भारतीय राजनीतिक इतिहास अपने नायकों का मूल्यांकन तात्कालिक नारों के आधार पर नहीं, बल्कि संकट के क्षणों में उनके द्वारा लिए गए निर्णयों से करता है। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की जन्मशताब्दी का यह समय उनके उस संपूर्ण राजनीतिक आचरण की चीर-फाड़ करने का एक ऐतिहासिक अवसर प्रदान करता है, जिसे लंबे समय तक ‘समाजवाद’ और ‘सिद्धांतों की राजनीति’ के मुलम्मे में लपेटकर पेश किया जाता रहा। स्वयं को आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और डॉ. राम मनोहर लोहिया का वैचारिक उत्तराधिकारी बताने वाले चंद्रशेखर की राजनीति का जब वास्तविक और व्यावहारिक धरातल पर परीक्षण किया जाता है, तो एक गहरा शून्य उभरता है। यह लेख उनकी जन्मशताब्दी के प्रासंगिक परिप्रेक्ष्य में उनके राजनीतिक विरोधाभासों, क्रोनी कैपिटलिज्म के साथ उनके समझौतों, और सामाजिक न्याय की राह में उनके द्वारा खड़े किए गए अवरोधों का एक निर्मम, तथ्य-आधारित और आलोचनात्मक दस्तावेज है।
1. छद्म समाजवाद और कॉरपोरेट साठगांठ: अंबानी की शरण में ‘यंग तुर्क’
चंद्रशेखर ने भारतीय राजनीति में अपनी पहचान एक ऐसे ‘यंग तुर्क’ (Young Turk) के रूप में बनाई थी जो संसद के भीतर और बाहर बड़े पूंजीपतियों, एकाधिकारवादी कॉरपोरेट घरानों और कांग्रेस की उद्योगपति-परस्त नीतियों पर तीखे प्रहार करता था। लेकिन, इतिहास का सबसे कड़वा विरोधाभास नवंबर 1990 में तब रेखांकित हुआ जब उन्होंने प्रधानमंत्री पद की अपनी ‘हविश’ को पूरा करने के लिए उन्हीं कॉरपोरेट शक्तियों का परोक्ष सहयोग स्वीकार कर लिया, जिनके खिलाफ वे जीवन भर बोलते रहे थे।
विश्वनाथ प्रताप सिंह (V.P. Singh) की सरकार ने रिलायंस इंडस्ट्रीज और धीरूभाई अंबानी के खिलाफ कर चोरी, सीमा शुल्क उल्लंघन और बेनामी वित्तीय लेन-देन के मामलों में कड़ा प्रशासनिक शिकंजा कसा था। रिलायंस के कई बड़े प्रोजेक्ट्स की फाइलें रोक दी गई थीं। ऐसे में, कॉरपोरेट जगत के लिए वी.पी. सिंह को सत्ता से बेदखल करना एक व्यावसायिक अनिवार्यता बन चुका था।
खोजी पत्रकारों और तत्कालीन राजनैतिक साक्ष्यों के अनुसार, जनता दल के भीतर चंद्रशेखर और चौधरी देवीलाल के गुट को भड़काने, बागी सांसदों की लामबंदी करने और दिल्ली के पांच सितारा होटलों से लेकर राजनैतिक गलियारों तक प्रबंधन करने में रिलायंस और अंबानी समूह के संसाधनों ने पर्दे के पीछे से बड़ी भूमिका निभाई।
प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही चंद्रशेखर का समाजवाद अचानक ‘व्यावहारिक’ हो गया। वी.पी. सिंह सरकार द्वारा रिलायंस इंडस्ट्रीज के खिलाफ शुरू की गई तमाम वित्तीय जांचें और सीमा शुल्क से जुड़े विवादित मामले अचानक ठंडे बस्ते में डाल दिए गए। रिलायंस के अटके हुए आयातों को तेजी से हरी झंडी दिखाई गई और वित्तीय संस्थानों पर उनके नियंत्रण की राह आसान की गई। इतना ही नहीं, थापर समूह (ललित मोहन थापर) जैसे अन्य बड़े घरानों के अटके प्रोजेक्ट्स को भी चंद्रशेखर ने स्वयं आगे बढ़कर क्लीयरेंस दी। जीवन भर पूंजीवाद को कोसने वाले नेता ने अपनी ७ महीने की सरकार के संचालन की बागडोर डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी को सौंप दी, जिनके कॉरपोरेट लॉबी और धीरूभाई अंबानी के साथ संबंध जगजाहिर थे।
