
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में टी. एन. शेषन का नाम एक ऐसे मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में दर्ज है जिसने चुनाव आयोग की शक्ति को कागज पर लिखे संवैधानिक अधिकार से निकालकर जमीन पर दिखाई देने वाली संस्थागत शक्ति में बदल दिया। लेकिन शेषन का पूरा मूल्यांकन केवल उनकी कठोरता और चुनाव सुधारों की प्रशंसा से नहीं किया जा सकता। उनके कार्यकाल में उनके अनेक फैसलों पर तीखे सवाल उठे, सरकार से टकराव हुआ, राजनीतिक दलों ने विरोध किया और सर्वोच्च न्यायालय ने भी उनकी कार्यशैली के कुछ पहलुओं पर प्रतिकूल टिप्पणियां कीं। इसके बावजूद समय बीतने के साथ उनकी विरासत का बड़ा हिस्सा चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा और चुनावी अनुशासन से जुड़ी मिसाल के रूप में स्थापित हुआ।
आज मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ है, वह इसी इतिहास की रोशनी में देखने योग्य है। फर्क यह है कि आज विवाद केवल किसी एक फैसले या चुनाव स्थगित करने के अधिकार तक सीमित नहीं है। सवाल मतदाता सूची के व्यापक पुनरीक्षण, उसके लिए उपलब्ध समय और प्रशासनिक क्षमता, लाखों मतदाताओं के नाम हटने, फिर उनके नाम बहाल कराने की अपीलों के पहाड़ और स्वयं निर्वाचन आयोग के भीतर दर्ज असहमतियों तक पहुंच गया है।
और यहीं से सबसे असहज प्रश्न सामने आता है—क्या चुनाव आयोग ने जिस विशाल प्रशासनिक प्रक्रिया का बीड़ा उठाया, उसके परिणामों को संभालने की अपनी क्षमता का पर्याप्त आकलन पहले किया था?
बंगाल का मौजूदा घटनाक्रम इस प्रश्न को असाधारण गंभीरता देता है।

37 लाख अपीलें और बारह साल का सवाल
पश्चिम बंगाल में एसआईआर के बाद मतदाता सूची से हटाए गए नामों के खिलाफ अपीलों की संख्या जिस स्तर तक पहुंची है, वह सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई है। निर्वाचन आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने बताया कि कुल 38.31 लाख अपीलें दायर हुई हैं। इनमें 22.21 लाख उन मतदाताओं की हैं जिनके नाम हटाए गए और वे अपने नाम वापस मतदाता सूची में शामिल कराने की मांग कर रहे हैं। 16.10 लाख अपीलें ऐसे नामों के खिलाफ हैं जिन्हें सूची में शामिल किया गया और जिन्हें हटाने की मांग की गई है। 37 लाख से अधिक अपीलें अभी लंबित हैं।
और सबसे चौंकाने वाला तथ्य स्वयं आयोग की ओर से सामने आया—मौजूदा गति से इस लंबित काम को पूरा करने में 12 वर्ष से अधिक लग सकते हैं। इसी कारण आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय से अपीलीय न्यायाधिकरणों की संख्या बढ़ाने का आग्रह किया है। फिलहाल 19 न्यायाधिकरण काम कर रहे हैं और आयोग ने पश्चिम बंगाल के 42 लोकसभा क्षेत्रों के अनुरूप 42 न्यायाधिकरण बनाने का प्रस्ताव दिया है।
यहीं वह प्रश्न पैदा होता है जिसे अब केवल राजनीतिक आरोप कहकर टाला नहीं जा सकता।
यदि मतदाता सूची के व्यापक पुनरीक्षण के बाद लाखों लोग अपने नाम बहाल कराने के लिए अपील करने को मजबूर होते हैं और उन अपीलों के निपटारे की मौजूदा क्षमता के आधार पर आयोग स्वयं कहता है कि काम पूरा करने में बारह वर्ष लग सकते हैं, तो क्या एसआईआर की शुरुआत करते समय पूरे प्रशासनिक तंत्र की क्षमता, समय और अपीलों के संभावित बोझ का वास्तविक आकलन किया गया था?
