सर्वहारा क्रांति की सबसे बड़ी विडंबनाओं में एक यह थी कि जिस क्रांति का नेतृत्व औद्योगिक मजदूर कर रहा था, उसकी सफलता के लिए उसे किसान के साथ खड़ा होना पड़ा। लेकिन किसान और खेतिहर मजदूर एक ही वर्ग नहीं थे। किसान के पास जमीन थी, खेतिहर मजदूर के पास अपना श्रम। किसान की खेती की लागत में मजदूर की मजदूरी शामिल थी और मजदूर की जिंदगी उसी मजदूरी पर निर्भर थी। इसलिए किसान और खेतिहर मजदूर के वर्ग हितों में बुनियादी विरोधाभास मौजूद था।

रूसी क्रांति की राजनीतिक प्रतिभा इसी में थी कि उसने इस विरोधाभास को नकारा नहीं। उसने यह नहीं कहा कि किसान और मजदूर के हित बिल्कुल एक हैं। उसने यह समझा कि क्रांति को सफल करने और बचाए रखने के लिए किसान के उस हिस्से को मजदूर के साथ जोड़ना होगा जिसका हित जमींदार और पूंजीपति के खिलाफ था।

भारत में यही सवाल और कठिन हो जाता है। यहां किसान और खेतिहर मजदूर के बीच आर्थिक विरोधाभास के ऊपर जाति का संबंध भी जुड़ा हुआ है। खेतिहर मजदूरों का बड़ा हिस्सा दलित रहा है और अनेक क्षेत्रों में जमीन रखने वाली प्रभावशाली कृषक जातियों का सामाजिक वर्चस्व भी रहा है।

इसलिए भारत में दलित खेतिहर मजदूर की मुक्ति का अर्थ केवल मजदूरी बढ़ना नहीं है। इसका अर्थ गांव की सामाजिक और राजनीतिक सत्ता का पुनर्वितरण भी है।

यहीं से रूस की सर्वहारा क्रांति और भारत की किसान राजनीति के बीच तुलना का असली अर्थ निकलता है।

सर्वहारा क्रांति किसान के बिना पूरी नहीं हो सकती थी

1917 में रूस मुख्यतः किसानों का देश था। बोल्शेविकों के सामने यह वास्तविकता थी कि औद्योगिक सर्वहारा संख्या में अल्प था, जबकि किसानों की संख्या बहुत बड़ी थी। इसलिए केवल कारखाने के मजदूरों के आधार पर सत्ता कायम करना संभव नहीं था।

लेकिन किसान कोई एकसार वर्ग भी नहीं था। गरीब और खेतिहर किसान, मध्यम किसान और समृद्ध किसान—इनके हित अलग-अलग थे। लेनिन ने 1917 में ही कृषि मजदूरों और गरीब किसानों को समृद्ध किसानों से अलग संगठित करने की बात कही थी और चेताया था कि संपन्न किसान पूंजीपति और जमींदारों के साथ गठजोड़ की ओर जा सकते हैं।

यानी रूसी क्रांति के सामने समस्या साफ थी—किसान जरूरी है, लेकिन पूरा किसान वर्ग सर्वहारा का स्वाभाविक सहयोगी नहीं है।

इसीलिए अक्टूबर क्रांति के तुरंत बाद भूमि का सवाल उठाया गया। जमींदारों की जमीन का स्वामित्व समाप्त किया गया और जमीन के उपयोग का अधिकार उसे दिया गया जो उसे जोतता था।

यह किसान को दिया गया कोई भावनात्मक उपहार नहीं था। यह क्रांति की राजनीतिक जरूरत भी थी।

बोल्शेविक जानते थे कि जिस किसान को जमीन चाहिए, उसे जमीन दिए बिना उससे सर्वहारा सत्ता की रक्षा की उम्मीद नहीं की जा सकती।

लेकिन इसके साथ दूसरी बात भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी—खेतिहर मजदूर और गरीब किसान को समृद्ध किसान के मुकाबले अलग राजनीतिक शक्ति के रूप में संगठित करना।

