सत्ता से असहमति को विदेशी साजिश बताने की प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी; आरोप सही हैं तो जांच और सबूत सामने आएं, महज संदेह से आंदोलनों की विश्वसनीयता खत्म नहीं की जा सकती
भारत में अब यह एक पहचाना हुआ राजनीतिक दृश्य बनता जा रहा है। कहीं सरकार के किसी फैसले के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ, कहीं नागरिक अधिकारों को लेकर प्रदर्शन हुआ, कहीं अल्पसंख्यक समुदाय ने अपनी शिकायतों के साथ आवाज उठाई और कहीं किसी नीतिगत फैसले पर सवाल खड़े हुए—बहस के बीच अचानक विदेशी फंडिंग, बाहरी ताकतों और देशविरोधी साजिश का शोर सुनाई देने लगता है। आंदोलन की मांगों, उसके पीछे की परिस्थितियों और सरकार की जवाबदेही पर चर्चा बाद में होती है; पहले आंदोलन की नीयत पर सवाल खड़ा कर दिया जाता है। मानो किसी आंदोलन को बदनाम करने के लिए उसके पीछे विदेशी हाथ होने का आरोप लगा देना ही पर्याप्त हो।
विदेशी फंडिंग का सवाल अपने आप में निराधार या गैरजरूरी नहीं है। देश में काम करने वाले संगठनों और संस्थाओं को मिलने वाले विदेशी धन पर कानून लागू होते हैं। यदि किसी संगठन ने अवैध तरीके से विदेशी धन प्राप्त किया है, उसका इस्तेमाल कानून के विरुद्ध किया है या किसी गैरकानूनी गतिविधि के लिए धन उपलब्ध कराया है तो जांच होनी चाहिए और दोष साबित होने पर कार्रवाई भी। राष्ट्रीय सुरक्षा और वित्तीय पारदर्शिता के मामले में किसी तरह की रियायत नहीं दी जा सकती। लेकिन इस वैध चिंता और हर असुविधाजनक आंदोलन को विदेशी साजिश से जोड़ देने के बीच एक बुनियादी फर्क है, जिसे नजरअंदाज करना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
विदेशी फंडिंग का आरोप जांच का विषय हो सकता है, किसी आंदोलन को खारिज करने का स्वतः प्रमाणपत्र नहीं।
आरोप लगाना आसान, सबूत देना सरकार की जिम्मेदारी
किसी आंदोलन में विदेशी धन का इस्तेमाल हुआ है या नहीं, इसका पता राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, जांच से चल सकता है। धन कहां से आया, किस खाते में पहुंचा, किस उद्देश्य से दिया गया, उसका इस्तेमाल कहां हुआ और क्या किसी कानून का उल्लंघन हुआ—इन सवालों के जवाब दस्तावेजों, वित्तीय लेन-देन और जांच के प्रमाणों से ही मिल सकते हैं। यदि सरकार के पास ठोस सूचना है तो उसके पास जांच एजेंसियां हैं। वह जांच कराए, तथ्य सामने रखे और कानून के मुताबिक कार्रवाई करे।
लेकिन यदि किसी आंदोलन के शुरू होते ही उसे विदेशी फंडिंग से प्रेरित बताने का सिलसिला चल पड़े और आरोपों के समर्थन में प्रमाण जनता के सामने न आएं, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठेगा कि क्या विदेशी फंडिंग का शोर वास्तविक अनियमितता उजागर करने के लिए है या आंदोलन की राजनीतिक वैधता पर हमला करने का औजार बन गया है?
