धर्मपाल की ‘ब्यूटीफुल ट्री’ के आंकड़ों से अतीत को बराबरी का स्वर्णयुग साबित करने की कोशिश पर कुछ असहज सवाल

भारत में समानता की बहस जितनी वर्तमान की ओर बढ़ती है, उतनी ही बार उसे अतीत की ओर मोड़ देने की कोशिश होती है। आज जब दलित, पिछड़े और दूसरे वंचित समुदाय शिक्षा, प्रतिनिधित्व, रोजगार, संपत्ति, सम्मान और अवसरों में बराबरी की मांग करते हैं तो जवाब वर्तमान से नहीं, अतीत से आने लगता है—कहा जाता है कि अंग्रेजों के आने से पहले तो भारत में गांव-गांव पाठशालाएं थीं, सभी जातियों के बच्चे पढ़ते थे, दलित-पिछड़ों की संख्या तो कई जगह सवर्णों से भी ज्यादा थी और शिक्षक भी अलग-अलग जातियों के होते थे। इस दावे के समर्थन में धर्मपाल की चर्चित पुस्तक The Beautiful Tree सामने रख दी जाती है।

धर्मपाल ने जो काम किया, उसका अपना महत्व है। उन्होंने औपनिवेशिक शासन के आरंभिक वर्षों में ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा किए गए शिक्षा संबंधी सर्वेक्षणों को सामने लाकर यह दिखाया कि अंग्रेजों के भारत में आने से पहले और उनके शासन के शुरुआती दौर में देशी शिक्षा संस्थाओं का एक व्यापक नेटवर्क मौजूद था। मद्रास प्रेसीडेंसी के सर्वेक्षणों और विलियम एडम की बंगाल-बिहार संबंधी रिपोर्टों में अनेक स्थानीय पाठशालाओं, विद्यार्थियों और शिक्षकों का विवरण मिलता है। इन आंकड़ों में केवल ब्राह्मण विद्यार्थी नहीं थे। अनेक शूद्र और अन्य जातियों के विद्यार्थी भी थे। कुछ जगह गैर-ब्राह्मण जातियों के शिक्षक भी दिखाई देते हैं। इतना तथ्य स्वीकार करने में किसी को संकोच नहीं होना चाहिए।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब इस तथ्य से एक बहुत बड़ा निष्कर्ष निकाल लिया जाता है—कि इसलिए भारत की पुरानी शिक्षा व्यवस्था सामाजिक रूप से समानतामूलक थी, जाति शिक्षा में बाधा नहीं थी और अंग्रेजों ने आकर किसी स्वर्णिम शिक्षा व्यवस्था को नष्ट कर दिया।

सवाल यह है कि क्या पाठशाला में प्रवेश मिल जाना सामाजिक बराबरी का प्रमाण है?

अगर किसी समाज में किसी जाति के बच्चे को पढ़ना-लिखना और हिसाब-किताब सीखने की अनुमति है, लेकिन उसी समाज में उसके लिए उच्च शिक्षा के दरवाजे सीमित हैं, कुछ ज्ञान परंपराओं तक उसकी पहुंच निषिद्ध है, प्रशासनिक पदों पर उसकी मौजूदगी नगण्य है, सामाजिक प्रतिष्ठा जन्म से तय होती है और सार्वजनिक जीवन में छुआछूत कायम है, तो क्या केवल पाठशाला में उसकी मौजूदगी से उस समाज को समानतामूलक कह दिया जाएगा?

यही वह सवाल है जिसे धर्मपाल की पुस्तक के आसपास चल रही बहस में अक्सर दबा दिया जाता है।

धर्मपाल के सर्वेक्षणों में विद्यार्थियों की जाति दर्ज है। लेकिन किसी विद्यार्थी की जाति दर्ज हो जाने से यह पता नहीं चलता कि वह किस गुणवत्ता की शिक्षा पा रहा था, कितने वर्षों तक पढ़ता था, पाठशाला के बाद उसकी शिक्षा कहां तक जाती थी, उसे उच्च शिक्षा में प्रवेश मिलता था या नहीं, पढ़ाई के बाद उसे कौन-से पेशे उपलब्ध थे और समाज में उसकी शिक्षा का मूल्य कितना था। आंकड़े यह बता सकते हैं कि किसी स्कूल में कितने बच्चे थे; वे अपने आप यह नहीं बता देते कि उन बच्चों के लिए समाज की सारी सीढ़ियां खुली थीं।

