एक समय था जब आईएएस और आईपीएस अधिकारी राजनीति से दूरी को अपनी पेशेगत गरिमा का हिस्सा मानते थे। जनता में काम के कारण नायक जैसी छवि बनाने वाले कई अधिकारियों को राजनीतिक दलों ने चुनाव लड़ने के प्रस्ताव दिए, लेकिन उन्होंने इन्हें ठुकरा दिया। प्रशासनिक पद और उसकी प्रतिष्ठा ही उनके लिए पर्याप्त थी।

अब यह मानसिकता बदलती दिख रही है। नौकरशाही से राजनीति में आने वाले अधिकारी अभी भी अपवाद हैं, लेकिन उनकी संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण है इस रास्ते को लेकर बदलती सोच। अब किसी अधिकारी की लोकप्रियता केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, संभावित राजनीतिक पूंजी भी मानी जाने लगी है। दिव्या मित्तल का राजनीति में प्रवेश इस बदलाव का ताजा उदाहरण है।

ओम पाठक से शुरू होती एक पुरानी कहानी

1980 के दशक की शुरुआत में मेनका गांधी ने संजय गांधी विचार मंच के जरिए राजनीति में अपनी अलग जमीन बनाने की कोशिश की। उस समय सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी जे.एन. मिश्रा भी इससे जुड़े थे। उन्होंने कुछ अधिकारियों को चुनावी राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया।

उस दौर में लखनऊ के जिलाधिकारी रहे ओम पाठक का नाम इसी सिलसिले में सामने आता है। उन्होंने संजय गांधी विचार मंच के टिकट पर उपचुनाव लड़ने के लिए सेवा से इस्तीफा देने की पहल की, लेकिन सरकार ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया। लिहाजा वे राजनीति में जाने की अपनी योजना पूरी नहीं कर सके।

यह प्रसंग बताता है कि राजनीति का आकर्षण तब भी था, लेकिन प्रशासनिक सेवा से राजनीतिक मैदान में उतरना सहज निर्णय नहीं था। अधिकारी की पेशेगत पहचान राजनीति से दूरी के साथ जुड़ी हुई थी।

अजीत जोगी ने दिखाया कि कलेक्टर मुख्यमंत्री भी बन सकता है

नौकरशाही से राजनीति की ओर संक्रमण को निर्णायक पहचान देने वाले उदाहरणों में अजीत जोगी का नाम सबसे ऊपर आता है। मध्य प्रदेश में कलेक्टर के रूप में काम करते हुए उनकी राजनीतिक नेतृत्व से निकटता बढ़ी। तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह से उनके संबंध बने और वे राष्ट्रीय राजनीतिक नेतृत्व के संपर्क में आए।

1986 में जोगी ने आईएएस छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा और राज्यसभा पहुंचे। बाद में वे लोकसभा सदस्य बने और 2000 में छत्तीसगढ़ के गठन के बाद उसके पहले मुख्यमंत्री बने। (indiatoday.in)

जोगी की यात्रा ने नौकरशाहों के लिए एक नई संभावना खोली—कलेक्टर के रूप में अर्जित प्रशासनिक पहचान को चुनावी राजनीति की पूंजी बनाया जा सकता है। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि नौकरशाही और राजनीति के बीच दीवार उतनी अभेद्य नहीं है, जितनी दिखाई देती थी।

केजरीवाल ने बनाया स्वतंत्र राजनीति का मॉडल

इसके बाद अरविंद केजरीवाल का उदाहरण आया। वे आईएएस नहीं बल्कि भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी थे। आयकर विभाग की नौकरी छोड़ने के बाद सूचना के अधिकार और भ्रष्टाचार विरोधी अभियान से उन्होंने सार्वजनिक पहचान बनाई। अन्ना आंदोलन के बाद उन्होंने आम आदमी पार्टी बनाई और स्थापित दलों से अलग राजनीतिक मंच खड़ा किया।

केजरीवाल की यात्रा ने प्रशासनिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के लिए राजनीति का एक दूसरा मॉडल प्रस्तुत किया—किसी स्थापित पार्टी में शामिल होने के बजाय अपनी सार्वजनिक पहचान के आधार पर स्वतंत्र राजनीतिक संगठन खड़ा करना।