किसी संगठन को विदेशी धन मिलना भी अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि उसका हर कार्यक्रम विदेशी निर्देश पर चल रहा है। इसी तरह, किसी आंदोलन की मांगों से सरकार को असहमति हो सकती है, लेकिन इससे आंदोलन के पीछे विदेशी साजिश होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। धन के स्रोत, उसके उपयोग और आंदोलन के संचालन के बीच प्रमाणित संबंध स्थापित करना आवश्यक है।
लोकतंत्र में आरोप लगाने वाले को प्रमाण प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता। खासकर तब, जब आरोप सरकार या उसके समर्थकों की ओर से लगाए जा रहे हों और उनका इस्तेमाल नागरिकों की देशभक्ति पर सवाल उठाने के लिए किया जा रहा हो।
अल्पसंख्यकों के आंदोलन और संदेह की राजनीति
इस प्रवृत्ति का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि अल्पसंख्यक समुदायों के आंदोलनों के संदर्भ में विदेशी प्रभाव या साजिश का आरोप कई बार अधिक तीखे राजनीतिक विमर्श के साथ सामने आता है। नागरिकता, धार्मिक स्वतंत्रता, भेदभाव की आशंका या किसी सरकारी नीति के विरोध में जब कोई समुदाय संगठित होकर आवाज उठाता है, तो उसकी शिकायतों पर विचार करने के बजाय उसके उद्देश्यों पर संदेह करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।
यहां किसी भी सरकार की कार्रवाई को एक ही रंग में रंगना उचित नहीं होगा। कुछ मामलों में वित्तीय अनियमितता, हिंसा या कानून के उल्लंघन के वास्तविक प्रमाण हो सकते हैं। ऐसे मामलों में कार्रवाई सरकार का अधिकार ही नहीं, दायित्व भी है। लेकिन किसी समुदाय की पहचान, आंदोलन की राजनीतिक असुविधा या सरकार के प्रति उसकी मुखर असहमति अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं हो सकती।
यदि किसी आंदोलन में हिंसा हुई है तो हिंसा में शामिल व्यक्तियों की जिम्मेदारी तय की जाए। यदि विदेशी धन के अवैध इस्तेमाल का संदेह है तो वित्तीय जांच हो। यदि किसी संगठन ने कानून तोड़ा है तो उसके विरुद्ध प्रमाणों के आधार पर कार्रवाई की जाए। लेकिन इन अलग-अलग प्रश्नों को एक साथ मिलाकर पूरे आंदोलन, उसके हर समर्थक और उसकी प्रत्येक मांग को संदेह के घेरे में डाल देना न्याय के सिद्धांतों के अनुकूल नहीं है।
आखिर किसी लोकतंत्र में नागरिकों को अपनी शिकायत रखने के लिए पहले अपनी देशभक्ति साबित करने की शर्त क्यों स्वीकार करनी चाहिए? किसी समुदाय की मांग गलत हो सकती है, किसी आंदोलन का तरीका अनुचित हो सकता है और उसके नेतृत्व की आलोचना भी की जा सकती है। लेकिन इन सबका निर्णय तथ्यों और कानून के आधार पर होना चाहिए, सामूहिक संदेह के आधार पर नहीं।
ट्रम्प कार्ड की तरह इस्तेमाल होने लगा आरोप
राजनीति में किसी आरोप का बार-बार इस्तेमाल अंततः उसी की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकता है। यदि हर सरकार विरोधी आंदोलन में विदेशी फंडिंग का आरोप लगाया जाए, लेकिन उसके समर्थन में ठोस प्रमाण सामने न आएं, तो जनता के बीच इस आरोप की गंभीरता कम होने लगती है। तब वास्तविक विदेशी वित्तीय हस्तक्षेप के मामलों में भी लोगों को यह आशंका हो सकती है कि कहीं यह आरोप किसी वैध विरोध को बदनाम करने के लिए तो नहीं लगाया जा रहा।
यह स्थिति सरकार के हित में भी नहीं है। विदेशी फंडिंग के जरिए गैरकानूनी गतिविधियां संचालित करने वाले संगठनों की पहचान करना गंभीर काम है। यदि यही मुद्दा राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में उलझकर रह जाए तो वास्तविक अनियमितताओं की जांच भी अविश्वसनीयता के घेरे में आ सकती है।
सरकार की विश्वसनीयता केवल इस बात से नहीं बनती कि वह कितने संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करती है। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि कार्रवाई के पीछे प्रमाण कितने मजबूत हैं, जांच कितनी निष्पक्ष है और कानून का इस्तेमाल विरोधियों तथा समर्थकों के मामले में समान रूप से होता है या नहीं। कठोर कार्रवाई और न्यायपूर्ण कार्रवाई एक ही चीज नहीं हैं। लोकतंत्र में कठोरता की स्वीकार्यता भी निष्पक्षता और प्रमाणों पर निर्भर करती है।
दुनिया बदल चुकी है, अब जवाबदेही से बचना आसान नहीं
यह बहस केवल भारत तक सीमित नहीं है। वैश्वीकरण और डिजिटल संचार के दौर में किसी देश के भीतर होने वाले घटनाक्रमों पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, मानवाधिकार संगठनों, शोध संस्थानों और नागरिक समाज की नजर रहती है। संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार व्यवस्था से लेकर एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच और फ्रीडम हाउस जैसे संगठन विभिन्न देशों में नागरिक स्वतंत्रताओं, मानवाधिकारों और लोकतंत्र की स्थिति पर रिपोर्ट जारी करते हैं। उनकी कार्यपद्धति, निष्कर्षों और संभावित पूर्वाग्रहों की आलोचना की जा सकती है, लेकिन केवल विदेशी होने के कारण उनके हर सवाल को निरर्थक नहीं ठहराया जा सकता।