यह सवाल इसलिए और बड़ा है क्योंकि मतदाता सूची कोई सामान्य सरकारी रजिस्टर नहीं है। उसमें किसी नाम का होना या न होना नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार के सीधे इस्तेमाल से जुड़ा है।
संख्या नहीं, एक-एक मतदाता का सवाल
एसआईआर के समर्थक पक्ष का तर्क है कि मतदाता सूची में मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित और दोहरे नाम बने रहना चुनाव की विश्वसनीयता के लिए खतरा है। यह तर्क अपने आप में गंभीर है। कोई भी लोकतांत्रिक व्यवस्था ऐसी मतदाता सूची नहीं चाह सकती जिसमें अपात्र नाम बने रहें।
लेकिन दूसरी तरफ उतना ही गंभीर सिद्धांत है—एक भी पात्र मतदाता केवल प्रशासनिक प्रक्रिया की कठिनाई के कारण मतदान से बाहर नहीं होना चाहिए।
यही कारण है कि जब 27.16 लाख हटाए गए मतदाताओं में से 22.21 लाख ने बहाली के लिए अपील की, तो यह आंकड़ा केवल प्रशासनिक काम का आंकड़ा नहीं रह जाता। यह बताता है कि हटाए गए नामों के बड़े हिस्से के सामने अपने लोकतांत्रिक अधिकार को वापस पाने के लिए अलग प्रक्रिया अपनानी पड़ी। आयोग के आंकड़ों के अनुसार अब तक तय हुई अपीलों में एक लाख से अधिक नाम वापस जोड़े जा चुके हैं।
यहां से आयोग की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
यदि पहले मतदाता को सूची से बाहर किया गया और फिर उसी मतदाता को अपना नाम वापस पाने के लिए न्यायिक या अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया में जाना पड़ा, तो पूरी व्यवस्था की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि कितने अपात्र नाम हटे। यह भी देखना होगा कि कितने पात्र लोग इस प्रक्रिया में अनावश्यक रूप से फंसे।

बंगाल की सीटों ने विवाद को चुनाव परिणाम तक पहुंचा दिया
विवाद का सबसे विस्फोटक पहलू अब यह है कि एसआईआर से हटाए गए मतदाताओं की संख्या और विधानसभा चुनाव के जीत के अंतर को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के सामने एक आवेदन में यह मुद्दा उठाया गया कि बंगाल की 31 विधानसभा सीटों पर भाजपा की जीत का अंतर हटाए गए मतदाताओं की संख्या से कम था। बाद में निर्वाचन आयोग ने अपने जवाब में इस तुलना को चुनौती दी और कहा कि केवल कुल हटाए गए नामों की संख्या की तुलना जीत के अंतर से करना गलत और अनुमानाधारित तरीका है, क्योंकि हटाए गए नामों में अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और दोहरे नाम भी शामिल थे। आयोग ने यह भी बताया कि ऐसी सीटें थीं जिन्हें तृणमूल कांग्रेस ने जीता, जबकि वहां भी हटाए गए नामों की संख्या जीत के अंतर से अधिक थी।
यानी यहां दो तथ्य एक साथ मौजूद हैं।
पहला—ऐसी सीटों की संख्या को लेकर गंभीर प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखे गए हैं जहां हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से अधिक बताई गई।
दूसरा—निर्वाचन आयोग कह रहा है कि इस आधार पर चुनाव परिणाम को संदिग्ध मानना उचित नहीं है, क्योंकि सभी हटाए गए नाम वास्तविक पात्र मतदाता नहीं थे।
अब असली समस्या यह है कि इन दोनों दावों के बीच अंतिम सत्य किस प्रक्रिया से सामने आएगा।
यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय के सामने मामला असाधारण रूप से कठिन है। यदि किसी चुनाव क्षेत्र में बाद की न्यायिक प्रक्रिया यह स्थापित करती है कि बड़ी संख्या में वास्तविक पात्र मतदाता गलत तरीके से सूची से बाहर हुए और उनकी संख्या चुनाव के जीत के अंतर से अधिक थी, तो चुनाव परिणाम की वैधता का प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठेगा। दूसरी ओर केवल सांख्यिकीय समानता से किसी चुनाव को अमान्य घोषित नहीं किया जा सकता। चुनाव परिणाम को चुनौती देने की अपनी वैधानिक प्रक्रिया है और निर्वाचन आयोग ने भी इसी ओर ध्यान दिलाया है।
