लौना गांव के जीत सिंह की मौत के बाद उठे सवाल—जिस बिजली से खेत सींचने थे, वही जानलेवा कैसे बन गई?
सिरसाकलार-उरई | सोमवार की सुबह करीब आठ बजे का समय था। गांव लौना में खेतों की तरफ जाने वाले रास्तों पर दिन अपने रोजमर्रा के काम में लगा हुआ था। कहीं फसल को पानी देना था, कहीं खेत की मेड़ दुरुस्त करनी थी। साठ साल के जीत सिंह भी अपने खेतों की सिंचाई करने निकले थे। उनके लिए यह कोई असाधारण सुबह नहीं थी। खेती करने वाले आदमी की सुबहें अक्सर ऐसी ही होती हैं—सूरज पूरी तरह निकले, उससे पहले खेत पहुंच जाना और फसल की जरूरत पूरी करने में जुट जाना।
लेकिन उस सुबह खेत तक पहुंचकर जीत सिंह की जिंदगी का हिसाब अचानक खत्म हो गया।
बताया गया है कि निजी नलकूप का ट्रांसफार्मर एक ट्रैक्टर की ट्रॉली पर रखा हुआ था। जीत सिंह नलकूप चालू करने पहुंचे। उनका हाथ ट्रॉली से छू गया। ट्रॉली में जबरदस्त करंट उतर रहा था। बिजली ने उन्हें संभलने तक का मौका नहीं दिया। वह अचेत होकर जमीन पर गिर पड़े।
आसपास खेतों में काम कर रहे किसानों ने यह देखा तो परिजनों को सूचना दी। उन्हें तत्काल राजकीय मेडिकल कॉलेज, उरई ले जाया गया। वहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
खेत में पानी पहुंचाने निकला एक आदमी अस्पताल पहुंचते-पहुंचते एक खबर में बदल चुका था।
घर में अब किसका इंतजार होगा?
जीत सिंह के घर में इस सुबह का मतलब कुछ और था। वहां दिन की शुरुआत खेत, फसल और परिवार की जरूरतों से हुई होगी। किसी को यह अंदाजा नहीं था कि थोड़ी देर बाद उसी घर में ऐसी खबर पहुंचेगी, जिसके बाद आवाजें बदल जाएंगी, चेहरे बदल जाएंगे और रोजमर्रा के काम अचानक अर्थहीन लगने लगेंगे।
घर के मुखिया की मौत की खबर पहुंची तो कोहराम मच गया। पत्नी गोदा देवी और पुत्र राजू सिंह का रो-रोकर बुरा हाल है। दूसरा बेटा संजय गुजरात के सूरत में रहकर व्यवसाय करता है। एक किसान की मृत्यु का अर्थ सिर्फ एक सांस का थम जाना नहीं होता। उसके साथ खेत का अनुभव, परिवार की जिम्मेदारियां और भविष्य को लेकर बनी छोटी-बड़ी योजनाएं भी अचानक संकट में आ जाती हैं।
गांवों में आदमी की पहचान अक्सर उसके नाम से कम, उसके काम से ज्यादा होती है। कोई खेत संभालता है, कोई पशु, कोई परिवार की जरूरतें। जीत सिंह भी इसी दुनिया के आदमी थे। उनकी सुबह खेत में शुरू हुई थी। शाम को घर लौटने का जो सामान्य-सा भरोसा रहा होगा, वह अब किसी के पास नहीं है।
ट्रांसफार्मर कहां से आया था?
इस मौत के बाद सबसे जरूरी सवाल यही है कि ट्रॉली पर रखा ट्रांसफार्मर करंट से भरा कैसे था और उसे वहां किसने रखा था?
परिजनों और ग्रामीणों ने बिजली विभाग के कर्मचारियों तथा नलकूप मालिक की लापरवाही का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि इस लापरवाही ने एक किसान की जान ले ली। दूसरी ओर, बिजली विभाग के अनुसार संबंधित ट्रांसफार्मर विभाग की ओर से नहीं भेजा गया था, बल्कि उसे कहीं और से लाया गया था।
इन दोनों बातों के बीच जांच के लिए कई सवाल खड़े हैं। ट्रांसफार्मर किसका था? उसे ट्रॉली पर क्यों रखा गया था? क्या उसकी विद्युत आपूर्ति बंद थी? ट्रॉली में करंट उतरने का कारण क्या था? क्या उपकरण की जांच की गई थी और क्या खेत पर काम करने वाले व्यक्ति को किसी खतरे की जानकारी थी?
इन सवालों का जवाब आरोपों से नहीं, जांच और तकनीकी तथ्यों से मिलना चाहिए। किसी किसान की मौत के बाद यह पता लगाना जरूरी है कि बिजली का घातक प्रवाह कहां से आया, सुरक्षा में चूक कहां हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।
एक मौत, जिसके पीछे व्यवस्था का सवाल है
सिरसा कलार थाना क्षेत्र के थानाध्यक्ष वरुण प्रताप सिंह ने करंट लगने से किसान की मौत की सूचना मिलने की पुष्टि की है।
अब इस घटना का सच सामने लाने की जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों की है। यदि ट्रांसफार्मर निजी तौर पर लाया गया था, तो उसकी स्थिति और इस्तेमाल की परिस्थितियों की जांच होनी चाहिए। यदि कहीं विद्युत सुरक्षा के नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। और यदि विभाग की कोई भूमिका नहीं थी, तो उस दावे की भी जांच के आधार पर पुष्टि होनी चाहिए।
क्योंकि खेत में काम करने वाला किसान बिजली की तकनीकी व्यवस्था का विशेषज्ञ नहीं होता। वह इतना जानता है कि नलकूप चलेगा तो पानी आएगा और पानी आएगा तो फसल बचेगी। उसके लिए ट्रांसफार्मर बिजली पहुंचाने वाला उपकरण है, कोई ऐसा खतरा नहीं जिसे देखकर वह अपने खेत से लौट जाए।
लेकिन जब वही उपकरण जानलेवा साबित हो, तो यह पूछना जरूरी हो जाता है कि सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी।
लौना गांव में सोमवार की सुबह एक किसान खेत में पानी पहुंचाने गया था। वहां से उसकी अर्थी उठेगी, यह किसी ने नहीं सोचा होगा। अब उसके घर में शोक है, गांव में सवाल हैं और उन सवालों के बीच एक ऐसी मौत है, जिसे केवल हादसा कहकर भुला देना शायद सबसे आसान रास्ता होगा।
मुश्किल काम यह है कि पता लगाया जाए—जीत सिंह की जान लेने वाली बिजली आखिर किसकी जिम्मेदारी थी?





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