खोदा पहाड़ निकली चुहिया: उत्तर प्रदेश मंत्रिमण्डल विस्तार का अंदरूनी सच और दिल्ली का रिमोट कंट्रोल

उत्तर प्रदेश की सियासत देश के राजनीतिक फलक पर हमेशा से एक ऐसी प्रयोगशाला रही है, जहाँ होने वाली छोटी सी हलचल भी पूरे देश की दिशा और दशा तय करने का माद्दा रखती है। हाल ही में उत्तर प्रदेश मंत्रिमण्डल के जिस बहुप्रतीक्षित, बहुचर्चित और लंबे समय से टाले जा रहे विस्तार की तस्वीर सामने आई है, उसने राजनीतिक विश्लेषकों, ज़मीनी कार्यकर्ताओं और आम जनता को हैरत में डाल दिया है। महीनों से मीडिया की सुर्खियों और सियासी गलियारों की गपशप में जिस बड़े फेरबदल, कई दिग्गजों की छुट्टी और नए कद्दावर चेहरों के आगमन के कयास लगाए जा रहे थे, उसका पटाक्षेप ‘खोदा पहाड़, निकली चुहिया’ जैसी निराशाजनक स्थिति के साथ हुआ है।

इस विस्तार को बहुत गहराई से देखने पर साफ समझ आता है कि यह न तो किसी क्षेत्रीय समीकरण को साधने का कोई क्रांतिकारी प्रयास है और न ही आगामी चुनावी वैतरणी को पार करने के लिए बुनी गई कोई मजबूत बिसात। इसमें मात्र ६ नए मंत्रियों को शामिल किया गया है, जबकि २ वर्तमान मंत्रियों का कद बढ़ाकर उन्हें प्रमोट किया गया है। कुल मिलाकर यह एक बेहद ‘बेमजा’ और नीरस विस्तार साबित हुआ है, जो ठहरी हुई झील बन चुकी उत्तर प्रदेश की सियासत में कोई नई हिलोर या नया राजनीतिक उत्साह पैदा करने में पूरी तरह विफल रहा है। इस विस्तार के साथ ही उत्तर प्रदेश मंत्रिमण्डल की जो ६० की अधिकतम संवैधानिक सीमा थी, वह अब पूरी तरह संतृप्त (फुल) हो चुकी है, यानी अब इसमें आगे किसी भी नए समायोजन या सुधार की गुंजाइश भी खत्म हो गई है।


केंद्रीय रिमोट कंट्रोल की गहरी छाप और खुदमुख्तारी का भ्रम

इस पूरे मंत्रिमण्डल विस्तार की सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा रेखांकित करने वाली विशेषता यह रही कि इसमें शुरू से लेकर अंत तक पूरी तरह से दिल्ली यानी केंद्रीय नेतृत्व के ‘रिमोट कंट्रोल’ की छाप दिखाई दी। पिछले कुछ महीनों से राष्ट्रीय मीडिया और राजनीतिक हलकों में लगातार यह नैरेटिव (विमर्श) स्थापित करने की पुरजोर कोशिश की जा रही थी कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के आलाकमान ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश में ‘खुदमुख्तार’ (स्वायत्त) नेतृत्व को पूरी तरह तस्लीम यानी स्वीकार कर लिया है। माना जा रहा था कि दिल्ली अब लखनऊ के आंतरिक फैसलों में सीधे दखल देने से कतरा रही है और मुख्यमंत्री को फ्री-हैंड दे दिया गया है। लेकिन इस विस्तार की ज़मीनी हकीकत ने इस पूरे विमर्श की हवा निकाल दी है।

पर्दे के पीछे की कहानी यह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस विस्तार के जरिए अपने कई सजातीय चेहरों (राजपूत नेताओं) को मंत्रिमण्डल में मजबूत स्थान देना चाहते थे, ताकि राज्य के भीतर उनके अपने कोर वोट बैंक को एक बड़ा और स्पष्ट संदेश जा सके। लेकिन दिल्ली दरबार ने उनके इन मंसूबों पर पूरी तरह पानी फेर दिया। योगी आदित्यनाथ के बेहद करीबी और भरोसेमंद माने जाने वाले महेन्द्र सिंह को मंत्रिमण्डल में शामिल करने की अनुमति दिल्ली से नहीं मिली। यही नहीं, प्रशासनिक सेवा से राजनीति में आए और लखनऊ की सरोजनी नगर सीट से विधायक राजेश्वर सिंह को भी इस विस्तार में जगह नहीं मिल सकी, जबकि मुख्यमंत्री स्तर पर उनके नाम की पैरवी की जा रही थी।

