परम सत्य और सामाजिक विसंगति का चौराहा

भारतीय दर्शन के इतिहास में आदि शंकराचार्य का नाम एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र की तरह लिया जाता है, जिन्होंने “सर्वं खलु इदं ब्रह्म” (सब कुछ ब्रह्म ही है) और “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः” जैसे अभूतपूर्व सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। उनका अद्वैत वेदांत दर्शन घोषणा करता है कि जड़-चेतन, राजा-रंक, सवर्ण-शूद्र, सब एक ही परम चेतना के विभिन्न रूप हैं। आत्मा नश्वर शरीर से परे है, और उसका कोई वर्ण या जाति नहीं होती। दार्शनिक धरातल पर इससे ऊँचा, समतावादी और स्वतंत्र विचार मनुष्य जाति के इतिहास में शायद ही कहीं और मिलता है।

परंतु, जैसे ही हम शंकराचार्य के इस परम दार्शनिक सत्य (पारमार्थिक सत्ता) से उतरकर उनके व्यावहारिक सामाजिक निर्देशन (व्यावहारिक सत्ता) को देखते हैं, हमें एक भयानक और विचलित कर देने वाला अंतर्विरोध दिखाई देता है। वह दार्शनिक जो आत्मा के स्तर पर पूर्ण स्वतंत्रता की बात करता है, समाज व्यवस्थापन के धरातल पर आकर वर्ण व्यवस्था का अंध-समर्थन करने लगता है। जब उनके इस विरोधाभास पर तीखे तार्किक सवाल उठाए जाते हैं, तो उनके सिद्धांत लड़खड़ाने लगते हैं। अंततः, एक गहरे बौद्धिक और नैतिक अपराध बोध  के चलते, समाज में उनकी साख और दर्शन को बचाने के लिए ‘मनीषा पंचकम’ जैसी चांडाल-संवाद की किंवदंतियाँ गढ़ी जाती हैं। यह लेख आदि शंकराचार्य के दर्शन की उसी गहरी विसंगति, उनके व्यावहारिक तर्कों की विफलता और उससे जनित सामाजिक अराजकता का एक तटस्थ और तार्किक विश्लेषण है।

दो सत्यों का विभाजन — विशेषाधिकारों को बचाने की दार्शनिक तरकीब?

आदि शंकराचार्य ने अपने दर्शन में विरोधाभासों से बचने के लिए सत्य के दो स्तर तय किए—पारमार्थिक सत्य , जहाँ कोई भेद नहीं है) और व्यावहारिक सत्य , जहाँ संसार और जातिगत नियम काम करते हैं)। उन्होंने व्यावहारिक धरातल पर वर्ण व्यवस्था को मान्य करने के लिए मुख्यतः तीन तर्क दिए:

कर्मफल और पुनर्जन्म का सिद्धांत : शंकराचार्य के अनुसार, किसी का शूद्र या ब्राह्मण कुल में जन्म लेना पूर्वजन्म के संचित कर्मों (प्रारब्ध) का अकाट्य परिणाम है। इसलिए सामाजिक ऊंच-नीच ईश्वर या समाज का अन्याय नहीं, बल्कि प्रकृति का स्वतः चालित न्याय है।

त्रिगुण और आंतरिक स्वभाव : उन्होंने भगवद्गीता के भाष्यों में स्पष्ट किया कि समाज के कुशल संचालन के लिए व्यक्ति को उसके स्वाभाविक मानसिक झुकाव (सत्त्व, रजस, तमस) के अनुसार काम मिलना चाहिए। ब्राह्मण में सत्त्व और शूद्र में तमस की प्रधानता होती है।

चित्त शुद्धि के लिए ‘स्वधर्म’ की अनिवार्यता: मोक्ष के लिए ‘ज्ञान’ आवश्यक है, और ज्ञान के लिए मन का शुद्ध होना जरूरी है। शंकराचार्य का तर्क था कि यदि व्यक्ति अपने वर्ण के लिए निर्धारित कर्तव्यों (स्वधर्म) का पालन निष्काम भाव से करेगा, तो उसका चित्त शुद्ध होगा और वह अंततः मोक्ष का अधिकारी बनेगा।

