रामजी गुर्जर
सपा हाशिये पर पहुंच चुकी है लेकिन पार्टी नेतृत्व को अभी तक सद्बुद्धि नहीं आ रही है। अखिलेश यादव अपनी अकड़ ढीली नहीं कर पा रहे हैं। दूसरी ओर सेक्युलर मोर्चा के नाम से नई पार्टी के गठन का ऐलान करने के बाद शिवपाल यादव ने चुप्पी साध ली है। उनके नजदीकी सूत्र बताते हैं कि वे तमाम लड़ाई के बावजूद समाजवादी पार्टी से अपने लगाव को भुला नहीं पा रहे हैं क्योंकि पार्टी के जन्मदाता उनके भाई मुलायम सिंह हैं जिनको वे अपना राजनीतिक गुरु (नेता) सब कुछ मानते हैं और जीवन की अंतिम सांस तक उनके साथ रिश्ते को निभाने की दुहाई देते हैं। अंतर्कलह के इस भंवर में प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल होने के बावजूद समाजवादी पार्टी अपनी प्रासंगिकता पुनः स्थापित करने की बजाय पहचान बचाने तक को मोहताज नजर आने लगी है।
विधानसभा चुनाव में जब
समाजवादी पार्टी केवल 47 सीटों पर सिमट गई थी, जो कि पार्टी के इतिहास में सबसे कम संख्या रही, तो उम्मीद की गई थी कि वजूद का सवाल आ जाने की वजह से समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को सद्बुद्धि आएगी और इस नाते अखिलेश यादव अपने पिता मुलायम सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद वापस करके भूल सुधार कर लेंगे लेकिन अखिलेश आत्मघात की हद तक हठधर्मिता दिखा रहे हैं क्योंकि उनकी राजनीति का सूत्र संचालन नेपथ्य से प्रो. रामगोपाल यादव द्वारा किया जा रहा है। सपा के स्वर्णिम दौर के कार्यकर्ताओं को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में ज्यादा नाराजगी किसी शख्स से थी तो वे प्रो. रामगोपाल यादव थे, जिन्होंने किसी को बेइज्जत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मुलायम सिंह यादव से पार्टी के कार्यकर्ता रामगोपाल यादव के अभद्र व्यवहार की शिकायत करते रहे लेकिन उस समय तक उनकी आंखों में चचेरे भाई के प्रति अनुरक्ति का चश्मा चढ़ा था इसलिए उन्होंने रामगोपाल यादव को न तो टोका और न ही उन पर कोई कार्रवाई की। जाहिर है कि ऐसे शख्स से पार्टी को कोई संगठनात्मक लाभ तो हो नहीं सकता था सिवाय नुकसान के। आज भी रामगोपाल यादव की इस फितरत में कोई बदलाव नहीं आ पाया है। उनके आगे रहते लोग पार्टी से कैसे जुड़ सकते हैं इसलिए समाजवादी पार्टी का आधार बढ़ाने की कोई मुहिम शुरू नहीं हो पा रही है। 47 विधायकों में से राजा भइया एंड कंपनी ने अलग रास्ता पकड़ लिया है। आजम खां और उनका बेटा अपनी ढपली अपना राग अलाप रहे हैं। शिवपाल यादव ने भले ही समाजवादी पार्टी की लाइन की सीट विधानमंडल सत्र में पकड़ी हो लेकिन अखिलेश ने उनको नोटिस तक में नहीं लिया जिससे समाजवादी पार्टी में उनकी काउंटिंग का कोई कोई मतलब नहीं है।
रामगोपाल यादव के ही कहने से अखिलेश ने विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था। जिससे पार्टी को कोई फायदा नहीं मिला। उलटे 103 सीटों पर जहां कांग्रेस के उम्मीदवार खड़े हुए थे पार्टी की मौजूदगी खत्म सी हो गई। जिसे फिर से खड़ा करने में वक्त लगेगा और इस हश्र के बावजूद कांग्रेस ने अपना काम बनता भाड़ में जाये जनता की तर्ज पर विधानसभा चुनाव में गठबंधन के संबल को बनाने के बाद सलीके से अपने को स्थानीय निकाय चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी से अलग कर लिया है। मुलायम सिंह यादव ने जब समाजवादी पार्टी बनाई थी, उन्हें 5 जिलों का नेता कहा जाता था लेकिन जुझारू नेतृत्व और सांगठनिक कौशल के चलते मुलायम सिंह ने धीरे-धीरे प्रदेश के हर जिले में समाजवादी पार्टी की जड़ें मजबूत कर लीं। लायक पिता के लायक बेटे होने के मुहावरे को चरितार्थ करते हुए अखिलेश को चाहिए था कि वे हर जिले में पार्टी को अपने पिता से भी ज्यादा सुदृढ़ करते लेकिन उनके सिर से गठबंधन का भूत नहीं उतर पा रहा है। कहते हैं कि दूध का जला छाछ भी फूंककर पीता है लेकिन कांग्रेस से मिले झटके के बावजूद वे अब बुआजी यानी मायावती के साथ गठबंधन की पींगें भरने में लग गये हैं। समाजवादी पार्टी को खरोंच-खरोंच कर सूक्ष्मकाय बनाने का इरादा शायद अखिलेश ने बना लिया है। इसके बावजूद मुलायम सिंह की नियति टुकुर-टुकुर अपनी आंखों के सामने अपने खून-पसीने से खड़े किये गये आशियाने को ध्वस्त देखना रह गई है।
