
दिशाहीन राजनीति करके मायावती उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री तो बन गई लेकिन उन्होंने बसपा के मिशन को खात्मे के द्वार पर पहुंचा दिया। इस बार तो उन्होंने पराकाष्ठा ही कर दी। बसपा के चुनाव अभियान का श्रीगणेश अयोध्या से पार्टी के सतीश मिश्रा ने गणेश वंदना करके किया। यह शुरूआत जिसका मकसद यह स्थापित करना था कि जाति के आधार पर उत्पीड़न सिर्फ दलितों का ही नहीं होता, सवर्णोे का भी एक हिस्सा अपने जातिगत पहचान के चलते उत्पीड़न का शिकार हो रहा है। मायावती को यह ज्ञान नहीं था कि ऐसा करके वे दलित उत्पीड़न निवारण अधिनियम के औचित्य पर प्रश्न चिन्ह लगा रही हैं।
कांशीराम ने शोषित वर्ग के करोड़ों लोगों को संघर्ष, परिश्रम और त्याग के लिए प्रेरित करके मजबूत राजनीतिक नीव खड़ी की थी जिस पर बसपा स्थापित हो पायी थी। इस पार्टी में मायावती का युग आया तो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के लिए उन्होंने इसकी दिशा ही बदल डाली। पार्टी में से उसकी वैचारिक आत्मा को निकालकर मायावती ने इसके संगठन को सत्ता हासिल करने के औजार के बतौर ढ़ाल दिया।
यही कारण है कि चार बार देश के सबसे बड़े सूबे में सत्ता हासिल करने के बावजूद यह पार्टी जिन संकल्पों को लेकर चल रही थी उनकी पूर्ति की दिशा मंे एक कदम की उपलब्धि भी हासिल नहीं कर सकी। आज हालत यह है कि उसके वजूद का कोई मतलब नहीं बचा है। इसलिए कांशीराम का मिशन मायावती के साथ दफन हो जाने की कगार पर पहुंच गया है।
कमजोरों को विशेष अवसर के सिद्धांत को कुचलने के लिए काफी समय से एक नेरेटिव चलाया जा रहा है कि तथाकथित ऊंची जातियां भी निजी जीवन में सताई जाती हैं इसलिए किसी को जाति के आधार पर व्यवस्था द्वारा किसी प्रकार का संरक्षण दिये जाने की आवश्यकता नहीं है। पहले यह नेरेटिव ओबीसी और अनुसूचित जाति, जन जाति को सरकारी नौकरियों में मिल रहे आरक्षण को समाप्त करने के आधार के बतौर अग्रसर किया गया। अब बात जातिगत आधार पर होने वाले तिरस्कार और अन्याय के निवारण के लिए कायम कानूनी व्यवस्थाओं को ठिकाने लगाने पर पहुंच गई है।
कानपुर के माफिया विकास दुबे के मामले से चलाये गये उक्त नेरेटिव के पीछे दूरगामी लक्ष्य रहा। नादान मायावती दलितों के लिए घातक इस शुरूआत को समझ पाने में विफल रही। चुनाव परिणामों से स्पष्ट है कि सत्तारूढ़ पार्टी का यह नेरेटिव कोई नुकसान नहीं कर पाया है अलवत्ता उसने इस दलील को पुष्ट किया है कि दलित उत्पीड़न निवारण अधिनियम को बनाये रखने की क्या जरूरत है जब शीर्ष कही जाने वाली जाति के लोग भी अपनी पहचान के कारण अन्याय के शिकार बनाये जा रहे हैं। ऐसी हालत में या तो अनुसूचित जाति/जनजाति उत्पीड़न अधिनियम को वापस लिया जाये या दूसरी और सताई हुई जाति है उसके नाम पर भी एक कानून लागू किया जाये।
बसपा को कायदे से वैचारिक विचलन के पहले भाजपा से कुछ सीखना चाहिए। जनसंघ के समय से शुरूआत में इस पार्टी के लोग हिन्दू राष्ट्र का सपना दिखाने के कारण हर स्तर पर दमन का शिकार हो रहे थे। पार्टी की कई पीढ़ियां अपने वैचारिक लक्ष्य के पूरा होने के अरमान को लिये गुजर गई पर उन्होंने हिन्दू राष्ट्र की लीक छोड़ना गंवारा नहीं किया। आखिर कई दशकों के बाद ऐसा अवसर आ सका जब केन्द्र और कई राज्यों में वह मजबूत सरकारें बना चुकी है। अगर बसपा का मिशन सही था तो उसे भी मायावती की सत्ता की हविश का निवाला बनने की बजाय ऐसा ही जज्बा दिखाना था। पर मायावती ने यह स्थापित कर दिया कि अगर पार्टी अपने विचारों पर टिकी रहती तो कई पीढ़ियां मर खप जाती पर उसे कभी सत्ता नहीं मिल पाती। मानो किसी वैचारिक मिशन का लक्ष्य सिर्फ उससे जुड़े किसी व्यक्ति को सत्ता की कुंजी दिलाने तक होता है। यह फरेब है, लोगों के साथ दगाबाजी है। हालांकि यह बात समाजवादी पार्टी के बारे में भी कही जा सकती है। अगर समाजवादी विचारधारा व्यक्ति विशेष की महत्वाकांक्षा का शिकार न होती तो उसे एक दिन सत्ता जरूर मिलती भले ही इंतजार कितना ही करना पड़ता।
किस तरह बसपा ने ही दलित एक्ट को खारिज करवाने की भूमिका मायावती ने निभाई