दिव्या मित्तल के मामले में इसी कारण केजरीवाल का उदाहरण दिया जा रहा है। दोनों की परिस्थितियां अलग हैं और दिव्या मित्तल की राजनीतिक यात्रा अभी शुरू ही हुई है, लेकिन एक समानता स्पष्ट है: उन्होंने राजनीति में प्रवेश की घोषणा करते समय किसी स्थापित दल का हिस्सा बनने के बजाय जनता के साथ स्वतंत्र मंच बनाने की बात कही है। (ndtv.com)

2014 के बाद बढ़ी राजनीतिक दृश्यता

2014 के बाद नौकरशाहों और अन्य पेशेवर अधिकारियों को राजनीति में लाने का सिलसिला अधिक दिखाई दिया। पूर्व मुंबई पुलिस आयुक्त सत्यपाल सिंह ने वीआरएस लेकर भाजपा में प्रवेश किया, बागपत से लोकसभा चुनाव जीता और केंद्र में मंत्री बने।

पूर्व आईएएस अधिकारी के.जे. अल्फोंस भी इसी दौर का उल्लेखनीय उदाहरण हैं। दिल्ली विकास प्राधिकरण के आयुक्त के रूप में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के कारण वे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुए। बाद में राजनीति में आए और 2017 में केंद्र में मंत्री बने। (indianexpress.com)

पूर्व गृह सचिव आर.के. सिंह और पूर्व विदेश सेवा अधिकारी हरदीप सिंह पुरी भी राजनीति में आए और केंद्र सरकार में मंत्री बने। पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह भाजपा के टिकट पर लोकसभा पहुंचे और केंद्र में मंत्री रहे। 2017 के मंत्रिमंडल विस्तार में ऐसे कई पेशेवरों और पूर्व अधिकारियों को जगह मिलने से यह संकेत गया कि शासन का अनुभव राजनीतिक नेतृत्व के लिए उपयोगी संसाधन माना जा रहा है। (hindustantimes.com)

इस दौर में एक और बदलाव हुआ—राजनीति में आने वाले अधिकारी केवल “पूर्व नौकरशाह” नहीं रहे। उनकी पिछली प्रशासनिक पहचान ही उनके राजनीतिक परिचय का हिस्सा बन गई।

हाल के वर्षों में कई नए उदाहरण

2018 में आईएएस अधिकारी ओ.पी. चौधरी ने इस्तीफा देकर भाजपा में प्रवेश किया और बाद में छत्तीसगढ़ की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2019 में कर्नाटक कैडर के आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई ने सेवा छोड़ी और भाजपा में शामिल हुए। वे तमिलनाडु भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने। उसी वर्ष कर्नाटक कैडर के आईएएस अधिकारी एस. शशिकांत सेंथिल ने इस्तीफा देकर कांग्रेस का रास्ता चुना और 2024 में लोकसभा पहुंचे। (indianexpress.com)

2022 में आईपीएस अधिकारी असीम अरुण ने वीआरएस लेकर भाजपा ज्वाइन की। वे कन्नौज से विधायक बने और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री बने। (indiatoday.in)

2023 में ओडिशा के 2000 बैच के आईएएस अधिकारी वी.के. पांडियन ने वीआरएस लेकर बीजू जनता दल में प्रवेश किया। 2024 में पंजाब की आईएएस अधिकारी परमपाल कौर सिद्धू ने सेवा छोड़कर भाजपा के टिकट पर बठिंडा से लोकसभा चुनाव लड़ा। आईपीएस अधिकारी आनंद मिश्रा ने भी सेवा छोड़कर 2024 का लोकसभा चुनाव बक्सर से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ा।

इन उदाहरणों से कोई सांख्यिकीय निष्कर्ष निकालना कठिन है, क्योंकि सरकार के पास “राजनीति में जाने के लिए इस्तीफा देने वाले IAS/IPS” की कोई अलग आधिकारिक केंद्रीय सूची नहीं है। फिर भी यह सिलसिला अब इतना दिखाई देने लगा है कि इसे व्यक्तिगत अपवादों की श्रृंखला भर नहीं कहा जा सकता।

