जिस दर्शन की बुनियाद में लोभ, मोह, अहंकार और भेदभाव से मुक्ति है, उसके स्वयंभू ध्वजावाहक समाज को उल्टी दिशा में क्यों ले जा रहे हैं?
सनातन धर्म के नाम पर आज जितना शोर सुनाई देता है, क्या उतनी ही नैतिकता हमारे सामाजिक और राजनीतिक जीवन में दिखाई देती है? धर्म के नाम पर विशाल आयोजन हो रहे हैं। कथाओं के मंच सज रहे हैं। मंदिरों का वैभव बढ़ रहा है। धर्मगुरुओं की लोकप्रियता और उनके अनुयायियों की संख्या में वृद्धि हो रही है। धार्मिक उपदेशों के प्रसारण के लिए संचार के आधुनिकतम साधनों का इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन क्या इस सबका कोई असर मनुष्य के चरित्र पर भी पड़ रहा है? क्या समाज में लोभ, ईर्ष्या, अहंकार, घृणा, जातीय श्रेष्ठता और दूसरे के अधिकारों के प्रति असहिष्णुता कम हो रही है? क्या सत्ता और संपत्ति के प्रति असीमित लालसा पर कोई अंकुश लग रहा है? क्या शासन में नैतिकता की प्रतिष्ठा बढ़ रही है?
इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए सनातन धर्म के स्वयंभू ध्वजावाहकों को अपनी अंतरात्मा में झांकना होगा। उन्हें यह देखना होगा कि वे जिस धर्म की रक्षा का दावा कर रहे हैं, उसके मूल दर्शन का निर्वहन भी कर रहे हैं या धर्म के नाम पर चल रही ऐसी गतिविधियों के हिस्सेदार बन गए हैं जो मनुष्य की कमजोरियों का दोहन करके उसकी धार्मिक भावनाओं को अपने हित में इस्तेमाल करती हैं।
सनातन परंपरा में वेदान्त ऐसा दर्शन है जो एक आदर्श समाज की स्थापना के लिए अत्यंत प्रभावी नैतिक आधार उपलब्ध कराता है। उसका मूल संदेश मनुष्य को बाहरी उपलब्धियों के पीछे अंधी दौड़ लगाने से रोककर अपने भीतर झांकने, अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने और जीवन की क्षणभंगुरता का बोध करने के लिए प्रेरित करना है। इस दर्शन का निरंतर प्रसार हो तो मनुष्य के भीतर लोभ, तृष्णा, ईर्ष्या, क्रोध और अहंकार के लिए जगह लगातार कम होती जाएगी। उसका चित्त निर्मल होगा और नैतिक आचरण उसके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बनने लगेगा।
वेदान्त की प्रासंगिकता केवल आध्यात्मिक मुक्ति तक सीमित नहीं है। वह मनुष्य के सामाजिक व्यवहार, दूसरे प्राणियों के प्रति उसके दृष्टिकोण और सत्ता-संपत्ति के प्रति उसकी आकांक्षाओं को भी प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि वेदान्त के मूल संदेश को सामाजिक जीवन में प्रतिष्ठित करना एक नैतिक समाज के निर्माण की महत्वपूर्ण शर्त हो सकती है।
वेदान्त मनुष्य को किस दिशा में ले जाता है?
वेदान्त का एक प्रमुख संदेश यह है कि संसार की समस्त भौतिक उपलब्धियां परिवर्तनशील और नश्वर हैं। जिन वस्तुओं को मनुष्य अपनी स्थायी संपत्ति समझकर उनके संग्रह में जीवन खपा देता है, वे एक दिन उससे छूट जाएंगी। जिस पद, प्रतिष्ठा और सत्ता को वह अपनी स्थायी पहचान बना लेता है, वे भी हमेशा उसके पास नहीं रहने वाले। शरीर तक नश्वर है। फिर इन सबके लिए मनुष्य दूसरे मनुष्य का अधिकार छीनने, उसे अपमानित करने, उसके प्रति हिंसा करने और छल-कपट का सहारा लेने पर क्यों उतारू हो?
ईशावास्य उपनिषद का पहला मंत्र इसी संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है-
‘ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥’
अर्थात इस जगत में जो कुछ भी है, वह ईश्वर से आच्छादित है। त्याग की भावना के साथ उसका उपभोग करो और किसी दूसरे के धन के प्रति लोभ मत करो।
इस एक मंत्र में एक नैतिक समाज की स्थापना का कितना व्यापक सूत्र छिपा हुआ है! इसमें उपभोग का निषेध नहीं है, बल्कि उपभोग के साथ संयम और त्याग का आग्रह है। दूसरे के धन पर लालच न करने की स्पष्ट चेतावनी है। यदि समाज इस एक संदेश को ही अपने आचरण का आधार बना ले तो आर्थिक शोषण, भ्रष्टाचार, दूसरों की संपत्ति हड़पने की प्रवृत्ति और असीमित संग्रह की मानसिकता पर कितना बड़ा अंकुश लग सकता है!
