सात साल में उत्तर प्रदेश के शासन की बदलती कार्यप्रणाली

सितंबर 2019 की वह तस्वीर उत्तर प्रदेश की राजनीतिक और प्रशासनिक यात्रा की दिलचस्प तस्वीरों में शामिल हो गई, जिसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों के साथ भारतीय प्रबंध संस्थान, लखनऊ की कक्षा में बैठे दिखाई दिए। सामान्यतः मंत्री अधिकारियों को दिशा देते हैं, अधिकारी अधीनस्थ कर्मचारियों को काम सौंपते हैं और शासन की मशीनरी ऊपर से नीचे तक चलती है। लेकिन उस दिन दृश्य कुछ उलटा था। निर्वाचित सरकार के मंत्री स्वयं प्रबंधन की कक्षा में थे और उनके सामने प्रबंध शिक्षा के विशेषज्ञ थे।

उस समय इसे लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी आईं। किसी ने इसे शासन की क्षमता बढ़ाने की कोशिश माना तो किसी ने सरकार के लगभग ढाई वर्ष बीत जाने के बाद प्रशिक्षण लेने पर सवाल उठाया। लेकिन सात वर्ष बाद इस घटना को केवल उस समय की राजनीतिक बहस के भीतर रखकर देखना शायद उसके वास्तविक महत्व को सीमित कर देगा।

क्योंकि आईआईएम लखनऊ के अपने दस्तावेज बताते हैं कि 2019 का ‘मंथन’ कोई सामान्य औपचारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं था। संस्थान ने इसे उत्तर प्रदेश के लिए दीर्घकालीन विकास प्राथमिकताएं तय करने की प्रक्रिया के रूप में दर्ज किया है। तीन दिन की इस विशेष कार्यशाला में मंत्रिपरिषद के साथ शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल हुए। उद्देश्य था—राज्य के विकास की प्रमुख प्राथमिकताओं पर साझा दृष्टि बनाना, नीति-निर्माताओं के बीच विचारों का आदान-प्रदान कराना, लक्ष्यों को स्पष्ट करना और उनके ठोस परिणामों की दिशा तय करना।

और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आईआईएम लखनऊ की रिपोर्ट में इस मंथन का फॉलो-अप भी दर्ज है। संस्थान के अनुसार सरकार ने स्वीकार की गई प्राथमिकताओं और लक्ष्यों के क्रियान्वयन के लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रियों की एक समिति बनाई, जिसकी नियमित बैठकें होती थीं। मंथन की रिपोर्ट सभी सरकारी कार्यालयों में भेजी गई। इसके बाद एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था से संबंधित दीर्घकालीन सलाह के लिए सरकार ने औपचारिक प्रस्ताव भी आमंत्रित किया। अलग-अलग विभागों को मंथन की बड़ी प्राथमिकताओं के साथ जोड़ने के लिए विभागवार आगे के अभ्यास किए गए और कोविड महामारी से पहले मंडी परिषद तथा उद्योग एवं आधारभूत ढांचा विभाग के साथ आईआईएम ने ऐसे फॉलो-अप अभ्यास भी किए।

इसलिए असली कहानी उस कक्षा की तस्वीर में नहीं, बल्कि उसके बाद बनी कार्यप्रणाली में है।

छह प्राथमिकताएं, जिनमें पूरे राज्य का विकास समा गया

2019 के मंथन में जिन क्षेत्रों को प्राथमिकता मिली, वे किसी एक विभाग की सीमाओं में बंधे हुए नहीं थे। आईआईएम लखनऊ की रिपोर्ट में छह प्रमुख क्षेत्रों का उल्लेख है—आर्थिक गतिविधियों को सहारा देने वाला आधारभूत ढांचा, औद्योगिक विकास और सुगमता के साथ एमएसएमई को मजबूत करना, कृषि और संबद्ध गतिविधियों का टिकाऊ विकास, स्वास्थ्य और शिक्षा पर विशेष जोर के साथ मानव विकास, कानून-व्यवस्था तथा नगरीय विकास।

यानी मंथन की मूल सोच यह थी कि उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास को अलग-अलग सरकारी विभागों के रूप में नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हुए तंत्र के रूप में देखा जाए।

मुख्यमंत्री ने उस समय इन प्राथमिकताओं को अधिक व्यावहारिक रूप देते हुए औद्योगिक विकास और निवेश, एमएसएमई तथा विनिर्माण, एक्सप्रेसवे और सड़क संपर्क, हवाई और जल संपर्क, बिजली व्यवस्था, कृषि, डेयरी, बागवानी, मत्स्य और खाद्य प्रसंस्करण, नगरीय विकास, शिक्षा-स्वास्थ्य तथा पुलिस आधुनिकीकरण जैसे क्षेत्रों पर कार्ययोजना तैयार होने की बात कही थी। जिलों की अर्थव्यवस्था को भी अलग से परिभाषित करने के लिए आईआईएम से कार्ययोजना बनाने को कहा गया था।

