• October 7, 2023

मोदी जी को बाबा भारती की कहानी पढ़ने की सलाह

मोदी जी को बाबा भारती की कहानी पढ़ने की सला
मोदी जी जब राष्ट्रीय राजनीति के रंगमंच पर उतरे उस समय उनके लिये स्थितियां चुनौतीपूर्ण थीं। अपनी ही पार्टी के एक प्रभावशाली वर्ग के लिये वे स्वीकार्य नहीं थे। दूसरी ओर पार्टी का भी कोई बेहतर पुरसाहाल नहीं था। कहा जाता है कि उस समय के भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने लालकृष्ण आडवाणी की नाराजगी की परवाह न करते हुये नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाये जाने के प्रस्ताव का अनुमोदन किया था लेकिन उन्हें उम्मीद नहीं थी कि चुनावों में भाजपा अकेले दम पर बहुमत हासिल कर पायेगी। वे कहीं न कहीं यह अंदाजा लगाये हुये थे कि भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी तो बन जायेगी लेकिन सरकार बनाने के लिये उसे दूसरे दलों की चिरौरी करनी पड़ेगी। ऐसे में अन्य पार्टियां कट्टर छवि वाले नरेंद्र मोदी का समर्थन करने को तैयार नहीं होगी तो छींका उनके भाग्य से टूट जायेगा। लेकिन मतदाताओं ने इन कयासों को ढेर कर दिया। यह सब कुछ हुआ जब नरेंद्र मोदी के हाथ में ईडी और सीबीआई की चाबी नहीं थी। आज जैसी फंडिंग भी उनके लिये नहीं थी। लेकिन आज तो नरेंद्र मोदी यह आभास दे रहे हैं कि चुनाव अभियान में बेतहाशा धन खर्च करने और विपक्ष की आर्थिक सप्लाई लाइन काटने के लिये ईडी और सीबीआई का इस्तेमाल किये बिना कार्य सिद्धि संभव नहीं है। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह की गिरफ्तारी प्रतिद्वंदियों की आर्थिक सप्लाई लाइन काटने के उनके अभियान की नवीनतम कड़ी है। पद संभालने के बाद से राजनीति में बढ़त बनाये रखने के लिये सकारात्मक प्रयासों पर भरोसा करने की बजाय वे इसी तरह के संदिग्ध नटखट करते नजर आते हैं। अब सब जान चुके हैं कि उन्होंने 2016 में जो नोटबंदी घोषित की थी उसका कोई प्रयोजन नहीं था सिवाय इसके कि उत्तर प्रदेश विधानसभा के 2017 में होने वाले चुनाव में विपक्ष को कैसे विरथ किया जाये। हुआ भी यही किवदंती है कि भाजपा ने सरकार होने के कारण पहले ही 500-1000 के अपने नोट बदलवा लिये थे जबकि कांग्रेस, बसपा और सपा का गुप्त फंड उनके दाव पर चढ़ गया था और चुनावी मुकाबला शुरू होने के पहले ही ये दल आउट होने के लिये अभिशप्त हो गये थे। इसके बाद हर चुनाव में यह उनका सिद्ध फार्मूला बन गया। किसी भी राज्य में चुनावी दुंदभी बजते ही विरोधी पार्टियों के फंड मैनेजरों के यहां सीबीआई और ईडी की धड़ाधड़ होने वाली रेड नोटबंदी का ही एक आयाम है। अजीब बात है कि कल तक भाजपा सहित सभी जिम्मेदार पार्टियां यह मानती रहीं हैं कि लोकतंत्र की खूबसूरती के लिये मजबूत विपक्ष जरूरी है लेकिन मोदी जी विपक्ष का सर्वनाश चाहते हैं। इसके पीछे दो ही बातें हो सकतीं हैं या तो वे निरंकुश और फासिस्ट शासन के कायल हैं या उनका आत्मविश्वास कमजोर है। विपक्ष के अंत की कल्पना का अर्थ लोकतंत्र के अंत की कामना है। लोकतंत्र तो तभी अस्तित्व में रह पायेगा जब पक्ष विपक्ष सलामत रहेंगे और पक्ष से अरूचि होने पर मतदाताओं के लिये दूसरा विकल्प उपलब्ध रहेगा।
