उरई। सोमवार को जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए हुए चुनाव के नतीजे से सपा के स्थानीय मठाधीशों की फजीहत की बात तो अब गौण हो गई है। चर्चें इस बात के है कि इस चुनाव परिणाम से खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की किरकिरी हुई है। चुनाव अभियान के अंतिम चरण में मुख्यमंत्री सीधे इसमें इनवाॅल्व हो गये थे। इसके बावजूद यह सीट पार्टी नही बचा सकी जबकि कुछ ही महीने पहले जब जिला पंचायत अध्यक्ष का आम चुनाव हुआ था तो सपा अपने प्रत्याशी को निर्विरोध निर्वाचित कराने में कामयाब रही थी।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जब खुद चुनाव जिताने के लिए जिले के लोगों से बात की तो यह माना गया था कि अब बात उनकी प्रतिष्ठा की हो गई है। जिससे रूठे भी सारे गिले-शिकवे भुलाकर पार्टी प्रत्याशी को जितवाने के लिए जुट जायेंगे। लेकिन असंतुष्टों ने बेखौफ बगावत जारी रखकर उन्हें नीचा देखने को मजबूर कर दिया। व्यक्तिगत् रूप से यह अखिलेश यादव के लिए बेहद अप्रिय संदेश है। जिससे लोगों में यह मैसेज गया है कि पार्टी में उनकी पकड़ अपने पिता की तरह मजबूत नही है। इस चुनाव परिणाम के माध्यम् से अखिलेश यादव को कमजोर नेता साबित करके क्षेत्रीय क्षत्रपों ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि दूसरे असंतुष्ट भी चुनावी बेला में खुली बगावत की हिम्मत जुटा सकते हैं जो सपा के लिए बहुत बुरा शकुन है।
चूंकि यह जिला पंचायत अध्यक्ष का प्रदेश में इकलौता उपचुनाव था जिसकी वजह से सारे प्रदेश की निगाह इसके परिणाम पर टिकी हुई थीं। इसी बीच जब भाजपा ने निर्दल प्रत्याशी सुमन निरंजन को खुले तौर पर अपनाने की घोषणा कर दी तो प्रदेश में सपा की मुख्य प्रतिद्वंदी के रूप में उभरने के लिए हर तीन-तिकड़म पर उतारू भाजपा का मनोबल किसी भी तरह न बढ़ने देने की खातिर अपने प्रत्याशी की इस चुनाव में सफलता मुख्यमंत्री के लिए और अहम हो गई थी। फिर भी इस चुनाव में सपा की इज्जत नही बचाई जा सकी। यह मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के लिए करारा झटका है।






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