आज पीछे मुड़कर देखने पर इन क्षेत्रों में हुए कामों को उसी 2019 की कार्ययोजना का प्रत्यक्ष परिणाम घोषित करना उचित नहीं होगा। अनेक योजनाएं पहले से चल रही थीं और कई परियोजनाएं केंद्र तथा राज्य सरकारों की अलग-अलग नीतियों से जुड़ी थीं। लेकिन यह अवश्य देखा जा सकता है कि मंथन में जिन क्षेत्रों को शासन की केंद्रीय प्राथमिकताओं में रखा गया था, अगले वर्षों में उन्हीं क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर संस्थागत और अवसंरचनात्मक काम हुए।

यही इस लेख का असली प्रश्न है—क्या मंथन ने शासन की प्राथमिकताओं को स्थायी कार्य-सूची में बदलने में कोई भूमिका निभाई?

उपलब्ध दस्तावेजों से इसका उत्तर पूर्ण रूप से मापने योग्य नहीं है, लेकिन उसके कई संकेत मिलते हैं।

आधारभूत ढांचा : सड़क से आगे की अर्थव्यवस्था

2019 में आधारभूत ढांचे को पहली प्राथमिकताओं में रखा गया था। उस समय एक्सप्रेसवे, अंतरराज्यीय सड़क संपर्क, हवाई संपर्क और जलमार्ग पर चर्चा हुई थी। आज उत्तर प्रदेश के एक्सप्रेसवे तंत्र का विस्तार इस बदलाव का सबसे दिखाई देने वाला उदाहरण है।

उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण की वर्तमान सूची में आगरा-लखनऊ, पूर्वांचल, बुंदेलखंड, गोरखपुर लिंक और गंगा एक्सप्रेसवे को परिचालन में बताया गया है।

यहां प्रबंधन की दृष्टि केवल सड़क बनाने तक सीमित नहीं है। एक्सप्रेसवे को औद्योगिक गलियारों, लॉजिस्टिक व्यवस्था, कृषि बाजार और शहरों के बीच तेज संपर्क से जोड़ना ही उस निवेश को आर्थिक उपयोग में बदलता है।

इसीलिए 2019 में मंथन के दौरान जिस आधारभूत ढांचे को आर्थिक गतिविधियों का आधार बताया गया था, उसके बाद सड़क, औद्योगिक क्षेत्र और निवेश सुविधा को परस्पर जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।

उत्तर प्रदेश रक्षा औद्योगिक गलियारे के छह नोड—लखनऊ, कानपुर, झांसी, आगरा, अलीगढ़ और चित्रकूट—भी इसी व्यापक ढांचे का हिस्सा हैं।

बुंदेलखंड जैसे अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्र के लिए इसका अर्थ केवल सड़क संपर्क नहीं है। यदि सड़क और औद्योगिक गलियारा निवेश, रोजगार और स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ता है तो आधारभूत ढांचा आर्थिक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है।

यही वह बिंदु है जहां ‘कार्य प्रबंधन’ का विचार दिखाई देता है—एक परियोजना को अलग परियोजना न मानकर उसके साथ जुड़ी अगली दस गतिविधियों की कल्पना करना।

उद्योग : निवेश बुलाने से निवेश को संभालने तक

2019 के मंथन में औद्योगिक विकास, निवेश, एमएसएमई और विनिर्माण को प्रमुखता मिली थी। बाद के वर्षों में उत्तर प्रदेश में निवेश आकर्षित करने के लिए नीतिगत सुधारों और डिजिटल सुविधा को बड़ा स्थान मिला।

निवेश मित्र जैसे एकल खिड़की तंत्र का विस्तार इसका उदाहरण है। उत्तर प्रदेश के निवेश प्रोत्साहन विभाग के अनुसार वर्तमान व्यवस्था में अनेक विभागों की सेवाएं एक डिजिटल मंच पर उपलब्ध हैं और आवेदन, स्वीकृति तथा अनापत्ति प्रक्रियाओं को ऑनलाइन किया गया है। विभाग के अनुसार 2024 के व्यापार सुधार कार्यक्रम में राज्य ने 434 सुधार लागू किए और निवेश मित्र पर 22 लाख से अधिक आवेदन प्राप्त हुए, जिनके लिए विभाग 97.3 प्रतिशत संतुष्टि का आंकड़ा प्रस्तुत करता है। ये सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़े हैं, स्वतंत्र मूल्यांकन नहीं।

2023 में मुख्यमंत्री उद्यमी मित्र योजना शुरू की गई। इसका उद्देश्य निवेशकों और सरकारी मशीनरी के बीच समन्वय बनाना तथा निवेश परियोजनाओं में आने वाली व्यावहारिक समस्याओं के समाधान में सहायता करना है। सरकारी वेबसाइट के अनुसार उद्यमी मित्रों की नियुक्ति जिलों और औद्योगिक विकास प्राधिकरणों में की गई है।

