अगस्त 2026 के मध्य में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल सिंह यादव ने रामपुर जिला जेल में बंद आजम खान से मुलाकात के बाद जो बयान दिया, उसने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर हलचल मचा दी। शिवपाल ने साफ कहा कि 2027 में अगर सपा की सरकार बनती है तो अखिलेश यादव मुख्यमंत्री होंगे और आजम खान गृह मंत्री बनाए जाएंगे। यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक वादे से कहीं ज्यादा है। यह सपा की पुरानी रणनीति, आंतरिक शक्ति संतुलन और आगामी विधानसभा चुनाव की संभावनाओं पर गहरा सवाल खड़ा करता है।
### शिवपाल-आजम रिश्ते का खट्टा-मीठा इतिहास
शिवपाल सिंह यादव और आजम खान के रिश्ते कभी पूरी तरह गरम नहीं रहे और न ही कभी पूरी तरह ठंडे पड़े। दोनों मुलायम सिंह यादव के करीबी रहे। मुलायम काल में आजम खान को पार्टी का प्रमुख मुस्लिम चेहरा बनाया गया। उनकी आक्रामक और ध्रुवीकरण वाली शैली मुलायम के लिए उपयोगी साबित हुई। मुलायम ने आजम की विवादास्पद छवि को राजनीतिक पूंजी के रूप में इस्तेमाल किया।
एक पुराना लेकिन महत्वपूर्ण प्रसंग याद रखने लायक है। जब सोनिया गांधी ने सलमान खुर्शीद को उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया, तो मुलायम को लगा कि कांग्रेस मुस्लिम वोटबैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है। मुलायम पक्ष से सलमान की ईसाई पत्नी को लेकर मुद्दा बनाने की कोशिश हुई। जवाब में कांग्रेस ने तंज कसा कि अगर मुलायम मुसलमानों के इतने बड़े हिमायती हैं तो विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद शिवपाल को देने के बजाय आजम खान को क्यों नहीं सौंपते। इस टिप्पणी के बाद मुलायम और शिवपाल आजम को लेकर और अधिक चौकन्ने हो गए। उनका प्रयास रहा कि आजम को नियंत्रित और अपेक्षाकृत लो-प्रोफाइल रखा जाए।
2012 में अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने के समय भी आजम और शिवपाल दोनों की शुरू में कुछ आपत्ति थी, लेकिन मुलायम के दबाव में दोनों ने समर्थन दे दिया। 2016-17 के परिवारिक संकट में आजम ज्यादातर अखिलेश के पक्ष में नजर आए या मध्यस्थ बने। शिवपाल के साथ उनके रिश्ते खराब नहीं हुए, लेकिन उन्होंने अखिलेश का साथ दिया। बाद के वर्षों में जब शिवपाल अलग पार्टी बनाकर चले गए, तब भी आजम सपा में ही रहे। 2022 में जेल से निकलते समय शिवपाल उनका स्वागत करने पहुंचे थे। अब 2026 में शिवपाल का गृह मंत्री वाला ऐलान पुरानी नजदीकी और नई राजनीतिक जरूरत दोनों का मिश्रण लगता है।
### आजम खान की विवादास्पद छवि और मुलायम की रणनीति
आजम खान की छवि हमेशा विवादास्पद रही। एक समय उन्होंने ऐसा बयान दिया जिसे भारत माता को “डायन” कहने के रूप में लिया गया। भाजपा परस्त अखबारों ने इसे खूब उछाला। आजम ने कोई स्पष्ट सफाई नहीं दी। उनके कई भाषणों की कैसेट “माहौल बिगाड़ने वाली” बताकर विवादों में रहीं। अदालतों में भड़काऊ भाषण के मामले चले।
मुलायम सिंह यादव की नजर में यही विवादास्पद छवि आजम का गुण बन गई। मुलायम ने समझा कि आजम की आक्रामक बयानबाजी मुस्लिम वोटबैंक को एकजुट रखने और हिंदू वोटों को ध्रुवीकृत करने में सहायक है। आजम हिंदुओं को आहत करने वाली बयानबाजी करते रहे और मुलायम ने इसे अपनी राजनीतिक सेहत के लिए उपयोगी मानते हुए उनका कद ऊंचा किया।