वेदान्त मनुष्य को यह समझाने का प्रयास करता है कि उसकी वास्तविक पहचान धन, पद, जाति, शरीर अथवा सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं है। उसका वास्तविक स्वरूप इन सबसे परे है। उपनिषदों का ‘अहं ब्रह्मास्मि’ और ‘तत्त्वमसि’ इसी आत्मबोध की अभिव्यक्तियां हैं। जब मनुष्य अपने भीतर उस चेतना का अनुभव करने लगता है जो समस्त अस्तित्व में व्याप्त है, तब दूसरे मनुष्य के प्रति उसका व्यवहार भी बदलना चाहिए।
बृहदारण्यक उपनिषद का ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ वाला भाव और ईशावास्य उपनिषद का छठा मंत्र इस संदर्भ में विशेष महत्व रखते हैं। मंत्र कहता है कि जो सभी प्राणियों को अपने आत्मस्वरूप में और अपने आत्मा को सभी प्राणियों में देखता है, वह किसी से घृणा नहीं करता।
यही वह बिंदु है जहां अध्यात्म नैतिकता में बदलता है। यदि दूसरे मनुष्य में भी उसी चेतना का अंश है जो मेरे भीतर है तो मैं उसे नीचा कैसे समझ सकता हूं? उसका शोषण कैसे कर सकता हूं? उसके प्रति घृणा और हिंसा कैसे पाल सकता हूं? उसकी जाति, जन्म और आर्थिक हैसियत के आधार पर उसकी गरिमा का निर्धारण कैसे कर सकता हूं?
अद्वैत का दर्शन और सामाजिक समानता का प्रश्न
वेदान्त की सबसे प्रभावशाली दार्शनिक धाराओं में अद्वैत वेदान्त है। आदि शंकराचार्य ने इस दर्शन को अत्यंत तार्किक और व्यवस्थित रूप दिया। अद्वैत का केंद्रीय प्रतिपादन है कि परम सत्य एक ही ब्रह्म है। जीव और ब्रह्म के बीच जो भिन्नता दिखाई देती है, वह अज्ञान के कारण है। ब्रह्म ही अंतिम सत्य है और आत्मा का वास्तविक स्वरूप उसी ब्रह्म से अभिन्न है।
यदि इस सिद्धांत को उसके सामाजिक निहितार्थों के साथ समझा जाए तो मनुष्य-मनुष्य के बीच ऊंच-नीच, छुआछूत और जन्म आधारित श्रेष्ठता के लिए कोई आध्यात्मिक आधार शेष नहीं रह जाता। ब्रह्म किसी एक जाति, वर्ग या समुदाय की निजी संपत्ति नहीं हो सकता। यदि सभी जीवों का मूल एक ही ब्रह्म है तो किसी मनुष्य को जन्म के आधार पर दूसरे से आध्यात्मिक रूप से श्रेष्ठ कैसे ठहराया जा सकता है?
लेकिन भारतीय दार्शनिक परंपरा का अध्ययन करते हुए एक असुविधाजनक प्रश्न से भी बचा नहीं जा सकता। शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन में जहां आत्मा की सार्वभौमिक एकता का प्रतिपादन मिलता है, वहीं उनके ब्रह्मसूत्र भाष्य में वेदाध्ययन के अधिकार को लेकर वर्ण आधारित सीमाओं की चर्चा भी मिलती है। यह उनके दर्शन के आध्यात्मिक आदर्श और तत्कालीन सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था के बीच एक महत्वपूर्ण तनाव है।
यह उल्लेख शंकराचार्य का अनादर करने के लिए नहीं है। किसी महान दार्शनिक के विचारों का सम्मान करने का अर्थ यह नहीं हो सकता कि उसके विचारों में दिखाई देने वाली विसंगतियों पर चर्चा ही न की जाए। भारतीय दर्शन की परंपरा में स्वयं ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां एक आचार्य के विचारों का दूसरे आचार्य ने तर्क के आधार पर प्रतिवाद किया और दर्शन को नई दिशा दी।
शंकराचार्य से संबंधित चांडाल प्रसंग इस संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। परंपरा के अनुसार, काशी में गंगा स्नान के बाद जब शंकराचार्य अपने शिष्यों के साथ जा रहे थे तो रास्ते में एक चांडाल सामने आ गया। उसे रास्ते से हटने के लिए कहा गया। तब उस चांडाल ने प्रश्न किया कि हटने के लिए किससे कहा जा रहा है? शरीर से या आत्मा से? यदि शरीर से कहा जा रहा है तो दोनों शरीर पंचभूतों से बने हैं। यदि आत्मा से कहा जा रहा है तो आत्मा तो एक ही है, उसमें भेद कहां है?