यही सर्वहारा क्रांति का वास्तविक वर्ग-समीकरण था।

किसान और खेतिहर मजदूर के हित एक नहीं थे

यहां उस मूल विरोधाभास को समझना जरूरी है जिसे अक्सर किसान-मजदूर एकता के नारे में छिपा दिया जाता है।

एक किसान जो अपने परिवार के श्रम से खेती करता है, उसकी स्थिति अलग है। लेकिन जो किसान मजदूर रखकर खेती करता है, उसके लिए मजदूर की मजदूरी उत्पादन लागत है।

मजदूर के लिए वही मजदूरी उसकी आय है।

किसान कम मजदूरी देकर लागत घटाना चाहता है।

मजदूर अधिक मजदूरी पाकर अपना जीवन बेहतर करना चाहता है।

यह विरोधाभास किसी विचारधारा का बनाया हुआ नहीं है। यह उत्पादन संबंधों से पैदा होता है।

रूस में भी यह विरोधाभास मौजूद था। इसलिए लेनिन ने कृषि मजदूरों और गरीब किसानों को अलग से संगठित करने की जरूरत पर जोर दिया। 1917 के दस्तावेजों में कृषि मजदूरों और गरीब किसानों को संपन्न किसानों से अपने हितों की रक्षा के लिए स्वतंत्र संगठन बनाने की बात साफ दर्ज है।

अर्थात सर्वहारा क्रांति ने किसान और मजदूर के बीच वर्गीय अंतर को मिटाया नहीं था; उसने उसे राजनीतिक रूप से व्यवस्थित किया था।

फिर किसान क्रांति के साथ क्यों आया?

क्योंकि किसान का भी एक बड़ा संघर्ष था—जमीन के मालिकों के खिलाफ।

रूस में जमींदार और पूंजीपति एक तरफ थे और भूमिहीन या अल्पभूमिधारी किसान दूसरी तरफ। किसान के लिए सबसे बड़ा सवाल जमीन था। सर्वहारा सत्ता ने जमीन का सवाल उठाकर किसान को अपने साथ जोड़ने की जमीन बनाई।

अक्टूबर के भूमि डिक्री ने निजी जमींदारी समाप्त कर दी। बाद में किसान प्रतिनिधियों की अखिल रूसी कांग्रेस ने भी मजदूर-किसान गठबंधन को समाजवादी क्रांति की सफलता की आवश्यक शर्त माना।

यानी गठजोड़ का आधार यह नहीं था कि किसान और मजदूर के बीच कोई विरोधाभास नहीं है।

गठजोड़ का आधार यह था कि दोनों के सामने कुछ साझा दुश्मन थे और कुछ साझा तत्काल हित थे।

यही फर्क महत्वपूर्ण है।

क्रांति के बाद विरोधाभास और खुलकर सामने आया

सत्ता मिलने के बाद किसान और मजदूर के हितों का अंतर गायब नहीं हुआ।

बल्कि अनाज की आपूर्ति, कीमत और राज्य की मांग के सवाल पर किसान और सोवियत सत्ता के बीच गंभीर तनाव पैदा हुआ। शहरों के मजदूरों को भोजन चाहिए था और राज्य को अनाज चाहिए था। किसान अपनी उपज का बेहतर मूल्य चाहता था और राज्य युद्ध तथा अकाल की परिस्थितियों में अनाज जुटाना चाहता था।

1918 में लेनिन ने स्वयं मजदूरों और ग्रामीण गरीबों के गठजोड़ को मजबूत करने तथा संपन्न किसानों के प्रभाव से मुकाबला करने की बात की। साथ ही उन्होंने मध्यम किसानों के साथ समझौते की नीति पर जोर दिया।

फिर 1921 में नई आर्थिक नीति आई।

इसका अर्थ यही था कि बोल्शेविक नेतृत्व को समझ आ गया था कि किसान को केवल आदेश देकर समाजवादी व्यवस्था में नहीं बांधा जा सकता।