यहां 2019 के मंथन से एक प्रशासनिक संबंध दिखाई देता है। निवेश को केवल सम्मेलन में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने की घटना न मानकर उसके बाद की अनुमति, भूमि, विभागीय स्वीकृति, समस्या समाधान और परियोजना के धरातल पर उतरने की प्रक्रिया को भी शासन की जिम्मेदारी मानना।

2024 के ग्राउंड ब्रेकिंग कार्यक्रम के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा था कि वैश्विक निवेशक सम्मेलन के बाद एक वर्ष में 14,000 से अधिक परियोजनाएं लगभग दस लाख करोड़ रुपये के अनुमानित निवेश और 33.50 लाख रोजगार अवसरों के साथ क्रियान्वयन में लाई गईं। यह सरकारी दावा है; वास्तविक निवेश और रोजगार का स्वतंत्र सत्यापन अलग प्रश्न है।

फिर भी यह आंकड़ा यह बताता है कि शासन का ध्यान निवेश आकर्षित करने के साथ-साथ परियोजनाओं को क्रियान्वयन तक पहुंचाने की प्रशासनिक संरचना पर भी रहा।

कृषि : खेत से प्रसंस्करण तक

मंथन में कृषि को केवल फसल उत्पादन के रूप में नहीं देखा गया था। कृषि के साथ डेयरी, बागवानी, मत्स्य और खाद्य प्रसंस्करण को जोड़ने पर चर्चा हुई थी।

बाद की नीतियों में कृषि और खाद्य प्रसंस्करण को जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है। उत्तर प्रदेश के निवेश विभाग के अनुसार प्रदेश में विभिन्न जिलों में कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण के 15 पार्क या क्लस्टर स्थापित किए गए हैं। 250 विनियमित मंडियों, 225 ग्रामीण बाजारों और 100 ई-नाम मंडियों का भी विभाग उल्लेख करता है। खाद्य प्रसंस्करण नीति में कोल्ड चेन, मूल्य संवर्धन, कृषि प्रसंस्करण क्लस्टर तथा किसान उत्पादक संगठनों और स्वयं सहायता समूहों के लिए सहायता के प्रावधान हैं।

इसका महत्व इसलिए है क्योंकि कृषि अर्थव्यवस्था में किसान की आय केवल खेत में पैदा होने वाली वस्तु से तय नहीं होती। भंडारण, परिवहन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और बाजार तक पहुंच भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

यानी 2019 के मंथन में कृषि को डेयरी, बागवानी, मत्स्य और खाद्य प्रसंस्करण से जोड़ने की जो सोच सामने आई थी, उसके बाद नीति स्तर पर कृषि मूल्य श्रृंखला को विस्तृत करने के प्रयास दिखाई देते हैं।

यह कहना फिर भी सही नहीं होगा कि इन सभी योजनाओं की शुरुआत आईआईएम के मंथन के कारण हुई। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि मंथन की प्राथमिकताओं और बाद की सरकारी कार्ययोजनाओं के बीच विषयगत निरंतरता स्पष्ट है।

नगरीय विकास : बढ़ते शहरों की नई चुनौती

2019 के मंथन में नगरीय विकास को अलग प्राथमिकता देना भी महत्वपूर्ण था। उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में नगर निकाय हैं और ग्रामीण से शहरी संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है। उस समय नियोजित शहरी विकास और नगर नियोजकों की जरूरत पर चर्चा हुई थी।

बाद के वर्षों में राज्य में स्मार्ट सिटी, मेट्रो, शहरी आवास और डिजिटल निगरानी जैसी व्यवस्थाओं का विस्तार हुआ। उत्तर प्रदेश के निवेश विभाग के अनुसार प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी के तहत 13.3 लाख मकान पूरे किए गए, दस शहर स्मार्ट सिटी मिशन और सात शहर राज्य की स्मार्ट सिटी योजना के अंतर्गत विकसित किए गए तथा 17 स्मार्ट शहरों के लिए केंद्रीय डिजिटल निगरानी केंद्र स्थापित किया गया। लखनऊ, कानपुर और आगरा सहित कई शहरों में मेट्रो परियोजनाएं भी संचालित हैं।

नगरीय विकास की चुनौती केवल पुल, सड़क और भवन बनाने की नहीं है। शहर को परिवहन, जल, कचरा, आवास, यातायात, रोजगार और भूमि उपयोग के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।

यही कारण है कि मंथन में नगरीय विकास को स्वतंत्र प्राथमिकता देना प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था।

स्वास्थ्य : भवन से प्रबंधन तक

मंथन की चौथी बड़ी दिशा मानव विकास थी, जिसमें स्वास्थ्य और शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया था।