इसलिए अदालत के सामने असली चुनौती केवल यह नहीं है कि किसके कितने वोट कटे। चुनौती यह है कि क्या एसआईआर से मतदाता सूची में हुई ऐसी गड़बड़ी का कोई प्रमाणित चुनावी प्रभाव पड़ा जिसे कानून की कसौटी पर परिणाम से जोड़ा जा सके।
शेषन भी विवादों से बाहर नहीं थे
यहीं टी. एन. शेषन का उदाहरण उपयोगी हो जाता है।
शेषन के कार्यकाल को आज अक्सर चुनाव आयोग की दृढ़ता और स्वायत्तता के स्वर्णिम दौर के रूप में याद किया जाता है। लेकिन उनके समय की वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल थी।
उन्होंने चुनावी आचार संहिता को कठोरता से लागू किया, चुनावी खर्च और प्रशासनिक मशीनरी पर नियंत्रण की कोशिश की, चुनावी अनियमितताओं के खिलाफ सख्त रुख अपनाया और कई बार चुनाव प्रक्रिया को रोकने या तारीखों में बदलाव करने तक के निर्णय लिए। इन फैसलों ने राजनीतिक व्यवस्था में भूचाल पैदा किया।
उनकी शैली को लेकर राजनीतिक विरोध हुआ। सरकार से उनका संघर्ष हुआ। और अंततः सर्वोच्च न्यायालय में भी उनकी कार्यशैली के कुछ पहलुओं की आलोचना दर्ज हुई।
1995 के टी. एन. शेषन बनाम भारत संघ फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग की बहुसदस्यीय संरचना से जुड़े विवाद पर फैसला देते हुए शेषन के कार्यकाल और उनके फैसलों से जुड़े कई प्रसंगों पर चर्चा की। फैसले में उनके कुछ निर्णयों के प्रति मिली-जुली प्रतिक्रिया, कुछ फैसलों के अदालत में टिक न पाने और उनके सार्वजनिक वक्तव्यों में संयम की आवश्यकता का उल्लेख मिलता है।
लेकिन आज शेषन को केवल इन विवादों से याद नहीं किया जाता।
यही इतिहास का दिलचस्प पक्ष है।
किसी अधिकारी की तत्कालीन आलोचना और उसका दीर्घकालीन संस्थागत मूल्यांकन एक ही चीज नहीं होते।
शेषन के मामले में समय ने उनके कठोर फैसलों के साथ-साथ उनके द्वारा निर्वाचन आयोग की शक्ति को स्थापित करने के प्रयास को भी देखा। चुनाव आयोग को सरकार और राजनीतिक दलों से ऊपर खड़ी संवैधानिक संस्था के रूप में देखने की जो धारणा मजबूत हुई, उसमें उनका कार्यकाल महत्वपूर्ण पड़ाव बना।
लेकिन आज सवाल सिर्फ फैसलों का नहीं, नीयत के भरोसे का है
ज्ञानेश कुमार के मामले में विवाद का स्वर कुछ अलग है।
यहां आलोचना करने वाला वर्ग केवल यह नहीं कह रहा कि आयोग ने कोई कठोर फैसला किया। आलोचना का एक बड़ा हिस्सा यह है कि क्या इतनी व्यापक प्रक्रिया के लिए संस्थागत तैयारी पर्याप्त थी?
यह सवाल इसलिए पैदा हुआ है क्योंकि अब परिणाम स्वयं सामने हैं—लाखों अपीलें, न्यायाधिकरणों पर भारी बोझ और आयोग का यह कहना कि मौजूदा गति से काम पूरा होने में बारह वर्ष से अधिक लग सकते हैं।
इसे महज विपक्ष की राजनीतिक भाषा कहकर खारिज करना कठिन है।
और संदेह को और बल उस समय मिलता है जब आयोग के भीतर से ही दो निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियों की खबर सामने आती है। इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों या आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट में नए मतदाताओं के फार्म में बदलाव, मतदाता डेटा तक पहुंच के केंद्रीकरण, मतदाता नाम जोड़ने-हटाने और बंगाल में अपीलों से जुड़े निर्णयों को लेकर उनकी आपत्तियों का उल्लेख है।
यह किसी राजनीतिक दल का आरोप नहीं है। यह आयोग के भीतर दर्ज असहमति का प्रश्न है।
विशेष रूप से तब, जब एक आयुक्त ने कुछ कदमों को “unauthorised” और “illegal” बताते हुए आपत्ति दर्ज की होने की बात रिपोर्ट में सामने आई है।
बेशक, किसी आयोग के भीतर असहमति अपने आप में किसी फैसले को गलत या अवैध सिद्ध नहीं करती। तीन सदस्यीय आयोग में मतभेद होने की स्थिति में बहुमत का निर्णय मान्य हो सकता है। लेकिन संवैधानिक संस्था में बार-बार दर्ज हो रही असहमति जनता के भरोसे के प्रश्न को जरूर गंभीर बनाती है।
शेषन पर नीयत का सवाल क्यों नहीं टिक पाया?
