चयनात्मक प्रतीकवाद और अधूरा इतिहास: संविधान क्लब के मंडल दिवस आयोजन पर उठते सवाल*

7 अगस्त 2026 को दिल्ली के संविधान क्लब में “विधायिकाओं में ओबीसी आरक्षण की आवश्यकता” विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ। इसे मंडल दिवस के अवसर पर OBC Activists’ Joint Committee ने आयोजित किया था। मंच पर विभिन्न दलों के नेता, सांसद, एक्टिविस्ट और बुद्धिजीवी मौजूद रहे। कार्यक्रम का उद्देश्य ओबीसी समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को मजबूत करने की मांग को आगे बढ़ाना था। लेकिन आयोजन के प्रतीकों, बैनर और पृष्ठभूमि को लेकर जो सवाल उठे हैं, वे कार्यक्रम की विश्वसनीयता और व्यापकता दोनों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

सबसे पहली और सबसे स्पष्ट विसंगति बैनर पर दिखाई दी। स्टेज के बैकड्रॉप पर केवल दो चेहरे थे—डॉ. भीमराव अंबेडकर और बी.पी. मंडल। वी.पी. सिंह का चेहरा नहीं था, चौधरी चरण सिंह का नहीं था, शरद यादव का नहीं था, लालू प्रसाद यादव का नहीं था और न ही छत्रपति साहूजी महाराज का। जबकि मंच पर राजद के सांसद मौजूद थे और कार्यक्रम मंडल दिवस के नाम पर हो रहा था। यह चयन महज डिज़ाइन की सरलता नहीं लगता। यह एक गहरी राजनीतिक पसंद का संकेत देता है।

अगर अंबेडकर को बैनर पर जगह दी गई, तो साहूजी महाराज को भी जगह मिलनी चाहिए थी। छत्रपति साहूजी महाराज को भारत में आरक्षण नीति का जनक माना जाता है। 1902 में उन्होंने कोल्हापुर रियासत में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण लागू किया था। डॉ. अंबेडकर स्वयं साहूजी महाराज के इस योगदान को स्वीकार करते थे और उनके प्रति आभार व्यक्त करते रहे। आरक्षण की अवधारणा को व्यावहारिक रूप देने वाले पहले शासक साहूजी महाराज ही थे। अंबेडकर को रखना और साहूजी महाराज को छोड़ देना भी उसी चयनात्मक दृष्टि का हिस्सा लगता है, जिसमें इतिहास को सुविधा के अनुसार काटा-छाँटा गया।

7 अगस्त इसलिए मंडल दिवस बना क्योंकि 1990 में इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की थी। मंडल आयोग की रिपोर्ट 31 दिसंबर 1980 को सरकार को सौंपी गई थी। उसके बाद लगभग दस साल तक वह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में पड़ी रही। काका कालेलकर आयोग की रिपोर्ट की तरह इसे भी नजरअंदाज किया जा सकता था। अगर वी.पी. सिंह ने 7 अगस्त 1990 को वह राजनीतिक जोखिम न उठाया होता, तो आज न तो 27 प्रतिशत आरक्षण होता और न ही 7 अगस्त को मंडल दिवस के रूप में मनाया जाता। रिपोर्ट को लागू करना आयोग बनाने या लिखने से कहीं अधिक कठिन और निर्णायक कदम था। फिर भी बैनर पर उनके चेहरे को जगह नहीं दी गई। यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या यह सामाजिक न्याय का आयोजन था या किसी खास राजनीतिक धारा की सुविधा के अनुसार इतिहास को संपादित करने का प्रयास?

अगर आयोजक बी.पी. मंडल का चेहरा इसलिए रख रहे थे क्योंकि उन्होंने आयोग की अध्यक्षता की, तो तर्क की पूर्णता के लिए पहले के आयोगों के अध्यक्षों को भी जगह मिलनी चाहिए थी। काका कालेलकर ने 1950 के दशक में ही पिछड़ी जातियों के आरक्षण पर काम किया था। उनकी रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। मंडल रिपोर्ट भी उसी राह पर जा रही थी। दोनों आयोगों के बीच निरंतरता को स्वीकार करना इतिहास की ईमानदारी होती। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। सिर्फ मंडल और अंबेडकर को रखकर एक अधूरा चित्र पेश किया गया।

आयोजन के पीछे के लोगों की राजनीतिक पसंद भी इस विसंगति को और स्पष्ट करती है। कार्यक्रम के संयोजक प्रो. संदीप यादव का झुकाव अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी की तरफ साफ दिखता है। डॉ. लक्ष्मण यादव, जिनकी घोषणा और प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है, वे भी अखिलेश यादव की राजनीति के प्रति सकारात्मक रुख रखते हैं। दोनों ही सामाजिक न्याय की बात करते हैं, लेकिन उनकी सार्वजनिक अभिव्यक्ति सपा की वर्तमान लाइन से मेल खाती है। सह-संयोजक डॉ. अला वेंकटेश्वरलू अधिक स्वतंत्र ओबीसी एक्टिविस्ट के रूप में सामने आते हैं, लेकिन कुल मिलाकर आयोजन के मुख्य सूत्रधारों का झुकाव एक खास दिशा में था।

