इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में युद्धकला का स्वरूप जिस तेज़ी से बदला है, उसने दुनिया भर की सेनाओं को अपनी संरचना, रणनीति और मानव संसाधन नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य कर दिया है। पारंपरिक रूप से सेनाओं की ताकत उनके सैनिकों की संख्या से आंकी जाती थी। जिस देश के पास जितनी विशाल पैदल सेना होती थी, उसे उतना ही शक्तिशाली माना जाता था। किंतु आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन युद्धकला, लंबी दूरी की सटीक मिसाइलों, साइबर युद्ध और उपग्रह आधारित निगरानी के इस युग में संख्याबल की तुलना में तकनीकी दक्षता और वित्तीय गतिशीलता कहीं अधिक निर्णायक तत्व बन चुके हैं।
भारत के संदर्भ में देखें तो जून 2022 में घोषित ‘अग्निपथ योजना’ इसी वैश्विक बदलाव की दिशा में उठाया गया एक ऐतिहासिक और संरचनात्मक कदम था। इस योजना के माध्यम से भारतीय सशस्त्र बलों में पारंपरिक नियमित भर्ती प्रक्रिया को समाप्त कर चार वर्ष के संविदा आधारित सेवा मॉडल को लागू किया गया। इसके तहत भर्ती होने वाले जवानों को ‘अग्निवीर’ कहा गया, जिनमें से पच्चीस प्रतिशत को चार साल बाद नियमित कैडर में स्थायी रूप से बनाए रखने और शेष पचहत्तर प्रतिशत को एकमुश्त वित्तीय पैकेज के साथ सेवामुक्त करने का प्रावधान किया गया।
इस नीतिगत बदलाव ने देश के भीतर गंभीर रणनीतिक, सामाजिक और आर्थिक बहसों को जन्म दिया। एक वर्ग का मानना था कि इससे सेना की औसत उम्र कम होगी और रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा पेंशन के बोझ से मुक्त होकर तकनीकी आधुनिकीकरण में लगेगा। वहीं आलोचकों ने तर्क दिया कि इससे सेना की पारंपरिक रेजिमेंटल निष्ठा, सामरिक निरंतरता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गहरा आघात पहुंचेगा। इस पूरी बहस को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम केवल घरेलू चश्मे से न देखकर इसका मूल्यांकन दुनिया के उन प्रमुख देशों के अनुभवों की रोशनी में करें, जिन्होंने अपनी सेनाओं को ‘मैनपावर-हेवी’ से ‘टेक्नोलॉजी-ड्रिवन’ बनाने के लिए इसी प्रकार के अल्पकालिक और संविदा आधारित मॉडल अपनाए हैं। इनमें संयुक्त राज्य अमेरिका का ‘ऑल-वॉलंटियर एनलिस्टमेंट’ मॉडल और इज़राइल की ‘अनिवार्य सेवा व सक्रिय रिज़र्व’ प्रणाली सबसे उल्लेखनीय हैं।
भारत में रक्षा बजट का संरचनात्मक संकट और अग्निपथ की उत्पत्ति
अग्निपथ योजना किसी शून्य में पैदा नहीं हुई थी, बल्कि यह भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान के सामने दशकों से खड़े उस वित्तीय संकट का समाधान खोजने का प्रयास थी जिसे ‘पेंशन और वेतन बनाम पूंजीगत व्यय’ का द्वंद्व कहा जाता है। कारगिल समीक्षा समिति (1999) और बाद में डीबी शेकतकर समिति (2016) की रिपोर्टों में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया था कि भारतीय सेना का रक्षा बजट एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुका है जहां उसका विशाल हिस्सा केवल राजस्व व्यय, यानी सैनिकों के वेतन, भत्तों और पूर्व सैनिकों की पेंशन को चुकाने में खर्च हो रहा है।