शेषन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि शायद यह नहीं थी कि उन्होंने हर फैसला सही किया। उनके कार्यकाल के दौरान यह दावा करना भी कठिन है कि उनके हर निर्णय को न्यायपालिका ने स्वीकार किया।
उनकी ताकत यह थी कि उनके पूरे सार्वजनिक जीवन को देखने पर उनकी केंद्रीय चिंता चुनावी प्रक्रिया की शुचिता और निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता के इर्द-गिर्द दिखाई देती थी। उनकी शैली कठोर थी, कई बार टकरावपूर्ण थी और कई बार अदालत से उन्हें झटका भी मिला। फिर भी उनके कार्यकाल की मूल संस्थागत विरासत को बाद के दशकों ने स्वीकार किया।
आज विवाद इसलिए ज्यादा गहरा है कि आलोचकों का एक बड़ा वर्ग फैसले से आगे बढ़कर प्रक्रिया और नीयत पर सवाल उठा रहा है।
यहां सावधानी जरूरी है। किसी सार्वजनिक संस्था या अधिकारी की नीयत को तथ्य के रूप में संदिग्ध घोषित नहीं किया जा सकता जब तक उसके समर्थन में प्रमाण न हों। लेकिन लोकतंत्र में यह भी संभव नहीं कि जनता के बीच पैदा हुए व्यापक संदेह को केवल “राजनीतिक आरोप” कहकर समाप्त कर दिया जाए।
विश्वास मांगने से नहीं, प्रक्रिया से पैदा होता है।
यदि आयोग अपने फैसलों के कारण विवाद में है तो उसे अधिक पारदर्शिता दिखानी होगी। यदि उसके भीतर दो आयुक्त लगातार आपत्ति दर्ज कर रहे हैं तो उन आपत्तियों का सार्वजनिक महत्व है। यदि लाखों मतदाताओं को अपील करनी पड़ रही है तो प्रक्रिया की समीक्षा जरूरी है। और यदि अदालत के सामने यह प्रश्न आ रहा है कि मतदाता सूची में हुए बदलावों का चुनाव परिणाम पर संभावित प्रभाव क्या पड़ा, तो आयोग को केवल अपने फैसले का बचाव नहीं, बल्कि उसके परिणामों का भी उत्तर देना होगा।
सवाल एसआईआर के औचित्य से आगे निकल चुका है
मतदाता सूची का पुनरीक्षण होना चाहिए या नहीं—इस प्रश्न का उत्तर बहुत सरल है। होना चाहिए।
मृत व्यक्ति का नाम हटना चाहिए। स्थायी रूप से स्थानांतरित व्यक्ति की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। दोहरे नाम हटने चाहिए। फर्जी नाम नहीं रहने चाहिए। यह चुनाव की विश्वसनीयता की बुनियादी शर्त है।
लेकिन असली प्रश्न है—किस कीमत पर?