यही वह अंतर है जिसे जानबूझकर या अनजाने में मिटा दिया जाता है।

एक किसान का बेटा यदि स्थानीय पाठशाला में गणना सीख गया तो यह उसके लिए उपयोगी था। एक कारीगर के बच्चे को माप-तौल और हिसाब आ गया तो उसका पेशा बेहतर चल सकता था। मजदूरी करने वाले व्यक्ति को पढ़ना-लिखना आ गया तो वह लेन-देन में कम ठगा जा सकता था। स्थानीय बाजार और गांव की अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए ऐसी शिक्षा की जरूरत थी। इसलिए यह बिल्कुल संभव है कि पारंपरिक समाज में व्यावहारिक शिक्षा अपेक्षाकृत व्यापक रही हो।

लेकिन व्यावहारिक शिक्षा और सामाजिक मुक्ति एक चीज नहीं हैं।

किसी व्यक्ति को अपने पारंपरिक पेशे को अधिक दक्षता से करने के लिए शिक्षित करना और उसे यह अवसर देना कि वह अपनी जाति के पारंपरिक पेशे से बाहर निकलकर किसी भी क्षेत्र में जा सके—इन दोनों के बीच जमीन-आसमान का अंतर है। यदि शिक्षा आपको व्यवस्था के भीतर बेहतर काम करने लायक बनाती है लेकिन व्यवस्था से बाहर निकलने की अनुमति नहीं देती, तो वह शिक्षा व्यापक हो सकती है, पर समानतामूलक नहीं।

यही बात हमें उस पुराने समाज की शिक्षा को समझते समय पूछनी चाहिए—किसे क्या पढ़ाया जाता था और किस सीमा तक?

धर्मपाल के आंकड़ों को लेकर सबसे अधिक उत्साह उस समय दिखाई देता है जब यह बताया जाता है कि अनेक गैर-द्विज विद्यार्थी पाठशालाओं में पढ़ते थे। लेकिन यहां एक सांख्यिकीय सावधानी भी जरूरी है। किसी समूह का विद्यार्थियों में बड़ा प्रतिशत होना और उस समूह की पूरी आबादी का बड़ा प्रतिशत शिक्षित होना दो अलग बातें हैं। यदि किसी सामाजिक समूह की आबादी बहुत बड़ी है तो स्कूल में उसके विद्यार्थियों की संख्या बड़ी होना अपने आप उसकी शिक्षा-दर ऊंची होने का प्रमाण नहीं है। इसके लिए उस समुदाय की कुल आबादी और उसकी उम्रवार संरचना से तुलना करनी होगी। धर्मपाल की चर्चा में यह जरूरी जनसांख्यिकीय संदर्भ अक्सर गायब रहता है।

और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिन बच्चों को शिक्षा मिल रही थी, उनकी शिक्षा की सीमा क्या थी?

भारत की परंपरागत शिक्षा एक समान स्तर की शिक्षा नहीं थी। गांव की पाठशाला में पढ़ना-लिखना और गणित सीखना एक बात थी; संस्कृत के उच्च व्याकरण, न्याय, मीमांसा, वेदांत, धर्मशास्त्र और धार्मिक ग्रंथों का गहन अध्ययन दूसरी बात। इसी तरह किसी को व्यावहारिक गणित सिखा देना और उसे ज्ञान की प्रतिष्ठित परंपराओं का अधिकार देना भी अलग-अलग बातें थीं।

इसलिए जब कोई कहता है कि “दलित-पिछड़े भी पढ़ते थे”, तो अगला सवाल होना चाहिए—क्या पढ़ते थे?

और उसके बाद—कहां तक पढ़ते थे?

फिर—पढ़ने के बाद बन क्या सकते थे?