स्वास्थ्य क्षेत्र में चिकित्सा महाविद्यालयों के विस्तार को एक ठोस उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। 2024 के उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य क्षेत्र संबंधी सरकारी निवेश दस्तावेज में कहा गया कि 75 में से 59 जिलों में मेडिकल कॉलेज उपलब्ध थे और शेष अपेक्षाकृत वंचित जिलों में भी नए मेडिकल कॉलेज शुरू करने की प्रक्रिया चल रही थी।

लेकिन इस क्षेत्र में आईआईएम से जुड़ा एक अधिक सीधा फॉलो-अप भी मिलता है।

2023 में आईआईएम लखनऊ ने जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय और उत्तर प्रदेश के राज्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान के साथ मिलकर मध्य स्तर के चिकित्सा अधिकारियों के लिए छह दिन का सार्वजनिक स्वास्थ्य नेतृत्व और प्रबंधन प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया। इसका उद्देश्य चिकित्सा अधिकारियों में नेतृत्व और प्रबंधन संबंधी क्षमताओं को मजबूत करना था।

दिसंबर 2023 में पहले समूह का प्रशिक्षण पूरा हुआ। आईआईएम के समाचार पत्र के अनुसार इसमें स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की भागीदारी थी और कार्यक्रम का घोषित उद्देश्य स्वास्थ्य व्यवस्था के समग्र प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए नेतृत्व तथा प्रबंधन क्षमताओं को मजबूत करना था।

यहां 2019 के मंथन का विचार एक अलग स्तर पर दिखाई देता है।

2019 में मंत्री को प्रबंधन समझाने की बात थी। 2023 में वही प्रबंधन दृष्टि स्वास्थ्य व्यवस्था के मध्य स्तर के चिकित्सा अधिकारियों तक पहुंच रही थी।

कोविड : जब प्रबंधन किताब से निकलकर संकट में उतरा

इस पूरी यात्रा में कोविड महामारी एक ऐसी परीक्षा थी जिसने प्रशासनिक क्षमता की वास्तविक जरूरत सामने रख दी।

आईआईएम लखनऊ के एक संकाय सदस्य के आधिकारिक परिचय में दर्ज है कि उन्होंने अपनी टीम के साथ 2020 की पहली कोविड लहर के दौरान उत्तर प्रदेश 112 के लिए मानक संचालन प्रक्रिया और अन्य प्रोटोकॉल तैयार किए और 2021 की दूसरी लहर में उत्तर प्रदेश सरकार के ऑक्सीजन ऑडिट से जुड़े।

यह घटना इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि यहां प्रबंधन शिक्षा का संबंध सीधे संकट प्रबंधन से जुड़ता है।

कोविड जैसी परिस्थिति में आदेश जारी करना आसान हिस्सा है। कठिन हिस्सा है—मांग का अनुमान, आपूर्ति की निगरानी, अस्पतालों का समन्वय, उपलब्ध संसाधनों का वितरण, सूचना का प्रवाह और अचानक बदलती परिस्थितियों में निर्णय लेना।

मंथन के समय जिस ‘प्रबंधन क्षमता’ की बात की गई थी, कोविड ने उसे वास्तविक संकट में परखने का अवसर दिया।

कानून-व्यवस्था : पुलिस को भी प्रबंधन और तकनीक की जरूरत

2019 में कानून-व्यवस्था और पुलिस आधुनिकीकरण को भी मानव विकास और समग्र विकास की प्राथमिकताओं से जोड़ा गया था। मुख्यमंत्री ने उस समय पुलिस आधुनिकीकरण, फोरेंसिक तथा साइबर प्रयोगशालाओं जैसे विषयों पर चर्चा का उल्लेख किया था।

आज उत्तर प्रदेश पुलिस की संरचना में तकनीकी सेवाएं, पुलिस कंप्यूटर केंद्र, फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाएं, राज्य अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और फिंगरप्रिंट ब्यूरो जैसी इकाइयां संस्थागत रूप से जुड़ी हुई हैं।

पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार साइबर अपराध से निपटने के लिए लखनऊ में साइबर अपराध मुख्यालय तथा 18 पुलिस रेंज में साइबर पुलिस थानों की व्यवस्था है।

फोरेंसिक क्षेत्र में भी कंप्यूटर फोरेंसिक, मोबाइल और संग्रहण उपकरणों से डेटा निकालने, सीसीटीवी फुटेज के विश्लेषण तथा डीएनए जैसी तकनीकों का इस्तेमाल दर्ज है।

इस क्षेत्र में भी एक बात ध्यान देने योग्य है—आधुनिक कानून-व्यवस्था केवल पुलिस बल की संख्या का प्रश्न नहीं है। अपराध की प्रकृति बदलने पर जांच पद्धति, तकनीकी विशेषज्ञता, डेटा और फोरेंसिक क्षमता भी बदलनी पड़ती है।