यदि एक वास्तविक मतदाता को अपना नाम साबित करने के लिए बार-बार दस्तावेज देने पड़ें, न्यायाधिकरण जाना पड़े, अपील करनी पड़े और फिर भी लाखों मामलों के निपटारे में वर्षों लगने की स्थिति पैदा हो जाए, तो प्रक्रिया की प्रशासनिक डिजाइन पर सवाल उठेंगे ही।
यही वह बिंदु है जहां शेषन और ज्ञानेश कुमार के दौर की तुलना सार्थक होती है।
शेषन ने चुनाव आयोग की शक्ति बढ़ाई थी। आज प्रश्न यह है कि उस शक्ति का इस्तेमाल कितनी सावधानी, कितनी पारदर्शिता और कितनी संस्थागत जवाबदेही के साथ किया जा रहा है।
इतिहास अभी फैसला नहीं सुनाएगा
शेषन के समय भी तत्कालीन आलोचक यह नहीं जानते थे कि तीन दशक बाद इतिहास उनके बारे में क्या कहेगा। आज ज्ञानेश कुमार के बारे में भी अंतिम फैसला देना जल्दबाजी होगी।
लेकिन एक फर्क जरूर है।
शेषन के मामले में उनके कठोर फैसलों ने चुनाव आयोग की शक्ति और चुनावी अनुशासन की बहस को आगे बढ़ाया। आज एसआईआर के मामले में निर्वाचन आयोग को यह साबित करना है कि व्यापक पुनरीक्षण मतदाता सूची को साफ करने की प्रक्रिया भर नहीं, बल्कि मतदाता के अधिकार की रक्षा करने वाली प्रक्रिया भी है।
बंगाल के 37 लाख से अधिक लंबित मामले इस समय आयोग के सामने सबसे बड़ा आईना हैं। आयोग स्वयं कह रहा है कि वर्तमान क्षमता से इन्हें निपटाने में 12 वर्ष से अधिक लग सकते हैं। इसलिए अब सवाल केवल यह नहीं कि एसआईआर क्यों किया गया। सवाल यह है कि इतना बड़ा अभियान शुरू करने से पहले उसके बाद पैदा होने वाले विवादों और अपीलों को निपटाने की क्षमता का आकलन क्यों पर्याप्त नहीं साबित हुआ?
और यदि आगे न्यायिक प्रक्रिया में यह साबित होता है कि बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटे और कहीं उनका प्रभाव चुनाव परिणाम की निर्णायक सीमा तक पहुंचा, तो सवाल और गंभीर होगा।
वहीं यदि आयोग यह साबित कर देता है कि हटाए गए नामों का बड़ा हिस्सा वास्तव में मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित या दोहरे मतदाता थे और चुनाव परिणाम पर उनका कोई वास्तविक प्रभाव नहीं पड़ा, तो उसका पक्ष मजबूत होगा। आयोग फिलहाल इसी आधार पर जीत के अंतर और हटाए गए नामों की संख्या की सीधी तुलना को भ्रामक बता रहा है।
यानी इस समय फैसला किसी एक पक्ष के हाथ में नहीं है।
लेकिन जिम्मेदारी पूरी तरह निर्वाचन आयोग की है।
क्योंकि चुनाव में हारने वाली पार्टी अगले चुनाव में लौट सकती है। सरकार बदल सकती है। उम्मीदवार बदल सकते हैं। लेकिन मतदाता सूची पर जनता का भरोसा टूट गया तो उसकी मरम्मत बहुत कठिन होती है।
टी. एन. शेषन की विरासत का सबसे बड़ा सबक यही है कि निर्वाचन आयोग शक्तिशाली होना चाहिए, लेकिन उसकी शक्ति का अंतिम आधार जनता का विश्वास होना चाहिए।
शेषन के कई फैसलों पर विवाद हुआ, उनकी कार्यशैली पर अदालत तक ने सवाल उठाए, फिर भी समय के साथ उनके चुनावी सुधारों को मिसाल के रूप में देखा गया। ज्ञानेश कुमार के सामने भी इतिहास का यही अवसर है—लेकिन उसके लिए केवल कठोर निर्णय पर्याप्त नहीं होंगे।
उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि कठोरता के साथ प्रक्रियात्मक विश्वसनीयता, शक्ति के साथ पारदर्शिता, और मतदाता सूची की शुचिता के साथ हर पात्र मतदाता के अधिकार की सुरक्षा दिखाई दे।
क्योंकि अंततः निर्वाचन आयोग की सबसे बड़ी शक्ति कानून में लिखी धारा नहीं है।
उसकी सबसे बड़ी शक्ति यह विश्वास है कि वह सत्ता से नहीं, चुनाव की निष्पक्षता से संचालित होता है।
और आज एसआईआर के विवाद ने इसी विश्वास को सबसे कठिन परीक्षा के सामने खड़ा कर दिया है।





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