वर्षों तक स्थिति यह बनी रही कि कुल रक्षा बजट का पचास से साठ प्रतिशत तक हिस्सा वेतन और पेंशन में चला जाता था, जिसके कारण तीनों सेनाओं के आधुनिकीकरण, नए लड़ाकू विमानों की खरीद, नौसेना के जहाजी बेड़े के विस्तार, सटीक हथियारों के निर्माण और अनुसंधान एवं विकास के लिए बहुत सीमित पूंजीगत बजट बचता था। ‘वन रैंक वन पेंशन’ के क्रियान्वयन के बाद पेंशन का यह वार्षिक बिल और भी तेजी से बढ़ा। इसके अतिरिक्त, भारतीय सेना के अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिकों की औसत आयु बत्तीस वर्ष के आसपास पहुंच रही थी, जिसे करगिल युद्ध के अनुभवों को देखते हुए उच्च पर्वतीय और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल नहीं माना जा रहा था।
इन दोनों चुनौतियों का समाधान करने के उद्देश्य से अग्निपथ योजना को तैयार किया गया। इसका पहला लक्ष्य था सेना की प्रोफाइल को ‘युवा और फुर्तीला’ बनाना, ताकि औसत आयु घटकर लगभग छब्बीस वर्ष पर आ जाए। दूसरा लक्ष्य था मध्यम और दीर्घावधि में रक्षा बजट के राजस्व हिस्से को कम करना, जिससे भविष्य में बचने वाली धनराशि को अत्याधुनिक सैन्य साजो-सामान में निवेश किया जा सके। तीसरे, योजना का एक सामाजिक आयाम भी बताया गया कि चार साल के सैन्य अनुशासन और तकनीकी प्रशिक्षण के बाद बाहर आने वाले लाखों युवा राष्ट्र निर्माण और नागरिक उद्योगों में एक अनुशासित कार्यबल के रूप में योगदान देंगे।
अमेरिकी सेना का अनुबंध मॉडल: लचीलापन और आर्थिक अवसर
जब अल्पकालिक और अनुबंध आधारित सैन्य भर्ती की बात आती है, तो संयुक्त राज्य अमेरिका का मॉडल दुनिया भर में सबसे बड़ा और परिपक्व उदाहरण माना जाता है। 1973 में वियतनाम युद्ध की समाप्ति के बाद अमेरिका ने अनिवार्य सैन्य भर्ती को समाप्त कर दिया और पूरी तरह से स्वैच्छिक ‘ऑल-वॉलंटियर फोर्स’ की स्थापना की।
अमेरिकी प्रणाली में कोई भी सैनिक स्थायी नौकरी की गारंटी के साथ भर्ती नहीं होता। वहां ‘एनलिस्टमेंट कॉन्ट्रैक्ट’ की व्यवस्था है, जिसके तहत एक युवा सामान्यतः दो से छह वर्ष के निश्चित कार्यकाल के लिए अनुबंध पर हस्ताक्षर करता है। इस प्रारंभिक अनुबंध की समाप्ति पर सेना और सैनिक दोनों के पास विकल्प होता है। यदि सैनिक का प्रदर्शन उत्कृष्ट है और सेना को उस विशेषज्ञता की आवश्यकता है, तो अनुबंध का नवीनीकरण किया जा सकता है जिसे ‘री-एनलिस्टमेंट’ कहते हैं। यदि सैनिक नागरिक जीवन में लौटना चाहता है, तो वह अनुबंध समाप्त होते ही सेना छोड़ देता है। केवल वही सैनिक आजीवन पेंशन और पूर्ण सेवानिवृत्ति लाभों के पात्र होते हैं, जो लगातार पदोन्नति पाते हुए कम से कम बीस वर्ष की सक्रिय सेवा पूरी करते हैं।
अमेरिकी मॉडल की सबसे बड़ी ताकत उसका ‘पोस्ट-सर्विस बेनिफिट’ ढांचा है, जिसे ‘जीआई बिल’ के नाम से जाना जाता है। इस नीति के तहत, यदि कोई युवा अपना प्रारंभिक कार्यकाल सम्मानजनक तरीके से पूरा करता है, तो अमेरिकी सरकार उसके उच्च शिक्षा का पूरा खर्च उठाती है। इसमें विश्वविद्यालयों की ट्यूशन फीस, किताबों का खर्च और पढ़ाई के दौरान रहने-खाने का मासिक भत्ता शामिल होता है। इसके अलावा उन्हें कम ब्याज दरों पर होम लोन और स्वास्थ्य बीमा की विशेष सुविधाएं मिलती हैं।