दिव्या मित्तल : इस कहानी का नया अध्याय

इसी बदलते माहौल में दिव्या मित्तल का प्रवेश महत्वपूर्ण है।

2013 बैच की उत्तर प्रदेश कैडर की आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने करीब 13 साल की सेवा के बाद 30 अगस्त 2026 को इस्तीफा दिया। उनका इस्तीफा 15 सितंबर को स्वीकार हुआ। 29 सितंबर को उन्होंने राजनीति में आने की घोषणा कर दी। उन्होंने फिलहाल किसी राजनीतिक दल में शामिल होने के बजाय जनता के साथ स्वतंत्र राजनीतिक मंच बनाने की बात कही है। (indianexpress.com)

मिर्जापुर और देवरिया में जिलाधिकारी के रूप में उनका कार्यकाल उन्हें पहले ही व्यापक सार्वजनिक पहचान दे चुका था।

मिर्जापुर में लहुरियादह गांव तक पाइप से पानी पहुंचाने की पहल उनके कार्यकाल की सबसे चर्चित घटनाओं में रही। पानी पहुंचने के बाद हुए कार्यक्रम के तौर-तरीके को लेकर राजनीतिक विवाद हुआ और उनके तबादले की चर्चा भी इसी संदर्भ में हुई। हालांकि उनके तबादले को केवल इसी घटना का परिणाम बताना उचित नहीं होगा; उपलब्ध रिपोर्टों में प्रशासनिक प्रोटोकॉल और राजनीतिक असहमति दोनों संदर्भ सामने आते हैं। (indianexpress.com)

देवरिया में भी उनका कार्यकाल शांत नहीं रहा। दिशा समिति की बैठक में जनप्रतिनिधियों के साथ अधिकारियों के स्थानांतरण को लेकर उनका तीखा संवाद चर्चित हुआ। अवैध कब्जे के मामलों में अधिकारियों को फटकारने, पंचायत भवन के लिए निजी जमीन के इस्तेमाल पर वसूली की कार्रवाई और मैदानी निरीक्षण से जुड़े वीडियो भी सार्वजनिक चर्चा में रहे।

इन घटनाओं ने उनकी एक ऐसी छवि बनाई जिसमें जिलाधिकारी केवल कार्यालय में बैठा अधिकारी नहीं, बल्कि मैदान में जाकर कार्रवाई करने वाला प्रशासक दिखाई देता था।

मिर्जापुर की घटना अब राजनीतिक संदर्भ में क्यों महत्वपूर्ण है?

राजनीति में प्रवेश की घोषणा करते हुए दिव्या मित्तल ने मिर्जापुर के अपने अनुभव को विशेष रूप से याद किया। उन्होंने बताया कि किस तरह किसी गांव की समस्या के समाधान के लिए प्रशासनिक मंजूरी और संसाधन होने के बावजूद काम आगे नहीं बढ़ पा रहा था। उनके अनुसार प्रशासनिक पद पर रहते हुए हर समस्या का समाधान संभव नहीं था और इसी अनुभव ने उन्हें व्यापक राजनीतिक भूमिका के बारे में सोचने को प्रेरित किया। (indianexpress.com)

यह उनके राजनीतिक प्रवेश को समझने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। उन्होंने अपनी प्रशासनिक असंतुष्टि को व्यक्तिगत करियर परिवर्तन की बजाय राजनीतिक हस्तक्षेप की जरूरत के रूप में पेश किया है।

यहीं उनका मामला पुराने नौकरशाह-से-राजनेता मॉडल से अलग दिखाई देता है। अजीत जोगी राजनीतिक नेतृत्व के संपर्क में आकर कांग्रेस में गए थे। सत्यपाल सिंह और असीम अरुण सीधे राजनीतिक दलों में गए। केजरीवाल ने स्वतंत्र राजनीतिक संगठन बनाया। दिव्या मित्तल अभी तीसरे मॉडल की ओर संकेत कर रही हैं, हालांकि उनके संगठन और राजनीतिक रणनीति का वास्तविक स्वरूप अभी स्पष्ट नहीं है।

प्रशासनिक लोकप्रियता से राजनीतिक पूंजी तक

दिव्या मित्तल की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनका राजनीतिक दल नहीं, बल्कि उनकी सार्वजनिक छवि है।