यहाँ प्रश्न उठता है कि समाजवाद की बात करने वाले चंद्रशेखर ने उद्योगपति कमल मोरारका को अपनी पार्टी (जनता दल-सोशलिस्ट) का पदाधिकारी और अपनी सरकार में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में राज्य मंत्री क्यों बनाया? पूंजीपति और समाजवाद का यह अनैतिक कॉकटेल यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि चंद्रशेखर का समाजवाद केवल विपक्ष में रहने का एक सुविधाजनक नारा था, सत्ता के गलियारों में प्रवेश करते ही वह ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ की शरण में साष्टांग दंडवत हो गया।
2. लोहिया के “सौ में साठ” की उपेक्षा और मंडल पर ऐतिहासिक विश्वासघात
डॉ. राम मनोहर लोहिया की राजनीति का केंद्रीय स्तंभ आर्थिक समाजवाद के साथ-साथ सामाजिक समाजवाद था, जिसका स्पष्ट उद्घोष उनके प्रसिद्ध नारे में था:
“पिछड़ा पावे सौ में साठ, राज-काज और धन-धरती में।”
लोहिया के लिए सामाजिक न्याय कोई अमूर्त दर्शन नहीं बल्कि सत्ता, शिक्षा और प्रशासन में पिछड़ों, दलितों और वंचितों को विशेष अवसर (Special Opportunities) देकर तत्काल अधिकार सौंपने का क्रांतिकारी कार्यक्रम था।
चंद्रशेखर स्वयं को इसी लोहियावादी धारा का प्रतिनिधि बताते रहे। परंतु, जब परीक्षण की घड़ियां आईं, तो उनका आचरण लोहिया के सिद्धांतों के ठीक विपरीत खड़ा दिखाई दिया:
- दस वर्षों का लंबा मौन (1980-1990): 1979 में जब जनता पार्टी सरकार ने मंडल आयोग का गठन किया, तब चंद्रशेखर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। दिसंबर 1980 में मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी, जिसमें अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के लिए 27% आरक्षण की सिफारिश की गई थी। इसके बाद पूरे दस वर्षों तक यह रिपोर्ट धूल खाती रही। चंद्रशेखर इस दौरान देश के शीर्ष नेताओं में थे, उन्होंने कन्याकुमारी से दिल्ली तक 4,200 किलोमीटर से अधिक की ‘भारत यात्रा’ की, गरीबी और विषमता पर लंबे भाषण दिए, लेकिन इस पूरे दशक में उन्होंने कभी भी मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कराने के लिए कोई देशव्यापी आंदोलन या वैचारिक अभियान नहीं चलाया।
- 1989 का घोषणा-पत्र और अवसरवादिता: 1989 में जब जनता दल ने अपने घोषणा-पत्र में मंडल आयोग को लागू करने का वादा शामिल किया, तब चंद्रशेखर ने इसका कोई सार्वजनिक विरोध नहीं किया। वे इस घोषणा-पत्र के आधार पर चुनाव लड़े और संसद पहुंचे। अर्थात, तब तक वे इस नीति को भुनाने के पक्ष में मूक सहमति दिए हुए थे।
- 7 अगस्त 1990 का यू-टर्न और ‘सहमति’ का छद्म तर्क: जैसे ही प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने मंडल आयोग को लागू करने की ऐतिहासिक घोषणा की, चंद्रशेखर ने तुरंत विरोध का झंडा उठा लिया। उन्होंने तर्क दिया कि “इतना बड़ा फैसला लागू करने से पहले समाज में व्यापक आम सहमति (Consensus) बनाई जानी चाहिए थी।”
यह तर्क उनकी राजनीतिक कपटता को उजागर करता है। यदि वी.पी. सिंह ने केवल 27% आरक्षण देकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की थी, और चंद्रशेखर वास्तव में लोहिया के सच्चे अनुयायी थे, तो होना तो यह चाहिए था कि वे लोकसभा के पटल पर खड़े होकर कहते कि:
