देश की राजनीति के पटरी से उतारने के लिए कौन है उत्तरदायी

क्या देश के लोगों के लिए भ्रष्टाचार अब कोई मुददा नही रह गया जबकि भारत की जनता को धर्म प्राण माना जाता है। एक समय था जब ईमानदारी को सार्वजनिक जीवन में सर्वोच्च योग्यता माना जाता था जिसके कारण प्रमुख नेताओं से लेकर स्थानीय नेताओं तक पर दबाव रहता था कि वे कोई ऐसा प्रदर्शन न करें जिससे जनमानस की निगाह में उनकी सत्य निष्ठा पर कोई प्रश्न चिन्ह लगे। सरकारें भी भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर सतर्क रहती थी। 1971 में बंगला देश निर्माण के बाद मजबूत राष्ट्र नायिका की छवि में उभरी इंदिरा गांधी की अपराजेय मानी जा रही सरकार 1975 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कारण ही एकदम लोगों की निगाह से गिर गयी थी जिसकी परिणति में अपनी सरकार बचाने के लिए 1977 में उन्हें इमरजेंसी लगाने का कलंक पूर्ण कदम उठाना पड़ा था। 1984 में उनकी शहादत के बाद हुए चुनाव में जनता ने भूतो न भविष्यतो बहुमत देकर उनके बेटे राजीव गांधी को अपार दुलार दिया था लेकिन बोफोर्स तोप सौदे की दलाली में बदनाम किये जाने से एक ही कार्यकाल में उनकी सत्ता का दुर्ग ढह गया था। 2014 में मनमोहन सरकार के चुनाव में पतन के पीछे अन्ना का वह आंदोलन था जिसमें उनकी सरकार को महाभ्रष्ट साबित कर दिया गया था हालांकि बाद में उनकी सरकार पर लगे लगभग सारे आरोप झूठे सिद्ध हो गये पर इससे क्या। कांग्रेस की लंका तो आग में भस्म हो चुकी थी। लेकिन आज क्या भ्रष्टाचार के आरोप कोई मायने रखते हैं। समाज की मानसिकता में इस मामले में बहुत बड़े उलटफेर को देखा जा रहा है लेकिन यह अचानक नही हुआ।
1991 में चंद्रशेखर की सरकार जिन परिस्थितियों में बनी थी उसमें मानसिकता के बदलाव के लक्षण आज साफ निहित देखे जा सकते हैं। इसमें सबसे बड़ी भूमिका मीडिया की दिखायी देती है। उसका छल समझने वालों के लिए कदम-कदम पर उजागर दिखता है। जो लोग यह विश्वास करते हैं कि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने धोखाधड़ी करके प्रधानमंत्री पद हथियाया था उनसे अगर यह पूंछा जाये कि 1989 में क्या आपने किसी देवीलाल या चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट दिया था या जनता दल को इसलिए वोट दिया था कि उसके द्वारा चुनाव के पहले ही विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री के चेहरे के रूप में प्रोजेक्ट कर दिये गये थे। जनता दल में रामकृष्ण हेगड़े जैसे कुछ नेताओं को छोड़कर कोई ऐसा सक्रिय नेता नही था जिसकी छवि विश्वनाथ प्रताप सिंह की तरह साफ-सुथरी हो। सूरज देव सिंह जैसों को राजनीतिक मान्यता दिलाने वाले चंद्रशेखर पहले ही विवादित हो चुके थे। लोगों ने भ्रष्टाचार के आरोपों से नाराज होकर राजीव गांधी का तख्ता पलट का निश्चय किया था और विश्वनाथ प्रताप सिंह पर उन्हें भरोसा था कि वे एक निष्कलंक व्यवस्था को देश में स्थापित करने का लोगों का स्वप्न पूरा कर सकेगें। लेकिन जनता दल में जिन तत्वों का जमघट था उनके रहते हुए यह काम आसान नही था। एक व्यक्ति एक पद के पार्टी के घोषित सिद्धांत का निर्वाह करने के लिए जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पीएम