यानी 2019 की चर्चा में शामिल पुलिस आधुनिकीकरण की अवधारणा आज साइबर और डिजिटल अपराध की बदलती दुनिया के संदर्भ में और बड़ी हो गई है।

शिक्षा : मंथन की सबसे सीधी प्रशासनिक प्रयोगशाला

आईआईएम लखनऊ और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच बाद का सबसे स्पष्ट संस्थागत सहयोग शिक्षा क्षेत्र में दिखाई देता है।

2022 में बेसिक शिक्षा विभाग ने आईआईएम लखनऊ को मुख्यमंत्री निपुण भारत एसोसिएट्स कार्यक्रम का ज्ञान साझेदार बनाया। समझौते के अनुसार आईआईएम प्रशिक्षण, क्षमता-विकास और कार्यक्रम की संरचना में सहयोग करने वाला था। कार्यक्रम में युवा पेशेवरों को शिक्षा व्यवस्था में निपुण भारत मिशन के लक्ष्यों के क्रियान्वयन के लिए जोड़ा जाना था।

इसी अवधि में आईआईएम लखनऊ ने उत्तर प्रदेश सरकार के राजकीय इंटर कॉलेजों के प्रधानाचार्यों के लिए प्रशिक्षण और क्षमता-विकास कार्यक्रम शुरू किए। संस्थान की सार्वजनिक नीति इकाई के अनुसार इसका उद्देश्य विद्यालयों को प्रभावी ढंग से संचालित करने और छात्रों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने की प्रशासनिक क्षमता को मजबूत करना था।

यहां प्रबंधन शिक्षा का स्वरूप बिल्कुल बदल जाता है।

अब आईआईएम में केवल मंत्री नहीं बैठा है। एक विद्यालय का प्रधानाचार्य भी नेतृत्व, मानव संसाधन, निर्णय, निगरानी और संस्थागत प्रबंधन की सीख ले रहा है।

सरकारी विद्यालय के प्रधानाचार्य के लिए भी यही प्रश्न होते हैं—शिक्षकों का बेहतर उपयोग कैसे हो, विद्यार्थियों की उपस्थिति और सीखने के परिणाम कैसे सुधरें, संसाधनों का प्रबंधन कैसे हो और विद्यालय को स्थानीय समुदाय से कैसे जोड़ा जाए।

जिलों की अर्थव्यवस्था : मंथन का वह हिस्सा जो सबसे दूर तक जा सकता है

2019 में मुख्यमंत्री ने आईआईएम से जिलों की अर्थव्यवस्था को परिभाषित करने के लिए कार्ययोजना बनाने की बात कही थी।

बाद में नीति आयोग ने उत्तर प्रदेश सरकार के साथ मिलकर आईआईएम लखनऊ को प्रदेश के नियोजन विभाग की क्षमता बढ़ाने के लिए ‘लीड नॉलेज इंस्टीट्यूट’ के रूप में चुना। आईआईएम के अनुसार इसके अंतर्गत अध्ययन, हितधारकों से विचार-विमर्श, कार्यशालाएं और सम्मेलन शामिल थे।

यहां 2019 की सोच का एक महत्वपूर्ण विस्तार दिखाई देता है।

यदि उत्तर प्रदेश को केवल लखनऊ से चलाया जाए तो राज्य की विविधता प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती बनती है। बुंदेलखंड की अर्थव्यवस्था पूर्वांचल से अलग है, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कृषि संरचना अलग है और तराई क्षेत्र की आवश्यकताएं अलग।

इसलिए जिला-विशिष्ट विकास योजना का विचार महत्वपूर्ण है।

इसे आधुनिक शासन की भाषा में ‘स्थान-विशिष्ट योजना’ कहा जा सकता है—एक ही नीति को हर जिले पर समान रूप से लागू करने के बजाय स्थानीय संसाधन, रोजगार, कृषि, उद्योग और सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर विकास की प्राथमिकता तय करना।

कौशल विकास : जिला प्रशासन को नई भूमिका

आईआईएम लखनऊ के महात्मा गांधी राष्ट्रीय फेलोशिप कार्यक्रम का उत्तर प्रदेश वाला अनुभव भी इस कहानी में महत्वपूर्ण है। इस कार्यक्रम में आईआईएम लखनऊ के साथ उत्तर प्रदेश से 51 फेलो जुड़े और दो वर्षीय सार्वजनिक नीति एवं प्रबंधन प्रमाणपत्र कार्यक्रम पूरा किया। कार्यक्रम का उद्देश्य जिला स्तर के कौशल पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना तथा जिला कौशल समितियों को योजना, क्रियान्वयन और निगरानी में अधिक सक्षम बनाना था। 2023 में इसके समापन समारोह में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव ने भाग लिया।