यही प्रश्न इस पूरी बहस की दिशा बदल देता है।

यदि किसी सामाजिक समूह के बच्चे प्राथमिक स्तर पर पढ़ सकते थे, लेकिन उच्च ज्ञान के कुछ क्षेत्रों में उनकी पहुंच सीमित थी; यदि उन्हें पढ़ने के बावजूद प्रशासनिक और प्रतिष्ठित पदों में प्रवेश का समान अवसर नहीं था; यदि जन्म आधारित पेशागत व्यवस्था उनके लिए सामाजिक गतिशीलता की सीमा तय करती थी, तो पाठशाला में उनकी उपस्थिति को सामाजिक बराबरी की घोषणा बना देना ऐतिहासिक तथ्यों के साथ खिलवाड़ होगा।

यहां डॉ. भीमराव आंबेडकर का जीवन एक असुविधाजनक लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण सवाल बनकर सामने आता है। आंबेडकर कोई अशिक्षित व्यक्ति नहीं थे। उन्होंने भारत में शिक्षा पाई, विदेश जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त की, अर्थशास्त्र और कानून का अध्ययन किया और बड़ौदा राज्य की सेवा में अधिकारी बने। लेकिन उच्च शिक्षा और सरकारी पद मिलने के बाद भी जाति उनके जीवन से बाहर नहीं हुई। बड़ौदा लौटने पर उन्हें रहने के लिए मकान पाने में जातिगत पहचान के कारण कठिनाई हुई। एक ऐसा व्यक्ति जिसने आधुनिक विश्वविद्यालयों की सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त की थी, जिसके हाथ में सरकारी पद था, वह भी सामाजिक बराबरी की सामान्य सुविधाओं से वंचित हो सकता था।

यह घटना धर्मपाल के आंकड़ों को झूठा साबित नहीं करती। लेकिन यह जरूर बताती है कि शिक्षा और सामाजिक बराबरी के बीच कितना बड़ा अंतर हो सकता है।

यदि आधुनिक शिक्षा प्राप्त आंबेडकर को भी जाति की दीवार तोड़ने में इतनी कठिनाई हुई तो कुछ सदियों पहले किसी स्थानीय पाठशाला में पढ़ने वाले निम्न जाति के बच्चे के सामने सामाजिक संरचना की दीवार कितनी ऊंची रही होगी, इस प्रश्न से बचा नहीं जा सकता।

और यहीं उस तर्क की कमजोरी सामने आती है जिसमें कहा जाता है कि “जब दलित भी पाठशाला में पढ़ते थे तो जाति आधारित बहिष्कार कैसा?”

मनुष्य का सामाजिक व्यवहार इतना सरल नहीं होता। किसी समूह को एक क्षेत्र में सीमित प्रवेश मिल सकता है और दूसरे क्षेत्र में कठोर प्रतिबंध। किसी को व्यावहारिक ज्ञान मिल सकता है लेकिन धार्मिक ज्ञान नहीं। किसी को स्थानीय आर्थिक गतिविधि में भाग लेने की अनुमति हो सकती है लेकिन सामाजिक बराबरी न मिले। किसी को स्कूल में प्रवेश मिल सकता है लेकिन सार्वजनिक जीवन में सम्मान न मिले।

भारत का जातिगत समाज इसी जटिलता से बना था।

इसलिए यह कल्पना करना कि यदि निम्न जाति का बच्चा पाठशाला में बैठा तो वहां सब जातियां एक समान होकर बैठती होंगी, ऐतिहासिक रूप से आवश्यक निष्कर्ष नहीं है। स्कूल में प्रवेश और स्कूल के भीतर सामाजिक व्यवहार के बारे में अलग प्रमाण चाहिए। पानी किसके लिए उपलब्ध था, बैठने की व्यवस्था कैसी थी, शिक्षक और विद्यार्थी के संबंध कैसे थे, भोजन या स्पर्श के नियम क्या थे—इन सवालों के उत्तर केवल विद्यार्थी की जाति दर्ज करने वाली तालिका से नहीं मिलते।

आज सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील के दौरान जातिगत भेदभाव की खबरें सामने आती हैं। यह कहना उचित नहीं होगा कि हर सरकारी स्कूल में ऐसा होता है; लेकिन जहां ऐसा होता है, वहां एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—कानून द्वारा समान नागरिक बना दिए जाने के बाद भी सामाजिक मनोविज्ञान में पुरानी दूरी जीवित रह सकती है।

फिर यह मान लेने का आधार क्या है कि सदियों पहले, जब जाति सामाजिक पहचान की कहीं अधिक शक्तिशाली संस्था थी, केवल पाठशाला की मौजूदगी ने छुआछूत और सामाजिक दूरी को समाप्त कर दिया होगा?