बहरहाल संजय सिंह की गिरफ्तारी अगर सचमुच राजनीति में धनबल के प्रभाव को रोकने के लिये की गयी है तो इसका औचित्य हो सकता है। लेकिन सरकार की इस मामले में भावनायें अगर निष्कलुष हैं तो भाजपा के उन नेताओं की भी खोज ईडी को करना चाहिये जो सत्ता का फायदा उठाकर दोनों हाथों से रूपये बटोर रहे हैं। रातोंरात कहां से कहां जा पहुंचे ऐसे भ्रष्ट भाजपा नेता अंधो तक की आंख से ओझल नहीं हैं लेकिन ईडी सीबीआई को इस कदर रतौंधी हो चुकी है कि उसे भाजपा में कोई बेईमान नजर नहीं आता। भाजपा ही क्या जिन नेताओं को प्रधानमंत्री जी तक महाभ्रष्ट घोषित करते रहे उनके पाला बदलकर भाजपा में आते ही ईडी सीबीआई उन पर निगाह डालने की जुर्रत भुला देती है। इसके दर्जनों उदाहरण मौजूद हैं। किसी का नाम लेने की जरूरत इसलिये नहीं है।
राजनीति में धनबल का प्रभाव गंभीर समस्या है। रामो वामो के समय इसे घटाने के लिये सरकारी स्तर पर चुनाव फंड बनाने की बात होती थी ताकि पार्टियों को चुनाव अभियान में अंधाधुंध पैसा बहाने से रोका जा सके जिसके कारण आज पार्टियां कारपोरेट की बंधुआ बनने के लिये अभिशप्त रहतीं हैं। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी को इसमें कोई रूचि नहीं है। आत्म प्रचार की भूख प्रधानमंत्री जी पर इतनी हावी रहती है कि सबसे ज्यादा खर्चा तो वे अपनी ब्रांडिंग में करते हैं जिसकी बदौलत अमिताभ बच्चन की तरह ही वे भी राजनीति के मिलेनियम स्टार बन गये हैं। उनके महामानव स्वरूप का सम्मोहन इस कदर है कि लोग अपनी तार्किक शक्ति गंवाकर उनके दीवाने बने हुये हैं। ताजा सर्वे बता रहे हैं कि उनकी लोकप्रियता में पहले के मुकाबले भले ही कमी आयी हो लेकिन आज भी वे देश के किसी भी नेता से बहुत आगे हैं। क्यों न होेंगे जब रोजमर्रा के जीवन में तकलीफें बढ़ने से जो लोग सरकार को कोसते हैं वे ही उनको बदलने की बात आने पर कहने लगते हैं कि विकल्प क्या है। मोदी आज मजबूरी का नाम बन गया है।
संजय सिंह पर आरोप यह है कि गोवा विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पार्टी का फंड जुटाने के लिये उन्होंने ही अपने घर पर मनीष सिसौदिया से लाभार्थियों का लेनदेन कराया। अगर संजय सिंह ने ऐसा किया है तो इसमें कोई नयी बात नहीं है। पर्दे के पीछे हर पार्टी जायज नाजायज तरीके से फंड इकट्ठा करती है जिसमें बहुत बड़ा अंश अघोषित रहता है। क्योंकि हर चुनाव के लिये खर्च की एक सीमा तय है और चुनाव अभियान में अपने प्रतिद्वंदी से होड़ करने के लिये निर्धारित खर्च से कई गुना खर्च उनको करना पड़ता है। निश्चित रूप से इस बुराई का अंत होना चाहिये। लेकिन किसी बुराई का अंत करना प्रधानमंत्री जी का लक्ष्य नहीं है। इस कारण वे ऐसे किसी राजनीतिक सुधार के लिये सोचते तक नहीं हैं।
प्रधानमंत्री जी अपनी विध्वसंक सोच से उबर सकें तो राजनीति को शुद्ध और पवित्र करने के लिये वे बहुत कुछ कर सकते हैं। उन्हें निजी धन संपदा जोड़ने की गरज नहीं है और अपने परिजनों से भी उनका लगाव सीमित है जो उनके लिये हेराफेरी करें। जाहिर है कि इसके कारण लोग उनसे सबसे ज्यादा आशा लगाये बैठे थे पर उन्होंने इस दिशा में कुछ नहीं किया। पार्टियां इस कारण भी चुनावों में धनबल का सहारा लेने के लिये अभिशप्त रहतीं हैं कि मोदी युग के पहले तक हर पार्टी का कलेवर बहुत तंग होता था। नतीजतन चुनाव अभियान के समय पैड प्रचारक बनाये जाते थे जो गांव गांव में पार्टी की हवा बना सकें पर मोदी युग में भाजपा ने इस मामले में बेहतर संगठन किया है। बूथ स्तर तक उसने अपनी टीम बना रखी है जो समर्पित रहकर वोटरों की मानसिकता पर अपनी पार्टी और नेता को हावी बनाये रखने के लिये निरंतर अभियान चलाते रहते हैं। इस नाते मोदी जी चाहें तो चुनाव अभियान को सादगी से चलाकर भी कामयाबी को अपनी मुट्ठी