यहीं पर यादव राजनीति की आंतरिक विसंगतियां सामने आती हैं। मुलायम सिंह यादव ने एक समय डॉ. अंबेडकर पर तीखे और विवादास्पद बयान दिए थे। आज अखिलेश यादव अंबेडकर को अपना सबसे बड़ा वैचारिक प्रतीक बनाकर पेश करते हैं। यह बदलाव राजनीतिक आवश्यकता का परिणाम है, वैचारिक निरंतरता का नहीं। उसी तरह वी.पी. सिंह के साथ मुलायम सिंह का रिश्ता लंबे समय तक टकराव भरा रहा। मुलायम ने वी.पी. सिंह सरकार को सबक सिखाने और कमजोर करने की राजनीति की। इसलिए सपा सर्कल में वी.पी. सिंह का खुला महिमामंडन आसान नहीं है। शरद यादव मंडल आंदोलन के महत्वपूर्ण चेहरे थे, लेकिन मुलायम-अखिलेश की राजनीति में उनसे बड़े किसी यादव नेता को जगह देना मुश्किल रहा। लालू प्रसाद यादव ने मंडल लागू होने के बाद उसके बचाव में सक्रिय संघर्ष किया, जबकि मुलायम उस दौर की राजनीति में अलग रुख रखते थे। फिर भी इस कार्यक्रम में लालू का प्रतीकात्मक चेहरा नहीं रखा गया, जबकि राजद के सांसद मंच पर बैठे थे।

ये तथ्य एक पैटर्न बनाते हैं। आयोजन में अंबेडकर और मंडल को रखकर संवैधानिक और आयोग संबंधी वैधता हासिल करने की कोशिश की गई, लेकिन लागू करने वाले, राजनीतिक जोखिम उठाने वाले, आरक्षण की अवधारणा को व्यवहार में लाने वाले और लंबे समय तक मंडल की रक्षा करने वाले लोगों को नजरअंदाज कर दिया गया। साहूजी महाराज को छोड़ना भी इसी श्रृंखला की कड़ी है। यह चयनात्मक प्रतीकवाद है। सामाजिक न्याय के आंदोलन में प्रतीक सिर्फ सजावट नहीं होते। वे बताते हैं कि इतिहास को कैसे पढ़ा और पेश किया जा रहा है। जब इतिहास को सुविधा के अनुसार काटा-छांटा जाता है, तो आंदोलन की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।

कांग्रेस के सीडब्ल्यूसी सदस्य की उपस्थिति को लेकर भी सवाल उठे कि कहीं किसी तरह का दबाव तो नहीं था। उपलब्ध जानकारी से कोई सीधा दबाव साबित नहीं होता। लेकिन कांग्रेस का मंडल रिपोर्ट के साथ ऐतिहासिक रिश्ता जटिल रहा है। लंबे समय तक रिपोर्ट को लागू न करने का आरोप कांग्रेस पर लगता रहा है। ऐसे में बैनर से वी.पी. सिंह का गायब होना कई लोगों को संदिग्ध लगा।

इस पूरे प्रकरण से एक बड़ा सवाल निकलता है—क्या सामाजिक न्याय के आयोजन अब वैचारिक शुद्धता और ऐतिहासिक ईमानदारी के आधार पर हो रहे हैं, या वे किसी खास राजनीतिक धारा की वर्तमान जरूरतों के अनुसार ढाले जा रहे हैं? अगर मंडल दिवस मनाना है, तो लागू करने वाले व्यक्ति को नजरअंदाज करना तर्कहीन है। अगर आयोग और अंबेडकर को केंद्र में रखना है, तो आरक्षण के जनक साहूजी महाराज, पहले के आयोगों और अन्य संघर्षशील नेताओं को भी जगह मिलनी चाहिए। अधूरा इतिहास लंबे समय में आंदोलन को कमजोर करता है।

आयोजन में कई महत्वपूर्ण आवाजें शामिल हुईं। विधायिकाओं में ओबीसी आरक्षण की मांग जायज और जरूरी है। लेकिन प्रतीकों के चयन ने कार्यक्रम को विवादित बना दिया। जब मंच पर राजद के सांसद हों, सपा-समर्थक एक्टिविस्ट प्रमुख भूमिका में हों और बैनर पर सिर्फ दो सुरक्षित चेहरे हों, तो सवाल उठना लाजमी है। क्या यह व्यापक सामाजिक न्याय का मंच था या एक खास यादव-केंद्रित राजनीतिक दृष्टि का विस्तार?

इतिहास गवाह है कि मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होना आसान नहीं था। विरोध हुआ, आत्मदाह हुए, सरकारें हिलीं। वी.पी. सिंह ने वह कदम उठाया जिसके कारण आज ओबीसी राजनीति की भाषा बदली। साहूजी महाराज ने आरक्षण की नींव रखी, अंबेडकर ने उसे संवैधानिक आधार दिया, मंडल ने रिपोर्ट लिखी और वी.पी. सिंह ने उसे लागू किया। शरद यादव, लालू प्रसाद और कई अन्य नेताओं ने अलग-अलग तरीकों से उस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। इन सबको नजरअंदाज करके सिर्फ अंबेडकर और मंडल को रखना सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन यह पूर्ण नहीं है।

सामाजिक न्याय का आंदोलन तभी मजबूत होता है जब वह अपने पूरे इतिहास को ईमानदारी से स्वीकार करे। चयनात्मक स्मृति से पैदा होने वाला आंदोलन लंबे समय तक टिक नहीं पाता। संविधान क्लब का यह आयोजन कई मायनों में महत्वपूर्ण था, लेकिन प्रतीकों के स्तर पर यह अधूरा और विवादास्पद रह गया। उठे हुए सवालों का जवाब आयोजकों को देना चाहिए। इतिहास को सुविधा के अनुसार संपादित करने की बजाय उसे पूरी तरह सामने रखना ही सही रास्ता है।

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