आईएएस अधिकारी का मूल दायित्व प्रशासन चलाना है। लेकिन आज सोशल मीडिया के कारण प्रशासनिक काम भी सार्वजनिक प्रदर्शन का हिस्सा बन गया है। जिलाधिकारी का निरीक्षण, किसी अधिकारी की फटकार, गांव में किसी योजना का उद्घाटन या जनता से संवाद—इन सबके वीडियो सीधे जनता तक पहुंचते हैं।

इससे अधिकारी की व्यक्तिगत पहचान संस्थागत पहचान से अलग होने लगती है।

एक लोकप्रिय अधिकारी के लिए यह पहचान राजनीति में शुरुआती पूंजी बन सकती है। जनता उसे पहले से जानती है, उसके काम की कहानियां सुन चुकी होती है और उसके प्रशासनिक रिकॉर्ड को चुनावी पहचान में बदला जा सकता है।

लेकिन प्रशासनिक लोकप्रियता और चुनावी समर्थन एक ही चीज नहीं हैं। जिलाधिकारी के रूप में अधिकार कानून और पद से मिलता है; राजनेता को वही प्रभाव मतदाताओं, संगठन और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच समर्थन से हासिल करना पड़ता है। इसलिए दिव्या मित्तल की असली राजनीतिक परीक्षा अब शुरू होगी।

बदलती है अधिकारी की भूमिका, बदलती है जनता की अपेक्षा

नौकरशाह से राजनेता बनने की इस यात्रा में जनता की अपेक्षाएं भी बदलती हैं। प्रशासन में जनता अधिकारी से निष्पक्षता और कानून के अनुसार निर्णय की उम्मीद करती है। राजनीति में वही व्यक्ति किसी विचार, कार्यक्रम और राजनीतिक पक्ष के साथ खड़ा होता है।

इसलिए किसी अधिकारी की लोकप्रिय प्रशासनिक छवि अपने आप राजनीतिक सफलता की गारंटी नहीं देती। उसे संगठन खड़ा करना होगा, राजनीतिक मुद्दे चुनने होंगे और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच समर्थन बनाना होगा।

दिव्या मित्तल ने फिलहाल जिस स्वतंत्र मंच की बात की है, उसकी सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि व्यक्तिगत लोकप्रियता को संस्थागत राजनीतिक शक्ति में कैसे बदला जाए।

गरिमा से अवसर तक

1983 में ओम पाठक का इस्तीफा स्वीकार न होना और 2026 में दिव्या मित्तल का इस्तीफा देकर राजनीति में उतरना—इन दोनों घटनाओं के बीच चार दशक से अधिक का अंतर है। इस अंतर में भारतीय राजनीति और नौकरशाही दोनों बदल चुके हैं।

अजीत जोगी ने कलेक्टर से मुख्यमंत्री तक का रास्ता बनाया। केजरीवाल ने IRS अधिकारी से स्वतंत्र राजनीतिक दल के नेता तक का सफर तय किया। सत्यपाल सिंह, आर.के. सिंह, हरदीप सिंह पुरी और वी.के. सिंह ने प्रशासन, पुलिस, विदेश सेवा और सेना के अनुभव को केंद्रीय राजनीति में इस्तेमाल किया। ओ.पी. चौधरी, अन्नामलाई, शशिकांत सेंथिल, असीम अरुण और वी.के. पांडियन जैसे अपेक्षाकृत नए उदाहरण बताते हैं कि यह रास्ता अब कई अधिकारियों के लिए कल्पना से आगे निकल चुका है।

दिव्या मित्तल इस क्रम का नवीनतम उत्तर प्रदेश अध्याय हैं।

उनके सामने अब वही चुनौती है जो हर पूर्व नौकरशाह के सामने राजनीति में आने के बाद होती है—क्या प्रशासन में बनाई गई व्यक्तिगत विश्वसनीयता को राजनीतिक संगठन और जनसमर्थन में बदला जा सकता है?

इसका उत्तर अभी भविष्य देगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि जिस राजनीति को कभी नौकरशाही की गरिमा से अलग समझा जाता था, वही राजनीति अब कुछ अधिकारियों को अपनी प्रशासनिक यात्रा का अगला पड़ाव दिखाई देने लगी है।

और शायद यही भारतीय नौकरशाही में सबसे बड़ा बदलाव है—कभी लोकप्रियता राजनीति से दूरी बनाए रखने की वजह थी, अब वही लोकप्रियता राजनीति में जाने की शुरुआती पूंजी बन सकती है।

Leave a comment