की शपथ लेने के बाद स्वयं राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ा तो राज्यों में भी इसकी अमल की कोशिशें करना लाजिमी था। इसके तहत उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बन चुके मुलायम सिंह को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी से मुक्त करके विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब रामपूजन पटेल को नया अध्यक्ष नियुक्त करवाया तो मुलायम सिंह ने लखनऊ पहुंचते ही उनकी पिटाई करा दी। अगर इसमें कोई षणयंत्र था तो मुलायम सिंह रामपूजन पटेल की जगह अपने किसी समर्थक का नाम सुझा सकते थे। यह तो उचित हो सकता था लेकिन सर्वसत्तावादी मुलायम सिंह सिद्धांतों को भाड़ में झोकने के हामी थे। मूल बात यह थी कि उन्हें दोनों पद हथियाये रखने से पीछे हटना गंवारा नही था। यह सरासर जनता दल से जुड़े लोगों के विश्वास पर चोट थी जिसके लिए मीडिया को मुलायम सिंह को नैतिक फटकार लगानी चाहिए थी लेकिन धर्म भ्रष्ट मीडिया उस समय भी वीपी सिंह को षणयंत्रकारी साबित करने में अपनी ऊर्जा खर्च कर रही थी। बाद में जब 1995 में मायावती मुलायम सिंह को हटाकर मुख्यमंत्री बनी तो पत्रकारों पर मुलायम सिंह ने उन्हें अपना चारण बनाने के लिए कितना सरकारी पैसा खर्च किया था इसकी जांच उन्होंने बैठा दी। इसमें मीडिया की पक्षधरता के मानकों का रहस्य खुलकर सामने आ गया था।
खैर यह एक अलग विषय रहा। मूल बात यह रही कि वीपी सिंह ने बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर को भारत रत्न देने और मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने के जो फैसले लागू किये उससे भारत के भद्र लोक के नैतिक पाखंड की परतें खुल गयीं। सामाजिक प्रभुत्व उसके लिए किसी भी ईमानदारी से ज्यादा महत्वपूर्ण है यहां तक कि देश भी ज्यादा। वीपी सिंह के फैसलों ने सामाजिक उपनिवेशवाद की चूले हिला दी थीं जो उसे कदापि सहन नही था। इसलिए एक पतित उद्योगपति द्वारा विश्वनाथ प्रताप सिंह के कालाधन विरोधी अभियान के कोप से बचने के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त करके चंद्रशेखर की सरकार बनवायी जो एक बंधक सरकार थी। लोकतंत्र के और अपने हित में विवेकशील लोगों को ऐसे सरकार स्वीकार करनी ही नही चाहिए थी। डा. अंबेडकर ने एक अवसर पर कहा था कि मैरिट से अधिक शील महत्वपूर्ण है। भारत के प्रबुद्ध समाज की मानसिकता को समझने के संदर्भ में उनकी यह उक्ति मौजू है। ईमानदारी और नैतिकता के सार्वजनिक जीवन में सबसे निचले तल पर चले जाने की नीव यहीं से पड़ी।
भारत के प्रबुद्ध समाज को चंद्रशेखर से देश का कोई भला कराने की अपेक्षा नही थी। जो अपेक्षा थी उसे चंद्रशेखर ने सरदार पटेल को भारत रत्न देने की घोषणा करके पूरा किया। यह कहने का मतलब सरदार पटेल के राष्ट्रीय अखंडता को सुदृढ़ करने में दिये गये योगदान को नकारना नही है लेकिन यहां उनका जो संदर्भ लिया गया वह अलग था जिसे समझने की जरूरत है। सरदार पटेल एक समय डा. अंबेडकर से इतने चिढ़े हुए थे कि उन्होंने कहा था कि वे अंबेडकर के लिए संविधान सभा के दरवाजे खोलें इसकी तो उनसे अपेक्षा करना ही बेकार है। वे अंबेडकर के लिए संविधान सभा की एक खिड़की खोलना