यहां फिर वही सूत्र सामने आता है—प्रबंधन को सचिवालय से जिले तक ले जाना।

2019 के बाद आईआईएम में बना सार्वजनिक नीति केंद्र

इस पूरी यात्रा में एक संस्थागत बदलाव सबसे महत्वपूर्ण है।

आईआईएम लखनऊ ने 1 सितंबर 2020 को सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी स्थापित किया। इसका घोषित उद्देश्य सरकार और अन्य हितधारकों को नीति संबंधी विशेषज्ञता, प्रशिक्षण और परामर्श उपलब्ध कराना तथा नीति के धरातल पर प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए प्रमाण-आधारित विश्लेषण विकसित करना था। संस्थान ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों की सार्वजनिक नीति को इसके दायरे में रखा।

यह बात 2019 के मंथन को समझने में सबसे अधिक उपयोगी है।

क्योंकि यदि आईआईएम के साथ सरकार का संबंध केवल एक बार के प्रशिक्षण तक रहता, तो उसे एक अलग घटना माना जा सकता था। लेकिन सार्वजनिक नीति केंद्र की स्थापना के बाद प्रशिक्षण, शोध, नीति संवाद और सरकार के साथ संस्थागत सहयोग के लिए एक स्थायी ढांचा बन गया।

2022-23 की रिपोर्ट में आईआईएम लखनऊ ने उत्तर प्रदेश सरकार के साथ एक ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था की दिशा में सहयोग जारी रखने और मुख्यमंत्री के साथ बैठक का उल्लेख किया।

2023-24 में संस्थान ने नीति आयोग और उत्तर प्रदेश सरकार के साथ नियोजन विभाग की क्षमता बढ़ाने के लिए लीड नॉलेज संस्थान की भूमिका निभाई।

यानी मंथन का एक परिणाम यह भी था कि शासन और प्रबंधन शिक्षा के बीच एक संस्थागत संवाद की जमीन तैयार हुई।

एक ट्रिलियन डॉलर : मंथन का आर्थिक विस्तार

2019 का मंथन उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था को एक ट्रिलियन डॉलर तक ले जाने की दीर्घकालीन सोच से भी जुड़ा था। आईआईएम की वार्षिक रिपोर्ट इसे सीधे इस लक्ष्य के समर्थन के संदर्भ में दर्ज करती है।

2022 में मुख्यमंत्री ने फिर वरिष्ठ अधिकारियों और विशेषज्ञों के साथ राज्य को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की रणनीति पर चर्चा की। उस समय कृषि, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र को आर्थिक विस्तार के तीन प्रमुख आधारों के रूप में सामने रखा गया था।

इससे 2019 के मंथन और बाद की आर्थिक रणनीति के बीच एक विचारगत निरंतरता दिखाई देती है।

कृषि उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं; उसका प्रसंस्करण बढ़ाना भी जरूरी है।

उद्योग लगाना पर्याप्त नहीं; निवेशक को स्वीकृति और जमीन तक पहुंच भी देनी होगी।

सड़क बनाना पर्याप्त नहीं; उसे औद्योगिक और कृषि बाजार से जोड़ना होगा।

शहर बढ़ाना पर्याप्त नहीं; उसके लिए नियोजित परिवहन और आवास की व्यवस्था भी चाहिए।

और मानव संसाधन को रोजगार योग्य बनाने के लिए केवल शिक्षा नहीं, कौशल विकास भी आवश्यक है।

यही समेकित दृष्टि किसी बड़े राज्य की अर्थव्यवस्था को आगे ले जाने के लिए जरूरी होती है।

सात साल का फॉलो-अप : क्या बदला?

यदि 2019 के मंथन को एक बीज मानें तो 2026 तक उसके चारों ओर विकसित हुई संरचना को चार स्तरों में समझा जा सकता है।

पहला स्तर है राजनीतिक नेतृत्व—मंत्रियों के लिए नेतृत्व और प्रबंधन का प्रशिक्षण।

दूसरा स्तर है प्रशासनिक क्षमता—वरिष्ठ अधिकारियों, चिकित्सा अधिकारियों, प्रधानाचार्यों, कौशल विकास से जुड़े कर्मियों और जिला स्तर के पेशेवरों का प्रशिक्षण।

तीसरा स्तर है नीति निर्माण—आईआईएम का सार्वजनिक नीति केंद्र, नीति आयोग के साथ नियोजन विभाग के लिए ज्ञान साझेदारी और विभिन्न सरकारी परियोजनाओं में शोध एवं परामर्श।

चौथा स्तर है क्रियान्वयन—निवेश मित्र, उद्यमी मित्र, डिजिटल निगरानी, जिला नियोजन, कौशल समितियां और विभागवार परिणामों की निगरानी जैसी व्यवस्थाएं।

यह चारों स्तर मिलकर उस ‘कार्य प्रबंधन’ की अवधारणा का विस्तार करते हैं जिसके लिए 2019 में मंत्रियों को आईआईएम भेजा गया था।

लेकिन क्या इसे आईआईएम की उपलब्धि कहा जाए या सरकार की?