सबसे गंभीर आरोप मुजफ्फरनगर दंगों (2013) से जुड़ा है। कवाल की घटना के बाद तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट और एसएसपी ने स्थिति संभालने की कोशिश की, लेकिन दबाव में उनका तबादला कर दिया गया। आरोप है कि क्षेत्र के प्रभारी मंत्री आजम खान के दबाव में यह तबादला हुआ। इसके बाद दंगे तीव्र हुए। आजम पर हिंदू पक्ष के खिलाफ एकतरफा कार्रवाई कराने का आरोप लगा। उन्होंने इनकार किया, लेकिन राजनीतिक नुकसान सपा को ही उठाना पड़ा। 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा की दुर्दशा में मुजफ्फरनगर दंगों के बाद हुए हिंदू ध्रुवीकरण का बड़ा योगदान माना जाता है।
### अखिलेश यादव का नियंत्रण और शिवपाल की सीमा
अखिलेश यादव ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत की लड़ाई में रामगोपाल यादव का बेलाग साथ पाया। लेकिन टिकट वितरण से लेकर महत्वपूर्ण फैसलों में रामगोपाल तक के दखल को अखिलेश ने सीमित रखा है। शिवपाल की तो बात ही क्या। अखिलेश पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत रखते आए हैं। ऐसे में शिवपाल का आजम खान को गृह मंत्री बनाने वाला बयान अखिलेश की पूर्व सहमति से दिया गया हो, यह स्वीकार करना मुश्किल है।
यह बयान अदूरदर्शी लगता है। यह हिंदुओं को फिर उत्तेजित कर सकता है। 2013 के बाद सपा ने जिस मुश्किल से हिंदू वोटों का कुछ हिस्सा वापस पाने की कोशिश की, उस प्रयास को यह बयान नुकसान पहुंचा सकता है। 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा की उज्ज्वल संभावनाओं को यह मटियामेट भी कर सकता है। भाजपा इसे आसानी से “सपा फिर वही पुरानी राजनीति पर लौट रही है” का मुद्दा बना सकती है। योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य जैसी प्रतिक्रियाएं पहले ही आ चुकी हैं।
### राजनीतिक जोखिम और डैमेज कंट्रोल की जरूरत
शिवपाल का बयान रामपुर और आसपास के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सपा के समर्थन को मजबूत करने की कोशिश लगती है। आजम खान अभी भी रामपुर की राजनीति में प्रभाव रखते हैं। लेकिन पूरे प्रदेश के स्तर पर यह बयान नुकसानदायक साबित हो सकता है। सपा को अगर 2027 में सरकार बनानी है तो उसे व्यापक गठबंधन और हिंदू-मुस्लिम दोनों वर्गों का भरोसा चाहिए। आजम खान को गृह मंत्री बनाने का ऐलान उस भरोसे को चोट पहुंचा सकता है।
अखिलेश यादव अब डैमेज कंट्रोल की स्थिति में हैं। वे या तो शिवपाल के बयान से दूरी बना सकते हैं, या इसे पार्टी की आंतरिक चर्चा बताकर नरम कर सकते हैं, या फिर चुप रहकर इंतजार कर सकते हैं कि विवाद शांत हो जाए। लेकिन चुप्पी भी महंगी पड़ सकती है। भाजपा इसे “सपा की असली सोच” बताकर प्रचार करेगी।
सपा के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी पुरानी ध्रुवीकरण वाली छवि से कितनी दूर निकल पाती है। मुलायम काल में आजम खान की विवादास्पद भूमिका पार्टी के लिए फायदेमंद मानी गई, लेकिन 2017 ने दिखा दिया कि इसकी कीमत भी बहुत भारी हो सकती है। शिवपाल का ताजा बयान उसी पुरानी राह पर लौटने का संकेत देता है। अखिलेश यादव अगर समय रहते इस नुकसान को नियंत्रित नहीं करते, तो 2027 का चुनाव उनके लिए पहले से कहीं अधिक कठिन हो सकता है।
यह बयान सिर्फ शिवपाल और आजम खान के रिश्ते की कहानी नहीं है। यह सपा की भविष्य की रणनीति, अखिलेश के नेतृत्व और उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीतिक जमीन का आईना है। देखना होगा कि अखिलेश इस आईने में अपनी छवि कितनी साफ रख पाते हैं।







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