परंपरा के अनुसार, इस संवाद से शंकराचार्य का आत्मबोध जागृत हुआ और उन्होंने मनीषा पंचकम की रचना की। इस रचना का केंद्रीय संदेश है कि जो ब्रह्मज्ञान से संपन्न है, वही वास्तविक ज्ञानी और गुरु है, चाहे उसका जन्म किसी भी वर्ण या जाति में हुआ हो।
मनीषा पंचकम का एक प्रसिद्ध भाव है कि चांडाल हो या ब्राह्मण, जो ब्रह्म के सत्य को जानता है, वह मेरा गुरु है। यह अद्वैत की सामाजिक परिणति का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतिपादन है।
यहां एक बात ध्यान देने योग्य है कि चांडाल प्रसंग परंपरागत रूप से शंकराचार्य से जुड़ी कथा है; इसे निर्विवाद ऐतिहासिक घटना मानने के बजाय उनकी परंपरा में प्रचलित दार्शनिक आख्यान के रूप में समझना उचित है। लेकिन इस आख्यान का दार्शनिक संदेश अपने आप में महत्वपूर्ण है।
बाद में रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत और मध्वाचार्य ने द्वैत दर्शन का प्रतिपादन करते हुए शंकराचार्य के अद्वैत से असहमति जताई। उनके दर्शन में जीव, जगत और ईश्वर के संबंधों की व्याख्या अलग-अलग है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय अध्यात्म में किसी एक आचार्य के विचार अंतिम और आलोचना से परे नहीं माने गए। यहां मतभेद को भी दर्शन की समृद्धि का आधार बनाया गया।
इसलिए आज जो लोग सनातन धर्म के नाम पर किसी भी आलोचनात्मक प्रश्न को धर्मविरोध घोषित कर देते हैं, उन्हें भारतीय दर्शन की इस परंपरा को समझना चाहिए। शंकराचार्य का सम्मान उनके विचारों को तर्क और विवेक की कसौटी पर परखने से कम नहीं होता। बल्कि ऐसा करने से उनके दर्शन की वास्तविक शक्ति सामने आती है।
कथा के बाजार में खोता वेदान्त का नैतिक संदेश
आज धर्म और अध्यात्म के नाम पर जो गतिविधियां तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं, उनमें एक बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। वेदान्त जहां मनुष्य को तृष्णा और लोभ से मुक्त करने की प्रेरणा देता है, वहीं धर्म के नाम पर चलने वाले अनेक लोकप्रिय आयोजनों में मनुष्य की इन्हीं कमजोरियों को उद्दीप्त किया जा रहा है।
कथाओं के मंचों से लोगों को बताया जाता है कि अमुक कथा सुनने से धन प्राप्त होगा, अमुक अनुष्ठान से पद और प्रतिष्ठा मिलेगी, अमुक धार्मिक आयोजन से हर मनोकामना पूरी हो जाएगी। कहीं संतान प्राप्ति का प्रलोभन है तो कहीं व्यापार में सफलता का। कहीं शत्रुओं के विनाश का आश्वासन है तो कहीं राजसत्ता और ऐश्वर्य की प्राप्ति का।
राजाओं के वैभव, महलों की चमक-दमक, भोग-विलास और अपार संपत्ति के वर्णन को भी इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि श्रोता के भीतर वैसी ही उपलब्धियां प्राप्त करने की आकांक्षा जागृत हो। धर्म का मंच मनुष्य को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करने की जगह इच्छाओं की पूर्ति के उपाय बताने लगता है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भारतीय परंपरा में कथाओं का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। रामायण, महाभारत, पुराण और उपाख्यानों ने सदियों तक समाज को नैतिक शिक्षा दी है। कथा अपने आप में दोषपूर्ण नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब कथा का मूल नैतिक संदेश पीछे चला जाता है और उसका इस्तेमाल चमत्कार, प्रलोभन, भय और निजी लाभ की आकांक्षाओं को बढ़ाने के लिए होने लगता है।
उदाहरण के लिए, महाभारत में राजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ और राजवैभव का वर्णन है, लेकिन उसी महाभारत में दुर्योधन की लोभवृत्ति, जुए की विनाशकारी परिणति और सत्ता की लालसा से पैदा हुए महाविनाश का भी वर्णन है। यदि कथा में केवल राजाओं का वैभव सुनाया जाए और उसके पीछे छिपे अहंकार, लोभ और सत्ता संघर्ष के परिणामों को दबा दिया जाए तो कथा का नैतिक उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
