
पैराडाइज पेपर्स खुलासे ने देश में फिर भूचाल की स्थिति पैदा कर दी है। इस खुलासे में 714 भारतीयों या भारतीय कंपनियों के नाम सामने आये हैं जो टैक्स हैवन देशों में पैसा जमा किये हुए थे। सफाई कुछ दी जाये लेकिन यह कहने की जरूरत नही है कि यह दो नंबर का पैसा है। इसके पहले पनामा पेपर्स लीक में भी 426 भारतीयों के नाम सामने आये थे। पनामा पेपर्स लीक की जांच मल्टी एजेंसी ग्रुप को सौपी गई थी। इसी ग्रुप को पैराडाइज पेपर्स खुलासे की जांच सौंपी गई है। इस समूह के गठित हो जाने से पनामा पेपर्स लीक से उठे बबंडर का गुबार दब गया था लेकिन कोई सार्थक कार्रवाई नही हुई थी। ऐसे में पैराडाइज पेपर्स का खुलासा सरकार की दुर्गति कर सकता था। इसलिए अब जानकारी दी गई है कि पनामा पेपर्स की जांच में मल्टी एजेंसी ग्रुप ने 147 मामले कार्रवाई के योग्य पाये हैं जिसमें 792 करोड़ रुपये की अघोषित संपति का पता चला है। जाहिर है कि काला धन को बाहर निकालने के लिए दहाड़ने वाली सरकार ने केंद्र में साढ़े तीन वर्ष पूरे कर लिए हैं लेकिन आज तक एक भी मामले में इसके द्वारा दृश्यमान कार्रवाई नही हुई है। यहां तक कि पनामा पेपर्स लीक में जिन सेलिब्रिटीज के नाम सामने आये हैं उनसे परहेज करने की बजाय सरकार ने इस बीच उनको और ज्यादा महिमा मंडित किया है। जांच और कार्रवाई की इस कछुआ चाला को देखते हुए अंदाजा यह है कि सरकार को कार्रवाई का मौका देने के लिए अभी कई और कार्यकाल देने पड़ेगे। तब तक अभी जिस पीढ़ी के सामने खुलासे हुए हैं वह मर-खप चुकी होगी और आने वाली पीढ़ी के ध्यान में यह बात नही रहेगी कि ऐसी कोई जांच शुरू हुई थी।

बिडंबना इस बात की है कि यह मुखवीर सरकार भ्रष्ट और काला धन अर्जित करने वालों के खिलाफ कुछ कर तो नही पा रही लेकिन करते दिख भी नही रही है। सरकार ने इस नाम पर अभी तक जितने कदम उठाये हैं उनमें व्यवस्था सुधार की भावना कही नही है, उनके पीछे सिर्फ राजनैतिक मकसद रहा है। नोट बंदी हुई तो उत्तर प्रदेश में केवल उन पार्टियों की तात्कालिक मुसीबत हो गई जो चुनावी दंगल में भाजपा को मुख्य रूप से चुनौती देने वाले थे और उनका इसके चलते चुनाव में राम नाम सत्य हो गया। लालू यादव और चिदंबरम के बेटे पर तो शिकंजा कसा गया लेकिन विभीषण अवतार मुलायम सिंह के मामले में न तो स्वयं उनके और न ही उनके किसी आदमी के खिलाफ कोई कार्रवाई होती दिख रही है। जबकि मुलायम सिंह ने अपने राज में जिलों-जिलों में चप्पल चटकाने वाले कई लोगों को अरब-खरब पति तक बनवा दिया। बिना कुछ किये और छूछी विरासत के बावजूद इतनी संपदा अर्जित करने वालों को पकड़ने की भी शक्ति क्या हमारे कानून में नही है तो इस कानून को बदलिये न।

सच्चाई तो यह है कि सरकार का भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई के मामले में रवैया पूरी तरह चूजी या सलेक्टिव है। इसलिए कार्यसेवकों पर गोली चलवाने जैसे भाजपा के लिए अक्षम्य अपराध से जुड़े होने के बावजूद व्यक्तिगत रूप से मोदी से लेकर पूरी भाजपा में मुलायम सिंह के प्रति जो श्रद्धा और भक्ति का भाव दिखाई देता है वह अनोखा है। मोदी ने यह मुलायम सिंह के परिवार के विवाह कार्यक्रम में कृतज्ञ भाव से पहुंच कर दिखा दिया था। मुलायम सिंह ने गैरकानूनी तरीके से जिस लाखों रुपये की सरकारी गाड़ी पर कब्जा कर रखा है उसे वापस मंगाने से संबंधित फाइल यूपी के सीएम योगी ने यह कहकर लौटा दी कि नेताजी से गाड़ी मांगने की जरूरत नही है। उन्होंने इसे लेकर जो कहा उससे यह आभास होता है कि उनकी निगाह में मुलायम सिंह सबसे बड़े महापुरुष हैं।

सही बात यह है कि लोगों को काम करने के बदले पैसा लेने का रिवाज सरकारी तंत्र में पहले से कई गुना बढ़ गया है। अधिकारी साल भर में 70-80 करोड़ रुपये तक कमा रहे हैं और उसे सफेद बनाने के लिए उल्टा-सीधा निवेश भी कर रहे हैं। अगर भ्रष्टाचार व रिश्वतखोरी की जांच करने वाली एजेंसियां जरा भी सक्रिय होती तो अधिकारी इतना पैसा जमा करने से डरते। फिर भी सरकार धोखा देना चाहती है कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ काम कर रही है। वह अमूर्त टाइप की आंकड़ेबाजी करके लोगों को इस भुलावे में रखना चाहती है कि इतनी कंपनियों और लोगों के खिलाफ उसने जांच शुरू करा दी है जो उसकी भ्रष्टाचार विरोधी प्रतिबद्धता का प्रमाण है। जबकि सत्य यह है कि वह रुटीन की कार्रवाइयों का संकलन पेश कर रही है। वैसे ही जैसे कोई एसपी बेहद भ्रष्ट हो जिसके जिले में क्राइम बहुत बढ़ गया हो और इसकी आलोचना को झुठलाने के लिए वह कहने लगे कि उसने इतने मुकदमों में एक साल में चार्जशीट भिजवाई है। थाने खुले है तो चार्जशीट तो जायेगीं हीं। लेकिन सिद्धांत यह है कि न्याय न केवल होना चाहिए बल्कि दिखना भी चाहिए कि न्याय हो रहा है। इतनी भ्रष्ट व्यवस्था के रहते हुए सुशासन का कोई दावा ढकोसला ही कहा जायेगा।







Leave a comment