भारतीय राजनीति आज एक दूरगामी और ऐतिहासिक पुनर्गठन के मुहाने पर खड़ी है। पारंपरिक रूप से जो दलित राजनीति केवल सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ रक्षात्मक रुख अपनाने, आरक्षण की मांग करने या महज दबाव गुट (Pressure Group) की भूमिका तक सीमित रहने को मजबूर थी, वह अब एक व्यापक **’जन-राजनीति’ (Mass Politics)** के रूप में सामने आ रही है।

इस परिवर्तन का सबसे केंद्रीय तत्त्व है—**दलित नेतृत्व के भीतर हीन भावना का अंत और आत्मविश्वास का अभूतपूर्व प्रसार।** पूर्व में दलित राजनीति में यह संशय रहता था कि क्या समाज का प्रभुत्वशाली वर्ग उनका नेतृत्व स्वीकार करेगा? लेकिन वर्तमान दौर की ‘जेन-जी’ (Gen-Z) पीढ़ी की सोच, युवाओं के वैश्विक जुड़ाव और जातिविहीन शासन की मांग ने इस भ्रम को समाप्त कर दिया है। अब दलित राजनीति केवल सामाजिक व्यवस्था के आंतरिक बदलावों तक सीमित न रहकर अर्थनीति, विदेश नीति, रोजगार और समग्र राष्ट्र निर्माण के व्यापक मुद्दों पर अपनी निर्णायक दावेदारी पेश कर रही है।

### 1. दबाव गुट से सर्व-स्वीकार्य ‘जन-राजनीति’ तक का सफर

आधुनिक दलित राजनीति को यह अहसास हो चुका है कि नेतृत्व की सर्व-स्वीकार्यता के रास्ते में जाति के जो पारंपरिक बैरियर (अवरोध) थे, वे जनमानस की सोच से धीरे-धीरे मिट रहे हैं। अब दलित नेता केवल अपने वर्ग के प्रतिनिधि न बनकर पूरे समाज और देश का प्रतिनिधित्व करने का साहस और दृष्टिकोण रख रहे हैं।

#### आंदोलनों में बदलती सामाजिक संरचना: ‘काकरोच आंदोलन’ का संदेश

विश्व भर के साथ-साथ भारत में भी जेन-जी की गुणात्मक विशिष्टता यह है कि वह एक पारदर्शी और व्यवस्थित विकल्प का सपना देखती है। इसका एक अनूठा और ज्वलंत उदाहरण बांग्लादेश के **’काकरोच आंदोलन’** के रूप में देखा गया:

* **नेतृत्व की ऐतिहासिक स्वीकृति:** इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत दलित समाज से आने वाले **अभिजीत देव** के नेतृत्व को सर्वसम्मति से स्वीकार करना रही।

* **सामाजिक विरोधाभास का अंत:** यह आंदोलन मुख्य रूप से एलीट (उच्च-वर्ग) परिवार के जेन-जी युवाओं का था। इसके बावजूद एक दलित युवा की अगुवाई को दिल से स्वीकार करना वैकल्पिक राजनीति का अवश्यंभावी परिणाम है, जो यह साबित करता है कि नई पीढ़ी के लिए सामाजिक पृष्ठभूमि से अधिक नीतियां और विचार महत्वपूर्ण हैं।

### 2. मायावती की समावेशी राजनीति: ‘सर्वजन हिताय’ और दूरदर्शी शासन

दलित राजनीति की सर्व-स्वीकार्यता का पहला बड़ा और सफल प्रयोग बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की मुखिया मायावती के शासनकाल में देखने को मिला।

* **’बहुजन’ से ‘सर्वजन’ का परिवर्तन:** बसपा के शुरुआती दौर (DS4 और शुरुआती राजनीतिक आंदोलनों) में सवर्ण जातियों के प्रति काफी तीखे और कटुतापूर्ण नारे लगाए जाते थे। लेकिन जब सत्ता संचालन की बात आई, तो मायावती ने राजनीतिक परिपक्वता दिखाते हुए **’सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’** को अपना मुख्य ध्येय बनाया।