रामायण में भी राम का आदर्श केवल एक शक्तिशाली राजा होना नहीं है। उनका चरित्र त्याग, मर्यादा, कर्तव्य और व्यक्तिगत सुख से ऊपर लोकहित को रखने की प्रेरणा देता है। भरत का प्रसंग तो सत्ता के लोभ के विरुद्ध भारतीय साहित्य का अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण है। उन्हें राज्य मिल सकता था, लेकिन उन्होंने सिंहासन को अपना अधिकार मानने से इनकार कर दिया।
राजा जनक का उदाहरण भी इसी संदर्भ में उल्लेखनीय है। वे मिथिला के राजा थे, लेकिन उपनिषदों में उनका उल्लेख ऐसे राजर्षि के रूप में मिलता है जिनके लिए राजपद और आत्मज्ञान परस्पर विरोधी नहीं थे। बृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य और जनक के संवाद ज्ञान की उस परंपरा को सामने लाते हैं जिसमें सत्ता का वैभव आत्मबोध से बड़ा नहीं है।
इन प्रसंगों का संदेश यह है कि धर्म की कथा मनुष्य को उसके भीतर की कमजोरियों से परिचित कराए, न कि उन कमजोरियों को और मजबूत करे।
धर्म के नाम पर यदि लोगों को यह समझाया जा रहा है कि पूजा-पाठ और कथा सुनने का सबसे बड़ा लाभ धन, पद, संपत्ति और मनोकामनाओं की पूर्ति है तो यह वेदान्त की मूल भावना के विपरीत है। यह अध्यात्म का व्यवसायीकरण ही नहीं, उसके नैतिक उद्देश्य से विचलन भी है।
ईशावास्य उपनिषद का ‘मा गृधः कस्यस्विद्धनम्’ ऐसे धार्मिक बाजार के सामने एक सीधी चुनौती है। दूसरे के धन पर लोभ मत करो। संग्रह की अंधी दौड़ में मत पड़ो। अपने उपभोग को संयमित करो। यदि धार्मिक मंचों से यह संदेश गायब है और उसके स्थान पर धन-वैभव की प्राप्ति के उपाय बेचे जा रहे हैं तो हमें पूछना चाहिए कि यह धर्म का प्रसार है या मनुष्य की तृष्णा का व्यापार?
धर्म का नैतिक आधार कमजोर हो तो राजनीति भी निरंकुश होती है
समाज में नैतिकता का क्षरण केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहता। उसका प्रभाव शासन और राजनीति पर भी पड़ता है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थिरता केवल संवैधानिक संस्थाओं, पुलिस, प्रशासन और चुनावों से सुनिश्चित नहीं होती। उसके लिए शासकों का नैतिक आचरण और जनता की नैतिक चेतना भी जरूरी होती है।
संविधान सरकार को अधिकार देता है, लेकिन उन अधिकारों का इस्तेमाल किस भावना से किया जा रहा है, यह शासक के नैतिक विवेक पर निर्भर करता है। लोकतंत्र में चुनाव जीतना किसी सरकार को मनमानी करने का लाइसेंस नहीं देता। बहुमत का अर्थ यह नहीं है कि नैतिकता, जवाबदेही और सार्वजनिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का महत्व समाप्त हो गया।
आज भारतीय राजनीति में जिस प्रकार सत्ता और नैतिकता के बीच दूरी बढ़ती दिखाई दे रही है, वह गंभीर चिंता का विषय है।
चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर उठे विवाद इसका एक उदाहरण हैं। मतदाता सूची को शुद्ध करना चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है। इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। लेकिन इस प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम छूटने, दस्तावेजों की शर्तों, पारदर्शिता और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे तो उनका जवाब देना भी आयोग की जिम्मेदारी है।
