उरई। माह-ए-मोहर्रम के अवसर पर करसान रोड स्थित अतीक खान के आवास पर इमाम हुसैन की याद में शहादतनामा (नातिया मुशायरा) का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में जिले के विभिन्न शायरों ने शिरकत कर कर्बला के संदेश, इमाम हुसैन की कुर्बानी और इंसानियत के मूल्यों पर आधारित कलाम पेश किए।
मुशायरे की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर हाजी अब्दुल मालिक अब्बासी ‘साकी’ ने की, जबकि संचालन कालपी से आए शायर निज़ाम हुसैन ‘फ़िदा’ ने किया। कार्यक्रम में शायरों ने मनकबत, सलाम और नज़्मों के माध्यम से कर्बला की घटना और इमाम हुसैन की शहादत को याद किया।
हाजी अब्दुल मालिक अब्बासी ‘साकी’ ने पढ़ा—
“शब्बीर ने घर अपना लुटा कर दिखा दिया,
इस्लाम का जहां में मुकद्दर जगा दिया।”
निज़ाम हुसैन ‘फ़िदा’ ने अपने कलाम में कहा—
“किसको है इख्तिलाफ बता इस सवाल से,
शान-ए-अरब है सुर्खरू ज़हरा के लाल से।”
शफीकुर्रहमान ‘कश्फी’ ने कर्बला की घटना का उल्लेख करते हुए कहा—
“चौदह सदियां हो चुकी हैं वाक़या गुज़रे हुए,
फिर भी बढ़ती जा रही है और शाने कर्बला।”
हाजी हसीब अंसारी, शकील चिश्ती, अब्दुल सलाम ‘राही’, शमीम अशरफ, असरार अहमद मुकरी, फ़हीम आलम, चांद मुईन ‘चांद’ और अतीक खान सहित अन्य शायरों ने भी अपने कलाम पेश किए, जिन्हें श्रोताओं ने खूब सराहा।
मुशायरे में कर्बला की कुर्बानी, सत्य और न्याय के लिए संघर्ष तथा मानवता के संदेश को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया। देर रात तक चले इस कार्यक्रम में उपस्थित श्रोताओं ने शायरों के कलाम पर भरपूर दाद दी।
आयोजकों ने कहा कि मोहर्रम केवल शोक का पर्व नहीं, बल्कि सत्य, त्याग और इंसाफ के लिए संघर्ष की प्रेरणा देने वाला अवसर भी है। कार्यक्रम का समापन इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ हुआ।







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