विदेशी षड्यंत्र का प्रमाण कहां है? फ्रांस में सरकार को कटघरे में खड़ा करने वाले भारत के सत्तापक्षीय विमर्श को अपने देश में मताधिकार के सवाल पर आत्ममंथन क्यों नहीं सूझता?
लोकतंत्र में जन आंदोलन किसी सरकार के लिए असुविधा पैदा कर सकता है, उसकी प्रतिष्ठा को चुनौती दे सकता है और उसकी नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर सकता है। लेकिन लोकतंत्र की खूबी ही यह है कि सरकार के विरुद्ध उठने वाली आवाज को सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र का प्रमाण नहीं मान लिया जाता। जनता की शिकायतों को सुनना, उनकी पड़ताल करना और अपनी नीतियों में सुधार करना सरकार का दायित्व माना जाता है। आंदोलन के पीछे विदेशी धन, बाहरी शक्तियों या देश को अस्थिर करने की साजिश होने का आरोप भी लगाया जा सकता है, लेकिन उसके लिए प्रमाण चाहिए। महज आरोप के सहारे किसी आंदोलन की सामाजिक और राजनीतिक वैधता समाप्त नहीं की जा सकती।
दुनिया के अलग-अलग देशों में चल रहे जन आंदोलनों को देखने का यही प्रतिमान होना चाहिए। लेकिन भारत में पिछले कुछ वर्षों में एक विचित्र राजनीतिक प्रवृत्ति मजबूत हुई है। सरकार के समर्थक दूसरे देशों में होने वाले प्रदर्शनों को वहां की शासन व्यवस्था की विफलता, नेतृत्व की कमजोरी और जन असंतोष का प्रमाण बताते हैं। अपने देश में सरकार की नीतियों अथवा संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठाने वाले आंदोलनों के सामने आते ही उनका विमर्श बदल जाता है। यहां बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, चुनावी पारदर्शिता अथवा नागरिक अधिकारों से जुड़ी शिकायतों पर चर्चा करने के बजाय विदेशी फंडिंग, राष्ट्रविरोधी शक्तियों और षड्यंत्र की कहानियां सुनाई जाने लगती हैं।
फ्रांस के ताजा घटनाक्रम और भारत में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चल रहे विरोध के बीच यह दोहरा मापदंड विशेष रूप से उजागर हुआ है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के विजयादशमी भाषण ने इस बहस को और महत्वपूर्ण बना दिया है।
फ्रांस में उग्रता सरकार की विफलता का सवाल, भारत में विरोध साजिश कैसे?
फ्रांस में अक्टूबर 2026 के दौरान बढ़ते जन असंतोष ने वहां की सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। शुरुआत में छात्रों की शिक्षा संबंधी शिकायतों से सामने आया विरोध अब महंगाई, ईंधन की बढ़ती कीमतों, सार्वजनिक सेवाओं में कटौती और जीवनयापन के संकट से जुड़ गया है। 17 अक्टूबर को फ्रांस के अनेक शहरों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। इनमें बड़ी संख्या में लोग शांतिपूर्ण ढंग से शामिल हुए, लेकिन कुछ समूहों ने दुकानों में लूटपाट की, वाहनों में आग लगाई, सार्वजनिक इमारतों को नुकसान पहुंचाया और पुलिस से हिंसक टकराव किया।
रॉयटर्स की 17 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की विशाल भीड़ के बीच हिंसक समूहों की गतिविधियों ने कई शहरों में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ दी। पुलिस की तैयारी और भीड़ का अनुमान लगाने में हुई चूक पर भी सवाल उठे। 21 अक्टूबर को राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को फिर चेतावनी देनी पड़ी कि आगामी प्रदर्शनों में हिंसा और अव्यवस्था बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाने की घोषणा की, जबकि श्रमिक संगठनों ने महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं में कटौती के विरुद्ध पांच नवंबर को राष्ट्रव्यापी हड़ताल का कार्यक्रम बनाए रखा।<sup>1</sup>