बिहार के एसआईआर को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में हुई सुनवाई और बाद में आए निर्णय ने इस बहस को कई स्तरों पर सामने रखा। मई 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने आयोग के इस पुनरीक्षण की वैधानिकता को स्वीकार किया। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रक्रिया के हर प्रशासनिक निर्णय या उसके क्रियान्वयन पर उठे सभी सवाल समाप्त हो गए। आयोग के एक हलफनामे में ऑनलाइन प्रस्तुति के तरीके से फॉर्म में संशोधन का आभास होने की बात भी स्वीकार की गई थी।
लोकतंत्र में ऐसी स्थितियों में सबसे जरूरी चीज है पारदर्शिता। यदि किसी संस्था से कोई त्रुटि हुई है तो उसे स्वीकार कर सुधार करना उसकी प्रतिष्ठा घटाता नहीं, बढ़ाता है। लेकिन यदि सत्ता के समर्थक हर सवाल को संस्था के विरुद्ध षड्यंत्र बताकर खारिज करने लगें तो यह राजनीतिक नैतिकता का पतन है।
इसी प्रकार दुष्यंत गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किया जाना एक तथ्य है। राष्ट्रपति भवन ने अक्टूबर 2026 में उनकी नियुक्ति की घोषणा की और उन्होंने राज्यपाल पद की शपथ भी ली। यह नियुक्ति अपने आप में कोई अनैतिकता सिद्ध नहीं करती। लेकिन राजनीतिक दलों से जुड़े व्यक्तियों को संवैधानिक पदों पर नियुक्त करने की परंपरा के संदर्भ में यह सवाल जरूर उठता है कि संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और सार्वजनिक विश्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है या राजनीतिक निष्ठा को।
हाई प्रोफाइल राजनीतिक नियुक्तियों का मूल्यांकन व्यक्ति के नाम से नहीं, बल्कि इस कसौटी पर होना चाहिए कि वह अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन कितनी स्वतंत्रता और निष्पक्षता से करता है।
इसी तरह हरदीप सिंह पुरी को मंत्रिमंडल में बनाए रखना भी राजनीतिक नेतृत्व का निर्णय है। केवल पद पर बने रहने से किसी व्यक्ति की नैतिकता पर फैसला नहीं दिया जा सकता। लेकिन जब किसी मंत्री या सार्वजनिक पदाधिकारी को लेकर गंभीर आरोप और विवाद सामने आते हैं तो सरकार की जवाबदेही बनती है कि वह उनका पारदर्शी समाधान करे। पद की निरंतरता को ही निर्दोषता का प्रमाण मान लेना लोकतांत्रिक जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकता।
सत्ता और कॉरपोरेट हितों के रिश्ते पर सवाल
नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में अदाणी समूह और केंद्र सरकार के संबंधों को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं के दौरान अदाणी समूह के कारोबारी हितों को लाभ पहुंचाने के आरोप भी लगाए गए हैं। विपक्ष का आरोप रहा है कि प्रधानमंत्री की वैश्विक कूटनीतिक पहुंच का इस्तेमाल एक बड़े कारोबारी समूह के हितों के लिए किया गया।
इन आरोपों की जांच और प्रमाण का प्रश्न अपनी जगह है। किसी आरोप को न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी लोकतांत्रिक अधिकार है कि प्रधानमंत्री और सरकार से पूछा जाए कि सार्वजनिक कूटनीति और निजी कारोबारी हितों के बीच स्पष्ट सीमा कैसे सुनिश्चित की जा रही है।
अमेरिका में अदाणी समूह के अधिकारियों के विरुद्ध सौर ऊर्जा अनुबंधों से जुड़े कथित रिश्वतखोरी के आरोप सामने आने के बाद यह बहस और गंभीर हुई। अदाणी समूह ने आरोपों को निराधार बताया। इस प्रकरण में भी आरोप, कंपनी का पक्ष और जांच की स्थिति अलग-अलग तथ्य हैं। इन्हें मिलाकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं है।
मूल प्रश्न यह है कि क्या सरकार सभी उद्योगपतियों के लिए समान अवसर, समान नियम और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित कर रही है? क्या किसी कारोबारी समूह को राजनीतिक निकटता के कारण विशेष सुविधा मिलती दिखाई दे तो सरकार उसकी स्वतंत्र जांच और स्पष्टीकरण के लिए तैयार है? क्या दूसरे उद्योगपतियों के विरुद्ध सरकारी एजेंसियों की कार्रवाई में समान मानदंड लागू होते हैं?