तक गंवार नही करते। दूसरे सरदार पटेल आरक्षण की व्यवस्था के विरोध में थे। उनके माध्यम से डा. अंबेडकर को भारत रत्न दिये जाने और मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू किये जाने से आहत समाजिक प्रभु वर्ग को मनोवैज्ञानिक सांत्वना दिलाने का आरएसएस का एक हिडिन मन्तव्य था और चंद्रशेखर ने इस प्रयोजन को पूरा किया। फिर भी उन्हें धर्म निरपेक्षता का सूरमा साबित करने वाली मीडिया किस वर्ग सत्ता का प्रतिनिधित्व करती है इस पर ध्यान करो तो उसके महिमा मंडन की वजह सामने आ जायेगी। मीडिया और देश के जनमत की सोच में उतनी बड़ी खाई नही होनी चाहिए जितनी चंद्रशेखर को लेकर भारत में दिखाई देती है। वे एक व्यक्ति की पद विशेष की महत्वाकांक्षा जिसे विनाशकारी हठधर्मिता कहा जाना चाहिए उसे जस्टिीफाई करते हैं लेकिन यह नही देखते कि लोगों ने उन्हें 1991 के चुनाव में इतनी बुरी तरह क्यों नकारा कि वे अपनी दम पर एक भी सांसद नही जिता सके। किसी और को जिताने की बात तो और अगर मुलायम सिंह ने बलिया से मंत्री न बनाये होते जिन्होंने भारी बूथ कैपचरिंग की तो खुद चंद्रशेखर भी चुनाव हार जाते।
चंद्रशेखर के बाद 1991 के आम चुनाव में किसी पार्टी को लोकसभा में बहुमत नही मिला। नरसिंहा राव अल्पमत पर प्रधानमंत्री बने। किसी को उम्मीद नही थी कि वे अपना कार्यकाल पूरा कर पायेगें। उन्होंने इसके लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त से बहुमत जुटाने का जो हथकंडा चलाया उससे लोकतंत्र की आत्मा कराह उठी। लेकिन सामाजिक प्रभु वर्ग की नैतिक चेतना उसकी प्रभुत्व लोलुपता के बोझ तले इस कदर दफन हो चुकी थी कि उसने न केवल इसे सहन किया बल्कि नरसिंहा राव के राजनैतिक कौशल के रूप में महिमा मंडित भी किया। लोकतंत्र के जनसरोकारो से दूर छिटकने का जो सिलसिला चल पड़ा था वही आज पतन की महामारी का रूप ले चुका है। बीच में संयुक्त मोर्चा सरकार जैसे ठंडक के झौके पतन की लू-लपट से राहत देने के लिए आये लेकिन जिन्हें लोग मसीहा समझते थे वे करनी में यथा स्थिति वादियों के जमूरे साबित हो रहे थे इसलिए संयुक्त मोर्चा की सरकारें गतिरोध में घुटकर रह गयीं। इसके बाद चाहे वह एनडीए हो या संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन वे उस आर्थिक एजेंडे को आगे बढ़ाती रहीं। जिसका स्वाभाविक बीजारोपण नरसिंहा राव की प्रतिगामी सोच वाली सरकार करके जा चुकी थी। यह एजेंडा था आर्थिक उदारीकरण के नाम पर मुनाफाखोरी के दैत्यों को असीमित मुनाफे की छूट देना। इसके साथ-साथ चल रहा था सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रदूषण का वह सिलसिला जिसमें ऊंचे मूल्यों के लिए सामाजिक धरातल में कोई जीवन शक्ति नही रह जाती। उपभोगवाद की आंधी में अपनी बेलगाम इच्छाओं को पूरा करने की अंधी दौड़ चल पड़ती है। जाहिर है कि इसके लिए संसाधन किसी भी तरीके से जुटाये जायें युद्ध और प्रेम की तरह जायज लगता है। एक छोटा व्यापारी भी एक रुपये से हजार रुपये बनाना चाहता है क्योंकि उपभोक्तावाद के बवंडर में गरिमापूर्ण जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं तक का दायरा बहुत ज्यादा फैल चुका है जिसे जायज आमदनी किसी भी तरह नही समेट सकती। उपभोक्तावाद