फ्रांस की स्थिति का मूल्यांकन करते समय दो तथ्य एक साथ देखने होंगे। पहला, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और लोगों पर हमला करना स्वीकार्य नहीं है। दूसरा, कुछ प्रदर्शनकारियों की हिंसा से उन लाखों लोगों की शिकायतें निराधार नहीं हो जातीं जो अपनी शिक्षा, रोजगार, आय और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति से असंतुष्ट हैं।
सरकार की विफलता का प्रश्न इस बात से तय होगा कि उसने जनता की शिकायतों का समाधान करने में कितनी तत्परता दिखाई, संभावित हिंसा के बावजूद सुरक्षा व्यवस्था में कहां चूक हुई और पुलिस की कार्रवाई कितनी अनुपातिक रही। यदि सरकार अपनी नीतियों की आलोचना को केवल उपद्रव बताकर खारिज कर दे तो वह समस्या का समाधान नहीं करती, बल्कि उसे और गहरा करती है।
फ्रांस में भी सरकार ने आरंभ में पुलिस कार्रवाई का बचाव किया और वामपंथी दल ला फ्रांस इंसूमीज पर आंदोलन का राजनीतिक लाभ उठाने के आरोप लगाए। लेकिन 20 अक्टूबर के आसपास सामने आई रिपोर्टों में सुरक्षा व्यवस्था की तैयारियों, खुफिया आकलन और पुलिस तैनाती की कमियों पर गंभीर चर्चा हुई। सरकार के सामने यह सवाल था कि आंदोलन का पैमाना उसकी तैयारियों से इतना बड़ा कैसे हो गया।<sup>2</sup>
यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि सरकार की विफलता पर चर्चा करने के लिए आंदोलनकारियों को निर्दोष घोषित करना आवश्यक नहीं था। हिंसा की जांच अपनी जगह हुई और शासन की चूकों पर सवाल अपनी जगह उठे। लोकतांत्रिक जवाबदेही का अर्थ यही है।
मैक्रों ने विदेशी हस्तक्षेप और विदेशी दुष्प्रचार में फर्क किया
फ्रांस के आंदोलन के संदर्भ में विदेशी हस्तक्षेप का सवाल भी उठा। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सहित कुछ विदेशी नेताओं ने वहां की अशांति को प्रवासन और कट्टरपंथ से जोड़कर टिप्पणियां कीं। मैक्रों ने 21 अक्टूबर को ऐसी टिप्पणियों को अनुचित बताया और कहा कि घटनाओं के बाद विदेशी स्तर पर दुष्प्रचार किया गया। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि घटनाओं के दौरान प्रत्यक्ष विदेशी हस्तक्षेप के स्पष्ट संकेत सामने नहीं आए थे।<sup>3</sup>
इस अंतर को समझना बेहद जरूरी है। किसी विदेशी नेता का किसी आंदोलन पर टिप्पणी करना, किसी देश में चल रही अशांति का अपने राजनीतिक हित में इस्तेमाल करना और किसी आंदोलन को विदेशी धन से संचालित करना अलग-अलग स्थितियां हैं। एक का प्रमाण दूसरे का प्रमाण नहीं हो सकता।
फ्रांस की अशांति का इस्तेमाल विदेशी राजनीतिक शक्तियों ने अपने वैचारिक संदेश के लिए किया हो, तब भी इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि आंदोलन उन्हीं शक्तियों ने खड़ा किया था। यदि विदेशी फंडिंग का कोई ठोस प्रमाण है तो उसकी जांच होनी चाहिए। यदि ऐसा प्रमाण नहीं है तो महज आशंका के आधार पर जनता की शिकायतों को खारिज करना लोकतांत्रिक विवेक के विपरीत होगा।
भारत में आंदोलनकारियों पर विदेशी प्रभाव का आरोप लगाने वालों को फ्रांस के इस उदाहरण से सबक लेना चाहिए। किसी आंदोलन के बारे में पहले यह पूछना चाहिए कि लोग सड़कों पर क्यों उतरे हैं। उसके बाद यह जांच होनी चाहिए कि क्या उसके पीछे किसी बाहरी शक्ति की संगठित भूमिका का प्रमाण है। जांच का क्रम उलटकर पहले षड्यंत्र घोषित कर देना और फिर उसी धारणा के अनुरूप तथ्य तलाशना निष्पक्षता नहीं है।
यूनान में भी सरकार के सामने शिक्षा और जीवनयापन का संकट
