
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी का नाम केवल एक नेता का नाम नहीं रहा है, बल्कि वह एक राजनीतिक घटना रही हैं। तीन दशक तक वामपंथी प्रभुत्व वाले प्रदेश में उन्होंने जिस संघर्ष, साहस और राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय दिया, वह भारतीय लोकतंत्र की उल्लेखनीय कहानियों में गिना जाता है। किंतु राजनीति में लोकप्रियता उतनी ही स्थायी होती है जितनी जनता की आस्था। सत्ता के साथ उसका संबंध टूटते ही उसका स्वरूप बदल जाता है। पश्चिम बंगाल के हालिया राजनीतिक घटनाक्रम ने यही प्रश्न खड़ा किया है कि क्या ममता बनर्जी का राजनीतिक जादू वास्तव में उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता पर आधारित था या फिर वह सत्ता की शक्ति से निर्मित एक तिलिस्म था?
विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित हुए अभी पंद्रह दिन भी नहीं बीते थे कि तृणमूल कांग्रेस में अभूतपूर्व भगदड़ शुरू हो गई। पार्टी के 120 विधायकों में से 60 विधायकों ने नया गुट बना लिया और उसके नेता सुवेन्दु अधिकारी को विधानसभा अध्यक्ष ने विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता प्रदान कर दी। ममता बनर्जी इस आघात से उबर भी नहीं पाई थीं कि संसदीय दल में भी दरारें उभरने लगीं। राज्यसभा में डेरेक ओ’ब्रायन और सुखेंदु शेखर राय के इस्तीफों ने राजनीतिक हलकों को चौंका दिया। इसके बाद लोकसभा में पार्टी के 28 सांसदों में से 20 ने अलग होकर भाजपा समर्थक नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी में विलय की घोषणा कर दी।
इन घटनाओं ने एक समय अजेय समझी जाने वाली तृणमूल कांग्रेस को अस्तित्व के संकट में ला खड़ा किया। सवाल उठने लगा कि क्या यह वही पार्टी है जिसने कभी बंगाल में वामपंथी साम्राज्य को ध्वस्त कर दिया था? क्या यह वही नेता हैं जिन्हें बंगाल की शेरनी कहा जाता था?
दरअसल, ममता बनर्जी की कहानी भारतीय राजनीति की उन विरल कथाओं में से है जहाँ विरासत की जगह संघर्ष ने नेतृत्व को जन्म दिया। उनके पास न कोई राजनीतिक वंश था और न ही संसाधनों का अपार भंडार। कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने सड़क से लेकर संसद तक संघर्ष किया। वामपंथी शासन के दौरान उन पर हुए हमले, धरने, गिरफ्तारियाँ और लगातार राजनीतिक उपेक्षा ने उन्हें और अधिक आक्रामक बनाया।
जब उन्होंने कांग्रेस छोड़कर अपनी अलग पार्टी बनाने का निर्णय लिया था, तब अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे राजनीतिक आत्महत्या बताया था। लेकिन साधारण सूती साड़ी और चप्पलों में घूमने वाली इस नेता ने अपनी जुझारू छवि के बल पर जनसमर्थन जुटाया। धीरे-धीरे तृणमूल कांग्रेस बंगाल की सबसे बड़ी विपक्षी शक्ति बनी और अंततः वामपंथी किले को ध्वस्त कर सत्ता तक पहुँच गई।
सत्ता प्राप्ति तक की यह यात्रा प्रेरणादायक थी। किंतु सत्ता प्राप्ति के बाद शासन का चरित्र बदलता गया। जिन संस्थाओं को लोकतांत्रिक बनाया जाना था, वे धीरे-धीरे राजनीतिक प्रभाव के उपकरण बनती चली गईं। विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा कि प्रशासनिक मशीनरी का उपयोग राजनीतिक विरोधियों को नियंत्रित करने के लिए किया जा रहा है। पंचायत चुनावों से लेकर स्थानीय निकायों तक हिंसा और दबाव की शिकायतें लगातार सामने आती रहीं।
ममता बनर्जी पर यह आरोप भी लगा कि उन्होंने वैचारिक राजनीति की जगह व्यक्तिकेंद्रित राजनीति को बढ़ावा दिया। पार्टी और सरकार दोनों का केंद्र धीरे-धीरे एक ही व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमटता चला गया। उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी का बढ़ता प्रभाव भी पार्टी के भीतर असंतोष का कारण बना। कई वरिष्ठ नेता स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगे।
विधानसभा चुनाव में मिली हार ने इसी दबे असंतोष को विस्फोटक रूप दे दिया। जो नेता वर्षों तक पार्टी के साथ खड़े दिखाई देते थे, वे अचानक दूसरे खेमों में चले गए। यह केवल राजनीतिक अवसरवाद नहीं था बल्कि सत्ता के खो जाने के बाद नेतृत्व की वास्तविक स्वीकार्यता की भी परीक्षा थी।
हालाँकि यह कहना भी उचित नहीं होगा कि चुनाव परिणाम पूरी तरह विवादरहित थे। तृणमूल कांग्रेस और उसके समर्थकों का आरोप है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान प्रशासनिक और संस्थागत स्तर पर ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित की गईं जिनसे विपक्ष को लाभ पहुँचा। चुनाव आयोग की भूमिका पर भी प्रश्न उठाए गए। इन आरोपों की स्वतंत्र जाँच और प्रमाण का विषय अलग है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि हार के बाद पार्टी के भीतर विश्वास का संकट गहरा गया।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जनता का एक बड़ा वर्ग इस राजनीतिक टूट-फूट के विरोध में सड़कों पर नहीं उतरा। यही बात ममता बनर्जी के लिए सबसे अधिक चिंताजनक रही। किसी भी जननेता की वास्तविक शक्ति चुनाव परिणामों से अधिक उसके समर्थकों की सामाजिक सक्रियता में दिखाई देती है। यदि जनता अपने नेता के पक्ष में खड़ी होने को तैयार नहीं है तो इसका अर्थ है कि समर्थन का आधार पहले जैसा सशक्त नहीं रह गया है।