किसी लोकतंत्र में उद्योगपतियों और सरकार के बीच संबंध अपने आप में गलत नहीं हैं। आर्थिक विकास के लिए सरकार और उद्योग जगत का सहयोग आवश्यक है। लेकिन जब सरकारी शक्ति और निजी आर्थिक हितों के बीच संभावित टकराव के आरोप उठते हैं तो पारदर्शिता अनिवार्य हो जाती है।
वेदान्त का नैतिक संदेश यहां भी प्रासंगिक है। यदि मनुष्य को यह समझाया जाता है कि धन और संपत्ति नश्वर हैं, दूसरे के अधिकार पर लोभ करना अनुचित है और समस्त जीवों में एक ही चेतना व्याप्त है तो वह अपने आर्थिक हितों के लिए सार्वजनिक संसाधनों और सरकारी शक्ति का दुरुपयोग करने को नैतिक रूप से स्वीकार नहीं कर सकता।
लोकलाज और नैतिक जवाबदेही का लोप
भारतीय राजनीति में एक समय ऐसा था जब गंभीर सार्वजनिक विवादों के सामने आने पर मंत्री और मुख्यमंत्री नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ देते थे। इसका अर्थ यह नहीं कि उस दौर की राजनीति पूरी तरह निष्कलंक थी। भ्रष्टाचार, सत्ता का दुरुपयोग और राजनीतिक संरक्षणवाद तब भी मौजूद थे। लेकिन लोकलाज और सार्वजनिक प्रतिष्ठा का दबाव इतना जरूर था कि गंभीर आरोपों के बीच पद पर बने रहना राजनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता था।
1956 में रेल दुर्घटनाओं के बाद तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं करना चाहा, लेकिन शास्त्री अपने निर्णय पर कायम रहे। यह घटना भारतीय राजनीति में व्यक्तिगत नैतिक जिम्मेदारी का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गई।
1987 में बोफोर्स विवाद के बीच तत्कालीन रक्षा मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंत्रिमंडल छोड़ दिया। उस समय विवाद का राजनीतिक और नैतिक प्रभाव इतना व्यापक था कि सत्ता की जवाबदेही राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गई।
इन उदाहरणों से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि पुराने सभी नेता नैतिक आदर्श थे। बल्कि यह समझना चाहिए कि सार्वजनिक जीवन में नैतिक प्रतिष्ठा की एक स्वतंत्र भूमिका थी। सत्ता में बने रहने की क्षमता के साथ-साथ पद की गरिमा और लोकलाज का भी महत्व था।
आज स्थिति बदलती दिखाई देती है। राजनीतिक दल अपने नेताओं के बचाव में ऐसी आक्रामकता दिखाते हैं मानो किसी पदाधिकारी से जवाब मांगना पार्टी की प्रतिष्ठा पर हमला हो। आरोपों की जांच और नैतिक जवाबदेही की जगह राजनीतिक बचाव प्राथमिकता बन जाता है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से जुड़ा भाजपा में इस्तीफों की परंपरा नहीं होने वाला राजनीतिक कथन भी इसी मानसिकता के संदर्भ में चर्चा में आता रहा है। लेकिन लोकतंत्र में इस्तीफा कोई दंडात्मक रस्म नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही का एक माध्यम है। हर आरोप पर इस्तीफा देना जरूरी नहीं, लेकिन गंभीर और विश्वसनीय आरोपों की स्थिति में जांच पूरी होने तक पद से अलग होने की नैतिक परंपरा को भी खारिज नहीं किया जा सकता।
शासन की स्थिरता का अर्थ यह नहीं कि शासक हर परिस्थिति में पद पर बना रहे। वास्तविक स्थिरता तब आती है जब जनता को यह भरोसा हो कि शासन न्यायपूर्ण है, उसके निर्णय निष्पक्ष हैं और सत्ता में बैठे लोग अपने लिए भी वही नैतिक मानदंड स्वीकार करते हैं जो वे दूसरों पर लागू करना चाहते हैं।
इतिहास में सत्ता और नैतिकता का संबंध
भारतीय परंपरा में राजा के लिए नैतिक आचरण को हमेशा महत्वपूर्ण माना गया। राजधर्म की अवधारणा का आधार यही था कि सत्ता व्यक्तिगत सुख, ऐश्वर्य और प्रभुत्व का साधन नहीं, बल्कि प्रजा के कल्याण की जिम्मेदारी है।
महाभारत के शांति पर्व में भीष्म युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश देते हुए राजा की जिम्मेदारियों और उसके नैतिक दायित्वों पर विस्तार से चर्चा करते हैं। राजा का पहला दायित्व प्रजा की रक्षा और न्यायपूर्ण शासन है। उसका निजी सुख प्रजा के हित से ऊपर नहीं हो सकता।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी राजा के निजी हित और राज्य के हित के बीच अंतर स्पष्ट किया गया है। वहां राजा के सुख को प्रजा के सुख से जोड़ने वाला प्रसिद्ध विचार मिलता है- प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है और प्रजा के हित में ही उसका हित है। यह विचार शासन की नैतिकता का अत्यंत व्यावहारिक सूत्र है।