के भूत में वह इतना पागल हो जाता है कि अगर वह चाट-मिठाई बेंचता है तो कई गुना मुनाफे के लिए उसे उसमें ऐसी मिलावट करने में भी हिचक नही होती जो खाने वाले को अपाहिज बना देने का सबब बन जाये। छोटे से बड़े स्तर तक शैतानों को मात कर देने वाली अमानवीयता की गिरफ्त में लोग जकड़ चुके हैं। दस पैसे की दवा दस हजार में बिक रही है। मरीज साधारण सा आॅपरेशन कराने आता है लेकिन नर्सिंग होम वाले चोरी से उसकी किडनी निकाल लेते हैं तांकि बेंचकर मोटी रकम जेब में डाल सकें। चोटी पर बड़ी कंपनियों का तांडव है। लोक हितैषी सरकारें उनकी बंधक हैं। उन पर कम से कम टैक्स लगातीं हैं। उन्हें बैंकों से अरबों रुपये का फाइनेंस बिना गारंटी के चुटकियों में हो जाता है। इसके बाद भी उनकी मदद का अंत नही। कर अदायगी से लेकर बैंक लोन तक में उन्हें माफी की घोषणा की जाती है। संसाधनों और पूंजी के वितरण की विश्लेषण रिपोर्ट बताती है कि 80 से 90 प्रतिशत आबादी अभाव के गर्त में जा पहुंची है जबकि इस विकास ने पूरी समृद्धि को 10-20 प्रतिशत धनाढ्यों तक सीमित कर दिया है। अगर यह स्थिति बनी रही तो एक दिन वंचितों के सामने मरता तो क्या न करता की नौबत आ सकती है।
प्रगति की सार्थकता तब है जब हर घर में खुशहाली की रोशनी पहुंचे। लेकिन जब सरकारों ने अपने को जन सामान्य की चिंताओं से बरी कर लिया है तो यह होना कैसे संभव है। लोकतंत्र ने कुछ न किया हो लेकिन इतनी जागरूकता तो पैदा की ही है कि हर व्यक्ति चाहे वह अंतिम छोर पर क्यों न खड़ा हो अपने अधिकारों को पहचानने लगा है। ऐसे में उसके द्वारा अपने अधिकारों को प्राप्त करने की कोशिश करना भी लाजिमी है। इसमें वह तभी सफल होगा जब वह न्याय और नैतिकता को अपने चुनाव की प्राथमिकता में सर्वोच्च स्थान पर रखेगा। उसे खुमारी से उबरना पड़ेगा भले ही वह धर्म और जाति की खुमारी हो या राष्ट्रवाद की। वैसे भी धर्म चित्त शुद्धि का दूसरा नाम है और शुद्ध चित्त वाली किसी व्यवस्था को शोषक वर्ग की सेवा की गरज क्या है। एजेंडा कैसा भी हो लेकिन हर सरकार के लिए बुनियादी कसौटी है कि वह लोक लाज के महत्व को कमतर न होने दें। वर्तमान सरकार जो कर रही है वह किसी भी मानक से तौला जाये इससे मुकरी हुई पायी जायेगी। वह ऐसा चुनाव आयोग बनाने की जिद क्यों करेगी जिसमें लोगों को बिठाने के मनमाने अधिकार वह हासिल कर ले और आपत्ति होने पर भी इससे पीछे न हटे। किसी भी मुददे पर लोगों को स्पष्टीकरण देने में उसे हैठी महसूस होती हो वह अपने पसंद की कंपनी का कारोबार बढ़ाने के लिए दूसरे देशों के सामने अपने देश के स्वाभिमान को भेंट चढ़ाने में ग्लानि महसूस न करती हो। भ्रष्टाचार के किसी भी आरोप की जांच कराना उसे गंवारा न हो। जो भ्रष्ट घोषित दूसरी पार्टियों के नेताओं को अपने पाले में लाकर उन्हें पवित्र गाय का प्रमाण पत्र बांटती हो। ऐसे निजाम को राम राज का नाम देने से बड़ा कोई पाप क्या हो सकता है। इसलिए लोग जैसा पहले करते आये हैं वैसा ही आज करने की सोचे यानि अपना मत और समर्थन उसकी झोली में डालने का संकल्प लें जिसके इरादे देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने वाले हों।

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