फ्रांस अकेला उदाहरण नहीं है। 21 अक्टूबर को यूनान में हजारों छात्र और शिक्षक शिक्षा पर सरकारी खर्च बढ़ाने, स्कूलों में बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने और भीड़भरी कक्षाओं की समस्या दूर करने की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे। एथेंस सहित कई शहरों में प्रदर्शन हुए। शिक्षकों और दूसरे सार्वजनिक कर्मचारियों ने वेतन, कर्मचारियों की कमी और जीवनयापन की बढ़ती लागत से जुड़े मुद्दे भी उठाए। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, यूनान की सरकार ने शिक्षा संस्थानों के सुधार और छात्र आवास में निवेश की योजनाओं का उल्लेख किया, लेकिन प्रदर्शनकारियों की मांगें बनी रहीं।<sup>4</sup>
यूनान आर्थिक संकट और कठोर मितव्ययिता की नीतियों के लंबे दौर से गुजर चुका है। वहां के मौजूदा विरोध को भी आर्थिक कठिनाइयों, आवास की महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति के संदर्भ में समझा जा रहा है। सरकार के सामने चुनौती यह है कि आर्थिक सीमाओं के बावजूद नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को कैसे पूरा किया जाए।
क्या यूनान के छात्रों को यह कहकर चुप कराया जा सकता है कि वे देश की छवि खराब कर रहे हैं? क्या शिक्षकों की कमी दूर करने की मांग अपने-आप किसी विदेशी षड्यंत्र का प्रमाण बन जाती है? और क्या सरकार की आलोचना करने वाले हर नागरिक को किसी राजनीतिक शक्ति का मोहरा मान लिया जाना चाहिए?
इन प्रश्नों का उत्तर स्पष्ट है। आंदोलन के पीछे राजनीतिक दल सक्रिय हों, तब भी उसकी वास्तविक सामाजिक पृष्ठभूमि की जांच आवश्यक रहती है। सरकारों को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वे अपनी नीतियों पर सवाल उठाने वाले नागरिकों की शिकायतों को बिना प्रमाण बाहरी साजिश घोषित कर दें।
भारत में एसआईआर: मतदाता सूची की शुद्धता या मताधिकार की सुरक्षा?
अब भारत की ओर लौटिए। मतदाता सूची का शुद्धिकरण किसी भी लोकतंत्र की अनिवार्य आवश्यकता है। मृत व्यक्तियों के नाम हटाना, दोहरी प्रविष्टियों को समाप्त करना और अपात्र नामों की जांच करना चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है। लेकिन शुद्धिकरण का उद्देश्य पात्र नागरिकों को मताधिकार से वंचित करना नहीं हो सकता। इसीलिए ऐसी किसी भी प्रक्रिया में पारदर्शिता, उचित सूचना, दस्तावेजों की जांच, दावा-आपत्ति का अवसर और प्रभावी अपील की व्यवस्था अनिवार्य महत्व रखती है।
एसआईआर को लेकर उठ रहे सवाल इसी कसौटी पर परखे जाने चाहिए। विपक्षी दलों और नागरिक समूहों ने आरोप लगाया है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम हटाए गए, दस्तावेज जुटाने में गरीब और वंचित नागरिकों को कठिनाइयां हुईं तथा कुछ मामलों में जीवित व्यक्तियों को मृत या स्थानांतरित दर्ज कर दिया गया। निर्वाचन आयोग का पक्ष है कि प्रक्रिया का उद्देश्य दोहरी, मृत, स्थानांतरित और अन्य अपात्र प्रविष्टियों को हटाना है तथा गलत तरीके से बाहर किए गए मतदाताओं को दावा प्रस्तुत करने का अवसर उपलब्ध है।
20 अक्टूबर को रॉयटर्स की रिपोर्ट ने दिल्ली के कमता प्रसाद का मामला सामने रखा। 53 वर्षीय दर्जी को मतदाता सूची में मृत दर्ज कर दिया गया था, जबकि वह जीवित हैं और अपने नाम को बहाल कराने के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगा रहे थे। रिपोर्ट के अनुसार, पुनरीक्षण से जुड़े विवाद में देशभर में लगभग 13 करोड़ नाम हटाए जाने की सूचना थी। दिल्ली में लाखों नामों के हटने के बाद अनेक मतदाताओं को अपने नाम वापस जुड़वाने के लिए दस्तावेजों और अपील की लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है। आयोग ने गलत तरीके से बाहर हुए नामों की दोबारा जांच की बात कही है।<sup>5</sup>