सम्राट अशोक का उदाहरण भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। कलिंग युद्ध में हुए व्यापक रक्तपात के बाद अशोक के शासन और व्यक्तिगत दृष्टिकोण में परिवर्तन आया। उसके शिलालेखों में प्रजा के कल्याण, धार्मिक सहिष्णुता, जीवों के प्रति दया और नैतिक आचरण पर बल मिलता है। यह परिवर्तन केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं था, बल्कि सत्ता के इस्तेमाल के प्रति दृष्टिकोण में आए बदलाव का भी उदाहरण था।
अंग्रेजी शासन के दौरान भी भारतीय सार्वजनिक जीवन में नैतिक प्रतिष्ठा और जवाबदेही की बहस समाप्त नहीं हुई। महात्मा गांधी ने राजनीति को नैतिकता से अलग मानने से इनकार किया। उनके लिए साधन और साध्य दोनों की पवित्रता जरूरी थी। वे मानते थे कि गलत साधनों से प्राप्त लक्ष्य अंततः समाज को भी दूषित करेगा।
स्वतंत्र भारत के शुरुआती दशकों में भी सार्वजनिक जीवन में नैतिक प्रतिष्ठा का महत्व बना रहा। हालांकि उन सरकारों में भी अनेक कमियां और विवाद थे, लेकिन कम से कम यह स्वीकार किया जाता था कि सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की व्यक्तिगत और राजनीतिक जवाबदेही होती है।
आज इस नैतिक चेतना को फिर से जागृत करने की जरूरत है।
नैतिकता का संकट केवल सरकार का नहीं, समाज का भी है
यह मान लेना गलत होगा कि समाज की सारी नैतिक समस्याओं के लिए केवल सरकार जिम्मेदार है। सरकार का चरित्र भी समाज से ही बनता है। जब समाज में धन, पद और प्रभाव को ही सफलता का पैमाना मान लिया जाता है तो राजनीति भी उसी मानसिकता को प्रतिबिंबित करने लगती है।
यदि किसी व्यक्ति की संपत्ति अचानक कई गुना बढ़ जाए और उसके स्रोत पर सवाल उठाने के बजाय समाज उसे सफल और प्रभावशाली मानकर सम्मानित करने लगे, तो यह सामाजिक नैतिकता का संकट है। यदि कोई व्यक्ति जातीय या धार्मिक घृणा फैलाकर राजनीतिक लाभ प्राप्त करता है और उसके समर्थक इसे धर्मरक्षा का नाम देते हैं तो यह भी नैतिक चेतना के क्षरण का उदाहरण है।
यदि किसी धार्मिक आयोजन में हजारों लोग जुटें लेकिन वहां से निकलने के बाद भी वे अपने आसपास के गरीब, वंचित और पीड़ित लोगों के प्रति संवेदनहीन बने रहें तो उस आयोजन की आध्यात्मिक सफलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
धर्म का वास्तविक प्रभाव मनुष्य के व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। वह झूठ बोलने से बचे, दूसरे का अधिकार न छीने, कमजोर का शोषण न करे, स्त्री का सम्मान करे, जाति और जन्म के आधार पर किसी को छोटा न समझे, सार्वजनिक संपत्ति को निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल न करे और अपने अधिकारों के साथ दूसरों के अधिकारों का भी सम्मान करे।
भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में दैवी संपदा के अंतर्गत अभय, सत्य, अहिंसा, अक्रोध, त्याग, शांति, दया, अलोलुपता और विनम्रता जैसे गुणों का उल्लेख है। ये गुण किसी विशेष जाति या संप्रदाय के लिए निर्धारित नहीं हैं। ये मनुष्य के चरित्र को श्रेष्ठ बनाने वाले सार्वभौमिक नैतिक मूल्य हैं।
गीता के बारहवें अध्याय में भी अद्वेष्टा, मैत्री, करुणा, अहंकार से मुक्ति और समभाव को श्रेष्ठ भक्त के लक्षणों में रखा गया है। यह धार्मिक आस्था को नैतिक आचरण से जोड़ने का स्पष्ट संदेश है।
यदि कोई व्यक्ति दिनभर धार्मिक अनुष्ठान करता है लेकिन दूसरे के प्रति घृणा और हिंसा से भरा रहता है, तो उसे अपने धार्मिक आचरण की सार्थकता पर विचार करना चाहिए।
सच्चे सनातनियों की जिम्मेदारी