इस व्यवस्था का परिणाम यह हुआ कि अमेरिकी सेना में भर्ती होना युवाओं के लिए जीवन भर की नौकरी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक सीढ़ी पर चढ़ने का एक शक्तिशाली साधन बन गया। गरीब और मध्यम वर्ग के युवा चार साल सेना में सेवाएं देते हैं, तकनीकी कौशल सीखते हैं, दुनिया देखते हैं, और फिर मुफ्त उच्च शिक्षा प्राप्त कर कॉर्पोरेट, तकनीक या प्रशासनिक क्षेत्रों में उच्च पदों पर आसीन होते हैं। यही कारण है कि अनुबंध आधारित होने के बावजूद अमेरिकी मॉडल युवाओं को आकर्षित करने में सफल रहा है।
इज़राइल का अनिवार्य राष्ट्रीय मॉडल: सेना और नागरिक समाज का सह-अस्तित्व
अमेरिका और भारत की तुलना में इज़राइल की भू-राजनीतिक स्थिति और सैन्य दर्शन बिल्कुल भिन्न है। चारों तरफ से शत्रुतापूर्ण पड़ोसियों से घिरे होने और अत्यंत सीमित जनसंख्या के कारण इज़राइल कभी भी एक विशाल नियमित पेशेवर सेना का वित्तीय और जनसांख्यिकीय भार नहीं उठा सकता था। इसलिए इज़राइल डिफेंस फोर्सेज (आईडीएफ) की पूरी संरचना अनिवार्य सेवा और विशाल रिज़र्व बल के सिद्धांत पर आधारित है।
इज़राइल में अठारह वर्ष की आयु प्राप्त करने वाले प्रत्येक नागरिक (कुछ धार्मिक और विशेष छूटों को छोड़कर) के लिए सैन्य सेवा कानूनी रूप से अनिवार्य है। पुरुषों को लगभग बत्तीस महीने और महिलाओं को चौबीस महीने की सेवा देनी होती है। इस प्रारंभिक अवधि में सभी नागरिकों को कठोर बुनियादी प्रशिक्षण और फ्रंटलाइन तैनाती का अनुभव कराया जाता है। कार्यकाल समाप्त होने के बाद, अधिकांश युवाओं को नागरिक जीवन में भेज दिया जाता है और केवल कुछ चुनिंदा अधिकारियों, कमांडरों और उच्च तकनीकी विशेषज्ञों को ही स्थायी ‘करियर कोर’ में रखा जाता है।
नागरिक जीवन में लौटने वाले ये युवा अपनी सामान्य नौकरियों, व्यवसायों और पढ़ाई में लग जाते हैं, लेकिन वे लगभग चालीस वर्ष की आयु तक ‘एक्टिव रिज़र्व’ का अभिन्न हिस्सा बने रहते हैं। उन्हें हर साल कुछ हफ्तों के लिए सैन्य वर्दी पहनकर अनिवार्य अभ्यास में भाग लेना होता है। इज़राइल के मॉडल की अद्वितीय सफलता यह है कि किसी भी बड़े संकट या युद्ध की स्थिति में वह मात्र चौबीस से अड़तालीस घंटों के भीतर चार से पांच लाख पूरी तरह से प्रशिक्षित और अभ्यस्त नागरिकों को युद्ध के मैदान में अग्रिम मोर्चों पर तैनात कर सकता है।
इसके अलावा, इज़राइल के आर्थिक और तकनीकी विकास में इस मॉडल की केंद्रीय भूमिका रही है। इज़राइली सेना की खुफिया और तकनीकी यूनिटों, जैसे यूनिट 8200, में सेवा देने वाले युवा बाहर निकलकर तेल अवीव की ‘सिलिकॉन वाडी’ में दुनिया की अग्रणी साइबर सुरक्षा और सॉफ्टवेयर कंपनियां स्थापित करते हैं। वहां सैन्य सेवा को जीवन का समय बर्बाद होना नहीं माना जाता, बल्कि उसे राष्ट्रीय पहचान, नेतृत्व क्षमता और व्यावसायिक नेटवर्किंग का सबसे बड़ा प्रमाण पत्र समझा जाता है।
तीनों मॉडलों का संरचनात्मक और दार्शनिक अंतर
भारत, अमेरिका और इज़राइल के मॉडलों का जब हम गहन विश्लेषण करते हैं, तो सतह पर दिखने वाली अल्पकालिक समानता के पीछे गहरे दार्शनिक, आर्थिक और सामाजिक अंतर उभर कर आते हैं।