तार्किक प्रतिवाद: लेकिन यह विभाजन सिद्धांत और व्यवहार की एक गहरी खाई को जन्म देता है। एक तरफ अद्वैत दर्शन चीख-चीख कर कहता है कि यह संसार मिथ्या है, शरीर नश्वर है, और जाति-वर्ण सब ‘माया’ के खेल हैं। लेकिन जब समाज को निर्देश देने की बात आती है, तो वही दर्शन माया के बनाए शोषक नियमों (जाति व्यवस्था) को अक्षुण्ण रखने के लिए अड़ जाता है। क्या यह एक स्पष्ट बौद्धिक पाखंड नहीं दिखाई देता?

परशुराम का उदाहरण और जन्म बनाम गुण के सिद्धांत की पूर्ण विफलता

शंकराचार्य का पूरा सामाजिक ढांचा इस बात पर टिका है कि पूर्वजन्म के पुण्यों के कारण व्यक्ति सतो गुणी होता है, जिसके फलस्वरूप उसका ब्राह्मण कुल में जन्म लेना तय होता है। लेकिन इतिहास और पुराणों के जीवंत उदाहरण इस सिद्धांत की धज्जियां उड़ा देते हैं।

• परशुराम का क्रोधी और तामसिक स्वभाव: भगवान परशुराम का उदाहरण इस सिद्धांत की सबसे बड़ी विफलता है। यदि ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वाला अनिवार्य रूप से सतो गुणी (शांत, तपस्वी, क्षमाशील) होना चाहिए, तो परशुराम इतने क्रोधी, प्रतिशोधी और युद्धप्रिय क्यों थे? क्षत्रियों का 21 बार संहार करना रजोगुण और तमोगुण के चरम लक्षण हैं, सत्त्वगुण के नहीं।

• लीपापोती के पौराणिक कुतर्क: पारंपरिक व्यवस्था इस विसंगति को छिपाने के लिए महर्षि ऋचीक और सत्यवती के ‘यज्ञीय चरु’ (खीर का प्रसाद) के बदल जाने की चमत्कारी कथाएं गढ़ती है, जिसमें कहा जाता है कि क्षत्रिय गुण अनजाने में ब्राह्मण कुल में संक्रमित हो गए।

• सिद्धांत का ध्वस्त होना: यह पूरी व्याख्या एक दार्शनिक लीपापोती प्रतीत होती है। यदि जन्मना वर्ण व्यवस्था ईश्वरीय और अकाट्य नियम है, तो प्रकृति में ऐसे अपवाद  क्यों पैदा होते हैं? यदि परशुराम ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी क्षत्रिय/तामसिक स्वभाव के हो सकते हैं, रावण ब्राह्मण होकर परम तामसिक राक्षस हो सकता है, और महर्षि विश्वामित्र क्षत्रिय होकर परम सतो गुणी ऋषि बन सकते हैं—तो यह सिद्ध होता है कि जन्म और आंतरिक गुण का कोई अनिवार्य संबंध नहीं है। प्रकृति किसी की जाति देखकर गुण नहीं बांटती। अतः, जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था का शंकराचार्य द्वारा समर्थन दार्शनिक रूप से पूरी तरह विफल साबित होता है।

संस्थागत अन्याय और सामाजिक ज्वालामुखी (व्यावहारिक अराजकता का जनक)

शंकराचार्य और उनके समकालीन पारंपरिक विचारकों का सबसे बड़ा डर यह था कि यदि वर्ण व्यवस्था को ढीला किया गया, तो समाज में अराजकता फैल जाएगी। लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट है—अराजकता तो स्वयं शंकराचार्य के इस व्यावहारिक निर्देशन में निहित थी।

• दमित ऊर्जा का समाजशास्त्रीय यथार्थ: यह एक स्थापित व्यावहारिक सत्य है कि प्रकृति किसी भी कुल में प्रतिभा दे सकती है। यदि शूद्र कुल में जन्मा कोई व्यक्ति नेतृत्व प्रतिभा , रणनीतिक बुद्धि या दार्शनिक चेतना के धनी (सत्त्व या रजोगुणी) रूप में पैदा होता है, और आप उसे केवल उसके ‘जन्म’ के कारण जबरन मैला उठाने या पैरों की सेवा करने के ‘सेवाकर्म’ में बने रहने के लिए बाध्य करते हैं, तो उसकी वह प्रचंड ऊर्जा दमित (Suppress) हो जाती है।

