उरई। वरिष्ठ पत्रकार केपी सिंह ने कहा कि गांधी लोगों को नैतिक अनुशासन की सैनिक की तरह कड़ी ट्रेनिंग दिए जाने के हिमायती थे और अपने अनुयायियों पर इसे लागू करते थे। स्वराज के पीछे उनकी कल्पना आत्मानुशासित लोगों का ऐसा समाज खड़ा करने की थी, जिसे व्यवस्थित रखने के लिए राज्य के डंडे की जरूरत न पड़े। साध्य के साथ साधनों की पवित्रता पर जोर देने वाले गांधी आज की उस राजनीतिक व्यवस्था को कतई स्वीकार नहीं करते, जिसमें सांसदों और विधायकों को खरीदकर सरकारें बनाई जाती हैं।

ज्ञानोदय विचार मंच के तत्वावधान में गांधी-शास्त्री जयंती पर आयोजित गोष्ठी में केपी सिंह ने कहा कि गांधी के लिए राजनीति केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं थी, बल्कि समाज को नैतिक आधार देने का साधन थी। उनके सत्य और अहिंसा के विचारों का प्रभाव भारत के बाहर भी दिखाई देता है।

गोष्ठी की अध्यक्षता डीवी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. आदित्य कुमार ने की। उन्होंने कहा कि गांधी एक व्यक्ति नहीं, विचार हैं। उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं और राष्ट्रीय जीवन को दिशा देने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। संचालन डॉ. राम प्रताप ने किया।

विषय प्रवर्तन करते हुए पूर्व कस्टम कमिश्नर शम्भू दयाल ने कहा कि गांधी विश्व पटल पर भारत के गौरव के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनकी स्मृति और विचारों को सहेजकर रखना प्रत्येक नागरिक और बुद्धिजीवी का दायित्व है।

माध्यमिक शिक्षक संघ के नेता गिरेंद्र सिंह ने कहा कि गांधी के विचार राष्ट्रीय एकता के लिए महत्वपूर्ण हैं। यशोधन त्रिपाठी ने गांधी को जादूगर बताते हुए कहा कि दंगा प्रभावित क्षेत्रों में उनके पहुंचने का लोगों पर नैतिक प्रभाव पड़ता था और कई बार उपद्रवियों का हृदय परिवर्तन हुआ।

कार्यक्रम की शुरुआत संगीत गुरु सुरेंद्र खरे ने गांधीजी के प्रिय भजन ‘रघुपति राघव राजाराम’ के गायन से की। इप्टा उरई के सचिव राज पप्पन ने जनगीत प्रस्तुत किया। अशोक गुप्ता, महेंद्र सिंह भाटिया और होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ. ज्ञान चंद कोंच ने भी विचार रखे।

गोष्ठी में अंडा इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य रविंद्र, कविवर शेष, अमरचंद्र इंटर कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य ओमप्रकाश, शिवशंकर दोहरे, रंगकर्मी संतोष, मनीष तोमर सहित अन्य लोग मौजूद रहे। आयुष ने आभार व्यक्त किया।

Leave a comment