07orai06कोंच-उरई। आठ सौ साल प्राचीन ऐतिहासिक धरोहर बारहखंभा पर बीती रात हो रहे अबैध कब्जे को प्रशासन ने सख्ती के साथ हटवा दिया। इमारत के पास रहने बाले कतिपय लोगों ने इस इमारत को घेरने के लिये ग्रिल आदि लगवाई थी जिसकी शिकायत प्रशासन के पास पहुंची तो एसडीएम संजय कुमार सिंह के निर्देश पर कोतवाल रूद्रकुमार सिंह ने मौके पर पहुंच कर उक्त कब्जे को मिसमार कराया और हिदायत दी कि आइंदा ऐसी हरकत न हो।
तकरीबन आठ सौ वर्ष प्राचीन ऐतिहासिक धरोहर बारहखंभा हालांकि पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है लेकिन विभागीय उपेक्षा के चलते इसका अस्त्वि क्षरण की ओर बढ़ रहा है। बीते रोज इलाकाई लोगों ने इस पर अबैध कब्जे का प्रयास किया था जिसे फिलवक्त तो विफल कर दिया गया है और कब्जा मिसमार कर वार्निंग भी कब्जा करने बालों को दे दी गई है कि इसे छूना भी मत, लेकिन आखिर कब तक ? बताना समीचीन होगा कि ऐतिहासिक और पुरा महत्व की धरोहरों से आवृत्त कोंच में मुहल्ला भगतसिंह नगर में अवस्थित बारहखम्भा दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चैहान और परमाल के बीच हुये युद्ध का मूक साक्षी है लेकिन शासन प्रशासन और पुरातत्व विभाग की उपेक्षा का शिकार यह ऐतिहासिक महत्व का गवाह शनैः शनैः क्षरण की ओर अग्रसर होता हुआ ध्वस्त होने की कगार पर है। बड़ी माता मंदिर के ठीक सामने स्थित बारहखम्भा पृथ्वीराज के विश्राम के लिये रातों रात तैयार किया गया था। इतिहासकारों के मुताबिक आठ सौ वर्ष प्राचीन इस बारहखम्भा का विवरण शताब्दी भर पुरानी ऐतिहासिक किताब अमर कोष में भी मिलता है जिसके अनुसार इस स्थान को कूंच जिला हमीरपुर में स्थित होना बताया गया है। बारहखम्भा के दक्षिणी पश्चिमी कोने पर पश्चिम की ओर एक बीजक नुमा पत्थर रखा गया है जिस पर पुरा अथवा सांकेतिक लिपि में कुछ उत्कीर्ण किया गया है जिसे फिलहाल अभी तक पढा नहीं जा सका है। पुरातत्व विभाग ने कई वर्ष पहले इसे अपने संरक्षण में ले तो लिया था और अपना एक बोर्ड भी चस्पा कर दिया था लेकिन फिर शायद वह इसे भूल गया और इसके संरक्षण जैसा कुछ भी नहीं किया। एक तरफ तो सरकार ऐतिहासिक और पुरा महत्व की धरोहरों के संरक्षण सम्बर्द्धन पर करोड़ों रूपये खर्च करके इनका मूल स्वरूप बनाये रखने के लिये प्रयासरत है, वहीं विभागीय शिथिलताओं के चलते इनका अस्तित्व संकट में नजर आ रहा है। पूरा एक ऐतिहासिक कालखण्ड अपने में आत्मसात् किये यह बारहखम्भा अपनी मिटती जा रही काया को लेकर किसके सामने अपनी व्यथा रोये, यह यक्षप्रश्न आज यहां के बाशिंदों के सामने है। इस इमारत के नीचे इलाकाई बाशिंदे अपने भेंस बकरियां बांध रहे हैं जिससे इसकी तस्वीर और भी बदरंग होती जा रही है।

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