• सामाजिक विस्फोट की बारूद: जब किसी मनुष्य की आंतरिक चेतना और उसकी बाहरी सामाजिक स्थिति में इतना भयानक टकराव होगा, तो वह कुंठा का रूप लेगी। यही कुंठा जब सामूहिक रूप धारण करती है, तो समाज रूपी धरातल में ज्वालामुखी के फटने की वजह बन जाती है।

• इतिहास की गवाही: जिसे शंकराचार्य ‘सामाजिक व्यवस्था’ कह रहे थे, वह वास्तव में संस्थागत अन्याय (Institutional Injustice) पर टिकी एक हिंसक व्यवस्था थी। इतिहास ने सिद्ध किया कि जब-जब इस दमित ऊर्जा को दबाया गया, तब-तब सामाजिक विस्फोट हुए। बौद्ध धर्म का उभार, मध्यकाल का भक्ति आंदोलन (कबीर, रविदास) और आधुनिक युग में डॉ. बी.आर. अंबेडकर का सामाजिक न्याय का आंदोलन—ये सब उसी दमित ऊर्जा के ज्वालामुखी के फटने के जीवंत उदाहरण हैं, जिसने इस रूढ़िवादी सामाजिक व्यवस्था को बार-बार ध्वस्त किया।

मोक्ष के द्वारों का निजीकरण और ‘अपशूद्राधिकरण’ की क्रूरता

शंकराचार्य के दर्शन में मोक्ष का एकमात्र साधन ‘ज्ञान’ है। वे कर्म को मोक्ष का सीधा कारण नहीं मानते। लेकिन जब वे समाज के एक बहुत बड़े हिस्से (शूद्रों) को केवल शारीरिक सेवाकर्म तक सीमित रखने की बात करते हैं, तो वे सैद्धांतिक रूप से उनके लिए मोक्ष के दरवाजे ही बंद कर देते हैं।

• ब्रह्मसूत्र भाष्य का ‘अपशूद्राधिकरण’ (१.३.३४ से १.३.३८): इस विसंगति का सबसे क्रूर प्रमाण शंकराचार्य के अपने ग्रंथों में मिलता है। यहाँ वे स्पष्ट व्यवस्था देते हैं कि शूद्रों का उपनयन (जनेऊ) संस्कार नहीं होता, इसलिए उन्हें वेदों को पढ़ने या सुनने का कोई अधिकार नहीं है। वे यहाँ तक सामाजिक कठोरता का समर्थन करते हैं कि यदि कोई शूद्र वेद सुने, तो उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल देना चाहिए।

• अवसरों का हरण: बचाव में शंकराचार्य कहते हैं कि शूद्रों को इतिहास और पुराणों को सुनने का अधिकार है, जिससे वे ज्ञान पा सकते हैं। लेकिन यह एक व्यावहारिक धोखा है। जब आप किसी वर्ग को दिन-रात हाड़-तोड़ शारीरिक श्रम में बांध देते हैं, तो उसके पास चिंतन करने या ज्ञान के मर्म को समझने का समय और मानसिक अवकाश  बचता ही नहीं है।

• विदुरादि का एस्केपिस्म : जब उनसे विदुर और धर्मव्याध जैसे शूद्रों के परम ज्ञानी होने पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कह दिया कि यह उनके ‘पूर्वजन्म के संचित पुण्यों’ का फल था। वर्तमान जीवन के संस्थागत अन्याय को सही ठहराने के लिए पूर्वजन्म का सहारा लेना एक दार्शनिक पलायनवाद के सिवा कुछ नहीं है।

खंड 5: नैतिक साहस का जवाब देना और ‘चांडाल संवाद’ की किंवदंती का सच

जब आदि शंकराचार्य का अद्वैत दर्शन (सब एक हैं) और उनका व्यावहारिक निर्देशन (शूद्र अछूत हैं) आमने-सामने आते हैं, तो यह अंतर्विरोध इतना तीखा हो जाता है कि तार्किकता के धरातल पर उनका नैतिक साहस जवाब दे देता है। इसी बौद्धिक अपराध बोध  के चलते काशी के ‘चांडाल संवाद’ की किंवदंती सामने आती है।