बात केवल मुख्यमंत्री के करीबियों तक ही सीमित नहीं रही; देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे को उपकृत करने यानी उन्हें मंत्रिमण्डल में शामिल करने के अवसर से भी मुख्यमंत्री को साफ तौर पर रोक दिया गया। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि लखनऊ से तैयार होकर भेजी गई सूची को दिल्ली में किस तरह से वीटो कर दिया गया।


बृजभूषण शरण सिंह की भड़ास और राजपूत राजनीति का अंतर्विरोध

इस विस्तार के दौरान सबसे नाटकीय और तीखा मोड़ तब आया जब भाजपा के बाहुबली नेता बृजभूषण शरण सिंह के बेटे को मंत्रिमण्डल में जगह नहीं मिली। इस अनदेखी से बिफरे बृजभूषण शरण सिंह सीधे तौर पर सार्वजनिक रूप से अपनी भड़ास निकालने पर उतर आए। उनके इन तीखे और बगावती तेवरों ने न केवल पार्टी के तथाकथित अनुशासन को तार-तार किया, बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उस छवि को भी मटमैला कर डाला, जिसमें उन्हें उत्तर प्रदेश में राजपूतों का ‘सर्वमान्य नेता’ माना जाता है।

राजनीतिक गलियारों में तैर रही खबरों के मुताबिक, जब मुख्यमंत्री ने दिल्ली के सामने अपने सजातीय चेहरों को शामिल करने का तर्क रखा, तो केंद्रीय नेतृत्व ने बेहद सपाट और दो टूक शब्दों में उनसे कहा कि आपके मुख्यमंत्री रहते हुए उत्तर प्रदेश में हर ठाकुर खुद को पहले से ही एक ‘सुपर मिनिस्टर’ की तरह देख रहा है। प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था पर इस वर्ग का प्रभाव वैसे ही स्थापित माना जाता है, ऐसे में मंत्रिमण्डल में और ज्यादा सजातीय चेहरों को शामिल करके बाकी बिरादरियों में गलत संदेश देने की क्या जरूरत है? इसी तर्क के बहाने मुख्यमंत्री के हाथ पूरी तरह बांध दिए गए।


‘आयातित’ नेताओं का खेल और क्षेत्रीय क्षत्रपों का वीटो

भाजपा में पिछले कुछ वर्षों में दूसरी पार्टियों से आए नेताओं यानी ‘आयातित नेताओं’ को तरजीह देने का एक नया चलन शुरू हुआ है। इस विस्तार में भी इसकी बानगी देखने को मिली, लेकिन यहाँ भी मुख्यमंत्री की पसंद-नापसंद को दरकिनार किया गया। प्रयागराज और आसपास के इलाके में अपना प्रभाव रखने वाली पूजा पाल के लिए मुख्यमंत्री खुद काफी जोर लगा रहे थे। वे चाहते थे कि पूजा पाल को मंत्रिमण्डल में शामिल कर प्रयागराज क्षेत्र में एक नया समीकरण साधा जाए। लेकिन यहाँ मुख्यमंत्री की ‘दाल नहीं गल सकी’।

इसकी मुख्य वजह बने उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य। दरअसल, केशव प्रसाद मौर्य खुद प्रयागराज की राजनीति में किसी अन्य पिछड़े चेहरे के उभार पर एतराज जता रहे थे। वे नहीं चाहते थे कि उनके गृह क्षेत्र में उनके प्रभाव को चुनौती देने वाला कोई नया चेहरा सरकार में शामिल हो। और केशव प्रसाद मौर्य की इस आपत्ति को अमित शाह क्यों मायूस होने देते। परिणामस्वरूप, पूजा पाल का पत्ता साफ हो गया।

इसके विपरीत, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की राजनीति से होते हुए भाजपा के पाले में आए मनोज पांडेय के मामले में पूरी कहानी ही उलट गई। लोकसभा चुनाव में उनके प्रभाव वाली सीट पर भी भाजपा बुरी तरह पिछड़ गई थी, इसके बावजूद मनोज पांडेय को सीधे कैबिनेट मंत्री पद का इनाम मिला, और यह इनाम उन्हें सीधे अमित शाह ने दिलवाया।

