उरई (जालौन)। जालौन के पुलिस अधीक्षक सुरेश चंद्र रावत ने हालिया तबादलों से अपने इरादों की जो झलक दिखाई है, उसने पुलिस महकमे में हलचल मचा दी है। थानों में लंबे समय से जड़ें जमाए बैठे मनमानी और कथित भ्रष्टाचार के तंत्र को तितर-बितर करने के लिए उन्होंने जिस तरह एक साथ 19 पुलिसकर्मियों को थानों से हटाकर पुलिस लाइन भेजा है, उससे उन थाना प्रभारियों और उनके इर्द-गिर्द अपनी अलग ही सत्ता चलाने वाले पुलिसकर्मियों को कड़ा संदेश गया है, जो अपने प्रभाव को अचूक तीरंदाज की तरह समझने लगे थे। एसपी ने यह दिखा दिया है कि थानों में किसकी तैनाती रहेगी और किसे हटना पड़ेगा, इसका फैसला किसी स्थानीय दबाव, जोड़तोड़ या व्यक्तिगत रसूख से नहीं, बल्कि पुलिस अधीक्षक के प्रशासनिक अधिकार से होगा।
इस कार्रवाई की खास बात यह है कि एसपी ने किसी एक थाने या एक क्षेत्र तक खुद को सीमित नहीं रखा। उरई कोतवाली से लेकर कालपी, कोंच, जालौन, माधौगढ़ और नदीगांव तक, जिले के 14 थानों में तैनात पुलिसकर्मियों को एक साथ हटाया गया है। इनमें दो उपनिरीक्षक, मुख्य आरक्षी, आरक्षी और चालक शामिल हैं। पुलिस महकमे में इस फैसले को केवल नियमित प्रशासनिक फेरबदल के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि थानों की कार्यसंस्कृति पर ऊपर से की गई एक बड़ी चोट के रूप में देखा जा रहा है।
दरअसल, थाने की ताकत केवल वर्दी और सरकारी अधिकार से नहीं बनती। उसके इर्द-गिर्द धीरे-धीरे ऐसा स्थानीय तंत्र भी विकसित हो जाता है, जिसमें कुछ पुलिसकर्मी अपने संपर्कों, प्रभाव और सुविधानुसार काम करने की शैली के कारण खुद को व्यवस्था से ऊपर समझने लगते हैं। आम नागरिक की शिकायतों को लेकर उदासीनता, फरियादियों को टरकाना और स्थानीय स्तर पर मनमानी की शिकायतें इसी प्रवृत्ति को जन्म देती हैं। ऐसे माहौल में पुलिस अधीक्षक का एक साथ इतने पुलिसकर्मियों को हटाने का फैसला महकमे को यह बताने के लिए पर्याप्त है कि थानों की चौधराहट अब पहले की तरह नहीं चलने वाली।
एसपी सुरेश चंद्र रावत के इस रुख से संभ्रांत नागरिकों और उन लोगों में नई उम्मीद जगी है, जो थानों की कार्यप्रणाली को लेकर अक्सर असंतोष जताते रहे हैं। पुलिस की वर्दी का असली सम्मान तभी है जब उसका इस्तेमाल आम आदमी को राहत देने और अपराधियों पर शिकंजा कसने में हो, न कि थाने के भीतर किसी निजी प्रभाव क्षेत्र को मजबूत करने में। इस लिहाज से यह कार्रवाई पुलिस की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक संदेश है।
तबादला सूची में उपनिरीक्षक चेतराम बुंदेला को थाना नदीगांव और उपनिरीक्षक संतोष यादव को थाना कैलिया से पुलिस लाइन भेजा गया है। उरई कोतवाली के मुख्य आरक्षी राघवेंद्र सिंह और प्रदीप सेंगर, एट के मुख्य आरक्षी बडेलाल, डकोर के आरक्षी धर्मपाल, जालौन के मुख्य आरक्षी रवि सिंह और गोहन के मुख्य आरक्षी धीरेन्द्र शिवहरे को भी पुलिस लाइन स्थानांतरित किया गया है।
इसी तरह कोंच से आरक्षी राहुल सिंह, कालपी से आरक्षी आशीष कुमार, कदौरा से आरक्षी मानस मिश्रा, आटा से आरक्षी लक्ष्मण परिहार, सिरसाकलार से आरक्षी अमित दुबे, माधौगढ़ से आरक्षी मनीष कुमार शुक्ला तथा रेंढर से आरक्षी ऋषि सिंह और अश्वनी कुमार को पुलिस लाइन भेजा गया है। इसके अतिरिक्त डकोर के आरक्षी चालक नंद किशोर, एट के आरक्षी चालक अजय कुमार पाल और कदौरा के मुख्य आरक्षी चालक मुकेश पुरोहित का भी तबादला किया गया है।
इस तरह कुल 19 पुलिसकर्मियों को थानों से हटाया गया है। इस कार्रवाई ने जिले के पुलिसकर्मियों को अपनी कार्यशैली पर पुनर्विचार करने का संकेत दिया है। एसपी के फैसले का वास्तविक असर अब इस बात से सामने आएगा कि थानों में शिकायतों का निस्तारण कितना निष्पक्ष होता है, फरियादियों को कितनी आसानी से न्याय मिलता है और स्थानीय स्तर पर मनमानी की गुंजाइश कितनी घटती है।
फिलहाल इतना जरूर है कि सुरेश चंद्र रावत ने पुलिस महकमे में यह संदेश पहुंचा दिया है कि थाने किसी की निजी जागीर नहीं हैं और वर्दी की आड़ में मनमानी करने वालों के लिए जिले की पुलिस व्यवस्था में कोई स्थायी सुरक्षित ठिकाना नहीं है।





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