उरई। एक तरफ जहां सरकार बालश्रम जैसे अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए सख्त से सख्त कदम उठाकर मासूमों को उज्ज्वल भविष्य देने के लिए प्रयत्नशील है वहीं ग्रामों के विकास का जिम्मा उठाने वाले ही इन कानूनों का माखौल बनाने में जुटे हैं। किस कदर अपने थोड़े से फायदे के चक्कर में इन्हें स्कूूल भेजने की व्यवस्था करने के बजाय इनसे मजदूरी करवाई जा रही है इसका उदाहरण ग्राम लोहई दिवारा में देखने को मिल रहा है जहां की प्रधान इन दिनों ऐसे ही मासूमों को मनरेगा के तहत कराए जा रहे चेकडैम की सफाई के कार्य में लगाए हुए हैं।
भारत में बालश्रम कानून बदल गया है। अब यह ज्यादा सख्त हो गया है। यदि चौदह साल से कम उम्र के बच्चे से किसी भी प्रकार का काम करवाया गया तो नियोक्ता को पचास हजार रुपए जुर्माना और दो साल की जेल होगी। इसमें सभी तरह के श्रम शामिल हैं। वह केवल अपने पिता के साथ उनके व्यवसाय में सहयोग कर सकता है। संसद ने 14 साल से कम उम्र के बच्चों से श्रम कराने और 18 साल तक के किशोरों से खतरनाक क्षेत्रों में काम लेने पर रोक के प्रावधान वाले बालक श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2016 को पारित भी कर दिया लेकिन शायद ग्राम लोहई दिवारा के प्रधान सुशीला देवी पाल व प्रधान प्रतिनिधि लल्लूराम पाल को कानूनों का भय नहीं रह गया है। स्थिति यह है कि गांव में इन दिनों चल रहे रजवा चेकडैम की सफाई के कार्य में प्रधान द्वारा बाल श्रम कानूनों की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। उक्त कार्य में बाल मजदूरों को भी लगाया गया है जिससे स्पष्ट होता है कि प्रधान व प्रधान प्रतिनिधि शायद शासन या प्रशासन किसी का भी खौफ नहीं रह गया है। स्थिति यह है कि चेकडैम सफाई में चौदह वर्ष से कम उम्र के लडक़ों के साथ लड़कियां भी काम कर रही हैं। स्कूल जाने की उम्र में मजदूरी में जुटे इन बाल मजदूरों के भविष्य के साथ प्रधान अपने थोड़े से फायदे के लिए खिलवाड़ करने में जुटी हैं। क्षेत्र के लोगों ने उक्त कार्य की जांच कराकर प्रधान के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की मांग की है।
इनसेट–
शिक्षा की बजाय मजदूरी को कर रहे प्रेरित
गांव के विकास की मंशा से चुनी गई ग्राम प्रधान सुशीला देवी को शायद अपनी स्वार्थपूर्ति के आगे कुछ नहीं दिख रहा है तभी वह प्रतिनिधि लल्लूराम पाल के साथ चेकडैम के सफाई कार्य में बाल मजदूरों को लगाए हुए हैं जबकि उनका मकसद एेसे बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करने के लिए होना चाहिए और इसके लिए उन्हें उनकी मदद करनी चाहिए लेकिन उन्हें शायद उक्त बच्चों के भविष्य से ज्यादा अपनी जेब की चिंता सता रही है।
इनसेट–
सरकारी योजनाओं को भी लग रहा पलीता
मनरेगा के तहत कराए जा रहे कार्यों में भी सिर्फ जाब कार्ड धारकों को काम दिया जाता है जबकि चेकडैम सफाई के कार्य में लगे बच्चों को देखकर यह साफ जाहिर हो जाता है कि किस कदर सरकारी धन के बंदरबांट के चक्कर में सरकारी योजनाओं को भी पलीता लगाया जा रहा है। इससे एक तरफ जहां जाब कार्ड धारकों का हक तो मारा ही जा रहा है वहीं शासन की योजनाओं को भी पलीता लग रहा है।




Leave a comment