पहला अंतर सेवा की प्रकृति का है। इज़राइल में सेवा अनिवार्य है, जहां अमीर और गरीब, शहरी और ग्रामीण सभी को एक ही बैरक में रहना होता है। इसके विपरीत, भारत और अमेरिका में सेवा पूरी तरह से स्वैच्छिक है। किंतु भारत और अमेरिका में भी एक बहुत बड़ा सामाजिक अंतर है। अमेरिका एक उच्च आय वाली विकसित अर्थव्यवस्था है, जहां युवाओं के पास सेना के अलावा भी निजी क्षेत्र में आजीविका के प्रचुर अवसर उपलब्ध हैं। भारत में सशस्त्र बलों की नौकरी केवल देश सेवा का माध्यम नहीं, बल्कि ग्रामीण और कस्बाई युवाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा, स्थायी आजीविका, पेंशन और सामाजिक प्रतिष्ठा का सबसे बड़ा स्तंभ रही है। इसलिए, जब भारत में स्थायी नौकरी की जगह चार साल का अनुबंध लाया गया, तो युवाओं में मनोवैज्ञानिक असुरक्षा की भावना अमेरिकी युवाओं की तुलना में कहीं अधिक तीव्र थी।
दूसरा अंतर सेवा के बाद के आर्थिक पुनर्वास के तंत्र में है। अमेरिका में जीआई बिल के माध्यम से सैनिक को सीधे उच्च शिक्षा और कौशल का वह पासपोर्ट मिल जाता है जो उसे नागरिक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाता है। इज़राइल में देश का समूचा औद्योगिक तंत्र और कॉर्पोरेट जगत सैन्य पृष्ठभूमि वाले युवाओं को हाथों-हाथ लेता है। भारत की अग्निपथ योजना में सरकार ने ‘सेवा निधि’ के रूप में लगभग बारह लाख रुपये का एकमुश्त कर-मुक्त कोष तो उपलब्ध कराया है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान संरचना में गैर-कृषि और औपचारिक नौकरियों का सृजन एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। चार साल बाद सेवामुक्त होने वाले पचहत्तर प्रतिशत अग्निवीरों को निजी क्षेत्र किस सीमा तक और किस वेतन स्तर पर समाहित कर पाएगा, यह प्रश्न अभी भी पूरी तरह सुलझ नहीं पाया है।
तीसरा अंतर रिज़र्व बल की अवधारणा का है। इज़राइल का संपूर्ण सुरक्षा ढांचा ही उसके रिज़र्व सिस्टम पर टिका है। अमेरिका में भी ‘नेशनल गार्ड’ और ‘आर्मी रिज़र्व’ का एक सुगठित ढांचा है, जहां पूर्व सैनिक सप्ताहांतों और आपात स्थितियों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं और उसके बदले उन्हें मानदेय और सुविधाएं मिलती हैं। भारत में अग्निपथ योजना के तहत चार साल बाद बाहर होने वाले युवाओं के लिए इज़राइल जैसा कोई सक्रिय और संस्थागत रिज़र्व ढांचा फिलहाल नहीं बनाया गया है। यदि इन प्रशिक्षित युवाओं को नियमित अंतराल पर रिफ्रेशर ट्रेनिंग और रिज़र्व ड्यूटी से नहीं जोड़ा गया, तो कुछ वर्षों में उनका सैन्य कौशल कुंद हो सकता है।
सामरिक चुनौतियां: रेजिमेंटल निष्ठा, युद्धक क्षमता और तकनीकी प्रशिक्षण
अग्निपथ योजना को लेकर केवल वित्तीय और सामाजिक प्रश्न ही नहीं हैं, बल्कि विशुद्ध सैन्य और सामरिक दृष्टिकोण से भी कई गंभीर चुनौतियां रक्षा विशेषज्ञों द्वारा उठाई गई हैं।
