राम राज क्या है > जहाँ कोई अभाव न हो लेकिन क्या यह सिर्फ यूटोपिया है या वास्तविकता में यह संभव हो सकता है | इससे जुडा दिलचस्प सवाल है कि सोवियत संघ के राष्ट्रपति स्टालिन के मन में क्या राम राज का कोई पूर्व संस्कार पैठा था क्योंकि उसने कुछ एसा ही करके दिखाया . बहरहाल यह एक मजाक है लेकिन हमारी सरकार अर्थ व्यवस्था के जिस माडल को अपनाए हुए है उसमें रद्दो बदल की जरुरत उसे महसूस करनी पड़ेगी अगर राम राज के लिए उसकी प्रतिबद्धता सच्ची है |
## 1. आज की भयावह तात्कालिक स्थिति और विकास का असली विरोधाभास
कल्पना कीजिए एक ऐसे समाज की, जहाँ देश की जीडीपी (GDP) के आंकड़े आसमान छू रहे हों, शेयर बाज़ार नए रिकॉर्ड बना रहा हो, और देश का एक कॉर्पोरेट घराना दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में शीर्ष पर पहुँच रहा हो—लेकिन ठीक उसी समय, उसी देश की 80 करोड़ से अधिक आबादी को हर महीने मुफ़्त राशन के सरकारी लिफ़ाफ़े पर निर्भर रहना पड़ रहा हो।
यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि **आज के भारत का कड़वा और तात्कालिक यथार्थ है।**
आज का आम भारतीय नागरिक जब सुबह सोकर उठता है, तो उसका सामना आंकड़ों की चमक से नहीं, बल्कि बुनियादी ज़रूरतों की भयावह महँगाई से होता है।
* **बिजली** का बिल हर महीने जेब पर भारी पड़ रहा है।
* **गैस सिलेंडर** और **राशन** रसोई का बजट बिगाड़ रहे हैं।
* **बच्चों की स्कूल फ़ीस** और **अस्पताल के बिल** किसी मध्यमवर्गीय परिवार को रातों-रात कर्ज के दलदल में धकेल रहे हैं।
* **सड़क और रेल परिवहन** से लेकर बुनियादी सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए आम आदमी को जेब से भारी-भरकम कीमत चुकानी पड़ रही है।
सवाल यह उठता है कि अगर देश तरक्की कर रहा है और जीडीपी बढ़ रही है, तो आम इंसान इतना बदहाल और असहाय क्यों होता जा रहा है? इसका सीधा उत्तर यह है कि **विकास का पैमाना और उसका स्वामित्व गलत हाथों में चला गया है।**
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## 2. स्टालिन के दौर का ऐतिहासिक संदर्भ: राज्य की संपन्नता बनाम नागरिक का कल्याण
जब भी दुनिया में आर्थिक विकास और जीडीपी वृद्धि की बात होती है, तो **स्टालिन के दौर के सोवियत संघ (USSR)** का ज़िक्र सबसे प्रासंगिक हो जाता है।
यह कोई मामूली ऐतिहासिक घटना नहीं थी। 1929 से 1930 के दशक में जब पूरा पूँजीवादी विश्व इतिहास की सबसे भयावह **’महामंदी’ (Great Depression)** की चपेट में था—अमेरिका और यूरोप के बैंक डूब रहे थे, उद्योग ठप थे और लाखों लोग सड़कों पर भूखे घूम रहे थे—तब सोवियत संघ की जीडीपी में **अभूतपूर्व और ऐतिहासिक वृद्धि** दर्ज की जा रही थी। आज तक किसी भी देश में ऐसी आर्थिक उछाल नहीं देखी गई।
### **उस दौर से आज के लिए सबसे बड़ा सबक क्या है?**
स्टालिन के दौर में जो आर्थिक वृद्धि हुई, उसका मुख्य आधार यह था कि **राज्य (State) संपन्न हो रहा था, कोई एक या दो निजी घराने नहीं।**
* **संसाधनों पर जनता का अधिकार:** खदानें, कारखाने, बिजली, परिवहन और कृषि—सब कुछ राज्य के नियंत्रण में था।
* **बुनियादी सुविधाओं की गारंटी:** क्योंकि राज्य संपन्न था, इसलिए उसने देश के **हर अंतिम व्यक्ति के लिए रोटी, कपड़ा और मकान सुलभ कराया।**