• काशी का प्रसंग और ‘मनीषा पंचकम’: कथा के अनुसार, काशी के एक संकरे मार्ग पर जब शंकराचार्य के सामने एक चांडाल (श्वपच) आया, तो उन्होंने अपनी जातिगत शुचिता के अहंकार में आकर उसे ‘दूर हटो, दूर हटो’ (गच्छ गच्छ) कहा। तब उस चांडाल ने पलटकर एक अकाट्य दार्शनिक प्रश्न पूछा—”हे सन्यासी! तुम किसे हटने को कह रहे हो? इस अन्न से बने शरीर को दूसरे शरीर से हटने को कह रहे हो, या मेरे भीतर बैठी उस चैतन्य आत्मा को तुम्हारे भीतर की आत्मा से दूर होने को कह रहे हो, जो दोनों एक ही हैं?”

• अपराध बोध और छवि सुधार का अनुमान: यह प्रश्न साक्षात् शंकराचार्य के अपने दर्शन का आइना था। कथा कहती है कि वे चांडाल के पैरों में गिर पड़े और ‘मनीषा पंचकम’ स्तोत्र की रचना की, जिसमें कहा गया कि जिसके पास आत्मज्ञान है, चाहे वह ब्राह्मण हो या चांडाल, वह मेरा गुरु है।

• ऐतिहासिक यथार्थ: आधुनिक और आलोचनात्मक इतिहासकारों के अनुसार, यह अनुमान अत्यंत सटीक लगता है कि यह कहानी बाद के कालखंडों में गढ़ी गई एक ‘लीपापोती’ (Hagiographical Patchwork) है। जब मध्यकाल में भक्ति आंदोलन के संतों ने जातिवाद पर कड़ा प्रहार किया और अद्वैत की इस सामाजिक संकीर्णता का मजाक उड़ाया, तब शंकराचार्य के अनुयायियों ने उनकी कट्टर छवि को सुधारने और इस भयानक अंतर्विरोध पर पर्दा डालने के लिए इस किंवदंती को जन्म दिया। यह कहानी असल में उस ‘अपराध बोध’ की दार्शनिक स्वीकृति है, जो स्वीकार करती है कि व्यावहारिक धरातल पर अद्वैत दर्शन पूरी तरह विफल रहा था।

खंड 6: आधुनिक युग में विसंगति का खंडन — विवेकानंद, अंबेडकर, कबीर और फुले

शंकराचार्य के इस दार्शनिक विरोधाभास की धज्जियां आधुनिक और मध्यकालीन भारत के महान विचारकों ने पूरी तरह उड़ा दीं, जिससे यह साफ हो गया कि इस दर्शन की सच्चाई के लिए धरातल पर कोई जगह नहीं थी।

• स्वामी विवेकानंद का व्यावहारिक अद्वैतवाद: विवेकानंद ने शंकराचार्य के दर्शन को तो माना, लेकिन ज्ञान पर लगाए गए जातिगत प्रतिबंधों को “बौद्धिक अत्याचार” कहा। उन्होंने कहा कि यदि सबमें ब्रह्म है, तो शूद्रों को वेदों से दूर रखना आत्म-विरोधाभास है। उन्होंने अद्वैत को किताबों से निकालकर झोपड़ियों तक ले जाने की वकालत की।

• डॉ. बी.आर. अंबेडकर का ऐतिहासिक प्रहार: डॉ. अंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘Who Were the Shudras?’ में शंकराचार्य द्वारा उपनिषदों की कथाओं (जैसे जानश्रुति और सत्यकाम जाबाल की कथा) की की गई रूढ़िवादी व्याख्याओं का पर्दाफाश किया। शंकराचार्य ने यह सिद्ध करने के लिए कि ‘सत्यकाम जाबाल’ इसलिए ज्ञानी बन पाया क्योंकि उसके जैविक पिता कोई ब्राह्मण रहे होंगे (चूंकि शूद्र सत्य नहीं बोल सकता), व्याकरण की जो कसरत की थी, अंबेडकर ने उसे ब्राह्मणवादी वर्चस्व को बनाए रखने की एक सोची-समझी साजिश सिद्ध किया।