इसी बीच राष्ट्रीय राजनीति में भी परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही हैं। इंडिया गठबंधन की बैठकों में विपक्षी रणनीति को लेकर नए संकेत मिले हैं। राहुल गांधी का रुख अपेक्षाकृत अधिक संघर्षपूर्ण दिखाई देता है। वे संसद के भीतर के विरोध को पर्याप्त नहीं मानते और जनआंदोलन की राजनीति को पुनर्जीवित करना चाहते हैं। लेकिन ममता बनर्जी का वर्तमान राजनीतिक मनोबल उन्हें इस प्रकार की आक्रामक भूमिका निभाने की अनुमति नहीं देता।
फिर भी उनके साथ कुछ महत्वपूर्ण चेहरे खड़े हैं। शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद जैसे नेताओं ने सार्वजनिक रूप से उनका समर्थन किया है। कल्याण बनर्जी जैसे प्रभावशाली नेताओं का पुनः उनके साथ आना भी उनके लिए राहत का विषय है। इन घटनाओं से संकेत मिलता है कि तृणमूल कांग्रेस पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
दूसरी ओर भाजपा भी एक जटिल परिस्थिति का सामना कर रही है। बंगाल के अनेक भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने तृणमूल से आए नेताओं को सीधे पार्टी में शामिल किए जाने का विरोध किया। उनका तर्क था कि जिन लोगों पर वर्षों तक राजनीतिक उत्पीड़न का आरोप लगाया जाता रहा, उन्हें अचानक सम्मानजनक स्थान देना कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ सकता है।
बताया जाता है कि इसी असंतोष को शांत करने के लिए संगठन स्तर पर विशेष प्रयास करने पड़े। यही कारण है कि कई बागी सांसदों को सीधे भाजपा में शामिल करने के बजाय एक अलग मंच के माध्यम से समर्थन जुटाने की रणनीति अपनाई गई।
तृणमूल नेताओं का आरोप है कि दल-बदल केवल वैचारिक कारणों से नहीं हुआ बल्कि इसके पीछे दबाव और प्रलोभन दोनों की भूमिका रही। इन आरोपों की पुष्टि करना कठिन है, किंतु भारतीय राजनीति के हालिया इतिहास में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के अनुभवों ने इस बहस को और प्रासंगिक बना दिया है।
असल प्रश्न किसी एक दल या नेता का नहीं है। प्रश्न लोकतांत्रिक संस्कृति का है। लोकतंत्र केवल संविधान की लिखित धाराओं से संचालित नहीं होता; वह राजनीतिक परंपराओं और नैतिक मर्यादाओं पर भी निर्भर करता है। यदि विपक्षी दलों को तोड़ना ही राजनीतिक सफलता का मानक बन जाए तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होने लगती है।
लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन स्वाभाविक प्रक्रिया है। कोई भी दल स्थायी रूप से विजेता या पराजित नहीं होता। किंतु यदि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का स्थान राजनीतिक समापन ले ले, तो व्यवस्था में संतुलन समाप्त होने लगता है। विपक्ष केवल सरकार का आलोचक नहीं होता, बल्कि वह लोकतांत्रिक व्यवस्था का आवश्यक स्तंभ होता है।
यही कारण है कि आज सबसे बड़ा प्रश्न ममता बनर्जी का भविष्य नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र का भविष्य है। क्या तृणमूल कांग्रेस कांग्रेस में विलय कर देगी? क्या ममता बनर्जी अपनी शेष राजनीतिक पूँजी के साथ नई शुरुआत करेंगी? या फिर वे उसी प्रकार पुनरुत्थान करेंगी जैसे कभी वामपंथी प्रभुत्व के विरुद्ध किया था?
राजनीति का इतिहास बताता है कि जिन नेताओं ने संघर्ष से अपनी पहचान बनाई होती है, वे पराजय के बाद भी अप्रासंगिक नहीं होते। इंदिरा गांधी 1977 में सत्ता से बाहर हुईं, लेकिन 1980 में वापस लौटीं। कई क्षेत्रीय नेताओं ने भी राजनीतिक पराजय के बाद पुनरुत्थान किया है।
इसलिए ममता बनर्जी को अभी राजनीतिक रूप से समाप्त घोषित करना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि उनका सबसे कठिन संघर्ष अब शुरू हुआ है। पहले वे सत्ता पाने के लिए लड़ रही थीं, अब उन्हें अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने के लिए लड़ना होगा।
बंगाल की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि ममता बनर्जी का नाम भारतीय राजनीति में एक युग के रूप में याद किया जाएगा या एक ऐसे नेता के रूप में जिसने अपने ही बनाए राजनीतिक साम्राज्य को टूटते हुए देखा। फिलहाल इतना निश्चित है कि पश्चिम बंगाल का यह अध्याय भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय बन चुका है।





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