* **मुफ़्त शिक्षा और स्वास्थ्य:** शिक्षा, चिकित्सा और सार्वजनिक परिवहन पूरी तरह मुफ़्त (या नाममात्र की दरों पर) कर दिए गए। कोई भी नागरिक इस डर में नहीं जीता था कि बीमारी उसके परिवार को तबाह कर देगी या उसका बच्चा अनपढ़ रह जाएगा।
यद्यपि उस व्यवस्था में अपनी राजनीतिक कमियाँ और मानवाधिकारों की चुनौतियाँ थीं, लेकिन आर्थिक दृष्टि से उस दौर ने दुनिया को यह साबित कर दिखाया कि **जब राष्ट्रीय संसाधन राज्य और जनता के पास रहते हैं, तो संकट के दौर में भी आम आदमी को सामाजिक सुरक्षा की छत्रछाया मिलती है।**
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## 3. आज का कॉर्पोरेट मॉडल: संसाधनों पर एकाधिकार और ‘अडानी युग’ का उदय
अब ज़रा स्टालिन युग के उस मॉडल की तुलना आज की तात्कालिक स्थितियों से कीजिए।
आज हम एक ऐसे मॉडल पर चल रहे हैं जहाँ राज्य अपनी ज़िम्मेदारियों से पीछे हट रहा है और देश के सबसे आवश्यक, रणनीतिक तथा बुनियादी संसाधनों को **चुनिंदा कॉर्पोरेट घरानों को सौंपने की उग्र कवायद** की जा रही है।
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│ दो आर्थिक मॉडलों की सीधी तुलना │
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│ स्टालिन युग का मॉडल (State-Centric) │ │ आज का नव-उदारवादी मॉडल (Corporate-Centric)│
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│ • संसाधन: राज्य और जनता के पास │ │ • संसाधन: चुनिंदा निजी घरानों (e.g. अडानी) पास│
│ • बिजली, कोयला, परिवहन: मुफ़्त / सस्ते │ │ • बिजली, बंदरगाह, हवाई अड्डे: निजी एकाधिकार │
│ • परिणाम: हर व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा │ │ • परिणाम: भारी कीमत, आम जनता की मुसीबत │
│ • लक्ष्य: बुनियादी ज़रूरतों की उपलब्धता │ │ • लक्ष्य: अधिकतम कॉर्पोरेट मुनाफा और शेयर वैल्यू│
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### **बुनियादी अवसंरचना पर एकाधिकार**
देश के वे संसाधन जिन पर 140 करोड़ भारतीयों का हक होना चाहिए था—
* **बिजली और कोयला** (ऊर्जा क्षेत्र)
* **बंदरगाह (Ports)** (समुद्री व्यापार का रास्ता)
* **हवाई अड्डे (Airports)** (यातायात के प्रमुख केंद्र)
* **खदानें और लॉजिस्टिक्स**
इन सभी पर आज एक या दो बड़े उद्योगपतियों का वर्चस्व स्थापित हो चुका है। इसका सबसे प्रमुख उदाहरण **अडानी समूह (Adani Group)** की हैसियत का वैश्विक शिखर पर प्रतिष्ठित होना है। रातों-रात एक ही व्यावसायिक समूह देश के लगभग सभी प्रमुख हवाई अड्डों, सबसे बड़े बंदरगाहों, कोयला खदानों और बिजली आपूर्ति तंत्र का मालिक या संचालक बन बैठा।
### **इसका आम आदमी पर क्या असर पड़ा?**
जब बिजली, परिवहन और माल ढुलाई जैसे बुनियादी ढाँचे पर निजी एकाधिकार (Private Monopoly) हो जाता है, तो उस निजी घराने का एकमात्र उद्देश्य **’अधिकतम मुनाफ़ा कमाना’** होता है, न कि जन-कल्याण।
1. **हर चीज की भारी कीमत:** निजी कंपनियाँ बुनियादी ढाँचे में लगाए गए अपने पैसे पर मोटा मुनाफा वसूलती हैं। जब बंदरगाह और एयरपोर्ट के इस्तेमाल का शुल्क (Tariff) बढ़ता है, तो देश में आने-जाने वाले हर सामान की लागत बढ़ जाती है।
2. **महँगी बिजली:** जब कोयला और बिजली उत्पादन निजी हाथों में जाता है, तो राज्य द्वारा मिलने वाली सब्सिडी खत्म या कम हो जाती है, और आम उपभोक्ता को महंगी बिजली का झटका सहना पड़ता है।
