
- बालिवध लीला में शबरी की रामभक्ति और राम-सुग्रीव मैत्री का हुआ मंचन
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बालि-सुग्रीव के किरदारों में पुरानी जोड़ी मोहन व नरोत्तम ने दर्शकों पर अपनी छाप छोड़ी
कोंच-उरई । रामलीला के बालिवध प्रसंग से पूर्व सीता अन्बेषण में निकले राम ने अपनी परम भक्त भीलनी शबरी को दर्शन देकर और उसके जूठे बेर खाकर उसे कृतार्थ किया। शबरी के बताये अनुसार ही राम ने भाई के त्रास से छिपकर रह रहे सुग्रीव से मैत्री कर ली और उसे बालि के संताप से मुक्त कराने का वचन दिया। वचन के पक्के राम ने बालि का बध कर सुग्रीव के प्रति अपना मित्र धर्म निभाया और उसे किष्किंधा का राजा बनाया। परमात्म तत्व में विलीन होने जा रहे बालि की अंतिम इच्छा पूरी करते हुये राम ने उसके बेटे अंगद को किष्किंधा का युवराज भी बनाया।
कोंच के 166वें रामलीला महोत्सव में मंगलवार की रात्रि रामलीला रंगमंच पर बालिबध लीला का रोमांचक मंचन देख दर्शक अभिभूत हो उठे। अभिनय विभाग के अध्यक्ष पुरुषोत्तमदास रिछारिया व मंत्री नरोत्तम स्वर्णकार के निर्देशन में मंचित रामलीला का यह प्रसंग आज समाज में फैलते जातीय और वर्गीय विद्वेष पर करारा प्रहार करने बाला है जिसमें भगवान राम ने कथित रूप से क्षुद्र जाति की भीलनी शबरी का न सिर्फ आतिथ्य स्वीकार किया बल्कि प्रेमातिरेक में शबरी द्वारा खिलाये गये जूठे बेरों को भी बहुत ही प्रेम पूर्वक ग्रहण किया। राम-सुग्रीव मैत्री भी यह दर्शाने के लिये काफी है कि बलवान का मित्र बनने के बजाय समाज के सताये और तिरस्कृत लोगों को संबल प्रदान करके ही सामाजिक एकता और समरसता को अक्षुण्ण रखा जा सकता है। शबरी के सुझाव पर राम वानरों के राजा सुग्रीव से मैत्री करते हैं। प्रभु श्रीराम शबरी को नवधा भक्ति का ज्ञान देकर सुग्रीव से मिलने ऋष्यमूक पर्वत पर जाते हैं जहां उनका साक्षात्कार हनुमान से होता है और राम-सुग्रीव मैत्री के बाद राम सुग्रीव को दिये वचनानुसार बालि के ऊपर वृक्ष की ओट लेकर वाण चला देते हैं, घायल पड़ा बालि अपने अहंकार में कहता है, ‘बालि का विनाश नहीं यह वीरता का ह्रास है, विश्व में खलों के मान दर्प बढ जायेंगे। पूजा नित्य होगी शंख झालर बजेगी, मंदिरों में आपकी प्रतिमा पधरायेंगे, किंतु हे नाथ कलंक के अंक सिर से न मिट पायेंगे..Ó। इस प्रकार राम के धाम को चला गया बालि। प्रभु राम सुग्रीव को किष्किंधा का राजा और अंगद को युवराज घोषित कर देते हैं।
मंचन के दौरान श्रृंगार और सिखावन गीतों ‘प्रणय के देवता तुम पर है बलिहारी सदा तारा…Ó, ‘कोयल कूक रही मदमाती, कोयल…Ó, ‘समुझ मोरे सैंया, पैंयां पड़ूं कर जोर…Ó ने रामलीला का आनंद और भी बढाया। बालि मोहनदास नगाइच, सुग्रीव नरोत्तमदास स्वर्णकार, शबरी रामप्रकाश पाटकार, तारा कैलाश नगाइच, हनुमान सोनू नगाइच, अंगद अक्षत रिछारिया, कबंध जवाहर अग्रवाल, वानर यूथपति दर्श द्विवेदी ने निभाये।






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