अतीत को वर्तमान के संविधान की आंख से देखकर सुंदर बना देना इतिहास नहीं है।

इसी तरह शिक्षा की गुणवत्ता का प्रश्न भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। भारत की प्राचीन और मध्यकालीन ज्ञान परंपराओं में असाधारण उपलब्धियां थीं। गणित, व्याकरण, चिकित्सा, दर्शन, तर्क और खगोल के क्षेत्र में भारतीय विद्वानों ने महत्वपूर्ण काम किया। इस उपलब्धि को नकारना मूर्खता होगी। लेकिन दूसरी ओर यह दावा करना भी अनुचित है कि पारंपरिक शिक्षा आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान-पद्धति के बराबर थी।

आधुनिक विज्ञान की ताकत केवल ज्ञान की मात्रा में नहीं, बल्कि उसकी पद्धति में है—प्रश्न पूछना, परिकल्पना बनाना, प्रयोग करना, परिणाम को दोहराना, प्रमाण की स्वतंत्र जांच करना और गलत सिद्ध होने पर निष्कर्ष बदल देना। आधुनिक इतिहास भी केवल कथा या वंशावली नहीं है। वह शिलालेख, सिक्के, पांडुलिपियां, पुरातात्विक स्तर, भाषायी प्रमाण और अलग-अलग स्रोतों के तुलनात्मक परीक्षण से अतीत को पुनर्निर्मित करता है।

प्राचीन भारतीय समाज में इतिहास-बोध था, लेकिन आधुनिक इतिहासशास्त्र उसी रूप में नहीं था। राजवंशों और परंपराओं की स्मृति थी, किंतु आधुनिक कालक्रम निर्धारण और स्रोत-समीक्षा की संस्थागत पद्धति अलग चीज है।

गुप्तकाल का इतिहास आज जिस तरह व्यवस्थित रूप से सामने आता है, उसमें अभिलेखों, सिक्कों और पुरातात्विक प्रमाणों की निर्णायक भूमिका है। चंद्रगुप्त प्रथम और चंद्रगुप्त द्वितीय के बीच अंतर, उनके कालक्रम और राजनीतिक इतिहास को समझने में आधुनिक इतिहासकारों ने अनेक स्रोतों को परस्पर मिलाया है। इसका मतलब यह नहीं कि प्राचीन भारतीयों को अपने राजाओं का कोई ज्ञान नहीं था। मतलब यह है कि परंपरागत स्मृति और वैज्ञानिक इतिहासलेखन दो अलग ज्ञान-पद्धतियां हैं।

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो का उदाहरण तो और भी बड़ा है। भारतीय उपमहाद्वीप की धरती पर हजारों वर्ष पुरानी एक विशाल नगरीय सभ्यता के अवशेष मौजूद थे। लेकिन उनकी ऐतिहासिक पहचान आधुनिक पुरातात्विक अनुसंधान से हुई। हड़प्पा की खुदाई और फिर मोहनजोदड़ो से सामने आई सामग्री ने भारत के अतीत की तस्वीर ही बदल दी। यदि आधुनिक पुरातत्व न होता तो उन ईंटों, मुहरों, नगर-योजनाओं और अवशेषों को हम आज जिस सिंधु सभ्यता के रूप में जानते हैं, उस रूप में पहचानना संभव नहीं था।

इसका मतलब यह नहीं कि भारतीयों में अपने अतीत के प्रति जिज्ञासा नहीं थी। बल्कि बात यह है कि सभ्यता का पुरातत्व और सभ्यता की स्मृति अलग चीजें हैं।

