क्या महिला पहलवान टूट चुकीं है?


भारतीय कुश्ती महासंघ के निवर्तमान अध्यक्ष सांसद बृजभूषण शरण सिंह पर उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपो के मामलें में स्थिति बहुत हद तक साफ हो जाने के बावजूद सरकार ने उन पर आंच न आने देने की जिस तरह ठान रखी है उससे हर प्रबुद्ध व्यक्ति का हतप्रम होना स्वाभाविक सा है। ऐसा लगता है कि सरकार ने उन्हें बचाना अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है। नाबालिग लड़की द्वारा अदालत में उन पर आरोप वापिस लिये जाने की चर्चा है। लड़की का मनोबल कैसे गिरा होगा उन परिस्थितियों का अन्दाजा लगाया जा सकता है। जन्तरमन्तर से महिला पहलवानों को निर्ममता पूर्वक हटाया गया, उन पर मुकदमें लाद दिये गये और उन्हें बेबस कर दिया गया कि वे फिर से जन्तरमन्तर पर धरने पर न बैठ पाये। जब उन्होंने इसके विकल्प में इण्डिया गेट पर धरना शुरू करने की धमकी दी तो वहां भी पूरी कड़ाई के साथ उनके लिये बंदिश घोषित कर दी गयी। उन्हें एहसास करा दिया गया कि वे सरकार से पार नहीं पा पायेंगी, अगर उन्होंने मोर्चे पर डटे रहना चाहा तो उनका बड़ा नुकसान कर दिया जायेगा। गृह मंत्री अमित शाह से उनके सरकारी आवास पर मुलाकात में और स्पष्ट हो गया कि उन्हें सरकार की जिद से टकराना होगा जिसमें वे बर्बाद हो सकतीं है। इसके बाद उनका बैक फुट पर चले जाना लाजिमी था।
बृजभूषण शरण सिंह को बचाने की कोशिश के पीछे सिर्फ राजनीतिक लालच का मामला नहीं है। अगर गौंडा और उसके आस पास की तीन चार सीटों पर क्षति हो जाने के भय मात्र ने सरकार को बृजभूषण के पीछे खड़े होने के लिये मजबूर किया है, ऐसा सोचा जा रहा है तो यह भोलापन होगा। दरअसल सरकार मंे दुष्टता की भावना घर कर चुकी है जिसकी वजह से वह ऐसी स्थिति बनाने पर उतारू है कि कोई सरकार द्वारा कितनी भी बड़ी गलती करने पर उस पर उंगली उठाने की धृष्टता न कर सके। यह ऐसा नाजायज दबदबा बनाने का उपक्रम है जिसके कारण सरकार की इच्छा में मीनमेख निकालने का लोकतांत्रिक गुण जनता में समाप्त हो जाये। लखीमपुर में केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी महाराज के बेटे द्वारा निहत्थे किसानों की भीड़ पर जीप चढ़ाकर कई लोगो को कुचल दिये जाने के मामले में भी सरकार उनके पक्ष में इसी तरह खड़ी हो गयी थी। यह घटनायें स्वेच्छाचारी शासन को कायम करने के लिये लिखी गयी भूमिकाएं हैं। जिनके निहितार्थ बहुत स्पष्ट है। फिर भी व्यापक तौर पर इन मामलों में जन उद्वेलन देखने को नहीं मिल रहा। अपने समकालीन नायक के प्रति लोगो की आसक्ति की यह पराकाष्ठा है जिसके चलते लोकतंत्र बेमानी नजर आने लगा है।
ऐसा नहीं है कि पहली बार अपने आदमी को सरकार द्वारा कानून से बचाने की कोशिश करने का मामला सामने आया हो। अतीत की तमाम सरकारें ऐसा करते देखी जा चुकी है लेकिन पहले पानी सिर से ऊपर होने पर सरकार को लोकलाज का डर महसूस करना पड़ता था और फिर वह अपने आदमी का मोह छोड़ देने में ही अपनी भलाई समझती थी लेकिन यह तो पूरी तरह बेधड़क सत्ता है जिसकी मनमानी को कोई लोकलाज नहीं बांध सकती। अदानी के मामले में भी सरकार की सीना जोरी के आगे कानून, नैतिकता की लाचारी सामने आयी थी। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट से अदानी की कम्पनियों के शेयरों के अप्रत्याशित तौर पर कुलाचे भरने के पीछे हेराफेरी के जो तथ्य सामने आये थे उन्हें संज्ञान में लिया जाना अनिवार्यता होनी चाहिय थी। उनके बूम के पीछे प्रधानमंत्री के योगदान की बात भी कही गयी थी जो हो सकता है कि पूरी तरह गलत रही हो लेकिन तथ्य ऐसे थे कि संदेहों को दूर करने के लिए प्रधानमंत्री को स्पष्टीकरण तो देना ही था। पारदर्शिता किसी लोकतंत्र का बुनियादी तत्व है लेकिन प्रधानमंत्री ने इस मामले में जो रवैया अपनाया था क्या उससे कहा जा सकता है कि वे पारदर्शिता के तकाजे में कुछ भी विश्वास रखते होंगे।
बृजभूषण शरण सिंह पर आरोप लगाने वाली लड़कियां कोई गुमनाम प्राणी या सड़क छाप लोग नहीं हंै, उनकी बड़ी गौरवशाली पहचान है जिसके कारण यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि ऐसे आरोप उछालने के लिए कोई उनका इस्तेमाल कर सकता हो फिर भी यह साबित करने की कोशिश की गयी। सच जो भी हो लेकिन सरसरी तौर पर यह दिखाई देता है कि जिम्मेदार लोगो को उनके द्वारा लगाये गये आरोपो पर यकीन करना चाहिऐ था। बृजभूषण शरण सिंह का लम्बा चैड़ा क्रिमिनल रिकाॅर्ड है फिर भी उन्हें प्रमाणिक समझा जा रहा है और महिला पहलवानों को अविश्वसनीय यह अत्यन्त विचित्र है। यह भी गौरतलब है कि मामले का रूख बदलने के लिये कैसे कैसे हथकन्डों का इस्तेमाल किया गया। इसे जातिगत रंग देने की कोशिश की गयी जिससे समाज बटवारे की नौबत पर पहुंच गया। दावा तो हिन्दुत्व की छतरी को इतना बड़ा बनाने का है जिसमें अलग अलग पहचान भुलाकर व्यापक समाज एक हो जायें लेकिन यहां तो दूसरे ही करम किये गये जिससे दो जातियां आमने सामने खड़ी कर दी गयी। वह तो भला हो जाट समाज के लोगों का जिन्होंने कोई उत्तेजना दिखाने की बजाय बेटियों की अस्मिता के मुद्दे पर सभी की अन्तरात्मा को पुकारने का काम किया।
इस बीच महिला पहलवानों ने ड्यूटी ज्वाइन कर ली है। इस मुद्दे पर आगे प्रत्यक्ष संघर्ष के कार्यक्रम घोषित करने के मामले में उनका रूख टालमटोल भरा है। कुल मिलाकर सरकार के अड़ियल रवैये के आगे उनके टूट जाने का आभास मिलने लगा है। इस मामले का किस तरह पटाक्षेप होता है इसको लेकर अटकलें लगना शुरू हो गयी है।  

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