एक व्यक्ति का गलत तरीके से मृत दर्ज हो जाना अपने-आप यह सिद्ध नहीं करता कि पूरी प्रक्रिया जानबूझकर गलत की गई। लेकिन ऐसे मामले प्रशासनिक त्रुटियों की गंभीरता अवश्य दिखाते हैं। यदि कोई नागरिक दशकों से मतदान करता आया हो और अचानक उसे अपना जीवित होना साबित करने के लिए कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ें, तो यह केवल कागजी गलती नहीं रह जाती। यह नागरिक के सम्मान, उसके समय और उसके संवैधानिक अधिकार का सवाल बन जाता है।
मतदाता सूची में नाम न होने का सबसे बड़ा नुकसान उस नागरिक को होता है जो अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने के बावजूद प्रशासनिक जटिलताओं के कारण मतदान नहीं कर पाता। इसलिए आयोग को केवल हटाए गए नामों की संख्या नहीं बतानी चाहिए, बल्कि यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि कितने नामों की जांच पूरी हुई, कितने पात्र नागरिकों के नाम गलत तरीके से हटे, कितने बहाल हुए और शिकायतों के निस्तारण में कितना समय लगा।
जब सवाल अदालत तक पहुंचे तो उन्हें षड्यंत्र बताकर टाला नहीं जा सकता
एसआईआर को लेकर विवाद केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं रहा है। उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों में प्रक्रिया से संबंधित याचिकाएं पहुंची हैं। कुछ याचिकाओं में आयोग की कार्यप्रणाली, निर्णय लेने की प्रक्रिया और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं।
दस अक्टूबर को प्रकाशित इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, निर्वाचन आयोग के भीतर एसआईआर से जुड़े कुछ निर्णयों पर दो निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियों के बारे में खबर सामने आने के बाद उच्चतम न्यायालय और बंबई उच्च न्यायालय में संबंधित याचिकाएं दायर की गईं। इनमें जांच और आयोग की कार्यप्रणाली से संबंधित राहतें मांगी गईं।<sup>6</sup>
यहां भी कानूनी स्थिति को ठीक-ठीक समझना चाहिए। किसी याचिका का स्वीकार होना, नोटिस जारी होना या न्यायालय द्वारा किसी विषय पर सुनवाई करना अपने-आप आरोपों को सिद्ध नहीं करता। न्यायालय का काम आरोपों और जवाबों की जांच करना है। लेकिन जब कोई संवैधानिक संस्था अदालत में उठाए गए सवालों का सामना कर रही हो, तब उन सवालों को बिना जांच देशविरोधी साजिश कहकर खारिज करना भी उचित नहीं है।
उच्चतम न्यायालय ने एसआईआर से संबंधित मामलों में प्रक्रिया, दावों और आपत्तियों के निस्तारण तथा प्रशासनिक जिम्मेदारियों पर निर्देश दिए हैं। पश्चिम बंगाल से जुड़े मामलों में न्यायालय ने मतदाता सूची में शामिल किए जाने के दावों पर अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार निर्णय लेने की आवश्यकता पर भी ध्यान दिलाया है।<sup>7</sup>
इन न्यायिक हस्तक्षेपों को आयोग के दोषी होने का अंतिम प्रमाण नहीं कहा जा सकता। लेकिन इनसे इतना जरूर स्पष्ट होता है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण महज प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है। इसका सीधा संबंध नागरिक के मताधिकार से है और इसलिए इसकी प्रक्रिया की वैधानिकता तथा निष्पक्षता की न्यायिक समीक्षा आवश्यक हो सकती है।
यही वह बिंदु है जहां लोकतांत्रिक विमर्श को गंभीर होना चाहिए। यदि किसी नागरिक को लगता है कि उसका नाम गलत तरीके से हटाया गया है, यदि किसी राजनीतिक दल को पुनरीक्षण की प्रक्रिया में पक्षपात की आशंका है और यदि किसी याचिका में कानून के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है, तो उनका उत्तर तथ्य, दस्तावेज और न्यायिक प्रक्रिया से दिया जाना चाहिए। आरोप लगाने वालों से प्रमाण मांगना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि आरोपों की जांच होने दी जाए।
मोहन भागवत का भाषण: चेतावनी या असहमति पर संदेह का वातावरण?