मनोज पांडेय के अतीत पर नजर डालें तो सपा के राज में उन्होंने खूब सत्ता सुख भोगा था और कथित रूप से काफी ‘माल छाना’ था, जिसके कारण वे इन्कमटैक्स और ईडी की कार्रवाई की जद में आ गए थे। जांच के इसी शिकंजे और कार्रवाई के डर से बचने के लिए वे समय रहते अमित शाह के सामने शरनागत हो गए थे और तभी से उनके चहेते बन गए थे। संकट के समय काम आया यह सम्बन्ध आखिर इस मंत्रिमण्डल विस्तार में उनके काम आ गया, जहाँ प्रदर्शन खराब होने के बावजूद उन्हें लाल बत्ती से नवाजा गया।

इसी तरह, भूपेंद्र चौधरी को भी अगर मुख्यमंत्री का बस चलता तो मंत्री बनने या अपने करीबियों को एडजस्ट करने का अवसर न मिलता, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में यह साफ हो गया कि लखनऊ में बैठकर सरकार चलाने वाले मुख्यमंत्री की दिल्ली के सामने एक न चली।


सामाजिक समीकरण का नया ताना-बाना: नई सूची का विस्तृत विश्लेषण

यदि इस मंत्रिमण्डल विस्तार के सामाजिक और जातीय ताने-बाने को देखा जाए, तो यह साफ हो जाता है कि अगर चीजें योगी आदित्यनाथ के चश्मे से देखी जातीं, तो सामान्य (सवर्ण) और वंचितों (दलित/ओबीसी) का अनुपात फिफ्टी-फिफ्टी (५०:५०) का तय किया जाता। योगी की राजनीति हमेशा से सवर्णों के एक बड़े हिस्से को सत्ता संतुलन में बराबर का हिस्सेदार बनाए रखने की रही है, लेकिन दिल्ली ने इस बार पूरी तरह से सामाजिक और वंचित समूहों के छोटे-छोटे जातीय आधारों को साधने की कोशिश की है।

इस विस्तार के तहत सामने आई नई और वास्तविक सूची का जातीय एवं क्षेत्रीय विश्लेषण इस प्रकार है:

१. मनोज पांडेय (ब्राह्मण – सवर्ण)

अवध क्षेत्र से आने वाले मनोज पांडेय पूर्व में कांग्रेस और सपा के कद्दावर नेता रह चुके हैं। इस पूरे विस्तार में वे सवर्ण समाज से आने वाले एकमात्र नए चेहरे हैं। इन्हें मंत्रिमण्डल में शामिल करना पूरी तरह से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की इच्छा और ब्राह्मण मतों को अवध क्षेत्र में साधे रखने की रणनीति का हिस्सा है।

२. भूपेंद्र चौधरी (जाट – ओबीसी)

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट मतों की अहमियत और संगठन पर मजबूत पकड़ रखने वाले भूपेंद्र चौधरी को स्थान देना केंद्रीय नेतृत्व की मजबूरी और पसंद दोनों था। पश्चिमी यूपी में किसान आंदोलनों और रालोद के साथ समीकरणों के बीच जाट समुदाय में पार्टी की साख को बनाए रखने के लिए इन्हें शामिल किया गया।

३. कृष्णा पासवान (अनुसूचित जाति – दलित)

पूर्वांचल और मध्य यूपी के बॉर्डर से आने वाली कृष्णा पासवान को शामिल करके भाजपा ने अपने दलित आधार, विशेषकर पासवान बिरादरी को मजबूत करने का प्रयास किया है। यह कदम मायावती के खिसकते वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिशों का हिस्सा माना जा रहा है।

४. कैलाश सिंह राजपूत (लोध/राजपूत समीकरण – ओबीसी)

बुंदेलखंड क्षेत्र से आने वाले कैलाश सिंह राजपूत को मंत्रिमण्डल में जगह देकर पार्टी ने लोध और पिछड़े वर्ग के उस बड़े हिस्से को संदेश देने की कोशिश की है जो कल्याण सिंह के दौर से भाजपा का वफादार रहा है। मुख्यमंत्री के क्षत्रिय चेहरों के विकल्प के रूप में इस पिछड़े राजपूत/लोध चेहरे को तरजीह दी गई।

