0 ब्राह्मण महासभा ने मनाई आद्य शंकराचार्य की जयंती
कोंच-उरई। जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य की जयंती पर जुटे विप्रजनों एवं अन्य मनीषियों ने उन्हें सनातन धर्म की स्थापना और उसके संवाहक के रूप में निरुपित करते हुये कहा कि यदि आद्य शंकराचार्य अवतरित नहीं हुये होते तो भारत बर्ष में सनातन धर्म रसातल में जा चुका होता।
ब्राह्मण महासभा द्वारा आयोजित जयंती कार्यक्रम की अध्यक्षता महासभा अध्यक्ष देवीदयाल रावत ने की तथा संचालन महामंत्री अनुरुद्ध मिश्रा ने किया। महासभा के संस्थापक अध्यक्ष सर्वाचरण वाजपेयी ने कहा कि आद्य शंकराचार्य का अवतरण ही धर्म की स्थापना के लिये हुआ। उन्होंने बाल्यकाल में ही संन्यास की दीक्षा लेकर भारत भ्रमण किया और बढ़ते बौद्ध प्रभाव को रोक कर वेदों व उपनिषदों को प्रतिष्ठित किया। उन्होंने चारों मठों की स्थापना कर उनमें शंकराचार्यों को प्रतिष्ठित किया। आज भारतवर्ष में सनातन धर्म का वर्चस्व उन्हीं की वजह से है। विद्वान अधिवक्ता कमलेश चोपड़ा ने उनके जीवन वृत्त के बारे में विस्तार से प्रकाश डालते हुये कहा कि केरल प्रांत के कालाडी में उनका जन्म बैशाख शुक्ल तृतीया 686 ईस्वी में हुआ था। कहीं कहीं उनके जन्म को लेकर बैशाख शुक्ल पंचमी 788 ईस्वी का भी उल्लेख मिलता है। उक्त बालक के मस्तक पर चक्र चिन्ह, ललाट पर नेत्र चिन्ह, स्कंद पर शूल चिन्ह देख कर पंडितों ने उन्हें शिवावतार के रूप में स्वीकार किया और उन्होंने अल्पायु में ही ईश्वर द्वारा निर्दिष्ट कार्यों का बखूबी निर्वहन किया। मालावार प्रदेशांतर्गत त्रिचुर नगर में परशुराम मंदिर में परशुराम मंदिर के भीतर देव शरीर में उनका विलीन होना बताया गया है। इस दौरान आरबी मिश्रा, आनंद दुवे, पुरुषोत्तमदास रिछारिया, राजेन्द्र भारद्वाज, रामू पटैरया, विनय तिवारी, राधिकाशरण श्रीवास्तव आदि मौजूद रहे।







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