उरई। कृषि प्रधान जनपद में खेती एवं किसानों की दुश्वारियां दिनों दिन बढ़ती जा रही हैं। लगातार विगत 6-7 वर्षों से प्राकृतिक परेशानियां किसानों का पीछा नहीं छोड़ रही हैं।
इसमें मौसम की मार शासन की अनुकूल मंशा के बावजूद यथार्थ के धरातल पर व्यवस्था द्वारा प्रदत्त राहत सिफर हो गई है। फिर वह चाहे बिजली, पानी, खाद या अन्नदाता के लिए दिये जाने वाला अनुदान हो। सबसे पहले यदि प्रकृति के कोप को देखें तो गत् रबी की फसल को अत्यधिक वर्षा व ओलावृष्टि ने निगल लिया। किसानों को हाड़तोड़ मेहनत करके उगाई गई फसल लगभग शत-प्रतिशत नष्ट हो गई लेकिन देश के रहनुमाओं को यह दयनीय स्थिति नजर नही आई। हालांकि केंद्र और प्रदेश सरकार ने ऊंट के मुंह में जीरा डालने वाली कहावत चरितार्थ करते हुए थोड़ी बहुत आर्थिक सहायता तो दी लेकिन वह भी अव्यवस्थाओं की भेंट चढ़ गई। इसकी बानगी तो यही है कि प्रभावशाली लोग जहां अपने परिवार के सभी सदस्यों के नाम जमीन रखने वाले 18-18 हजार रुपये प्राप्त कर लिए। चाहे वह रिश्ते में पति-पत्नी ही क्यों न हों। कई ऐसे मामले आये जिन्हें इन रिश्तों के बीच भी अनुदान मिला। वहीं अपनी बारी का इंतजार कर रहे किसान आज भी प्रशासन, शासन की ओर नजर लगाये हैं लेकिन उन्हें फूटी कौड़ी नही मिली। आखिर इस असमानता के लिए सरकार और प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नही हो सकते। हालांकि मुआवजा पाने के लिए किसानों ने प्रजातांत्रिक तरीके से विरोध, धरना एवं प्रदर्शन भी किए बावजूद इसके मामला सिफर ही रहा।
किसानों की दुर्दशा यहीं नही रुकी बल्कि आगामी खरीफ की फसल में भी आफत ने सुरसा के मुंह की तरह सूखा फैलाकर उनकी फसल को सुखा दिया। बड़े अरमानों से किसानों ने अपने पौरुष के बल पर जुलाई माह में खरीफ की फसल तिल, उरद, मूंग, अरहर आदि को पलेवा करके वो दिया था लेकिन प्रकृति ने अपना रौद्र रूप शांत नही किया और पानी के अभाव में इनकी फसलें सूख गई। लगातार दो फसलों की मार ने किसानों की रीढ़ की हड्डी तोड़कर रख दी और दर्जनों किसानों ने आत्म हत्यायें कर लीं।
इनके बुरे दिन यहीं नही थमें आगामी दूसरी साल की फसल वर्ष 2015 की रबी की फसल के लिए भी प्रकृति नही पसीजी और सूखा बरकरार रखा। जिजीविषा के धनी किसानों ने फिर एक बार उम्मीदों के साथ अपने जेवर आदि बेंचकर खेतों में पलेवा किया और फसल बो दी लेकिन प्रकृति का हाल यह है कि जनवरी माह में भी क्वांर जैसी गर्मी का एहसास करा रही है। जिससे फसलें मुरझाकर सूखने की कगार पर फिर आ गई।
यह प्रकृति का अप्राकृतिक व्यवहार अब शासन की व्यवस्था को देखें तो यह भी या तो असहाय है या फिर जानबूझकर अन्नदाता को उसके हाल पर छोड़ रही है। नहरों का हाल यह है कि टेल तक पानी न पहुंचने के बावजूद उनका संचालन ठप्प कर दिया। जिससे काफी क्षेत्रफल में तो बुबाई ही नही हो सकी। अलबत्ता जिन्होंने बुबाई कर भी दी थी वह भी बढ़े हुए तापमान व पानी की कमी के चलते सूखने की कगार पर आ गई। जनपद के ट्यूबवैलों का भी कोई पुरसा हाल नही। शासन, प्रशासन की तमाम सख्ती के बावजूद वह अपनी पूरी क्षमता से कार्य नही कर रहे हैं। शासन की 24 घंटे बिजली देने के महत्वाकांक्षी फरमान भी दुर्दशाग्रस्त नजर आ रहा है क्योंकि आज भी बिजली 10-12 घंटे ही उपलब्ध हो पा रही है।
जनपद में लगभग 60 प्रतिशत जमीन वैसे भी असिंचित और जो सिचिंत भी है उसके लिए पानी के संसाधन ठप्प हो गये। वर्ष 2015 का किसानों के लिए बस यही हाल रहा।






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