यही सिद्धांत देश के भीतर सक्रिय मानवाधिकार संगठनों, नागरिक समूहों और स्वतंत्र शोध संस्थाओं पर भी लागू होता है। भारत में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स चुनावी पारदर्शिता पर, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज नागरिक स्वतंत्रताओं पर, कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव पुलिस सुधार और सूचना के अधिकार पर तथा इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन डिजिटल अधिकारों पर काम करते हैं। इन संस्थाओं के निष्कर्षों से असहमति हो सकती है, उनके दावों की जांच भी हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछने की उनकी भूमिका को केवल संदेह के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।
अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही का अर्थ विदेशी शक्तियों को भारत के आंतरिक मामलों में मनमाना अधिकार देना नहीं है। इसका अर्थ यह है कि भारत अपनी संप्रभुता की रक्षा करते हुए अपने संवैधानिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों के प्रति भी जवाबदेह रहे। यदि कोई विदेशी संस्था गलत तथ्य प्रस्तुत करती है तो उसका प्रमाणों के आधार पर खंडन होना चाहिए। यदि किसी घरेलू संगठन पर अवैध विदेशी फंडिंग का संदेह है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दोनों ही स्थितियों में तथ्य निर्णायक होने चाहिए, पूर्वनिर्धारित राजनीतिक निष्कर्ष नहीं।
मजबूत सरकार आलोचना से नहीं डरती
लोकतंत्र में सरकार को आंदोलनों से असहमति रखने, उनकी आलोचना करने और कानून तोड़ने वालों के विरुद्ध कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है। लेकिन उसे यह भी स्वीकार करना होगा कि शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार है। हर आंदोलन सरकार के विरुद्ध साजिश नहीं होता और हर सरकार विरोधी आवाज किसी बाहरी शक्ति के इशारे पर नहीं उठती। कई बार आंदोलन स्थानीय समस्याओं, नीतिगत असंतोष, अधिकारों के सवालों या प्रशासनिक विफलताओं से पैदा होते हैं। उनकी वास्तविकता को समझे बिना उन्हें विदेशी फंडिंग के खाते में डाल देना समस्या का समाधान नहीं है।
यदि सरकार को लगता है कि कोई आंदोलन वास्तविक जनसमस्याओं से भटककर गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल हो गया है, तो उसे प्रमाणों के साथ यह बात जनता के सामने रखनी चाहिए। यदि आरोप सही हैं तो जांच की रिपोर्ट और कानूनी कार्रवाई उसकी पुष्टि करेंगी। यदि आरोप गलत साबित होते हैं तो सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। लोकतांत्रिक जवाबदेही केवल नागरिकों से अपेक्षित नहीं हो सकती; सत्ता को भी अपने आरोपों और कार्रवाइयों के लिए जवाबदेह होना पड़ेगा।
भारत की लोकतांत्रिक प्रतिष्ठा इस बात से नहीं बढ़ेगी कि सरकार कितनी आसानी से किसी आंदोलन को विदेशी साजिश बता देती है। प्रतिष्ठा तब बढ़ेगी, जब सरकार वास्तविक गैरकानूनी गतिविधियों के विरुद्ध प्रमाणों के आधार पर कार्रवाई करे और वैध असहमति को पर्याप्त लोकतांत्रिक स्थान दे।
विदेशी फंडिंग के आरोपों का सबसे प्रभावी उत्तर न तो उन्हें राजनीतिक हथियार बनाना है और न ही वास्तविक अनियमितताओं की अनदेखी करना। सही रास्ता है—निष्पक्ष जांच, सार्वजनिक प्रमाण और कानून का समान अनुपालन।
क्योंकि लोकतंत्र में किसी आंदोलन को गलत साबित करने के लिए उसके पीछे विदेशी हाथ होने की कहानी गढ़ना आवश्यक नहीं होना चाहिए। यदि उसकी मांगें गलत हैं तो तर्क से जवाब दिया जाए; यदि उसका तरीका गैरकानूनी है तो कानून के मुताबिक कार्रवाई हो; और यदि उसके आरोप सही हैं तो सरकार अपनी कमियां दूर करे।
आखिरकार, सरकार की ताकत उसके विरोधियों पर लगाए गए आरोपों की संख्या से नहीं, बल्कि उन आरोपों को प्रमाणित करने की क्षमता और अपनी व्यवस्था को निष्पक्ष बनाए रखने के साहस से तय होती है। विदेशी फंडिंग का आरोप जब जांच का विषय रहने के बजाय हर आंदोलन को खारिज करने का ट्रम्प कार्ड बन जाए, तो सवाल केवल आंदोलनों की विश्वसनीयता का नहीं रह जाता—सरकार की अपनी विश्वसनीयता भी दांव पर लग जाती है।







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