0 वर्ष 2005 में ग्रामीणों ने तालाब के अतिक्रमण हटाने की थी मांग
0 दबंगों ने निर्मित कराये कच्चे-पक्के मकान
0 तहसीलदार बोले तालाब का रकवा पूरा, नहीं है कोई अतिक्रमण
0 झूठी जांच रिपोर्ट बनाकर सालों से आला अधिकारियों को किया जा रहा गुमराह
उरई। एक ओर जहां सुप्रीम कोर्ट तालाबों के संरक्षण के लिये बेहद गंभीर है ताकि देश के ग्रामीणांचल ही नहीं शहरी क्षेत्रों में भी प्राचीनकाल के जलस्रोतों को सुरक्षित रखा जा सके। वहीं इसके ठीक विपरीत प्रशासन जनता की शिकायतों को दरकिनार कर तालाबों से अवैध कब्जों को हटाने में गंभीर नजर नहीं आ रहे हैं। ऐसा ही मामला ग्राम अकोढ़ी बैरागढ़ का प्रकाश में आया है। ताज्जुब की बात तो यह है कि ग्रामीणों ने वर्ष 2005 में गांव के पालों का तालाब से अतिक्रमण हटाने की शिकायत की थी जिसे तहसील प्रशासन द्वारा 4 हजार 380 दिन बाद भी नहीं हटवा पाया। जब उक्त संबंध में उरई तहसीलदार से दूरभाष पर जानकारी चाही तो उन्होंने अकोढ़ी के किसी भी तालाब पर अवैध अतिक्रमण होने को ही नकारते हुये बोले तालाब का रकवा पूरा है। जबकि गांवों के दोनों तालाबों के चारों ओर अतिक्रमणकारियों ने तालाब के आधे रकवे पर अपना कब्जा जमा लिया है। उरई तहसील क्षेत्र के ग्राम अकोढ़ी बैरागढ़ के ग्रामीण वर्ष 2005 से लगातार गांव के महत्वपूर्ण पालों के तालाब को अतिक्रमण मुक्त कराने का प्रयास करते आ रहे हैं। जिलाधिकारी के आदेशों के बावजूद आज तक तालाब से अतिक्रण नहीं हटाया जा सका। लेखपाल आदेशों को रद्दी की टोकरी में डालकर अतिक्रमणकारियों को खुला संरक्षण देने का काम कर रहा है। ग्रामीणों ने वर्ष 2005 में तालाब में हुये अवैध अतिक्रमण की शिकायत तत्कालीन जिलाधिकारी अजय सिंह चैहान से की थी जिसमें तत्कालीन उप जिलाधिकारी सदर कालूराम यादव ने दर्जन भर लोगों को अवैध अतिक्रमण करने का दोषी भी पाया था। उन्होंने अपने आदेश पत्र संख्या 380/1 एसटी दिनांक 18 जनवरी 2005 को तहसीलदार उरई व थानाध्यक्ष एट को ग्राम अकोढ़ी बैरागढ़ के पालों के तालाब से अवैध अतिक्रमण हटाये जाने के सख्त निर्देश भी दिये थे लेकिन आदेश को तहसील प्रशासन ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया था। जब ग्रामीणों को लगा कि उनकी शिकायत को अधिकारियों ने गंभीरता से नहीं लिया और तालाब की जगह पर अवैध अतिक्रमण करने वालों पर कोई कार्यवाही अमल में नहीं लायी गयी तो उन्होंने शिकायत करने का क्रम जारी रहा जिसे गांव का लेखपाल रद्दी की टोकरी में डालता रहा। वर्ष 2016 में भी ग्रामीणों ने तत्कालीन जिलाधिकारी संदीप कौर को तालाब के अवैध अतिक्रमण के मामले की शिकायत की जिसमें उप जिलाधिकारी सदर ने अपनी जांच में ग्राम के कई लोगों को अवैध अतिक्रमण करने का दोषी पाया था। लेखपाल ने उप जिलाधिकारी को दी गयी जांच आख्या में ग्रामीण भगवान सिंह पुत्र मगन, ग्राम सभा द्वारा तालाब के बीचों बीच सड़क बनवाने का दोषी पाया था। शिवराम पुत्र पंचे, रामसिंह पुत्र मथुराई, गेंदालाल पुत्र रघुवंशी, नरेश पुत्र मंगल, गजराज पुत्र श्याम, लखन पुत्र डरेले, रामपाल पुत्र चंद्रभान, शिवराम पुत्र मुनीराम, अमर सिंह पुत्र वृंदावन को तालाब की जमीन पर अवैध कब्जों का भी दोषी पाया। उप जिलाधिकारी सदर ने अपने आदेश पत्रांक 1853 एसटी/एसडीएम दिनांक 29 जून 2016 को तहसीलदार उरई व थानाध्यक्ष एट को निर्देशित किया कि उक्त अवैध अतिक्रमण से तालाब को मुक्त कराकर कृत कार्यवाही से अवगत करायें लेकिन ग्रामीणों की शिकायत को 4 हजार 380 दिन हो जाने के बाद भी एक भी व्यक्ति का अवैध अतिक्रमण नहीं हटाया जा सका। अब पुनः ग्रामीणों ने जिलाधिकारी नरेंद्र शंकर पांडेय से गांव के पालों के तालाब को अवैध अतिक्रमण से मुक्त कराने का प्रार्थना पत्र 18 मई 2017 को दिया जो आज भी तहसील में धूल खा रहा है। प्रार्थना पत्र में ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि ग्राम प्रधान व लेखपाल अतिक्रमणकारियों को खुला संरक्षण दिये हैं जिस कारण कोई कार्यवाही नहीं हो पाती है। लेखपाल आदेशों को रद्दी की टोकरी में डालकर कार्यवाही के नाम पर झूठी आख्यायें तहसीलदार को प्रेषित कर उन्हें भी गुमराह करने से बाज नहीं आ रहा है। ग्रामीणों ने जिलाधिकारी से मांग की है कि यदि पालों के तालाब पर अवैध कब्जा जमाये अतिक्रमणकारियों पर कार्यवाही नहीं की तो भविष्य में गांव के तालाबों को अस्तित्व ही नष्ट होने से कोई नहीं रोक पायेगा। शिकायतकर्ता ग्रामीणों का यह भी कहना था कि तालाब की जमीन पर अवैध कब्जा जमाये अतिक्रमण साल दर साल तालाब की जमीन पर मिट्टी का पुराव कर तालाब का रकवा हजम करने के अभियान में जुटे हुये हैं।






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