दिशाहीन राजनीति करके मायावती उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री तो बन गई लेकिन उन्होंने बसपा के मिशन को खात्मे के द्वार पर पहुंचा दिया। इस बार तो उन्होंने पराकाष्ठा ही कर दी। बसपा के चुनाव अभियान का श्रीगणेश अयोध्या से पार्टी के सतीश मिश्रा ने गणेश वंदना करके किया। यह शुरूआत जिसका मकसद यह स्थापित करना था कि जाति के आधार पर उत्पीड़न सिर्फ दलितों का ही नहीं होता, सवर्णोे का भी एक हिस्सा अपने जातिगत पहचान के चलते उत्पीड़न का शिकार हो रहा है। मायावती को यह ज्ञान नहीं था कि ऐसा करके वे दलित उत्पीड़न निवारण अधिनियम के औचित्य पर प्रश्न चिन्ह लगा रही हैं।
कांशीराम ने शोषित वर्ग के करोड़ों लोगों को संघर्ष, परिश्रम और त्याग के लिए प्रेरित करके मजबूत राजनीतिक नीव खड़ी की थी जिस पर बसपा स्थापित हो पायी थी। इस पार्टी में मायावती का युग आया तो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के लिए उन्होंने इसकी दिशा ही बदल डाली। पार्टी में से उसकी वैचारिक आत्मा को निकालकर मायावती ने इसके संगठन को सत्ता हासिल करने के औजार के बतौर ढ़ाल दिया।
यही कारण है कि चार बार देश के सबसे बड़े सूबे में सत्ता हासिल करने के बावजूद यह पार्टी जिन संकल्पों को लेकर चल रही थी उनकी पूर्ति की दिशा मंे एक कदम की उपलब्धि भी हासिल नहीं कर सकी। आज हालत यह है कि उसके वजूद का कोई मतलब नहीं बचा है। इसलिए कांशीराम का मिशन मायावती के साथ दफन हो जाने की कगार पर पहुंच गया है।
कमजोरों को विशेष अवसर के सिद्धांत को कुचलने के लिए काफी समय से एक नेरेटिव चलाया जा रहा है कि तथाकथित ऊंची जातियां भी निजी जीवन में सताई जाती हैं इसलिए किसी को जाति के आधार पर व्यवस्था द्वारा किसी प्रकार का संरक्षण दिये जाने की आवश्यकता नहीं है। पहले यह नेरेटिव ओबीसी और अनुसूचित जाति, जन जाति को सरकारी नौकरियों में मिल रहे आरक्षण को समाप्त करने के आधार के बतौर अग्रसर किया गया। अब बात जातिगत आधार पर होने वाले तिरस्कार और अन्याय के निवारण के लिए कायम कानूनी व्यवस्थाओं को ठिकाने लगाने पर पहुंच गई है।
कानपुर के माफिया विकास दुबे के मामले से चलाये गये उक्त नेरेटिव के पीछे दूरगामी लक्ष्य रहा। नादान मायावती दलितों के लिए घातक इस शुरूआत को समझ पाने में विफल रही। चुनाव परिणामों से स्पष्ट है कि सत्तारूढ़ पार्टी का यह नेरेटिव कोई नुकसान नहीं कर पाया है अलवत्ता उसने इस दलील को पुष्ट किया है कि दलित उत्पीड़न निवारण अधिनियम को बनाये रखने की क्या जरूरत है जब शीर्ष कही जाने वाली जाति के लोग भी अपनी पहचान के कारण अन्याय के शिकार बनाये जा रहे हैं। ऐसी हालत में या तो अनुसूचित जाति/जनजाति उत्पीड़न अधिनियम को वापस लिया जाये या दूसरी और सताई हुई जाति है उसके नाम पर भी एक कानून लागू किया जाये।
बसपा को कायदे से वैचारिक विचलन के पहले भाजपा से कुछ सीखना चाहिए। जनसंघ के समय से शुरूआत में इस पार्टी के लोग हिन्दू राष्ट्र का सपना दिखाने के कारण हर स्तर पर दमन का शिकार हो रहे थे। पार्टी की कई पीढ़ियां अपने वैचारिक लक्ष्य के पूरा होने के अरमान को लिये गुजर गई पर उन्होंने हिन्दू राष्ट्र की लीक छोड़ना गंवारा नहीं किया। आखिर कई दशकों के बाद ऐसा अवसर आ सका जब केन्द्र और कई राज्यों में वह मजबूत सरकारें बना चुकी है। अगर बसपा का मिशन सही था तो उसे भी मायावती की सत्ता की हविश का निवाला बनने की बजाय ऐसा ही जज्बा दिखाना था। पर मायावती ने यह स्थापित कर दिया कि अगर पार्टी अपने विचारों पर टिकी रहती तो कई पीढ़ियां मर खप जाती पर उसे कभी सत्ता नहीं मिल पाती। मानो किसी वैचारिक मिशन का लक्ष्य सिर्फ उससे जुड़े किसी व्यक्ति को सत्ता की कुंजी दिलाने तक होता है। यह फरेब है, लोगों के साथ दगाबाजी है। हालांकि यह बात समाजवादी पार्टी के बारे में भी कही जा सकती है। अगर समाजवादी विचारधारा व्यक्ति विशेष की महत्वाकांक्षा का शिकार न होती तो उसे एक दिन सत्ता जरूर मिलती भले ही इंतजार कितना ही करना पड़ता।







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