नाथ और जोगी परंपरा भी इसी तरह का उदाहरण है। योगी, जोगी, नाथ, सिद्ध आदि शब्दों का सामाजिक और धार्मिक उपयोग लंबी परंपरा में होता रहा। नाथ पंथ की अपनी स्मृतियां और गुरु परंपराएं थीं। लेकिन विभिन्न क्षेत्रों में फैले समूहों, उनकी सामाजिक संरचना, नामों और परंपराओं का व्यवस्थित वर्गीकरण और दस्तावेजीकरण आधुनिक सर्वेक्षणों तथा बाद के अकादमिक अध्ययन से व्यापक हुआ। इसलिए यह कहना कि आधुनिक शोध ने ऐसी परंपरा “बनाई”, गलत होगा; लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि आधुनिक शोध ने उसके बारे में कुछ नया व्यवस्थित ज्ञान नहीं दिया।

असल सवाल यह नहीं है कि अंग्रेजों ने भारत को ज्ञान दिया या नहीं। असली सवाल यह है कि उन्होंने कौन-सी ज्ञान-पद्धतियां व्यवस्थित कीं और बदले में भारतीय ज्ञान की कौन-सी परंपराएं कमजोर हुईं।

इसी संतुलन की जरूरत धर्मपाल की बहस में भी है।

धर्मपाल की पुस्तक को इसलिए पढ़ना चाहिए कि वह औपनिवेशिक भारत की शिक्षा व्यवस्था का एक ऐसा पक्ष सामने लाती है जिसे लंबे समय तक पर्याप्त महत्व नहीं मिला। लेकिन पुस्तक को इस तरह पढ़ना कि उससे प्राचीन भारतीय समाज की समूची सामाजिक संरचना निर्दोष सिद्ध हो जाए, उसके साथ भी न्याय नहीं है।

और यहां सबसे असहज सवाल फिर सामने आता है—यदि पुरानी व्यवस्था इतनी समानतामूलक थी तो बाद के भारत में सामाजिक न्याय का प्रश्न इतना बड़ा क्यों बना?

यदि जाति का शिक्षा पर प्रभाव नहीं था तो उच्च शिक्षा में सामाजिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न क्यों उठा?

यदि आर्थिक अवसर लगभग समान थे तो संपत्ति और पेशागत अवसरों में इतनी बड़ी सामाजिक विषमता क्यों बनी रही?

यदि जन्म आधारित सामाजिक स्थिति महत्वहीन थी तो आंबेडकर जैसे उच्च शिक्षित व्यक्ति की सामाजिक पहचान उसके सरकारी पद से बड़ी क्यों हो गई?

यदि समाज पहले से समान था तो आधुनिक भारत को अस्पृश्यता समाप्त करने के लिए संविधान में स्पष्ट प्रावधान क्यों करना पड़ा?

यदि अवसर बराबर थे तो आरक्षण जैसी नीतियों की आवश्यकता क्यों पड़ी?

इन सवालों का जवाब यह नहीं हो सकता कि “अंग्रेजों ने सब बिगाड़ दिया।” अंग्रेजों ने अनेक सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं को बदला, कई असमानताओं को नए रूप दिए और औपनिवेशिक शासन ने अपने हित में समाज को वर्गीकृत भी किया। लेकिन उससे पहले मौजूद सामाजिक असमानताओं को अंग्रेजों के खाते में डाल देना भी इतिहास से भागना है।

इतिहास की ईमानदारी यही है कि जो असमानता अंग्रेजों से पहले थी, उसका नाम लिया जाए; जो अंग्रेजों ने पैदा की या बढ़ाई, उसका भी नाम लिया जाए; और जो आधुनिक भारत में बनी हुई है, उसकी जिम्मेदारी वर्तमान समाज और राज्य से पूछी जाए।

आज समानता की बहस में यही सबसे ज्यादा जरूरी है।

गरीबी, शिक्षा, आवास, रोजगार और प्रतिनिधित्व के सरकारी आंकड़े आज भी बताते हैं कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को केवल यह कहकर नहीं समझाया जा सकता कि “पहले तो सब पढ़ते थे।” आवास योजनाओं में वंचित सामाजिक समूहों की बड़ी भागीदारी, शिक्षा और रोजगार में प्रतिनिधित्व की असमानताएं और सामाजिक भेदभाव की घटनाएं बताती हैं कि संविधान की बराबरी और समाज की वास्तविक बराबरी के बीच अभी दूरी है।