यहां एक सावधानी आवश्यक है।

उत्तर प्रदेश में 2019 के बाद जो भी विकास कार्य हुए, उन्हें आईआईएम के मंथन का परिणाम मान लेना दस्तावेजी रूप से सही नहीं होगा। एक्सप्रेसवे, मेडिकल कॉलेज, निवेश, स्मार्ट सिटी, पुलिस आधुनिकीकरण या कृषि संबंधी योजनाओं के पीछे केंद्र और राज्य की अनेक योजनाएं, बजट, विभागीय निर्णय और कई वर्षों की परियोजनाएं शामिल हैं।

दूसरी ओर यह भी सही नहीं होगा कि 2019 का मंथन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम था और उसका कोई फॉलो-अप नहीं हुआ।

आईआईएम लखनऊ की अपनी रिपोर्ट इसके विपरीत सीधे-सीधे बताती है कि मंथन के बाद मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति बनी, रिपोर्ट सरकारी कार्यालयों में भेजी गई, दीर्घकालीन सलाह की प्रक्रिया शुरू हुई और विभागवार फॉलो-अप अभ्यास किए गए।

इसलिए अधिक सटीक निष्कर्ष यही है कि मंथन को एक आरंभिक नीति-प्रबंधन अभ्यास के रूप में देखा जा सकता है, जिसके बाद सरकार और आईआईएम के बीच सहयोग कई संस्थागत क्षेत्रों में फैलता गया।

सात साल बाद वही सवाल फिर सामने आता है

2019 में विपक्ष ने सवाल उठाया था कि सरकार के आधे कार्यकाल के बाद मंत्रियों को प्रबंधन सीखने की आवश्यकता क्यों पड़ी। उस समय यह राजनीतिक आलोचना थी। लेकिन आज इस प्रश्न को एक अलग ढंग से देखा जा सकता है।

क्या सरकार को एक बार चुने जाने के बाद सीखने की जरूरत खत्म हो जाती है?

क्या मंत्री को अपने विभाग की विशेषज्ञता जानने के बाद प्रबंधन, आंकड़े, समय, मानव संसाधन और परिणाम मापन की नई तकनीक सीखने की जरूरत नहीं होती?

क्या किसी बड़े राज्य में प्रशासनिक प्रशिक्षण केवल कनिष्ठ अधिकारियों तक सीमित होना चाहिए?

आधुनिक शासन का अनुभव बताता है कि इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक नहीं हो सकता।

सरकारें भी बड़े संगठनों की तरह लगातार बदलती परिस्थितियों से गुजरती हैं। नई तकनीक, साइबर अपराध, महामारी, जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण, निवेश प्रतिस्पर्धा और रोजगार की बदलती जरूरतें प्रशासन को लगातार सीखने के लिए मजबूर करती हैं।

इसी संदर्भ में 2019 का मंथन एक घटना से अधिक एक विचार बन जाता है।

मंथन की असली कसौटी : परिणाम मापने की संस्कृति

फिर भी इस पूरी प्रक्रिया का एक हिस्सा अभी अधूरा दिखाई देता है।

यदि प्रशिक्षण और प्रबंधन को शासन का अभिन्न हिस्सा बनाया जा रहा है तो उसके परिणामों को भी नियमित रूप से मापा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए 2019 में प्रशिक्षण पाने वाले मंत्रियों के विभागों में निर्णय लेने की गति कितनी बदली? योजनाओं के क्रियान्वयन में कितना समय घटा? विभागों के बीच समन्वय कितना बढ़ा? प्रशिक्षण प्राप्त अधिकारियों की कार्यक्षमता में क्या परिवर्तन हुआ? शिक्षा या स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण के बाद मापने योग्य परिणाम क्या रहे?

ऐसे स्वतंत्र और दीर्घकालीन मूल्यांकन सार्वजनिक रूप से बहुत सीमित दिखाई देते हैं।

इसलिए अभी उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर यह कहना ज्यादा उचित है कि प्रशिक्षण और संस्थागत सहयोग की प्रक्रिया लगातार बढ़ी है, लेकिन उसके प्रत्येक प्रत्यक्ष परिणाम को केवल 2019 के आईआईएम मंथन से जोड़ने के लिए पर्याप्त स्वतंत्र मूल्यांकन उपलब्ध नहीं है।

यही सावधानी इस पूरे विषय को प्रचारात्मक लेख बनने से बचाती है और इसे शासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर विमर्श बनाती है।

मंत्रियों की कक्षा से शासन की प्रयोगशाला तक

2019 में आईआईएम की कक्षा में बैठे मंत्रियों की तस्वीर को सात साल बाद देखने पर उसका अर्थ कुछ व्यापक दिखाई देता है।

