
शिवपाल सिंह यादव खुद भी स्वतंत्र रूप से राजनीति में अपने पैर जमा पाने को लेकर आश्वस्त नही रहे होगें क्योकि न तो अभी तक की उनकी राजनीतिक पारी ऐसी रही है कि जो लोगो में उनके लिए श्रद्धा जगा सके और न ही वे कोई प्रभावशाली वक्ता माने जाते हैं बल्कि मजबूरी न हो तो उनके भाषण के बीच में ही लोग उकता जाने की वजह से उठकर जाते रहे हैं। इसीलिए उन्होनें सपा में भारी रुसवाई के बावजूद अखिलेश के पसीजने का लंबा इंतजार किया। लेकिन लगता है जब उन्हें पीछे से कोई दम मिल गई तो राजनीति के पहले कदम में ही उनके धमाके की ऐसी गूंज सुनाई पड़ी कि प्रेक्षक भौचक हैं। प्रेक्षक क्या इतने जोरदार आगाज से खुद शिवपाल भी अपनी कुव्वत को लेकर अंदर ही अंदर विस्मित हो रहे होगें। राजनीति में उनके तूफानी पदार्पण के पीछे सचमुच उनका कोई करिश्माई व्यक्तित्व है या वे भाजपा के छोड़े हुए स्वर्ण मृग मात्र हैं। इस प्रश्न के उत्तर के लिए कुछ दिनों का इंतजार करना पड़ेगा। फिर भी इतना तो है ही कि ऊपरी तौर पर शिवपाल के विष बुझे शब्द तीरों को नजरअंदाज कर बंगला आवंटन प्रकरण से भाजपा ने यह जाहिर किया है कि उनकी शाबाशी के लिए वह कितनी आतुर है। बिना किसी मतलब के तो ऐसा नही हो सकता।
शुरू में नेताजी यानि शिवपाल सिंह के बड़े भाई और उससे ज्यादा उनके राजनैतिक गुरू मुलायम सिंह यादव जब अलग पार्टी बनाने के उनके ऐलान के बाद दिल्ली पहुंचकर अपने बेटे अखिलेश यादव के साथ खड़े हो गये थे तो वे बहुत मायूस हो गये थे। लेकिन लगता है कि एक समय किसी की न मानने वाले नेता जी की चाबी भी आजकल कोई और भरने लगा है। जिसकी वजह से कुछ ही दिनों में गुलाट खाकर वे सार्वजनिक रूप से शिवपाल यादव को आशीर्वाद देते नजर आये। यही नही उनके दूसरे बेटे की बहू अपर्णा भी खुलकर शिवपाल के साथ आ गई है। जो नेताजी के इशारे के बिना संभव नही है। इसके बाद से शिवपाल मीडिया में छाये हुए हैं। मीडिया मैनेजमेंट के इस जमाने में लगता है कि वे ही शक्तियां शिवपाल के लिए मीडिया को मैनेज कर रहीं हैं। जिनकी भरी चाबी पर नर्तन करना नेताजी की नियति बन गया है।
अब शिवपाल एक ऐसे ध्रुव बन गये हैं जिनके जरिये नैपथ्य में रहकर युद्ध संचालित करने में निपुण मायावी शक्तियां सपा में भारी तोड़फोड़ के लक्ष्य को अंजाम दे पा रहीं हैं। शिवपाल जब अखिलेश के चाणक्य प्रो. रामगोपाल यादव के पुत्र अक्षय यादव के संसदीय क्षेत्र फिरोजाबाद पहुंचे तो उनका जलजला देखने लायक था। मीडिया के मुताबिक सैकड़ों गाड़ियों के साथ उन्होंने फिरोजाबाद में 6 किलोमीटर लंबा जबर्दस्त रोड शो किया। इससे सपा के अंदर अखिलेश के साथ निभाने में असहज महसूस कर रहे लोगों को निर्णय करने का हौसला मिला है। जिसकी परिणति फिरोजाबाद के रोड शो में सिरसागंज के विधायक हरीओम यादव के अपने पुत्र और पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष विजय प्रताप उर्फ छोटू के साथ खुलकर शिवपाल के पाले में आने के रूप में झलकी। यह सिलसिला और तेज करने के लिए नैपथ्य की मायावी शक्तियों द्वारा ताना-बाना बुना जा रहा है। जिससे सपा को विकल्प के रूप में देखने वालों के हौसले पस्त हो जायें। खबरे तो यहां तक छपवा दी गई है कि सपा के मुस्लिम चेहरे आजम खां ने भी पाला बदलने का मन बना लिया है। महागठबंधन को भी इन मोहरों से पलीता लगाने की उम्मीदें संजोई जा रही हैं क्योंकि मायावती का कोई भरोसा नही है। अर्जुन की तरह उनकी निगाह भी अपने वर्चस्व की मजबूती के लक्ष्य पर रहती है, न किसी सिद्धांत पर न किसी रिश्ते पर। बुआ-भतीजे के रिश्ते को सपा की नाव डूबती नजर आने पर वे कब झटक दें इसका कोई अंदाजा नही है।