किसान के वर्ग हित को समझना पड़ेगा।

रूस का यह अनुभव बहुत महत्वपूर्ण है—सर्वहारा क्रांति को किसान की जरूरत थी, लेकिन उसे किसान के भीतर के वर्ग विभाजन को भी समझना था।

भारत में विरोधाभास सिर्फ वर्ग का नहीं था

अब भारत पर आइए।

यहां भी किसान और खेतिहर मजदूर के बीच वही आर्थिक संबंध मौजूद है। किसान को खेत के लिए मजदूर चाहिए और मजदूर को किसान से मजदूरी।

लेकिन भारत में एक निर्णायक अतिरिक्त तत्व है—जाति।

बहुत से इलाकों में खेतिहर मजदूर दलित रहा और जमीन का बड़ा हिस्सा प्रभावशाली कृषक जातियों के पास रहा। इसलिए मजदूरी का संबंध केवल आर्थिक नहीं रहा।

दलित मजदूर जब मजदूरी बढ़ाने की मांग करता है, तो वह किसान की लागत बढ़ाता है।

जब वह अपनी मर्जी से काम चुनता है, तो किसान का श्रम पर नियंत्रण घटता है।

जब वह अपना वोट अपनी मर्जी से देता है, तो गांव की राजनीतिक सत्ता बदलती है।

जब वह जातिगत अपमान का विरोध करता है, तो सामाजिक सत्ता को चुनौती देता है।

और जब वह आंबेडकर को अपना राजनीतिक प्रतीक बनाता है, तो वह उस पूरी वर्ण-व्यवस्था को चुनौती देता है जिसने उसे नीचे रखा।

यानी भारत में दलित खेतिहर मजदूर की मुक्ति आर्थिक मुक्ति के साथ सामाजिक सत्ता के परिवर्तन की मांग भी है।

यहीं किसान राजनीति की सीमा सामने आती है।

खेतिहर मजदूर का स्वतंत्र वोट भी वर्ग-संघर्ष का हिस्सा था

स्वतंत्र भारत के शुरुआती दशकों में उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज पर हुए अध्ययनों में यह दर्ज है कि दलितों को कई इलाकों में स्वतंत्र मतदाता के रूप में नहीं, बल्कि भूमिधरों के प्रभाव में रहने वाले मतदाताओं के रूप में देखा जाता था। भूमिधर अपने साथ दलित मतदाताओं को मतदान केंद्र तक ले जाते और उनके मतदान को प्रभावित करते थे।

यह छोटी बात नहीं थी।

किसान के खेत में काम करने वाला मजदूर जब अपने वोट का इस्तेमाल भी अपनी मर्जी से नहीं कर सकता, तब लोकतंत्र का अधिकार अधूरा है।

चरण सिंह और राज नारायण के चुनावी संघर्ष से जुड़ा चलित मतदान केंद्रों का प्रसंग इसी व्यापक राजनीतिक वास्तविकता के संदर्भ में देखा जाता है। उस विशेष घटना का प्राथमिक दस्तावेज अभी उपलब्ध स्रोतों में नहीं मिला है, इसलिए उसे निर्विवाद तथ्य की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। लेकिन व्यापक तस्वीर स्पष्ट है—गांव में दलित का वोट भी सामाजिक सत्ता के नियंत्रण से मुक्त होने की लड़ाई का हिस्सा था।

और यही कारण है कि दलित राजनीति केवल आरक्षण की राजनीति नहीं थी।

वह गांव के सत्ता-संबंधों को बदलने की राजनीति थी।

किसान राजनीति की असली असहजता यहीं है

लोकदल से लेकर किसान-आधारित राजनीति की अनेक धाराओं ने किसानों की आर्थिक समस्याओं को राजनीतिक ताकत के साथ उठाया। लेकिन वर्ण व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष को उसी केंद्रीयता से स्वीकार करना उनके लिए आसान नहीं था।

कारण समझना कठिन नहीं है।

प्रभावशाली कृषक जातियां स्वयं गांव की सामाजिक सत्ता का हिस्सा थीं।

यदि दलित खेतिहर मजदूर केवल बेहतर मजदूरी मांगता है तो किसान से उसका आर्थिक संघर्ष है।

