देश में इन दिनों आरक्षण को लेकर बहस फिर तेज है। एक तरफ आरक्षण को सामाजिक न्याय और ऐतिहासिक असमानता से लड़ने का जरूरी माध्यम बताया जा रहा है, तो दूसरी तरफ यह सवाल उठ रहा है कि क्या आरक्षण व्यवस्था मेधा और समान प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर रही है। अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून को लेकर भी इसी समय उसके कथित दुरुपयोग की बहस जोर पकड़ रही है। कहीं यह आरोप है कि कानून का इस्तेमाल निजी और जातीय विवादों में दबाव बनाने के लिए किया जाता है, तो दूसरी तरफ यह तर्क है कि दुरुपयोग के कुछ मामलों के आधार पर उस कानून की आवश्यकता को ही संदिग्ध नहीं बनाया जा सकता। इस पूरे शोर के बीच तमिलनाडु से आई एक खबर इसलिए ठहरकर देखने लायक है कि वहां अनुसूचित जाति में शामिल देवेंद्रकुल वेल्लालर समुदाय के एक महत्वपूर्ण हिस्से ने कहा है कि उसे एससी की पहचान नहीं चाहिए, वह आरक्षण का लाभ नहीं लेना चाहता और एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून के तहत मुकदमे दर्ज कराने से भी परहेज करेगा। समुदाय एससी सूची से बाहर निकलकर पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में शामिल किए जाने की मांग कर रहा है। सितंबर में इस मांग को लेकर तमिलनाडु में प्रदर्शन भी हुए हैं।

इस खबर का महत्व केवल इतना नहीं है कि एक समुदाय आरक्षण छोड़ने की बात कर रहा है। इसकी असली प्रासंगिकता उस समय के सामाजिक वातावरण में है जिसमें यह आवाज उठी है। भारत में सामान्यतः जातियों की राजनीति आरक्षण हासिल करने की दिशा में चलती है। जो जाति जिस श्रेणी में नहीं है, वह अपने पिछड़ेपन के प्रमाण जुटाती है और उस श्रेणी में शामिल किए जाने की मांग करती है। जो पहले से आरक्षण पा रही है, वह उसके भीतर अपने लिए अधिक हिस्सा मांगती है। आरक्षण आज केवल सामाजिक न्याय का प्रश्न नहीं रह गया है, वह राजनीतिक प्रतिनिधित्व, रोजगार और सामाजिक प्रतिष्ठा का भी प्रश्न बन चुका है। ऐसे माहौल में किसी अनुसूचित जाति समुदाय का यह कहना कि उसे आरक्षण नहीं चाहिए और वह विशेष कानूनी संरक्षण की पहचान से भी बाहर निकलना चाहता है, सामान्य राजनीतिक प्रवृत्ति के ठीक उलट दिखाई देता है।

देवेंद्रकुल वेल्लालर तमिलनाडु की सात अनुसूचित जाति प्रविष्टियों से बना सामूहिक नाम है। 2021 में केंद्र सरकार ने इन समुदायों को एक साझा नाम देवेंद्रकुल वेल्लालर के तहत संगठित किया था। उस समय यह भी स्पष्ट किया गया था कि नाम बदला गया है, अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं। लेकिन समुदाय के कुछ प्रभावशाली नेता लंबे समय से इससे आगे की मांग करते रहे हैं। पुथिया तमिलगम के नेता के. कृष्णासामी 1990 के दशक से एससी सूची से बाहर किए जाने की मांग उठाते रहे हैं। उनका तर्क है कि समुदाय अपनी सामाजिक पहचान को अनुसूचित जाति की पहचान से अलग करना चाहता है। उसके लिए आरक्षण से मिलने वाला लाभ ही सब कुछ नहीं है; वह सामाजिक प्रतिष्ठा और बराबरी की पहचान चाहता है।

यहीं इस मामले का सबसे दिलचस्प पक्ष सामने आता है। आरक्षण को लेकर आज जो सबसे बड़ा विवाद है, उसमें ‘मेधा’ बनाम ‘आरक्षण’ का सवाल बार-बार खड़ा किया जाता है। आरक्षण के विरोध में यह तर्क दिया जाता है कि प्रतियोगिता में जाति आधारित रियायतें मेधा को प्रभावित करती हैं। आरक्षण के समर्थन में कहा जाता है कि सदियों की सामाजिक असमानता को केवल खुली प्रतियोगिता के नाम पर खत्म नहीं किया जा सकता। दोनों पक्ष अपनी-अपनी जगह तर्क रखते हैं। लेकिन देवेंद्रकुल वेल्लालर की मांग इस बहस के बीच एक तीसरा प्रश्न खड़ा करती है—क्या आरक्षण का अंतिम उद्देश्य हमेशा आरक्षण बनाए रखना है, या ऐसी स्थिति पैदा करना भी है जिसमें कोई समुदाय एक दिन कह सके कि अब हमें विशेष संरक्षण की जरूरत नहीं, हमें सामान्य सामाजिक बराबरी चाहिए?

यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून को लेकर भी समाज में इस समय तीखा मतभेद है। कानून के कथित दुरुपयोग के उदाहरण सामने आने पर उसके प्रावधानों पर सवाल उठते हैं, जबकि दूसरी ओर दलित संगठनों का कहना है कि ऐसे आरोप वास्तविक जातीय उत्पीड़न की गंभीरता को कम करके देखने का रास्ता नहीं बन सकते। हाल के वर्षों में अदालतों में भी ऐसे मामलों पर अलग-अलग संदर्भों में टिप्पणियां और जांच के आदेश सामने आए हैं। लेकिन इसी वातावरण में देवेंद्रकुल वेल्लालर समुदाय के कुछ प्रतिनिधियों का यह कहना कि वे स्वयं इस कानून का सहारा नहीं लेना चाहते, इस बहस को एक अलग कोण देता है। यह कानून को खत्म करने की मांग नहीं है और न ही इससे किसी व्यक्ति का कानूनी अधिकार समाप्त होता है, लेकिन सामाजिक संदेश जरूर अलग है—एक समुदाय विशेष कानूनी संरक्षण की पहचान से आगे निकलकर अपने को सामान्य सामाजिक संबंधों में स्थापित करना चाहता है।

इसे पूरे समुदाय की सर्वसम्मत राय मानना भी उचित नहीं होगा। समुदाय के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद के संकेत हैं और उसकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को लेकर भी अलग-अलग दावे मौजूद हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि पूरा देवेंद्रकुल वेल्लालर समाज आरक्षण छोड़ने पर एकमत है। लेकिन किसी आंदोलन का महत्व केवल इस बात से तय नहीं होता कि उसके पीछे कितने लोग हैं। कभी-कभी उसका महत्व उस सवाल से तय होता है जो वह समाज के सामने रख देता है।

आज जब आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में आवाजें पहले से अधिक तीखी हैं, जब जातीय पहचान चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है और जब एससी-एसटी कानून के कथित दुरुपयोग को लेकर लगातार बहस हो रही है, तब देवेंद्रकुल वेल्लालर की यह पहल कम से कम इतना तो सोचने के लिए मजबूर करती है कि सामाजिक न्याय की अंतिम मंजिल क्या है। यदि आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक असमानता को कम करने का माध्यम है तो उसका उद्देश्य ऐसी स्थिति पैदा करना भी होना चाहिए जहां विशेष संरक्षण की जरूरत धीरे-धीरे कम हो। लेकिन यह तभी संभव है जब समाज में वास्तविक बराबरी आए, शिक्षा और रोजगार के अवसर समान हों और जाति के आधार पर भेदभाव कम हो। केवल आरक्षण छोड़ देने की घोषणा से वह स्थिति पैदा नहीं हो जाती।

फिर भी इस पहल में एक महत्वपूर्ण सामाजिक संकेत छिपा है। भारत में जातियों की राजनीति प्रायः यह कहती रही है कि हमें हमारे हिस्से से कम न मिले। देवेंद्रकुल वेल्लालर का एक हिस्सा इसके विपरीत कह रहा है कि हमारी पहचान केवल किसी आरक्षित श्रेणी से नहीं होनी चाहिए। यह भावना कितनी व्यावहारिक है, इसके परिणाम क्या होंगे और इससे समुदाय के कमजोर तबके पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह अलग बहस है। लेकिन ‘हमें और आरक्षण चाहिए’ के बीच ‘हमें एक दिन आरक्षण से आगे जाना है’ की आवाज सुनाई देना निश्चित रूप से भारतीय सामाजिक न्याय की बहस को एक नया प्रश्न देता है।

शायद इसी कारण तमिलनाडु की यह घटना आज के भारत में केवल एक समुदाय की मांग के रूप में नहीं देखी जानी चाहिए। इसे उस बेचैनी के संदर्भ में देखना चाहिए जिसमें एक ओर जातियां आरक्षण के लिए संघर्ष कर रही हैं, दूसरी ओर आरक्षण को मेधा के विरुद्ध बताया जा रहा है और तीसरी ओर एससी-एसटी कानून के दुरुपयोग को लेकर विवाद चल रहा है। इन सबके बीच यदि कोई दलित समुदाय यह कहता है कि वह विशेष सुविधा और विशेष संरक्षण की पहचान से आगे निकलकर सामान्य सामाजिक बराबरी चाहता है, तो उसकी इस आकांक्षा को भी सामाजिक न्याय की बहस में जगह मिलनी चाहिए।

आरक्षण पर बहस का अंत इस सवाल पर नहीं होना चाहिए कि आरक्षण रहे या न रहे। उससे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारी व्यवस्था ऐसी सामाजिक बराबरी पैदा कर पा रही है जहां किसी समुदाय को हमेशा आरक्षण की जरूरत महसूस न हो। यदि कभी कोई समुदाय स्वयं कहता है कि अब वह विशेष पहचान से बाहर निकलकर बराबरी की पहचान चाहता है, तो यह उस आकांक्षा को समझने का अवसर है। इसे न तो पूरे दलित समाज की राय मानना चाहिए और न आरक्षण व्यवस्था की विफलता का प्रमाण। लेकिन आज के तनावपूर्ण जातीय वातावरण में यह एक ऐसी आवाज जरूर है जो टकराव के बीच सद्भाव और बराबरी की दिशा में सोचने का रास्ता खोलती है।

आखिर सामाजिक न्याय की सबसे बड़ी सफलता शायद यही होगी कि जिस दिन कोई समुदाय यह कह सके कि उसे किसी विशेष संरक्षण के कारण नहीं, बल्कि समान नागरिक होने के कारण सम्मान और अवसर मिल रहे हैं। देवेंद्रकुल वेल्लालर की मौजूदा मांग इसी संभावना की ओर इशारा करती है—और इसलिए यह खबर केवल तमिलनाडु की नहीं, पूरे देश की आरक्षण बहस के बीच पढ़े जाने लायक है।

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