इस दूरी को कम करने की जगह यदि हम अतीत का ऐसा चित्र बनाने लगें जिसमें असमानता थी ही नहीं, तो हम वर्तमान की समस्या को समझने की अपनी क्षमता ही नष्ट कर रहे हैं।

यही इस पूरे विवाद का सबसे गंभीर पक्ष है।

अतीत को निर्दोष साबित करने से वर्तमान निर्दोष नहीं हो जाता।

यदि आज किसी दलित परिवार के पास पर्याप्त जमीन नहीं है, यदि किसी बच्चे को सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है, यदि किसी समुदाय का उच्च शिक्षा में प्रतिनिधित्व कम है या यदि कोई परिवार आवास और बुनियादी सुविधाओं से वंचित है, तो उसके सामने यह कह देना कि “आपके पूर्वजों के समय पाठशालाएं थीं” कोई उत्तर नहीं है।

वर्तमान का सवाल वर्तमान में ही हल होगा।

और अतीत का मूल्यांकन भी वर्तमान की राजनीतिक सुविधा से नहीं, प्रमाणों से होना चाहिए।

इसलिए धर्मपाल को खारिज करने की जरूरत नहीं है। उनकी पुस्तक से यह महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है कि भारत की देशी शिक्षा व्यवस्था को “कुछ मुट्ठी भर ब्राह्मणों की शिक्षा” कह देना सही नहीं है। लेकिन धर्मपाल को उद्धृत करके यह साबित करने की कोशिश कि भारत की पुरानी सामाजिक व्यवस्था मूलतः समानतामूलक थी, उससे भी बड़ा सरलीकरण है।

पाठशाला में दलित दिखाई दे जाना इस बात का प्रमाण नहीं कि समाज में जाति दिखाई देना बंद हो गई थी।

शिक्षा का दरवाजा थोड़ा खुला होना और जीवन के सभी दरवाजों का खुला होना अलग बातें हैं।

किसी को अक्षरज्ञान मिल जाना और उसे ज्ञान पर अधिकार मिल जाना अलग बातें हैं।

गणित सीख लेना और संपत्ति अर्जित करने का समान अवसर मिलना अलग बातें हैं।

पाठशाला तक पहुंच और सत्ता तक पहुंच अलग बातें हैं।

और सबसे बढ़कर—शिक्षित हो जाना और सम्मानित नागरिक हो जाना भी हमेशा एक ही बात नहीं रही है।

भारत के अतीत को न तो अंधकार की गुफा बनाना चाहिए, न स्वर्णयुग की मूर्ति। वहां ज्ञान भी था, प्रतिभा भी थी, असाधारण बौद्धिक उपलब्धियां भी थीं और गहरे सामाजिक अंतर्विरोध भी। पाठशालाएं थीं और ज्ञान पर सामाजिक नियंत्रण भी था। कुछ निम्न जातियों के विद्यार्थी थे और जातिगत बहिष्कार भी था। व्यावहारिक शिक्षा थी और उच्च ज्ञान की असमान पहुंच भी थी।

यही वास्तविक इतिहास है—सुंदर भी, असुविधाजनक भी।

इसलिए आज की समानता की बहस से बचने के लिए प्राचीन व्यवस्था का औचित्यहीन बचाव और उसका चयनात्मक महिमामंडन अंततः इतिहास की सेवा नहीं करता। वह केवल वर्तमान के कठिन सवालों को टालता है।

और जब कोई समाज अपने वर्तमान की असमानताओं से असहज होकर अतीत को बार-बार निर्दोष साबित करने लगे, तब इतिहास की तलाश नहीं हो रही होती—अपने वर्तमान के लिए एक सुविधाजनक बहाना खोजा जा रहा होता है।

समानता की लड़ाई को ऐसे बहानों की जरूरत नहीं है।

उसे प्रमाण चाहिए, इतिहास चाहिए और सबसे बढ़कर—वर्तमान में बराबरी का वास्तविक अवसर चाहिए।

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