सबसे बड़ा सवाल प्रशिक्षण की अवधि और सैन्य विशेषज्ञता का है। पारंपरिक व्यवस्था में एक रंगरूट को लगभग नौ से ग्यारह महीने का बुनियादी सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता था, जिसके बाद वह अपनी यूनिट में जाकर अगले दो से तीन वर्षों में अनुभवी सीनियर सैनिकों के सानिध्य में वास्तविक युद्ध कौशल, उच्च पर्वतीय परिस्थितियों में जीवित रहने की कला और आधुनिक हथियारों के संचालन में पारंगत होता था। अग्निपथ योजना के तहत प्रशिक्षण की अवधि को घटाकर लगभग छह महीने कर दिया गया है। आधुनिक युद्धकला में केवल राइफल चलाना पर्याप्त नहीं है; आज के सिपाही को एन्क्रिप्टेड संचार उपकरण, नाइट-विजन गैजेट्स, ड्रोन डिटेक्शन सिस्टम और जटिल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें संचालित करनी होती हैं। छह महीने के संक्षिप्त प्रशिक्षण में एक युवा को जटिल इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों का विशेषज्ञ बनाना एक अत्यंत कठिन कार्य है।
दूसरी बड़ी चुनौती भारतीय सेना की विशिष्ट ‘रेजिमेंटल प्रणाली’ से जुड़ी है। भारतीय पैदल सेना की आत्मा उसकी रेजिमेंटल परंपरा, नाम, नमक और निशान के उस अटूट बंधन पर टिकी है जो सैनिकों को सियाचिन के शून्य से पचास डिग्री नीचे के तापमान या गलवान की बर्फीली घाटियों में प्राण न्योछावर करने की प्रेरणा देता है। सदियों से चली आ रही इस व्यवस्था में सैनिक एक ही यूनिट में भर्ती होते थे, साथ बड़े होते थे और दशकों तक एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी रहते थे। आलोचकों की आशंका है कि जब सैनिकों को यह पता होगा कि उनमें से केवल पच्चीस प्रतिशत ही बचेंगे और पचहत्तर प्रतिशत को चार साल में बाहर कर दिया जाएगा, तो यूनिट के भीतर अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा जन्म ले सकती है। इससे वह निस्वार्थ सामूहिकता और कॉमरेडरी प्रभावित हो सकती है जो युद्ध के मैदान में जान देने और बचाने के लिए अनिवार्य होती है।
इसके अतिरिक्त, पच्चीस प्रतिशत के चयन की प्रक्रिया भी अधिकारियों के लिए एक बड़ी मानवीय और प्रशासनिक चुनौती होगी। चार साल के कार्यकाल के अंत में किसी एक जवान को चुनना और दूसरे को बाहर का रास्ता दिखाना यूनिट कमांडर के स्तर पर व्यक्तिपरक निर्णयों या पक्षपात के आरोपों को जन्म दे सकता है, जिससे मनोबल पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।
सामाजिक और आंतरिक सुरक्षा के आयाम
अग्निपथ योजना का एक अत्यंत संवेदनशील पहलू इसका भारत के आंतरिक सुरक्षा परिदृश्य और सामाजिक ताने-बाने पर पड़ने वाला संभावित प्रभाव है। भारत में सशस्त्र बलों में भर्ती पारंपरिक रूप से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बिहार के विशिष्ट ग्रामीण अंचलों में केंद्रित रही है। इन क्षेत्रों में सेना की नौकरी केवल रोज़गार नहीं, बल्कि पूरे समुदाय के सामाजिक सम्मान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा रही है।
हर साल हजारों की संख्या में हथियार चलाने, सामरिक रणनीति बनाने और विध्वंसक सामग्री का उपयोग करने में प्रशिक्षित युवाओं का नागरिक समाज में लौटना एक दोधारी तलवार की तरह है। यदि इन युवाओं को बाहर आते ही सम्मानजनक आजीविका, अर्धसैनिक बलों में प्राथमिकता या निजी क्षेत्र में उत्पादक काम मिल गया, तो वे समाज के सबसे अनुशासित और उत्पादक नागरिक सिद्ध होंगे, जो आपदा प्रबंधन, कानून-व्यवस्था और औद्योगिक विकास में मील का पत्थर साबित हो सकते हैं।
