उरई। जिले में खरीफ की फसल की बुबाई बढ़ाने के लिए छेड़े गये अभियान की मेहनत पर बीमा कंपनी के अधिकारी के रवैये से पानी फिर जाने के आसार पैदा हो गये हैं। उनके लिए कैरियर महत्वपूर्ण है, किसानों की बर्बादी से उन्हें कोई गरज नही है। सरकार किसानों की आमदनी बढ़ाकर उन्हें खुशहाल बनाने के मंसूबे बांधती है लेकिन धरातल पर विघ्न संतोषी अमला इन्हें कामयाब नही होने देता। जालौन जिले के बेमौसम की मार से तबाह किसानों की इस दुर्दशा की जानकारी लखनऊ में बैठी हुकूमत तक कैसे पहुंचे यह बड़ा सवाल बन गया है।
जालौन जिले में सिचाई के साधन बढ़ाकर सरकार ने किसानों को सहूलियतें दीं तांकि वे ज्यादा से ज्यादा दोहरी फसल ले सकें। सरकार के इन प्रयासों का नतीजा रहा कि खरीफ सत्र में इस बार 72 हजार 950 एकड़ में खरीफ की जिंसों की बंपर बुबाई हुई। सबसे ज्यादा तिल और उड़द बोई गयी जिनमें किसानों को बड़ा मुनाफा होता है। इन जिंसों के लिए पानी की ज्यादा जरूरत नही पड़ती इसलिए शुरूआती अवर्षण के बावजूद इन जिंसों के लहलहाने के कारण किसान अपनी बल्ले-बल्ले मान रहे थे। पर जैसा कि होता है मौसम देवता उन्हें नजर लगाने के लिए तैयार बैठे रहते हैं।
खरीफ की फसल जब काटकर घर ले जाने का समय आया तो जुलाई के दूसरे पखवारे से ऐसी बारिश शुरू हुई कि खेत तालाब बन गये। पूरे अगस्त बारिश होती नही और सितंबर महीने के पहले दशक तक यह क्रम अनवरत बना रहा। नतीजतन अतिवृष्टि ने किसानों के सारे अरमान मटियामेट कर दिये। तिल और उड़द खेतों में खड़े-खड़े सड़ गये। प्राकृतिक आपदा के कारण किसानों को होने वाले नुकसान की काफी हदतक भरपायी के लिए सरकार ने हाल के वर्षों में बीमा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कर रखे हैं। इस बार एलआईसी इंश्योरेंस को फसल बीमा के तहत 21 करोड़ 81 लाख 10 हजार रुपये की प्राप्ति करायी गयी थी। जाहिर है कि बीमित किसानों से लिया गया अंशदान इसमें सम्मिलित है। होना यह चाहिए था कि बीमा कंपनी ईमानदारी से किसानों की मदद के लिए इस नुकसान को देखते हुए मिड सीजन सर्वे करवाती जैसा कि बुंदेलखंड के अन्य जिलों में हो रहा है। लेकिन यहां के डिस्ट्रिक मैनेजर को पता नही क्यों किसानों से क्या बैर है। वे मिड सीजन सर्वे न कराने पर अड़े हुए हैं।
यही नही किसानों का बीमा क्लेम रोकने के लिए उनके द्वारा कई चालबाजियां अपनाये जाने का आरोप है। किसानों ने बताया कि उन्हें ब्लैंक फार्म पर हस्ताक्षर करने को मजबूर किया जाता है और जो किसान ऐसा करने से मना कर दे उसे भगा दिया जाता है। खाली जमा कराये गये फार्म में कंपनी का स्टॉफ मनमानी प्रविष्टियां करता है इसलिए नुकसान की सही तस्वीर सामने नही आ पाती। कृषि कर्मचारियों को मौके पर जाकर सर्वे रिपोर्ट बनानी चाहिए लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि वे ऐसा न करके यहीं बैठे-बैठे किसान से ओटीपी पूंछकर इसकी खानापूर्ति कर देते हैं।
किसानों को गच्चा देने के लिए उनके सामने 70-80 प्रतिशत नुकसान भर भी लिया जाये तो उसमें भी हेराफेरी का रास्ता खोल दिया जाता है। किसान को यह पता नही चलता कि बाद में ऐरिया के कॉलम में 4 या 5 प्रतिशत भरकर उनका कबाड़ा किया जा रहा है। इसका तात्पर्य होता है कि पूरे खेत में नुकसान नही हुआ, रकवा के 4-5 प्रतिशत भाग मात्र में इस नुकसान को सीमित करके ऐसे आसार बनाये जा रहे हैं जिससे फसल की पूरी बर्बादी का केवल प्रतीकात्मक क्लेम हासिल कर सके और जब यह स्थिति आये तो किसान अपना माथा पीट ले। निवर्तमान जिलाधिकारी राजेश कुमार पाण्डेय का ध्यान जब इस ओर आकर्षित कराया गया था तो उनका कहना था कि राजस्व विभाग की टीम उन्होंने सर्वे पर लगा दी है। जबकि जन संघर्ष मोर्चा के संयोजक गिरेंद्र सिंह कुशवाह का कहना है कि राजस्व विभाग केवल खसरा का सर्वे करता है। इसलिए उसके सर्वे से किसानों को क्लेम हासिल करने में कोई मदद नही मिलेगी। किसानों के आरोपों के संबंध में जब एसबीआई इंश्योरेंस के जिला प्रबंधक पवन कुमार से बात करने के लिए उन्हें कॉल की गयी तो उन्होंने कॉल रिसीव नही की। गिरेंद्र सिंह का कहना है कि नये जिलाधिकारी को हस्तक्षेप करके बीमा कंपनी को मिड सर्वे के लिए निर्देशित करना चाहिए तांकि किसान पूरा क्लेम हासिल कर सकें। उन्होंने कहा कि वे सरकार का ध्यान आकर्षित कराने के लिए 18 सितंबर को इस मुददे पर शांतिपूर्ण धरने का आयोजन करेगें।

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