ऐसे समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का विजयादशमी भाषण महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश लेकर आया। 20 अक्टूबर 2026 को नागपुर में संघ के स्थापना दिवस समारोह में उन्होंने आंदोलनकारी गतिविधियों के पीछे वैश्विक षड्यंत्र की आशंका व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जब आंदोलन राजनीतिक स्वार्थ, विरोध और विद्वेष का साधन बन जाते हैं तो भारत को कमजोर करने वाली शक्तियां उनका लाभ उठाती हैं। यह वक्तव्य ऐसे समय आया जब एसआईआर और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के विरुद्ध देश में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे।<sup>8</sup>
किसी भी सामाजिक संगठन के प्रमुख को देश की एकता, शांति और स्थिरता पर अपनी चिंताएं व्यक्त करने का अधिकार है। विदेशी हस्तक्षेप की आशंका को भी सार्वजनिक बहस का विषय बनाया जा सकता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब व्यापक आशंका को किसी विशिष्ट आंदोलन की व्याख्या के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि उस आंदोलन के पीछे विदेशी फंडिंग या संगठित बाहरी षड्यंत्र का ठोस प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं रखा गया हो।
भागवत के वक्तव्य की आलोचना का आधार यही है। यदि एसआईआर को लेकर लोगों की शिकायतें हैं, यदि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मामले सामने आए हैं और यदि न्यायालयों में प्रक्रिया की वैधानिकता से जुड़े सवाल उठ रहे हैं, तो पहले उन सवालों का उत्तर आवश्यक है। आंदोलनकारियों को संभावित विदेशी षड्यंत्र का हिस्सा बताने से उनकी शिकायतों का निस्तारण नहीं हो जाता।
राष्ट्रीय एकता का अर्थ यह नहीं कि नागरिक संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठाना बंद कर दें। लोकतंत्र में संस्थाओं का सम्मान उनकी जवाबदेही से बढ़ता है, न कि आलोचना से उन्हें मुक्त कर देने से। निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है कि उसके निर्णय कानून और संविधान की कसौटी पर खरे उतरें।
भागवत के भाषण में एकता और सामाजिक सद्भाव का आग्रह था, लेकिन जब आंदोलन को लेकर वैश्विक षड्यंत्र की आशंका प्रमुखता से सामने आती है तो यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या इससे सरकार और आयोग के प्रति उठ रहे सवालों को हाशिये पर धकेलने का जोखिम नहीं पैदा होता? किसी आंदोलन को प्रमाण के बिना बाहरी षड्यंत्र के दायरे में रखना असहमति के प्रति संदेह का वातावरण पैदा कर सकता है।
लोकतंत्र में आंदोलन सरकार के लिए आईना होते हैं
फ्रांस, यूनान और भारत के उदाहरणों में एक साझा तत्व है—जनता की शिकायतें और उन शिकायतों पर शासन की प्रतिक्रिया। फ्रांस में महंगाई, सार्वजनिक सेवाओं और शिक्षा के संकट ने विरोध को व्यापक बनाया। यूनान में शिक्षा, वेतन और आवास की समस्या ने छात्रों और शिक्षकों को सड़क पर उतारा। भारत में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर सवाल उठे हैं कि कहीं पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित तो नहीं हो रहे।
तीनों देशों की राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। उनके कानून, प्रशासनिक ढांचे और आंदोलन का स्वरूप भी एक जैसा नहीं है। इसलिए उनकी सीधी तुलना करते समय सावधानी जरूरी है। लेकिन जन आंदोलन को समझने का लोकतांत्रिक सिद्धांत समान हो सकता है: पहले शिकायतों की जांच, फिर जिम्मेदारी का निर्धारण और उसके बाद यदि प्रमाण हों तो षड्यंत्र अथवा गैरकानूनी गतिविधियों की पड़ताल।
सरकार के विरुद्ध उठने वाली हर आवाज सही हो, यह आवश्यक नहीं। आंदोलनकारी भी गलत हो सकते हैं, राजनीतिक दल अपने लाभ के लिए आंदोलन का इस्तेमाल कर सकते हैं और हिंसक समूह शांतिपूर्ण विरोध का लाभ उठा सकते हैं। लेकिन इन संभावनाओं के आधार पर प्रत्येक आंदोलन को संदेह की दृष्टि से देखना भी उतना ही गलत है।