में कर सकते हैं। इसके अलावा उपलब्धियों के नाम पर भी उनके खाते में बहुत कुछ है। उन्होंने देर सबेर भारत के हाथ से कश्मीर के छिन जाने की लोगों की आशंकाओं का पूरी तरह अंत कर दिया है। आतंकवाद पर भी देशभर में पूरी तरह लगाम है। निरंतर नयी घोषणायें और ईवेंट करके देश में रचनात्मक उत्साह का माहौल उन्होंने बनाये रखा है। दुनियां के शक्तिशाली देश तक उनसे सहमे जैसे रहते हैं। कनाडा के मामले में अमेरिका ने भारत को दबाव में लेने की कोशिश की थी पर जब मोदी ने तेवर दिखाये तो जो बाइडन को पूंछ दबाने में ही खैरियत समझ में आयी। यूक्रेन युद्ध में भी न रूस भारत को दबा पाया और न अमेरिकी खेमा। लेकिन देश में वे जो कर रहे हैं वह अनर्थकारी है। वे सुप्रीमकोर्ट को भी अनर्गल हेकड़ी दिखा सकते हैं, आम लोगों को भी। यहां तक कि संघ को भी। किसानों को उनकी जिद के कारण ही इतने लंबे समय तक आंदोलन करना पड़ा जिसमें 600 के करीब किसानों की जान चली गयी। पर उन्होंने बहुत दिनों तक इसकी परवाह नहीं की। केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के लड़के ने शांतिपूर्ण ढंग से चले आ रहे किसानों को जीप चढ़ाकर कुचल डाला। इसमें टेनी अपने प्रभाव का उपयोग लड़के को बचाने के लिये करते नजर आये। तकाजा यह था कि उनका इस्तीफा मांग लिया होता लेकिन उनका विभाग तक नहीं बदला गया। बृजभूषण शरण सिंह के बारे में दिल्ली पुलिस की चार्जशीट क्या कह रही है। फिर भी पार्टी के स्तर पर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुयी। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के मामले में एक निर्णय सुनाया तो प्रधानमंत्री जी का अहम फिर आहत हो गया और उन्होंने चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिये पैनल गठित करने के प्रस्ताव में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश को पृथक रखने का ऐलान सुना डाला। दिल्ली में अधिकारियों के ट्रांसफर पोस्टिंग में चुनी हुयी सरकार को निर्णायक बनाने का फैंसला जब सुप्रीमकोर्ट ने घोषित किया तो उन्होंने नया कानून बनाकर केजरीवाल सरकार को पंगु करके सुप्रीम कोर्ट को संदेश देने में हिचक नहीं की। संघ ने जब यह कहा कि राज्यों के चुनाव में मोदी के चेहरे की बजाय स्थानीय नेताओं और मुद्दों को केंद्र में रखा जाये तो राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के होने वाले चुनावों में उन्होंने स्थानीय क्षत्रपों की छुट्टी करके अपने ही चेहरे को थोप दिया। हर तंत्र में राजा लोकलाज का लिहाज करते हैं लेकिन मोदी जी को किसी लोकलाज की परवाह करने में अपनी हेठी लगती है। अभी तक उनका सिक्का मजबूत रहा है इसलिये उनका अभिमान बढ़ता ही गया है। पर मोदी जी को सोचना होगा कि अब जब मनमानी के चलते वे ढलान पर खिसकने लगें हैं तो अपनी मानसिकता पर पुनर्विचार करें। उन्हें पुराने समय में स्कूली बच्चों को पढ़ाई जाने वाली बाबा भारती की कहानी तो याद होगी ही जिसमें बताया गया था कि साधु का भेष बनाकर आये डकैत खड़गसिंह ने जब बाबा भारती से छल पूर्वक उनका घोड़ा हथिया लिया तो बाबा भारती ने उससे कहा कि घोड़ा तो तुमने ले लिया लेकिन किसी को यह न बताना कि साधु बनकर तुमने बाबा भारती को ठगा वरना लोग साधु पर विश्वास करना छोड़ देंगे। यही बात मोदी जी से कही जा सकती है कि अगर आपने लोगों का विश्वास भंग किया तो लोग नेता नाम का भरोसा करना बंद कर देंगे।

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