किंतु यदि आर्थिक मंदी या नौकरियों के अभाव के कारण इनमें से एक वर्ग भी हताश और बेरोजगार रह गया, तो इस बात का गंभीर जोखिम बना रहता है कि असामाजिक तत्व, संगठित आपराधिक गिरोह या देश विरोधी ताकतें उनके इस सैन्य प्रशिक्षण का दुरुपयोग करने की चेष्टा करें। विश्व इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जहां उचित पुनर्वास के अभाव में विमुद्रीकृत या संविदा से बाहर किए गए पूर्व सैनिकों ने आंतरिक अस्थिरता को बढ़ाया है।
इसी कारण भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों ने बाद के चरणों में यह घोषणाएं कीं कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों जैसे सीआईएसएफ, बीएसएफ, सीआरपीएफ और राज्य पुलिस भर्तियों में पूर्व-अग्निवीरों को दस प्रतिशत आरक्षण और आयु सीमा में छूट दी जाएगी। हालांकि, इन वादों का ज़मीनी स्तर पर पारदर्शी और त्वरित क्रियान्वयन ही इस सामाजिक चिंता को वास्तविक रूप से दूर कर सकता है।
वैश्विक अनुभवों से भारत के लिए व्यावहारिक सबक
यदि भारत को अपनी इस महत्वाकांक्षी योजना को वास्तव में सफल बनाना है और इसके सामरिक व मानवीय नुकसान को न्यूनतम करना है, तो उसे अमेरिका और इज़राइल के अनुभवों से कुछ व्यावहारिक और नीतिगत सबक तत्काल अपनाने होंगे।
पहला सबक स्थायीकरण के अनुपात को तर्कसंगत बनाने से संबंधित है। पच्चीस प्रतिशत का वर्तमान कोटा बहुत सीमित प्रतीत होता है। यदि इसे बढ़ाकर पचास प्रतिशत तक कर दिया जाए, तो इससे सैनिकों के भीतर अपनी सेवा सुरक्षा को लेकर फैला तनाव काफी हद तक कम हो जाएगा और सेना को अपने तकनीकी रूप से प्रशिक्षित कार्यबल को लंबे समय तक बनाए रखने का अवसर मिलेगा। इससे रेजिमेंटल स्तर पर नेतृत्व और निरंतरता का संकट भी पैदा नहीं होगा।
दूसरा सबक अमेरिकी जीआई बिल की तर्ज पर एक सुदृढ़ ‘शैक्षिक और कौशल रूपांतरण नीति’ बनाने का है। केवल बारह लाख रुपये की सेवा निधि देना पर्याप्त नहीं हो सकता। सरकार को देश के शीर्ष केंद्रीय विश्वविद्यालयों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों और प्रबंधन संस्थानों में पूर्व-अग्निवीरों के लिए विशेष लेटरल एंट्री और शत-प्रतिशत छात्रवृत्ति की योजना बनानी चाहिए। चार साल की सैन्य सेवा के बाद यदि एक युवा को रोबोटिक्स, लॉजिस्टिक्स, डेटा एनालिटिक्स या कानून की डिग्री मिल जाए, तो वह निजी उद्योग के लिए एक अत्यंत मूल्यवान संपत्ति बन जाएगा।
तीसरा सबक इज़राइल की तर्ज पर एक औपचारिक ‘सक्रिय टेरिटोरियल रिज़र्व’ बल खड़ा करने का है। सेवामुक्त होने वाले पचहत्तर प्रतिशत अग्निवीरों को पूरी तरह छोड़ देने के बजाय, उन्हें एक औपचारिक नागरिक रिज़र्व सूची में दर्ज किया जाना चाहिए। उन्हें वर्ष में तीस दिनों के लिए सवैतनिक अभ्यास के लिए बुलाया जाना चाहिए और एक निश्चित मासिक रिटेनरशिप भत्ता दिया जाना चाहिए। इससे भारत के पास हमेशा एक ऐसी ‘सेकंड लाइन ऑफ डिफेंस’ तैयार रहेगी जिसे प्राकृतिक आपदाओं, आंतरिक दंगों या बड़े सीमा संघर्षों के समय कुछ ही घंटों में लामबंद किया जा सकेगा।