विदेशी फंडिंग के आरोप को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। यदि किसी संगठन ने गैरकानूनी धन प्राप्त किया है, यदि किसी बाहरी संस्था ने हिंसा भड़काने के लिए धन दिया है या यदि किसी देश की एजेंसी ने आंदोलन को गुप्त रूप से संचालित किया है, तो सरकार को जांच करके प्रमाण सामने रखने चाहिए। लेकिन बिना प्रमाण के ऐसी आशंका को राजनीतिक हथियार बना लेना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है।
भारत में सरकार और उसके समर्थकों के सामने आज यही कसौटी है। फ्रांस की सरकार की आलोचना करते समय यदि वे कहते हैं कि बढ़ता जन आक्रोश उसकी विफलता है, तो अपने देश में मताधिकार से जुड़े सवालों पर भी उन्हें उसी निष्पक्षता से विचार करना चाहिए। वहां पुलिस की तैयारी में कमी शासन की नाकामी मानी जाती है तो यहां किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से कट जाना भी प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न होना चाहिए। वहां प्रदर्शनकारियों की शिकायतों को सुनने की अपेक्षा की जाती है तो यहां भी आंदोलनकारियों को पहले देशविरोधी घोषित कर देना उचित नहीं हो सकता।
देशभक्ति का प्रमाण असहमति को दबाना नहीं, अधिकारों की रक्षा करना है
भारत का लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की व्यवस्था नहीं है। यह नागरिकों को सरकार चुनने, सरकार बदलने, नीतियों की आलोचना करने और संवैधानिक संस्थाओं से जवाब मांगने का अधिकार भी देता है। मताधिकार की रक्षा करने वाली संस्था पर सवाल उठाना अपने-आप मताधिकार का अपमान नहीं है। उलटे, यदि सवाल वास्तविक हैं तो उनका समाधान चुनावी व्यवस्था के प्रति विश्वास मजबूत कर सकता है।
मोहन भागवत जैसे प्रभावशाली सार्वजनिक व्यक्तित्व से अपेक्षा की जा सकती है कि वे राष्ट्रीय एकता की चिंता के साथ-साथ नागरिक अधिकारों और संवैधानिक जवाबदेही की चिंता को भी बराबर महत्व दें। विदेशी हस्तक्षेप के विरुद्ध सतर्कता आवश्यक है, लेकिन देश के भीतर उठने वाली हर असहमति को बाहरी षड्यंत्र से जोड़ देना न तो पर्याप्त प्रमाण पर आधारित दृष्टिकोण है और न ही लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा के अनुकूल।
लोकतंत्र में सरकारें आंदोलन से कमजोर नहीं होतीं; वे तब कमजोर होती हैं जब अपनी गलतियों को स्वीकार करने और सुधारने से इनकार करती हैं। आंदोलन कभी-कभी व्यवस्था की कमियों को सामने लाने का माध्यम बनते हैं। उन्हें सुनना सरकार की कमजोरी नहीं, शासन की जिम्मेदारी है। और यदि आंदोलन के भीतर हिंसा या गैरकानूनी गतिविधियां हैं तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए, बिना पूरे आंदोलन को अपराध घोषित किए।
फ्रांस में राष्ट्रपति मैक्रों के सामने चुनौती यही है कि वे सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखते हुए जनता के असंतोष का समाधान करें। भारत में चुनौती यह है कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के साथ किसी भी पात्र नागरिक का मताधिकार न छिने और प्रक्रिया पर उठने वाले सवालों का पारदर्शी उत्तर दिया जाए।
जन आंदोलनों को परखने का लोकतांत्रिक प्रतिमान किसी देश, दल या विचारधारा के अनुसार नहीं बदल सकता। विदेशी षड्यंत्र का आरोप हो तो प्रमाण दीजिए; प्रशासनिक गलती हो तो उसे सुधारिए; हिंसा हो तो कानून के अनुसार कार्रवाई कीजिए; और नागरिकों की शिकायतें हों तो उन्हें सुनिए।
लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं है कि सरकार अपने विरोधियों को कितनी मजबूती से जवाब देती है। परीक्षा यह है कि वह अपने आलोचकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए अपनी गलतियों को स्वीकार करने का कितना साहस दिखाती है।





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