* **रेडिकल तत्त्वों पर अंकुश:** उन्होंने पार्टी के भीतर मौजूद अतिवादी (रेडिकल) दलितवादी तत्त्वों को अलग-थलग किया ताकि शासन व्यवस्था में संतुलन और सामाजिक सौहार्द बना रहे।

* **बिना भेदभाव के विकास एवं कानून का राज:** मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने सरकारी योजनाओं का लाभ बिना किसी जातिगत भेदभाव के समाज के हर वर्ग तक पहुंचाया।

* **दलित उत्पीड़न अधिनियम के दुरुपयोग पर रोक:** मायावती देश की पहली ऐसी मुख्यमंत्री थीं जिन्होंने दलित उत्पीड़न निवारण अधिनियम (SC/ST Act) के फर्जी मुकदमों और दुरुपयोग को रोकने के लिए कड़ा शासनादेश जारी किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि कानून का इस्तेमाल न्याय के लिए हो, किसी वर्ग के उत्पीड़न या निजी द्वेष साधने के लिए नहीं।

हालांकि, इन प्रशासनिक सफलताओं के बावजूद अर्थनीति और विदेश नीति जैसे व्यापक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विषयों पर एक दूरदर्शी और सुदृढ़ वैचारिक ढांचा न खड़ा कर पाना यह दर्शाता है कि उनकी राजनीति कहीं न कहीं अपनी प्राथमिक सीमाओं से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकी।

### 3. पिछड़ों की ‘समाजवादी’ राजनीति का दोहरापन और सामंती मानसिकता

इतिहास गवाह है कि तथाकथित ‘समाजवादी’ या पिछड़ों के वर्चस्व वाली राजनीति ने सामाजिक न्याय के नाम पर सत्ता का युद्ध तो जीता, लेकिन दलितों को कभी भी बराबरी का दर्जा देने में रुचि नहीं दिखाई। उनकी राजनीति केवल सवर्णों से सत्ता छीनने तक सीमित रही, पर समाज से विषमता और हेय भावना को खत्म करने में उन्होंने कोई योगदान नहीं दिया।

* **लालू यादव और रामविलास पासवान का मामला:** जब पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह रामविलास पासवान को देश के पहले दलित प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते थे, तो लालू प्रसाद यादव (जो वी.पी. सिंह के करीबी सिपहसालार थे) इस प्रस्ताव से चिढ़ गए। यह इस बात का प्रमाण है कि पिछड़े वर्ग का नेतृत्व दलितों की सर्व-स्वीकार्यता को पचा नहीं पाया।

* **दलितों का प्रतीकात्मक इस्तेमाल और अपमान:** लालू यादव ने अपनी पार्टी में दलित नेता को प्रदेश अध्यक्ष तो बनाया, लेकिन सार्वजनिक मंचों और कार्यक्रमों में उन्हें एक ‘विदूषक’ (जोकर) की तरह प्रस्तुत करते थे। यह उस सामंती मानसिकता को उजागर करता है जो दलितों को पद तो देती है, लेकिन सम्मान नहीं।

* **मुलायम सिंह यादव और दलित विरोधी दृष्टि:** मुलायम सिंह यादव और उनकी पार्टी की दलितों के प्रति दृष्टि भी ऐसी ही रही। मुलायम सिंह ने तो अपने राजनीतिक बयानों के दौरान डॉ. बी.आर. आंबेडकर तक के योगदान पर विवादित और अशोभनीय टिप्पणियां कर डाली थीं। इसके अलावा, सपा के दौर में पदोन्नति में आरक्षण का खुलकर विरोध किया गया।

* **चरण सिंह और देवीलाल का क्षेत्र:** चौधरी चरण सिंह और चौधरी देवीलाल के प्रभाव वाले क्षेत्रों में दशकों तक दलितों को उनके बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार—यानी मतदान करने के अधिकार—से भी वंचित रखा जाता था और चुनावी प्रक्रियाओं में उन्हें वोट नहीं डालने दिया जाता था।