चौथा सबक भर्ती और विशेषज्ञता का विभेदन है। सेना की हर शाखा को चार साल के एक ही पैमाने से नहीं मापा जा सकता। साधारण इन्फैंट्री के लिए अल्पकालिक मॉडल फिर भी काम कर सकता है, लेकिन सिग्नल कोर, इलेक्ट्रॉनिक्स और मैकेनिकल इंजीनियर्स, आर्मी एविएशन और वायुसेना व नौसेना के जटिल तकनीकी ट्रेड्स के लिए छह महीने का प्रशिक्षण और चार साल का कार्यकाल पूरी तरह अव्यावहारिक है। तकनीकी संवर्गों के लिए अनुबंध की न्यूनतम अवधि को बढ़ाकर सात से आठ वर्ष किया जाना चाहिए, ताकि सेना द्वारा उनके प्रशिक्षण पर खर्च किए गए समय और संसाधन का पूरा लाभ राष्ट्र को मिल सके।
रक्षा आधुनिकीकरण और भविष्य की दिशा
सैन्य सुधार कभी भी स्थिर नहीं होते; वे निरंतर चलने वाली और खुद को सुधारने वाली प्रक्रियाएं हैं। अग्निपथ योजना भारत के रक्षा सुधारों के इतिहास का सबसे बड़ा ढांचागत प्रयोग है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पारंपरिक मॉडल में सेना का अनियंत्रित पेंशन बिल और लगातार बढ़ती औसत आयु राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर दीर्घावधि खतरा बन चुके थे। बजट का वह धन जो पाँचवीं पीढ़ी के स्टील्थ विमानों, मानवरहित युद्धक प्रणालियों, हाइपरसोनिक मिसाइलों और आधुनिक नौसैनिक पनडुब्बियों पर खर्च होना चाहिए था, वह केवल संस्थागत अस्तित्व को बनाए रखने में जा रहा था। इस लिहाज से परिवर्तन अपरिहार्य था।
किंतु किसी भी सैन्य सुधार की अंतिम कसौटी उसकी कागजी बचत नहीं, बल्कि युद्ध के मैदान में उसकी मारक क्षमता और जीत हासिल करने की योग्यता होती है। भारत की भौगोलिक स्थिति अमेरिका या इज़राइल से बहुत अलग है। भारत को एक ही समय में परमाणु शक्ति संपन्न दो विरोधी पड़ोसियों का सामना करना पड़ता है, जिनकी सीमाएं हिमालय की सबसे दुर्गम चोटियों से लेकर थार के तपते रेगिस्तानों तक फैली हैं। यहां का युद्ध केवल तकनीक से नहीं, बल्कि उस जवान के अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प से लड़ा जाता है जो अंतिम मोर्चे पर खड़ा होता है।
इसलिए, अग्निपथ को किसी कठोर और अपरिवर्तनीय सिद्धांत के रूप में लागू करने के बजाय एक गतिशील और लचीले मॉडल के रूप में देखा जाना चाहिए। सरकार और सैन्य नेतृत्व को पहले दो-तीन बैचों के प्रदर्शन का पूरी निष्पक्षता और कठोरता से ऑडिट करना चाहिए। यदि युद्धक क्षमता, मनोबल या तकनीकी दक्षता में कोई भी कमी परिलक्षित होती है, तो भर्ती की अवधि, प्रशिक्षण के महीनों और स्थायीकरण के प्रतिशत में रणनीतिक संशोधन करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए।
अंततः, राष्ट्र की सुरक्षा केवल हथियारों की चमक से नहीं, बल्कि उन हथियारों को चलाने वाले जवानों के अटूट विश्वास, निष्ठा और गरिमा से सुनिश्चित होती है। यदि भारत वैश्विक मॉडलों के सकारात्मक पहलुओं को अपनाते हुए और अपनी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक वास्तविकताओं का सम्मान करते हुए अग्निपथ योजना की विसंगतियों को दूर कर लेता है, तो यह मॉडल भारतीय सेना को इक्कीसवीं सदी की एक अत्यंत घातक, युवा, तकनीकी रूप से उन्नत और आर्थिक रूप से टिकाऊ महाशक्ति में बदल सकता है। यह संतुलन साधना ही आने वाले दशकों में भारत के सामरिक नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।







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