लेकिन यदि वही मजदूर कहता है—

मैं तुम्हारे खेत पर काम करूंगा या नहीं, यह मेरा फैसला होगा।

मैं वोट किसे दूंगा, यह मेरा फैसला होगा।

मैं जाति के नाम पर अपमान नहीं सहूंगा।

पंचायत में मेरा प्रतिनिधि भी होगा।

मेरे बच्चे तुम्हारे खेतों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी मजदूरी नहीं करेंगे।

—तो यह केवल मजदूर का आर्थिक संघर्ष नहीं रह जाता।

यह गांव की सत्ता का पुनर्गठन बन जाता है।

इसलिए किसान राजनीति की वर्ण-विरोधी राजनीति के प्रति ठंडी प्रतिक्रिया को केवल वैचारिक कमजोरी कहकर नहीं समझा जा सकता। उसके पीछे उसका अपना सामाजिक आधार और उसके हित भी काम करते हैं।

आंबेडकर पर हमला केवल मायावती पर हमला नहीं था

यही बात 1997 के उत्तर प्रदेश में दिखाई देती है।

मायावती के मुख्यमंत्री बनने के बाद सपा-बसपा संघर्ष में आंबेडकर की विरासत भी राजनीतिक संघर्ष का मैदान बन गई। 17 जून 1997 को लखनऊ में सपा महासचिव कपिल देव सिंह ने कहा कि डॉ. भीमराव आंबेडकर न तो संविधान के लेखक थे और न उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। इंडियन एक्सप्रेस ने अगले दिन इस बयान को अपनी रिपोर्ट “Launch of a non-violent stir against Ambedkar” में दर्ज किया।

उसी अभियान के दौरान बेनी प्रसाद वर्मा ने बाराबंकी में कहा कि आंबेडकर ने महात्मा गांधी के लिए परेशानी पैदा करने के अलावा कुछ नहीं किया। मुलायम सिंह यादव ने बदायूं में मायावती सरकार पर एससी/एसटी कानून के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए आंदोलन की चेतावनी दी।

इन बयानों को केवल “मायावती विरोध” कहकर खत्म कर देना इस प्रसंग का राजनीतिक अर्थ छोटा कर देता है।

क्योंकि मायावती के पीछे केवल एक मुख्यमंत्री नहीं थी।

आंबेडकर दलित समाज की स्वतंत्र राजनीतिक अस्मिता के सबसे बड़े प्रतीक थे।

उनकी विरासत पर हमला इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि दलित राजनीति उस समय तक सवर्ण संरक्षण की मोहताज राजनीति नहीं रह गई थी। वह अपना स्वतंत्र राजनीतिक आधार बना चुकी थी।

यहीं पिछड़ी जाति की राजनीति और दलित राजनीति के बीच वास्तविक तनाव सामने आया।

मंडल ने पिछड़ी जातियों को सत्ता में हिस्सेदारी का रास्ता दिया था।

आंबेडकरवादी राजनीति दलितों को अपनी स्वतंत्र सत्ता और सम्मान का दावा दे रही थी।

दोनों का साझा दुश्मन सवर्ण वर्चस्व हो सकता था, लेकिन दोनों के सामाजिक आधार और नेतृत्व के हित पूरी तरह एक नहीं थे।

यही भारतीय सामाजिक न्याय की राजनीति का सबसे कठिन सच है।

किसान राजनीति से दलित राजनीति का तनाव क्यों पैदा हुआ?

