
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रचंड जीत का इतिहास दोहराने का श्रेय जहां प्रदेश सरकार के मजबूत कानून व्यवस्था व अन्य उपलब्धियों को दिया जा रहा है वहीं संगठन के योगदान का भी महत्व कम नहीं आंका जा रहा है। इसके चलते प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह का नाम सुर्खियों में है।
2017 के विधानसभा चुनाव में अमित शाह ने भाजपा की बड़ी जीत में मुख्य शिल्पकार की भूमिका निभाई थी जो उस समय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। उन्होंने संगठन को सजीव तौर पर बूथ स्तर तक पहुंचा दिया और उत्तर प्रदेश के सघन ताने बाने की ही बदौलत भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी मानी जाने लगी।
इस बीच अमित शाह संगठन से निवृत्त होकर सरकार में शामिल हो चुके हैं। इस नाते संगठन की वैसी ही जादूगरी दिखाने का जिम्मा वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह के कंधे पर आ गया था जो पार्टी के एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत के तहत उप मुख्यमंत्री केशव मौर्या के इस्तीफा देने के बाद नये प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त हुए थे।
स्वतंत्र देव सिंह अकादमिक भले ही न हों लेकिन उन्होंने गजब की कर्मठता दिखाई। हालांकि इस मामले में उनकी ख्याति तभी से सुपरिचित हो चुकी है जब भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष के रूप में अपना कौशल दिखाने का मौका उन्हें मिला था। राजनाथ सिंह सरकार के समय स्वतंत्र देव को यह बागडोर मिली थी और इस दौरान आगरा में उन्होंने भारतीय जनता युवा मोर्चा का शानदार राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित करके अपनी सांगठनिक क्षमता की धाक पार्टी में राष्ट्रीय स्तर तक जमा ली थी।
ऐसे में जब केशव मौर्या के उत्तराधिकारी को तय करने की बात आयी तो भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व की निगाह स्वतंत्र देव पर पड़ी। नतीजतन उनकी ओर से बिना किसी लाविंग के उन्हें सरकार से बुलाकर संगठन की जिम्मेदारी सौंपने का फैसला केन्द्रीय नेतृत्व ने किया।
स्वतंत्र देव पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व की उम्मीदों पर पूरी तरह खरे दिखे। उन्होंने प्रदेश भर में अनवरत दौरों का क्रम चलाया जिसका लक्ष्य बूथ स्तर तक पार्टी का सक्रिय संगठन कायम करना था। 18वी विधानसभा का चुनाव स्वतंत्र देव का सबसे बड़ा इम्तिहान था।
अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक इस चुनाव में ओबीसी वोटर के छिटकने से भाजपा को काफी धक्का लगने का अनुमान व्यक्त कर रहे थे लेकिन प्रदेश के पार्टी संगठन ने उसके संख्यात्मक आधार में प्रतिद्वंदी दलों को सेंध लगाने का कोई मौका नहीं मिलने दिया। जो चुनाव के बाद आये परिणामों से साफ जाहिर है। खुद स्वतंत्र देव बड़े ओबीसी चेहरे के रूप में स्थापित हो चुके हैं इसलिए ओबीसी की उपेक्षा के नाम पर स्वामी प्रसाद मौर्या आदि के ऐन चुनाव के समय बगावत करके सपा में चले जाने को कोई असर नहीं पड़ा। अकेले स्वतंत्र देव सारे बागी ओबीसी नेताओं पर भारी साबित हुए और मतदान के दिन यह साफ दिखा।
जाहिर है कि स्वतंत्र देव पार्टी के ट्रम्प कार्ड बन चुके हैं जिनका इस्तेमाल और बड़ी भूमिका के लिए किये जाने की चर्चायें मतगणना के बाद से जोरों पर हैं।







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