3. **अल्प आय वाली बहुसंख्यक जनता की मुसीबत:** भारत की जिस 80-90% आबादी की आय बहुत कम है, उसके लिए अब सांस लेना भी महंगा हो गया है। जो शिक्षा, इलाज और परिवहन कभी मुफ़्त या सस्ते होने चाहिए थे, वे अब भारी कीमत चुकाने पर ही मिल रहे हैं।
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## 4. परिणाम: ‘अति-अमीरों का विकास’ बनाम ‘बहुसंख्यक जनता का शोषण’
इस नव-उदारवादी कॉर्पोरेट मॉडल ने देश के भीतर दो भारत बना दिए हैं:
1. **प्रथम भारत (1% कॉर्पोरेट जगत):** जिनके लिए नीतियाँ बनाई जा रही हैं, जिनके कॉर्पोरेट टैक्स घटाए जा रहे हैं, जिनके लाखों करोड़ रुपये के बैंक कर्ज (Bad Loans/NPA) ‘राइट-ऑफ’ (बट्टे खाते में) किए जा रहे हैं, और जिनकी संपत्ति में रोजाना हजारों करोड़ रुपये का इजाफा हो रहा है।
2. **द्वितीय भारत (99% आम जनता):** जिन्हें हर बुनियादी चीज़—चाहे वह बच्चों का स्कूल हो, सरकारी अस्पताल में दवा हो, या बस और ट्रेन का किराया हो—के लिए अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा लुटाना पड़ रहा है।
जब आप देश की संपत्ति और रणनीतिक संसाधनों को किसी एक या दो उद्योगपतियों के हाथों में सौंप देते हैं, तो बाज़ार में **’स्वस्थ प्रतिस्पर्धा’ (Free Competition) समाप्त हो जाती है।** फिर उपभोक्ता के पास कोई विकल्प नहीं बचता। उसे वही कीमत चुकानी पड़ती है जो वह कॉर्पोरेट तय करता है।
यही वजह है कि आज जीडीपी के आंकड़े तो चमक रहे हैं, लेकिन बहुसंख्यक अल्प-आय वर्ग की थाली से दाल-सब्जी गायब हो रही है और उनका जीवन रोजमर्रा के अस्तित्व की लड़ाई बनकर रह गया है।
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## 5. भविष्य का रास्ता क्या हो?
ऐतिहासिक सोवियत मॉडल और आज के भारतीय कॉर्पोरेट मॉडल की तुलना हमें एक बहुत बड़ा सबक सिखाती है:
> **”जिस देश का राज्य अपने बुनियादी संसाधनों को निजी एकाधिकार में सौंपकर केवल कॉर्पोरेट को धनवान बनाने में लग जाता है, वहाँ जीडीपी चाहे कितनी भी बढ़ जाए, आम जनता केवल मुसीबत और अभाव ही भुगतती है।”**
यदि हमें भारत को सचमुच एक महान और न्यायपूर्ण राष्ट्र बनाना है, तो हमें इस कॉर्पोरेट-परस्त आर्थिक दर्शन को बदलना होगा।
* **बुनियादी संसाधनों पर लोक-नियंत्रण:** बिजली, जल, कोयला, स्वास्थ्य, शिक्षा और सार्वजनिक परिवहन जैसे क्षेत्रों को मुनाफाखोरी का साधन नहीं बनने दिया जा सकता। इन पर या तो राज्य का कड़ा नियंत्रण होना चाहिए या फिर आम जनता के लिए सस्ती दरों पर इनकी उपलब्धता की संवैधानिक गारंटी होनी चाहिए।
* **एकाधिकार (Monopoly) पर रोक:** किसी भी एक या दो औद्योगिक घरानों को देश के सभी रणनीतिक संपत्तियों (ports, airports, power) को सौंपने की नीति पर तुरंत लगाम लगानी होगी।
* **जीडीपी का नया मापदंड:** देश की सफलता का मापदंड यह नहीं होना चाहिए कि अडानी या अंबानी की वैश्विक रैंकिंग क्या है, बल्कि यह होना चाहिए कि भारत के सबसे गरीब व्यक्ति को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, मुफ़्त इलाज, और सम्मानजनक जीवन किस कीमत पर मिल रहा है।
समय आ गया है कि हम जीडीपी और कॉर्पोरेट विकास के इस मायाजाल से बाहर निकलें और अर्थशास्त्र के केंद्र में फिर से **’इंसान और उसकी बुनियादी ज़रूरतों’** को स्थापित करें। क्योंकि अंततः, अर्थव्यवस्था इंसान की सेवा के लिए बनी है, इंसान कॉर्पोरेट का मुनाफा बढ़ाने के लिए पैदा नहीं हुआ है।







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