विश्व हिदू परिषद के कार्यकारी अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. प्रवीण तोगड़िया के राजस्थान पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के प्रयास के बाद अचेत होकर उनके अस्पताल पहुंच जाने के सनसनीखेज मामले ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कई कड़वी यादों को ताजा कर दिया है। इनमें भाजपा को सिफर से शिखर तक ले जाने वाले पार्टी के पितामह लालकृष्ण आडवाणी को हाशिए से न उबरने देने के लिए दलित राष्ट्रपति के नाम की पेशबंदी, इसके पहले गुजरात में तैनात किये गये संघ के एक प्रमुख स्तंभ संजय जोशी का हश्र और उनके चरित्र हनन तक की साजिश, साथ-साथ में नरेंद्र मोदी के विरोधी गुजरात के पूर्व गृहमंत्री हरेन पंडया की संदिग्ध मौत मुख्य हैं। इन प्रकरणों के तारतम्य में प्रवीण तोगड़िया की ताजा मुसीबत की कड़ी से नरेंद्र मोदी की जो छवि उभर रही है वह इंदिरा गांधी के चेहरे से कम निर्मम नही है।
एक समय था जब नरेंद्र मोदी और प्रवीण तोगड़िया में दांत काटे की दोस्ती थी। 1980 के दशक में मोदी और तोगड़िया दोनों अहमदाबाद के काकेंरिया विस्तार में संघ की शाखा में एक साथ जाते थे। यह दोस्ती और परवान चढ़ी तो दोनों ही गुजरात की महत्वपूर्ण शख्सियत बन गये। प्रवीण तोगड़िया को गुजरात में विश्व हिंदू परिषद के प्रमुख की हैसियत मिल गई तो नरेंद्र मोदी प्रदेश के शक्तिशाली संगठन नेता में सुमार हो गये। 1998 में केशूभाई पटेल की सरकार के समय गुजरात में सरकार में प्रत्यक्ष रूप से न होते हुए भी पूरी तरह से मोदी और तोगड़िया की ही तूती बोल रही थी। तोगड़िया को जैड प्लस सुरक्षा मिल गई थी। अहमदाबाद में उनके सोला इलाके में स्थित बंगले में लाल बत्तियां लगी गाड़ियों की कतारें लगी रहती थीं। उनके साथ मुख्यमंत्री की ही तरह पुलिस की चार-पांच गाड़ियां एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड की गाड़ी चलती थी। इसी बीच 2002 में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बन गये। इस दौरान राज्य में जो भीषण दंगे हुए उनमें प्रवीण तोगड़िया की भूमिका को अहम बताया गया। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने मोदी को राज धर्म याद दिलाकर उनके लिए सांसत पैदा कर दी और बमुश्किल लालकृष्ण आडवाणी के सहयोग से उनकी कुर्सी बच पाई तो मोदी सख्त हो गये। उन्होंने तोगड़िया के कई सहयोगियों पर कार्रवाई की और यहां से दोनों के संबंधों में बिगाड़ शुरू हो गया। 2008 में जब मोदी सरकार ने गुजरात में अनधिकृत मंदिरों को गिरवाने का अभियान छेड़ा तो उनके बीच तल्खी चरमसीमा पर पहुंच गई जिसमें तोगड़िया का सारा रुतबा और शक्तियां छीन लिये गये।
तोगड़िया अपनी फायर ब्रांड इमेज के चलते अतिवादियों में कितनी भी लोकप्रियता बढ़ाते गये हों लेकिन वे संगठन तक ही सीमित रह गये जबकि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनकर राष्ट्रीय राजनीति की कुंजी हथिया ली। इससे तोगड़िया की टीस और गहरा जाना स्वाभाविक था। हाल ही में तोगड़िया की एक किताब केसरिया प्रतिबिंब: चेहरे और मुखौटे प्रकाशित हुई। जिसके बाद मोदी को वे भस्मासुर नजर आने लगे। उन्होंने किताब में लिखा कि कानून बनाकर राममंदिर बनाने की बजाय सरकार इस मामले में खिलवाड़ कर रही है। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी एक भी बार अयोध्या नही गये। सियासत ने राममंदिर के मुददे पर हिंदुओं को ठग लिया है।
इसके बाद प्रधानमंत्री ने कही न कही विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से तोगड़िया की छुटटी कराने का तानाबाना बुनना शुरू कर दिया। हालांकि इस मामले में संघ धर्म संकट में रहा। एक ओर मोदी के सर्वसत्ता बाद को नियंत्रित करने की जरूरत संघ को महसूस हो रही है। जिसके लिए संघ प्रमुख ने गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले डा. मुरली मनोहर जोशी से मशविरा किया था। दूसरी ओर हिन्दुत्व के एजेंडे की तमाम बातें मोदी के रहते हुए जिस तरह पूरी हो रही हैं उससे संघ उनको कमजोर भी नही करना चाह रहा। मोदी