क्योंकि गांव में पिछड़ी कृषक जातियों का उभार केवल सामाजिक न्याय का उभार नहीं था। वह जमीन और स्थानीय सत्ता से जुड़े समूहों का राजनीतिक उभार भी था।

दूसरी ओर दलित राजनीति खेतिहर मजदूर और सामाजिक रूप से वंचित तबकों को स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनाना चाहती थी।

इसलिए जब दलित कहता है कि वह केवल मजदूर नहीं, बराबर नागरिक है, तो प्रभावशाली कृषक जाति के लिए यह केवल सामाजिक परिवर्तन का प्रश्न नहीं रहता।

उसकी गांव की पुरानी सत्ता चुनौती में आती है।

यही कारण है कि भारत में किसान राजनीति और दलित राजनीति के रिश्ते में एक गहरी खींचतान रही है।

किसान का शोषण करने वाला सवर्ण जमींदार उसका विरोधी हो सकता है, लेकिन खेत में काम करने वाला दलित मजदूर उसके बराबर आ जाए—यह सवाल किसान की अपनी सामाजिक सत्ता को भी चुनौती दे सकता है।

यहीं वर्गीय राजनीति जाति की राजनीति से टकराती है।

रूस का अनुभव और भारत का अधूरा सवाल

रूस में सर्वहारा क्रांति ने किसान को इसलिए साथ लिया क्योंकि किसान का एक बड़ा हिस्सा जमींदार और पूंजीपति के खिलाफ था। भूमि सुधार ने किसान की तत्काल मांग को संबोधित किया। साथ ही कृषि मजदूर और गरीब किसान को समृद्ध किसान से अलग राजनीतिक शक्ति के रूप में संगठित करने की कोशिश हुई।

भारत में यदि किसान और खेतिहर मजदूर की वास्तविक राजनीतिक एकता बनानी है तो केवल किसान की आर्थिक मांगें पर्याप्त नहीं हैं।

यहां उस एकता को जाति के सवाल से गुजरना होगा।

किसान और मजदूर के बीच मजदूरी पर समझौता हो सकता है।

लेकिन जाति पर आधी बराबरी नहीं हो सकती।

या दलित बराबर नागरिक है या नहीं है।

यदि वह बराबर नागरिक है तो उसका स्वतंत्र वोट भी होगा, स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व भी होगा, बराबर सामाजिक सम्मान भी होगा और अपने श्रम की कीमत तय करने का अधिकार भी होगा।

यही वह जगह है जहां किसान राजनीति की सबसे कठिन परीक्षा शुरू होती है।

सर्वहारा क्रांति का असली सबक

रूसी क्रांति का सबक यह नहीं है कि किसान और मजदूर के हित एक थे।

सबक इसके उलट है।

उनके हितों में विरोधाभास था, लेकिन क्रांति ने साझा हितों के आधार पर राजनीतिक गठजोड़ बनाया और किसान के भीतर भी वर्गीय अंतर को पहचाना।

भारत का सवाल इससे भी जटिल है।

यहां खेतिहर मजदूर और किसान के बीच वर्गीय विरोधाभास के ऊपर जाति का संबंध बैठा हुआ है। इसलिए दलित खेतिहर मजदूर की मुक्ति किसान की लागत या मजदूरी का सवाल भर नहीं है। वह गांव की सामाजिक सत्ता को बदलने का सवाल है।

यही कारण है कि भारत में किसान-मजदूर एकता का नारा तब तक अधूरा रहेगा जब तक उसमें दलित की सामाजिक बराबरी शामिल नहीं होगी।

जिस किसान-मजदूर एकता में खेतिहर मजदूर की जातिगत अधीनता बनी रहती है, वह वर्गीय एकता नहीं, आर्थिक समझौता भर है।

और जिस किसान राजनीति को दलित का स्वतंत्र वोट, स्वतंत्र श्रम और स्वतंत्र सम्मान असहज करता है, उसके सामने असली संघर्ष सरकार से ज्यादा अपने ही सामाजिक आधार के भीतर है।

रूस में सर्वहारा क्रांति को किसान के साथ समझौता करना पड़ा था।

भारत में किसान और खेतिहर मजदूर की वास्तविक एकता के लिए उससे आगे जाना पड़ेगा—

किसान के साथ खेतिहर मजदूर को जोड़ना ही नहीं, खेतिहर मजदूर को बराबर मनुष्य और बराबर नागरिक मानना पड़ेगा।

यही वर्ग और जाति के उस दोहरे विरोधाभास का समाधान है जिसे भारतीय राजनीति आज तक पूरी तरह हल नहीं कर पाई है।

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