“वी.पी. सिंह ने केवल 27% देकर पिछड़ों के साथ आधा-अधूरा न्याय किया है, मैं लोहिया का शिष्य हूँ और मैं पिछड़ों को उनका पूरा हक यानी पूरे 60 प्रतिशत आरक्षण दूंगा।”
लेकिन चंद्रशेखर ने लोकसभा की बहस में ऐसा कभी नहीं कहा। इसके विपरीत, उन्होंने वी.पी. सिंह के विश्वास मत की बहस के दौरान उन पर “देश को जातिवादी आग में झोंकने” और “बचकाना निर्णय लेने” के तीखे आरोप लगाए। उन्होंने संसद में खड़े होकर मंडल विरोधी सवर्ण आंदोलनकारियों की भाषा बोली और कानून-व्यवस्था तथा सामाजिक समरसता की आड़ लेकर वी.पी. सिंह की सरकार को गिरा दिया। उनका वास्तविक उद्देश्य मंडल रिपोर्ट को लागू होने से रोकना और उसे ‘अपनी मौत मरने देने’ के लिए ठंडे बस्ते में डालना था। यह पिछड़ों की चेतना के साथ किया गया एक ऐतिहासिक विश्वासघात था।
3. प्रतीकों की सवर्णवादी प्रतिशोध-राजनीति: आंबेडकर के समानांतर पटेल का उभार
विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने केवल नीतिगत स्तर पर मंडल आयोग लागू नहीं किया था, बल्कि उन्होंने भारतीय संविधान के निर्माता और शोषितों के मुक्तिदाता डॉ. भीमराव आंबेडकर को मरणोपरांत भारत रत्न प्रदान किया था। यह बहुजन चेतना और सामाजिक न्याय के विमर्श को देश के सर्वोच्च राजकीय सम्मान से अलंकृत करने का एक गहरा प्रतीकात्मक कदम था।
इसके ठीक बाद जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने, तो उनकी सरकार ने जो सबसे पहला बड़ा प्रतीकात्मक निर्णय लिया, वह था—सरदार वल्लभभाई पटेल को मरणोपरांत भारत रत्न देना। राजनीतिक विश्लेषण के धरातल पर इस निर्णय की टाइमिंग और इसके अंतर्निहित संदेश का मूल्यांकन करना बेहद जरूरी है:
- पटेल से वैचारिक दूरी: चंद्रशेखर के पूरे राजनीतिक जीवन में, उनके लेखों में या उनके भाषणों में सरदार पटेल कभी भी उनके वैचारिक प्रेरणास्रोत या आदर्श के रूप में दर्ज नहीं रहे। वे हमेशा आचार्य नरेंद्र देव, जेपी और लोहिया की समाजवादी परंपरा का जिक्र करते थे। फिर अचानक प्रधानमंत्री बनते ही उन्हें सरदार पटेल की याद क्यों आई?
- आरक्षण और आंबेडकर के प्रति पटेल का ऐतिहासिक रुख: इतिहास के दस्तावेजी साक्ष्य बताते हैं कि सरदार पटेल संविधान सभा के भीतर और बाहर बड़े पैमाने पर जाति आधारित रियायतों, पृथक निर्वाचन और आरक्षण की व्यवस्था के प्रति बेहद रूढ़िवादी व असहमत रुख रखते थे। संविधान सभा के भीतर डॉ. आंबेडकर के क्रांतिकारी प्रस्तावों और शोषितों के अधिकारों के प्रावधानों का कांग्रेस के जिस दक्षिणपंथी धड़े ने सबसे तीखा विरोध किया था, उसका नेतृत्व अक्सर पटेल से जोड़कर देखा जाता था।
- सांकेतिक प्रतिवाद (Counter-Response): जब वी.पी. सिंह ने मंडल रिपोर्ट लागू की और आंबेडकर को भारत रत्न दिया, तो देश का पारंपरिक सवर्ण मानस गहरे आक्रोश में था। चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री बनते ही इस आक्रोश को शांत करने और मंडल आंदोलन की धार को कुंद करने के लिए सरदार पटेल को भारत रत्न दिया। यह आंबेडकर और मंडल की ‘सामाजिक न्याय’ की प्रतीक-राजनीति के खिलाफ एक ‘सवर्ण-प्रतिवाद’ था। इसका निहितार्थ साफ था—देश के सवर्ण तबके को यह संदेश देना कि सरकार अब बहुजन उभार के प्रतीकों के बजाय यथास्थितिवादी और पारंपरिक राष्ट्रवादी प्रतीकों की ओर लौट रही है। यह निर्णय कोई ऐतिहासिक सम्मान मात्र नहीं था, बल्कि मंडल के खिलाफ एक गहरा राजनीतिक और सामाजिक काउंटर-स्ट्राइक था।