वह तस्वीर एक ऐसे शासन की कल्पना से जुड़ी थी जिसमें राजनीतिक नेतृत्व विशेषज्ञता से संवाद करता है। उसके बाद यह संवाद केवल मंत्रियों तक नहीं रहा। सार्वजनिक नीति केंद्र बना। अधिकारियों के प्रशिक्षण हुए। कोविड जैसी आपदा में प्रबंधन विशेषज्ञता का इस्तेमाल हुआ। चिकित्सा अधिकारियों के नेतृत्व प्रशिक्षण हुए। विद्यालयों के प्रधानाचार्यों के लिए क्षमता-विकास कार्यक्रम चले। निपुण भारत में आईआईएम ज्ञान साझेदार बना। जिला कौशल व्यवस्था में फेलो जुड़े। नियोजन विभाग के लिए नीति आयोग और आईआईएम का सहयोग बना। निवेश सुविधा के लिए डिजिटल तंत्र और उद्यमी मित्र जैसी व्यवस्थाएं विकसित हुईं।

इस पूरी यात्रा को यदि एक सूत्र में पिरोना हो तो वह सूत्र है—नीति से कार्ययोजना, कार्ययोजना से निगरानी और निगरानी से परिणाम तक पहुंचने की प्रशासनिक कोशिश।

यही वह अंतर है जो किसी घोषणा को शासन की प्रक्रिया में बदलता है।

उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में हर योजना की सफलता अंततः उसी अंतिम कड़ी पर निर्भर करती है जहां कोई अधिकारी, शिक्षक, चिकित्सक, पुलिसकर्मी, अभियंता या स्थानीय निकाय का कर्मचारी उसे जमीन पर लागू करता है। इसलिए शासन की क्षमता केवल शीर्ष नेतृत्व की क्षमता नहीं है। वह पूरे तंत्र की सामूहिक क्षमता है।

2019 का मंथन इसी सामूहिक क्षमता के प्रश्न को सामने लेकर आया था।

और कहानी अभी पूरी नहीं हुई है

2026 में खड़े होकर पीछे देखें तो 2019 का आईआईएम कार्यक्रम एक समाप्त अध्याय नहीं दिखाई देता। वह उत्तर प्रदेश सरकार और प्रबंधन संस्थान के बीच लंबे संवाद की शुरुआत के रूप में अधिक उपयोगी दिखाई देता है।

आईआईएम लखनऊ आज भी अपनी कार्यकारी शिक्षा सामग्री में उत्तर प्रदेश के मंत्रियों के लिए आयोजित नेतृत्व विकास कार्यशाला को अपने उल्लेखनीय कार्यक्रमों में प्रदर्शित करता है।

लेकिन असली फॉलो-अप तस्वीर से बाहर है।

वह सार्वजनिक नीति केंद्र में है।

वह अधिकारियों के प्रशिक्षण में है।

वह जिलों की योजना में है।

वह स्वास्थ्य अधिकारियों के नेतृत्व प्रशिक्षण में है।

वह विद्यालयों के प्रधानाचार्यों के क्षमता-विकास में है।

वह निवेश सुविधा और डिजिटल शासन में है।

और वह इस विचार में है कि शासन केवल आदेश देने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि लगातार सीखने, मापने, सुधारने और फिर लागू करने की प्रक्रिया भी है।

2019 में मंत्रियों को आईआईएम भेजने का प्रयोग इसलिए महत्वपूर्ण था कि उसने राजनीति और प्रबंधन के बीच एक संवाद की शुरुआत की। उसके बाद की सात वर्ष की यात्रा बताती है कि वह संवाद धीरे-धीरे शासन के दूसरे स्तरों तक पहुंचा।

इसका अंतिम मूल्यांकन अभी बाकी है। क्योंकि किसी भी प्रशासनिक सुधार की असली सफलता उसके प्रशिक्षण कक्ष में नहीं, बल्कि नागरिक के जीवन में दिखाई देती है।

सड़क कितनी जल्दी बनी, अस्पताल में सेवा कितनी बेहतर हुई, विद्यालय में बच्चे कितना सीख पाए, किसान को बाजार कितना मिला, निवेशक की बाधा कितनी जल्दी दूर हुई और पुलिस की जांच कितनी वैज्ञानिक हुई—अंततः यही वे प्रश्न हैं जिन पर किसी भी ‘मंथन’ का परिणाम तय होगा।

लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि सात वर्ष पहले शुरू हुई वह प्रक्रिया केवल एक दिन की कक्षा में बंद नहीं हुई।

आईआईएम की कक्षा से निकला ‘मंथन’ धीरे-धीरे नीति, प्रशिक्षण, योजना, निगरानी और प्रशासनिक क्षमता के व्यापक विमर्श में बदलता गया।

और शायद किसी बड़े राज्य में शासन को लगातार सीखने वाली व्यवस्था बनाने की दिशा में यही सबसे महत्वपूर्ण कदम होता है।

Leave a comment