५. हंसराज विश्वकर्मा (पिछड़ा वर्ग/कारीगर समाज)

पूर्वांचल की राजनीति और विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी और आसपास के जिलों में ‘कारीगर’ यानी विश्वकर्मा समाज को प्रतिनिधित्व देने के लिए हंसराज विश्वकर्मा को लाया गया है। यह गैर-यादव ओबीसी जातियों को जोड़ने की भाजपा की पुरानी सोशल इंजीनियरिंग का हिस्सा है।

६. सुरेंद्र दिलेर (अनुसूचित जाति – दलित)

पश्चिम उत्तर प्रदेश के दलित वोट बैंक में पैठ बनाने के उद्देश्य से सुरेंद्र दिलेर को मंत्रिमण्डल में शामिल किया गया है। पश्चिमी यूपी में जाटव और गैर-जाटव दलितों के बीच संतुलन बनाने के लिए यह नाम दिल्ली की पर्ची से तय हुआ।

७. पदोन्नत चेहरे: अजीत पाल और सोमेंद्र तोमर

इन नए चेहरों के अलावा, मंत्रिमण्डल में पहले से शामिल अजीत पाल (पाल समाज – मध्य यूपी) और सोमेंद्र तोमर (गुर्जर समाज – पश्चिमी यूपी) को सम्बद्ध राज्य मंत्री के पद से पदोन्नत करके ‘राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)’ बना दिया गया है। इन दोनों का प्रमोशन भी पूरी तरह से इनके समाज के वोट बैंक को चुनावों से पहले गोलबंद रखने के उद्देश्य से किया गया है।


उप-मुख्यमंत्रियों को ‘निपटाने’ का मंसूबा हुआ नाकाम

उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार के भीतर मुख्यमंत्री और उनके दो उप-मुख्यमंत्रियों के बीच चलने वाली आंतरिक खींचतान और ‘शीतयुद्ध’ की कहानियां किसी से छिपी नहीं हैं। लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम थी कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस बहुप्रतीक्षित विस्तार के जरिए अपने दो उप-मुख्यमंत्रियों में से कम से कम एक को (जो उनके लिए लगातार संगठनात्मक और प्रशासनिक मुश्किलें खड़ी करते रहे हैं) रास्ते से हटाने या उन्हें ‘निपटाने’ की पूरी ठाने बैठे थे।

लेकिन दिल्ली के शीर्ष नेतृत्व ने मुख्यमंत्री के इस मंसूबे को भी सिरे से खारिज कर दिया। उप-मुख्यमंत्री को हटाना तो दूर की बात थी, दिल्ली ने मुख्यमंत्री को साफ कह दिया कि वे वर्तमान मंत्रिमण्डल के किसी भी मंत्री को छू तक नहीं सकते। यानी किसी की छुट्टी करने या किसी का पर कतरने का अधिकार मुख्यमंत्री से पूरी तरह छीन लिया गया। यह योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक प्राधिकार (Authority) पर केंद्रीय आलाकमान की तरफ से लगाई गई सबसे बड़ी लगाम थी।


विभागों के बंटवारे का पेच और ‘दिल्ली की पर्ची’ का आतंक

मंत्रिमण्डल के इस बेमजा विस्तार के बाद अब असली ‘पेच’ विभागों के वितरण और आवंटन को लेकर फंसा हुआ है। नए और प्रमोट हुए मंत्रियों ने शपथ तो ले ली है, लेकिन वे कौन सा मंत्रालय संभालेंगे, इस पर मुख्यमंत्री के पास कोई विशेषाधिकार नहीं बचा है। इस गतिरोध को सुलझाने और अपनी बात रखने के लिए मुख्यमंत्री दिल्ली तक हो आए, शीर्ष नेताओं से मुलाकातें कीं और लखनऊ लौट भी आए, लेकिन उन पर केंद्रीय दबाव रत्ती भर भी कम नहीं हो पाया है।

विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, दिल्ली दरबार में मुख्यमंत्री को बेहद सख्त लहजे में निर्देश दे दिया गया है कि हाई कमान की पर्ची में जिस मंत्री के नाम के आगे जो विभाग लिख कर दे दिया जाए, आपको वही विभाग उस मंत्री को आवंटित करना होगा। इसमें मुख्यमंत्री को अपना अतिरिक्त दिमाग लगाने या कोई फेरबदल करने की कोई जरूरत नहीं है। यह स्थिति किसी भी मुख्यमंत्री के लिए बेहद असहज और उसकी प्रशासनिक क्षमता को पंगु बनाने जैसी है। जब राज्य का मुखिया अपनी कैबिनेट के मंत्रियों को उनकी योग्यता या अपनी पसंद के अनुसार विभाग भी न बांट सके, तो प्रशासनिक तंत्र और नौकरशाही पर उसकी पकड़ ढीली होना स्वाभाविक है।


विधानसभा चुनाव और ‘लॉलीपॉप’ का कड़वा सच

इस पूरे घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश की भविष्य की राजनीति को लेकर एक बहुत बड़ा और स्पष्ट संकेत दे दिया है। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व पिछले कुछ समय से सार्वजनिक मंचों से लगातार यह ऐलान कर रहा है कि आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर ही लड़ा जाएगा। लेकिन इस मंत्रिमण्डल विस्तार की कड़वी हकीकत को देखने के बाद यह साफ दिखाई दे रहा है कि ‘योगी के चेहरे पर चुनाव लड़ने’ का यह ऐलान सिर्फ और सिर्फ एक ‘लॉलीपॉप’ है, जिसे उत्तर प्रदेश के कोर वोटर और खुद मुख्यमंत्री को शांत रखने के लिए थमा दिया गया है।

इस रणनीति के पीछे दिल्ली की एक सोची-समझी बिसात है। केंद्रीय नेतृत्व जानता है कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की अपनी एक बड़ी लोकप्रियता और कड़क प्रशासक की छवि है, जिसके बिना चुनाव जीतना बेहद मुश्किल है। इसलिए चुनाव में उनके चेहरे को आगे रखा जाएगा ताकि उनके समर्थक और बहुसंख्यक समाज पूरी ताकत से वोट करे। लेकिन दूसरी तरफ, सरकार और संगठन के भीतर उनके पर इस कदर कतर दिए गए हैं कि वे पूरी तरह से दिल्ली पर निर्भर रहें।

इस विस्तार ने यह कड़ा संदेश दे दिया है कि चुनाव के बाद अगर भाजपा उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापस लौटती भी है, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि योगी आदित्यनाथ ही दोबारा मुख्यमंत्री बनेंगे। चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए किसके नाम की ‘पर्ची’ दिल्ली से लखनऊ भेज दी जाएगी, यह अभी कोई नहीं जानता। दिल्ली का मौजूदा नेतृत्व ‘पर्ची संस्कृति’ के जरिए मुख्यमंत्रियों को बदलने और चौंकाने वाले फैसले लेने के लिए जाना जाता है, जैसा कि हमने हाल के वर्षों में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में देखा है।


असमंजस के मुहाने पर खड़ी उत्तर प्रदेश की राजनीति

संक्षेप में कहें तो, उत्तर प्रदेश का यह मंत्रिमण्डल विस्तार भाजपा के भीतर चल रही जबरदस्त आंतरिक खींचतान, सत्ता के विकेंद्रीकरण बनाम अति-केंद्रीकरण की जंग और स्थानीय नेतृत्व पर केंद्रीय रिमोट控制 (रिमोट कंट्रोल) के पूरी तरह हावी हो जाने की जिंदा मिसाल है। जिस विस्तार से उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया जोश, नए चेहरों के जरिए एक नई ऊर्जा आने की उम्मीद थी, वह केवल दिल्ली के आदेशों की तामील करने वाली एक औपचारिक कसरत बनकर रह गया। इसने यह साफ कर दिया है कि उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य के मुख्यमंत्री अब अपने फैसलों में स्वायत्त नहीं हैं।

इस ‘बेमजा’ विस्तार ने भले ही मंत्रिमण्डल की संख्या को ६० पर पहुँचाकर संतृप्त कर दिया हो, लेकिन इसने उत्तर प्रदेश भाजपा के भीतर असंतोष, असमंजस और अविश्वास की एक ऐसी राजनीतिक ज़मीन तैयार कर दी है, जिसके परिणाम आगामी विधानसभा चुनावों के दौरान और उसके बाद देखने को मिल सकते हैं। क्या यह ठहरी हुई झील आने वाले दिनों में किसी बड़े राजनीतिक तूफान का रूप लेगी, यह देखना दिलचस्प होगा।

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