भी इस मामले में तत्परता दिखा रहे हैं। तीन तलाक के खिलाफ कानून, हज सब्सिडी समाप्त करने के ताजा फैसले, मदरसों को सरकारी नियंत्रण से बांधने और उत्तर प्रदेश में पूजा स्थलों पर ध्वनि विस्तारक यंत्रों के बिना अनुमति प्रयोग को रोकने के बहाने मुसलमानों को दबाव में लेने सहित कई कदम हैं। जिनसे संघ अपनी मुराद पूरी होने का अनुभव कर रहा है। इस दौर में न्यायपालिका भी जाने-अनजाने में सरकारी एजेंडे की पूर्ति में सहयोग की भूमिका अदा कर रही है जिसे संघ अनायास नही मानता बल्कि इसमें प्रधानमंत्री मोदी का योजनाबद्ध प्रयास उसे नजर आता है।
इस बीच गुजरात में भाजपा की वापसी के बाद मोदी की स्थिति और मजबूत हुई है। इसलिए वे संघ में अपने मुताबिक परिवर्तन के लिए दबाव बढ़ाने में सक्षम हो गये हैं। इसी उठापटक के बीच श्रीगंगानगर में कफ्र्यू और निषेधाज्ञा के उल्लंघन के 16 वर्ष पूर्व कायम हुए मुकदमे के वारंट को लेकर राजस्थान की पुलिस का दस्ता गत दिनों अहमदाबाद में विश्व हिंदू परिषद के कार्यालय में पहुंच गया। गुजरात में भी तोगड़िया का एक पुराना मामला उखड़ गया। इसके पहले खुद तोगड़िया बता रहे हैं कि उनकी हिंदू हेल्प लाइन और हेल्थ लाइन से जुड़े कार्यकर्ताओं से आईबी के अधिकारी पिछले कुछ समय से पूंछतांछ कर रहे थे। इसलिए राजस्थान पुलिस के पहुंचने के बाद अपने खिलाफ किसी गहरी साजिश की आशंका का अंदेशा होने के कारण तोगड़िया विश्व हिंदू परिषद के कार्यालय से निकलकर एक टूसीटर से भाग निकले।
दूसरी ओर उनके गायब हो जाने की अफवाह फैल गई जिससे देश भर में चर्चाओं का भूचाल आ गया। अगले दिन वे एक अस्पताल में पाये गये। उनका कहना है कि टूसीटर से निकलने के बाद उन्होंने राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और गृहमंत्री गुलाब चंद्र कटारिया से बात की थी। दोनों ने उनके खिलाफ राज्य की पुलिस के रवाना होने की जानकारी से इंकार किया था। इसके बाद उन्होंने अपने वकील से संबंधित मामले में जमानत के लिए बात की तो वकीलों ने यह संभव होने से इंकार कर दिया। नतीजतन वे खुद अदालत में सरेंडर करने के लिए जब एअरपोर्ट जा रहे थे तभी बेहोश हो गये और बाद में उन्होंने अपने को एक अस्पताल में पाया। हालांकि गुजरात पुलिस ने इसके बाद यह कहते हुए उनकी किरकिरी कर डाली कि वे उसे मिले तब बेहोश नही थे। निश्चित रूप से तोगड़िया ताजा घटनाक्रम से बेहद भयभीत हैं और उन्होंने अपने एनकांटर तक की आशंका व्यक्त कर डाली है, भले ही इसमें अतिश्योक्ति हो। दूसरी ओर यह भी जानकारी में आ रहा है कि जिस मामले में श्रीगंगानगर की अदालत से उनके खिलाफ वारंट जारी हुआ है राजस्थान सरकार उसे तीन साल पहले ही वापस ले चुकी है। लेकिन इसके कागज अदालत तक नही पहुंचाये गये थे आखिर क्यो ? इसके पीछे कोई लापरवाही है या साजिश! यह पता करना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश सरकार राजनैतिक कार्यकर्ताओं पर चल रहे मुकदमें थोक में वापस लेने का एलान कर चुकी है। तोगड़िया जैसी हस्ती के खिलाफ राजस्थान और गुजरात में मुकदमें वापस लेने में क्यों ढील बरती गई यह भी एक सवाल है।
बात चाहे अटलजी के दौर की हो या मोदी के दौर की। अपने खरे स्वयं सेवकों को दिग्गजों के कोप से बचाने में संघ क्यों सक्षम नही हो पाता। यह भी सवाल उठेगा और इससे संघ की साख उस पर आस्था रखने वालों में भी डिगेगी। आखिर गोविंदाचार्य में क्या कमी थी। उन्होंने त्याग या प्रतिबद्धता के मामले में कौन सा विचलन किया था। जिसकी वजह से अटलजी द्वारा उनको बलि का बकरा बनाये जाते संघ मूक दर्शक बना देखता रहा। प्रवीण तोगड़िया धर्म निरपेक्ष और प्रगतिशील तत्वों के लिए वर्ग शत्रु हो सकते हैं पर उनके काम संघ के सबसे ज्यादा दुलारे बनने के उपयुक्त हैं। फिर भी संघ न केवल उनके बचाव में असहाय है बल्कि मोदी को खुश करने के लिए लालकृष्ण आडवाणी आदि की तरह उन्हें भी हाशिए पर धकेलन की स्वीकृति प्रदान करने को अपने को मजबूर पा रहा है। तो संघ संस्कृति में व्यक्ति महत्वपूर्ण है या संघ।

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