दलितों के प्रति यह हेय भावना कई बार सवर्णों की मानसिकता से भी अधिक कठोर और दमनकारी साबित हुई।

### 4. नया दलित नेतृत्व: चंद्रशेखर आजाद का बढ़ता आत्मबल

समय के साथ जब समाज का नजरिया बदला, तो दलितों का आत्मविश्वास और आत्मबल भी बुलंद हुआ। इस नई और विराट दलित कारगरसत्ता का एक बड़ा उदाहरण **चंद्रशेखर आजाद** (आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष और सांसद) हैं।

* **संकीर्णता से परे सोच:** चंद्रशेखर ने पिछड़ों के मसीहा माने जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह को (मंडल आयोग लागू करने के लिए) ‘भारत रत्न’ देने की मांग उठाकर सबको चौंका दिया।

* **ऐतिहासिक संदेश:** एक दलित नेता द्वारा पिछड़े वर्ग के जननायक के लिए भारत रत्न की मांग करना यह साफ जाहिर करता है कि आज की दलित राजनीति अपनी पुरानी कुंठाओं, संकीर्णताओं और आक्रोश से बहुत आगे निकल चुकी है।

### 5. ‘जेन-जी’ के राजनीतिक स्पेस पर कब्जे की होड़ और रणनीतिक गलतियां

आज भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और अन्य स्थापित दल ‘जेन-जी’ के इस वैकल्पिक और जातिविहीन राजनीतिक स्पेस पर कब्जा करने या उसमें भ्रम पैदा करने की रणनीतियों में लगे हैं।

1. **आकाश आनंद की रणनीतिक भूल:** मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को राजनीतिक विरासत तो सौंपी, लेकिन आकाश ‘जेन-जी’ का विश्वास जीतने के लिए कोई बड़ी वैचारिक लाइन खींचने में असफल रहे। इसके विपरीत, विपक्षी नेताओं पर “अंकल” जैसे कटाक्ष करके उन्होंने राजनीतिक परिपक्वता खो दी। इस अपरिपक्वता के कारण उन पर **’वोट कटवा’** जैसी बदनाम छवि बनने का गंभीर खतरा मंडरा रहा है, जो उनकी राजनीतिक पारी को शुरुआत में ही तबाह कर सकता है। ऊपर से मायावती द्वारा बीच-बीच में उनकी ग्रोथ पर ग्रहण लगाने वाले फैसलों ने उनकी स्थिति और कमजोर की है।

2. **चिराग पासवान का इस्तेमाल:** चिराग पासवान भी एक युवा दलित चेहरा हैं, जो सर्व-स्वीकार्यता की बात करते हैं। लेकिन अपनी राजनीतिक मजबूरियों और भाजपा की व्यापक रणनीति के कारण वे खुद को एक स्वतंत्र विकल्प के रूप में स्थापित करने के बजाय भाजपा के एजेंडे का मोहरा बनने तक सीमित रह जाते हैं।

### 6. भावी राजनीति का स्वरूप

‘जेन-जी’ की राजनीति मूलतः **जातिवाद से परे** है और इसमें एक प्रगतिशील, पारदर्शी एवं सर्व-समावेशी राजनीति की झलक सर्वोपरि है।

तथाकथित समाजवादी दलों की संकीर्ण मानसिकता और भाजपा द्वारा इस स्पेस को हड़पने की कोशिशों के बीच, आज का दलित समाज अपनी हीन भावना को पूरी तरह त्याग चुका है। इस जद्दोजहद का अंतिम नतीजा यह होगा कि केवल ‘दलित कार्ड’ या जातिवादी नारों से राजनीति नहीं चलेगी। जो भी नेतृत्व—चाहे चंद्रशेखर हों, आकाश हों या चिराग—देश की अर्थनीति, तकनीक, रोजगार और विदेश नीति पर युवाओं को ठोस विकल्प दे पाएगा, वही इस नई ‘जन-राजनीति’ के दौर में देश का नेतृत्व करने में सक्षम होगा।

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