हालांकि अभी अखिलेश शिवपाल और उनकी पार्टी को नजरअंदाज कर रहे हैं। शिवपाल खेमें के उकसाने वाले बयान के बावजूद वे उनकी चर्चा करके उन्हें कोई भाव नही देना चाहते। अखिलेश को अंदेशा है कि अगर उन्होंने शिवपाल की पार्टी की चर्चा मंच से की तो वे और रफ्तार पकड़ जायेगें। पार्टी संगठन को सुरक्षित रखने के लिए भी अभी वे किसी तरह की कसमसाहट प्रदर्शित नही होने दे रहे हैं। दरअसल अखिलेश अपने को वेफिक्र दिखाकर शिवपाल को निपटा देने की रणनीति पर अमल कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि मतदाता समझदार हैं और इसलिए शिवपाल के लिए प्रायोजित करिश्मे से उन्हें किसी तरह का भुलावा होने वाला नही है।
सारे देश की तरह उत्तर प्रदेश में भी भाजपा के नाकाम होने के बाद लोग ऐसे विकल्प की तलाश में हैं जिसमें नयापन हो, ताजगी हो। दिल्ली में ऐसे ही कारणों से अरविंद केजरीवाल प्रचंड समर्थन जुटाने में सफल हुए थे। यहां तक कि मोदी लहर के समय भी दिल्ली में केजरीवाल के सामने भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया था। उत्तर प्रदेश में इसी तरह के सूरते हाल में कई पूर्व नौकरशाह अपने साफ-सुथरे रिकार्ड के मददेनजर एक क्रांति को अंजाम दे डालने की कवायद कर रहे हैं लेकिन आईएएस सूर्य प्रताप सिंह जैसे इन नौकरशाहों को अभी तक तो कोई कामयाबी मिल नही पाई है। यहां अभी तक यह समझा जा रहा था कि बात परंपरागत दलों से आगे नही बढ़ पायेगी लेकिन फिलहाल तो यह लग रहा है कि उत्तर प्रदेश की जनता जिस मसीहा की तलाश में थी वह पूरी हो गई है और लोगों ने शिवपाल को अपने उद्धारक के रूप में हाथों-हाथ लेने की उत्सुकता जताकर इसका आभास करा दिया है। अगर सचमुच ऐसा है तो उत्तर प्रदेश की जनता को धन्य कहना पड़ेगा। दरोगा आरपी सिंह की इटावा में नामांकन के समय हत्या, एमएलसी अजीत सिंह की हत्या, अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद लखनऊ से बस से लौट रही सपा की एक महिला नेत्री की संदिग्ध मौत इसके तार कहां जुड़े समझे जाते रहे हैं यह कहने की आवश्यकता नही है। सपा की बाहुबल और अपराधियों के राजनीतिकरण पर आधारित राजनीति को बदलकर विकास पर आधारित राजनीति की शुरूआत करने की वजह से अखिलेश का एक समय जबर्दस्त स्वागत हुआ था। लेकिन अगर आज सचमुच इसमें कोई उलटबांसी हो रही है और सपा की अतीत की संस्कृति ही लोगों को सुहा रही है तो इसे एक पहेली ही कहा जायेगा क्योंकि समाज शास्त्र का स्थापित सूत्र तो यह है कि व्यक्तिगत तौर पर लोग भले ही भ्रष्ट, लालची और स्वार्थी बन जायें लेकिन सामूहिक मानसिकता स्वच्छ नैतिक व्यवस्था की पक्षधर होती है। लेकिन शिवपाल के उभार के पीछे सिर्फ एक रची हुई मृग मरीचिका है तो लोकसभा के चुनाव के पहले-पहले तक इसकी वास्तविकता सामने आ जानी है।






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