• कबीर और फुले की चोट: संत कबीर ने आध्यात्मिक चोट की कि जब सबका जन्म एक ही बूंद से हुआ है, तो कोई ब्राह्मण और कोई शूद्र कैसे हो सकता है? वहीं महात्मा जोतीराव फुले ने हिंदू धर्मग्रंथों के इन आख्यानों का ऐतिहासिक विश्लेषण करके दिखाया कि यह शूद्रों को मानसिक रूप से गुलाम बनाए रखने की एक सांस्कृतिक और आर्थिक तरकीब थी। उन्होंने ‘शिक्षा’ को इस गुलामी की काट बताया।

समकालीन राजनीतिक यथार्थ — सत्ता का मोह और दर्शन का अंत

यदि कोई आज भी यह सोचता है कि शंकराचार्य का अद्वैत दर्शन आज के समाज को संचालित कर रहा है, तो उसे वर्तमान भारत के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य को देखना चाहिए।

• नया धर्म रक्षक और वर्ग-हित: आज के दौर में जब पारंपरिक वर्ग (मुख्यतः ब्राह्मण समाज) वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व (जैसे नरेंद्र मोदी) को ‘नये दौर के सबसे बड़े धर्म रक्षक’ के रूप में प्रतिष्ठित करता है, तो यह सिद्ध हो जाता है कि समाज आज भी दार्शनिक आदर्शों से नहीं, बल्कि ठोस वर्ग-हितों, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सत्ता के संरक्षण के पुराने मोह से चल रहा है।

• अद्वैत का पूर्ण अवसान: यदि अद्वैत दर्शन धरातल पर सच होता, तो समाज में पहचान, जाति और वर्ग के आधार पर कोई राजनीतिक ध्रुवीकरण होता ही नहीं। किसी एक वर्ग का अपनी पहचान को बचाने या चमकाने के लिए किसी राजनीतिक सत्ता के पीछे लामबंद होना यह दिखाता है कि व्यवहार की दुनिया में ‘सर्वं खलु इदं ब्रह्म’ की कोई जगह नहीं है। वर्तमान की यह राजनीतिक वास्तविकता आदि शंकराचार्य के सामाजिक दर्शन की अंतिम और सबसे प्रत्यक्ष विफलता की घोषणा करती है।

रूढ़ियों से मुक्त ‘चेतना’ ही एकमात्र मार्ग है

आदि शंकराचार्य के इस पूरे विमर्श का निष्कर्ष यही है कि हमें एक महान दार्शनिक और एक रूढ़िवादी सामाजिक व्यवस्थापक के रूप में उन्हें अलग-अलग करके देखना होगा। उनका दर्शन (अद्वैत) क्रांतिकारी था, जिसने मनुष्य को सीधे ईश्वर (ब्रह्म) के समकक्ष खड़ा कर दिया। लेकिन उनका व्यावहारिक निर्देशन अत्यंत संकीर्ण और शोषक था, जो तत्कालीन सामंतवादी और ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था की मर्यादाओं का कैदी था। वे अपने युग की सीमाओं से बाहर नहीं निकल पाए।

आज के आधुनिक, लोकतांत्रिक और संवैधानिक युग में शंकराचार्य की वह सड़ी-गली वर्ण व्यवस्था पूरी तरह अप्रासंगिक और अनैतिक हो चुकी है। यदि आज के समाज को, और विशेष रूप से स्वयं ब्राह्मण समाज को भी अपनी वास्तविक बौद्धिक और नैतिक क्षमताओं को मुक्त करना है, तो उन्हें वर्ण व्यवस्था के इस झूठे मोह को पूरी तरह त्यागना होगा। ज्ञान, न्याय और समता को किसी जाति का विशेषाधिकार बनाने के बजाय सार्वभौमिक बनाना होगा। तभी जाकर उपनिषदों के महावाक्य—”तत् त्वम् असि” और “अहं ब्रह्मास्मि”—ग्रंथों के पन्नों से बाहर निकलकर एक वास्तविक, जीवंत और न्यायपूर्ण समाज के धरातल पर अवतरित हो सकेंगे।

Leave a Reply