आज सनातन धर्म के सामने सबसे बड़ी चुनौती बाहरी आक्रमण या किसी दूसरे मत की प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि अपने ही मूल दर्शन से दूर होते जाने की है। धर्म के नाम पर यदि मनुष्य के भीतर लोभ, घृणा, जातीय अहंकार और सत्ता की अंधभक्ति को बढ़ावा मिल रहा है तो यह सनातन की सेवा नहीं हो सकती।
सच्चे सनातनियों को वेदान्त के मूल संदेश को फिर से समाज के केंद्र में लाना होगा। धार्मिक मंचों पर केवल कर्मकांड और चमत्कारों की चर्चा नहीं, बल्कि उपनिषदों के नैतिक संदेश का भी प्रसार होना चाहिए। कथाओं में केवल राजाओं के वैभव और देवताओं की कृपा से प्राप्त संपत्ति का वर्णन नहीं, बल्कि त्याग, सत्य, करुणा, न्याय और परोपकार की प्रतिष्ठा होनी चाहिए।
धर्मगुरुओं को यह बताना होगा कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए केवल पूजा-पाठ पर्याप्त नहीं, बल्कि अपने आचरण को भी शुद्ध करना जरूरी है। किसी मनुष्य का अपमान करके, दूसरे का अधिकार छीनकर और समाज में घृणा फैलाकर कोई व्यक्ति धार्मिक श्रेष्ठता का दावा नहीं कर सकता।
राजनीति में भी वेदान्त का नैतिक संदेश प्रासंगिक हो सकता है। यदि शासक यह स्वीकार करे कि सत्ता स्थायी नहीं है, पद और प्रतिष्ठा नश्वर हैं और समस्त नागरिकों में एक ही चेतना का वास है तो शासन का चरित्र बदल सकता है। वह विरोधियों को शत्रु नहीं, लोकतांत्रिक व्यवस्था के समान अधिकार वाले सहभागी के रूप में देखेगा। वह आलोचना को अपमान नहीं, सुधार का अवसर समझेगा। वह सार्वजनिक संपत्ति को निजी लाभ का साधन नहीं बनाएगा।
यह अपेक्षा केवल किसी एक राजनीतिक दल से नहीं है। सत्ता में जो भी हो, उसके लिए नैतिकता की कसौटी समान होनी चाहिए।
वेदान्त का अर्थ संसार से भाग जाना नहीं है। उसका अर्थ संसार में रहते हुए संसार की वस्तुओं को अपनी अंतिम उपलब्धि न मानना है। व्यक्ति अपने परिवार का पालन करे, व्यापार करे, संपत्ति अर्जित करे, शासन चलाए और सामाजिक जीवन में सक्रिय रहे, लेकिन इन सबके बीच अपने विवेक और नैतिक दायित्वों को न भूले।
इसलिए वेदान्त को केवल संन्यासियों और आध्यात्मिक जिज्ञासुओं तक सीमित करना भी उसके व्यापक सामाजिक महत्व को कम करना है। वह गृहस्थ, व्यापारी, शिक्षक, अधिकारी, राजनीतिज्ञ और सामान्य नागरिक सभी के लिए नैतिक दिशा प्रदान कर सकता है।
आज जरूरत है कि सनातन धर्म के स्वयंभू ध्वजावाहक इस प्रश्न का ईमानदारी से उत्तर दें कि वे किस सनातन की रक्षा कर रहे हैं? उस सनातन की, जो मनुष्य को तृष्णा, लोभ और अहंकार से मुक्त करना चाहता है, या उस धार्मिक बाजार की, जो इन्हीं इच्छाओं को हवा देकर अपना विस्तार कर रहा है?
यदि धर्म के नाम पर धन और सत्ता की लालसा को ही प्रतिष्ठा मिलती रहेगी, यदि जातीय श्रेष्ठता और धार्मिक अहंकार को ही सनातन की पहचान बनाया जाता रहेगा, यदि शासन की अनैतिकता पर सवाल उठाने वालों को धर्मविरोधी कहा जाता रहेगा तो इससे सनातन का गौरव नहीं बढ़ेगा।
सनातन का वास्तविक गौरव उसके दर्शन में है। उस दर्शन में जो कहता है कि संसार की कोई भौतिक उपलब्धि स्थायी नहीं है, दूसरे के धन पर लोभ मत करो, सभी प्राणियों में एक ही आत्मतत्त्व को देखो और अपने भीतर के विकारों पर विजय प्राप्त करो।
इसलिए आज सबसे बड़ी धर्मरक्षा वेदान्त के इस संदेश को जन-जन तक पहुंचाना है। मंदिर बनें, धार्मिक आयोजन हों, कथाएं कही जाएं, लेकिन इन सबका अंतिम उद्देश्य मनुष्य को अधिक उदार, करुणामय, सत्यनिष्ठ और सदाचारी बनाना होना चाहिए।
जिस दिन धर्म के नाम पर जुटने वाली भीड़ अपने भीतर के लोभ, घृणा और अहंकार को कम करने लगेगी, जिस दिन धार्मिक आस्था सत्ता के सामने विवेक को गिरवी रखने के बजाय उसे नैतिकता की कसौटी पर परखने लगेगी और जिस दिन शासक अपने पद को विशेषाधिकार नहीं बल्कि लोकसेवा का दायित्व समझने लगेंगे, उसी दिन सनातन की वास्तविक प्रतिष्ठा स्थापित होगी।
धर्म की रक्षा का सबसे बड़ा प्रमाण धार्मिक नारों की गूंज नहीं, बल्कि समाज के चरित्र में आया नैतिक परिवर्तन है। और इस परिवर्तन का सबसे प्रभावी दार्शनिक आधार वेदान्त है।






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