शिवपाल यादव इसलिए कच्चे पड़ गये कि जब उन्होंने मुलायम सिंह के नेतृत्व में सेक्लुयलर मोर्चा के गठन का ऐलान किया तो मुलायम सिंह ने कह दिया कि शिवपाल ने यह फैसला उनसे पूछकर नहीं किया है। इससे राजनीति में सनसनी मच गई। मुलायम सिंह के बयान में यह इबारत पढ़ी जाने लगी कि वे अपने भाई के साथ छल करके अपने बेटे की बजाने का मूड बनाये हैं। दरअसल मुलायम सिंह अखिलेश के मामले हृदयविहीन नहीं हो पा रहे हैं। वे पहले ही कह चुके हैं कि है तो वह मेरा बेटा ही, उसे मार तो नहीं सकता। शिवपाल भी बड़े भाई की इस मजबूरी को समझते हैं इसलिए अपमानित होकर भी वे बार-बार कदम वापस खींचने को मजबूर हो जाते हैं। लेकिन मुलायम सिंह ने साफ कर दिया कि कुछ भी हो जाये वे भाई शिवपाल को नहीं भूल सकते। उन्होंने शिवपाल की बात का समर्थन करते हुए कहा कि भले ही उनको पद की भूख नहीं है लेकिन अखिलेश ने चुनाव के तीन महीने के बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद नेताजी को लौटाने का जो वायदा किया था उसे उनको निभाना चाहिए। पर अखिलेश प्रो. रामगोपाल यादव के वशीकरण में लोक-लाज भूल चुके हैं। रामगोपाल यादव के निर्देशन में सदस्यता अभियान चलाया गया जिसके बाद पार्टी की चुनाव प्रक्रिया शुरू कराकर अखिलेश को एक बार फिर से पांच साल के लिए विधिवत अध्यक्ष चुन लिया जाएगा यानी अखिलेश को पिता के नाम पर भी पार्टी के हित के लिए कोई त्याग करना मंजूर नहीं है।
दूसरी ओर अखिलेश यादव में न तो संघर्ष क्षमता और कर्मठता है और न ही जोड़तोड़ का माद्दा, मुलायम सिंह का इस मामले में कोई विकल्प समाजवादी पार्टी में हो सकता है तो केवल शिवपाल यादव, इसलिए अखिलेश के नेतृत्व में न तो पार्टी का कारवां आंगे बढ़ पा रहा है और न लोग उससे जुड़ पा रहे हैं। सपा के लोगों तक को अपनी पार्टी डूबता जहाज नजर आने लगी है। स्थानीय निकाय चुनाव के परिणाम पार्टी के पतन का और ज्यादा भयावह चेहरा सामने ला सकते हैं। इस आशंका से कार्यकर्ता डरे हुए हैं। ऐसे में सैफई परिवार में अखिलेश के प्रति गुस्सा बढ़ने लगा है।
विधानमंडल में राज्यपाल के अभिभाषण पर अखिलेश के इशारे पर सपा के सदस्यों ने जो गरिमाहीन आचरण पेश किया उसे लेकर शिवपाल के बेटे आदित्य यादव और अनुजवधु अपर्णा यादव ने उन्हें आड़ों हाथों ले लिया। अपर्णा भी खुलकर अखिलेश के लिए कह चुकी हैं कि भइया को राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़कर पिताजी को सौंप देना चाहिए। मुलायम सिंह यादव की पत्नी साधना यादव उनके अपमान पर चुनाव के समय खुलकर अखिलेश के सामने आ गई थीं लेकिन मुलायम सिंह ने उनको खामोश कर दिया है। मुलायम सिंह यादव को इस बात की बड़ी पीड़ा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विधानसभा चुनाव के दौरान यह कहकर उनके परिवार की स्थिति को अपने पक्ष में भुना लिया कि जो अपने पिता का नहीं हुआ वह किसी दूसरे का क्या होगा। वे नहीं चाहते थे कि साधना के मैदान में आने से लोगों को बात का बतंगड़ बनाकर उनकी पारिवारिक मर्यादा को तार-तार करने का अवसर मिले।
उधर राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सीएम योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह अखिलेश एंड कंपनी को सीटी के बहाने जलील किया उससे आदित्य और अपर्णा के आरोपों को बल मिला है। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उन्होंने तो दो ही लोगों को सीटी बजाते हुए देखा है। या तो ट्रैफिक के सिपाही को या उन लोगों को जिनके दमन के लिए एंटी रोमियो स्कवायड बनाया गया है। अखिलेश उस समय सदन में मौजूद थे। जब योगी यह भाषण दे रहे थे। उनका चेहरा यह भाषण सुनकर उतरते देखा जा रहा था। बहरहाल सैफई के मुगलों का क्रम अकबर से सीधे बहादुरशाह जफर के अंतिम पायदान गिरेगा, यह अंदाजा किसी को नहीं था। पर फिलहाल इसी के आसार हैं।







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