4. सांगठनिक तानाशाही और हिंसा: जेपी के ‘लोकतांत्रिक मूल्यों’ का तर्पण
चंद्रशेखर स्वयं को लोकनायक जयप्रकाश नारायण (JP) की संपूर्ण क्रांति और लोकतांत्रिक मूल्यों का सबसे बड़ा पैरोकार बताते थे। जेपी की राजनीति का मूल तत्व था—आंतरिक लोकतंत्र, असहमति का सम्मान और शांतिपूर्ण विरोध। लेकिन चंद्रशेखर ने जनता पार्टी के अध्यक्ष पद पर अपना एकाधिकार और कब्जा बनाए रखने के लिए जिस तरह की सांगठनिक तानाशाही और शारीरिक बल का प्रदर्शन करवाया, उसने जेपी के आदर्शों का सरेआम तर्पण कर दिया।
भारतीय राजनीति के इतिहास में दो घटनाएं चंद्रशेखर की इस सांगठनिक असहिष्णुता की गवाह हैं:
क. डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी के साथ बदसलूकी (मार्च 1984)
जब जनता पार्टी के भीतर आंतरिक चुनाव हो रहे थे और चंद्रशेखर लगातार अध्यक्ष पद पर काबिज थे, तब डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने उनके एकाधिकार को चुनौती देते हुए अध्यक्ष पद के लिए अपना नामांकन पत्र दाखिल किया। चंद्रशेखर के समर्थकों (जिन्हें पार्टी के भीतर उनका निजी लठैत कैडर माना जाता था) ने इस लोकतांत्रिक चुनौती को बर्दाश्त नहीं किया। नामांकन के दौरान स्वामी के साथ सरेआम हाथापाई, धक्का-मुक्की और बदसलूकी की गई। पार्टी के भीतर के इस लोकतांत्रिक विरोध को दबाने के लिए शारीरिक हिंसा का सहारा लिया गया और बाद में स्वामी को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।
ख. राम जेठमालानी पर हिंसक हमला (9 दिसंबर 1988)
जनता दल के गठन के समय जब विपक्षी धड़े में वी.पी. सिंह का कद बढ़ रहा था और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री पद की रेस में पिछड़ रहे थे, तब मशहूर कानूनविद राम जेठमालानी ने चंद्रशेखर की अवसरवादी राजनीति की तीखी आलोचना की थी। 9 दिसंबर 1988 को जब दिल्ली में जनता दल की बैठक चल रही थी, तब चंद्रशेखर के कट्टर समर्थकों ने राम जेठमालानी पर जानलेवा हमला कर दिया। उनके कपड़े फाड़ दिए गए, उनके साथ गंभीर मारपीट और बदसलूकी की गई। इस गुंडागर्दी से आहत होकर जेठमालानी ने तुरंत पार्टी के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।
ये दोनों घटनाएं यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि चंद्रशेखर के लिए लोकतांत्रिक मूल्य और आंतरिक असहमति केवल भाषणों के विषय थे। जब भी उनके स्वयं के पद, प्रतिष्ठा और राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती मिली, उनके संगठन ने फासीवादी और हिंसक आचरण अपनाने में कोई संकोच नहीं किया। जेपी की विरासत का दावा करने वाले नेता के आंगन में लोकतांत्रिक विरोधियों को लाठियों और घूंसों से चुप कराया जा रहा था।
5. जन्मशताब्दी का निष्कर्ष: कहां ढूंढें चंद्रशेखर का समाजवाद?
चंद्रशेखर की जन्मशताब्दी के इस मोड़ पर जब हम उनके संपूर्ण राजनीतिक जीवन का लेखा-जोखा तैयार करते हैं, तो उनके घोषित सिद्धांतों और वास्तविक कर्मों के बीच की खाई इतनी चौड़ी नजर आती है कि उसमें किसी भी प्रकार के ‘सच्चे समाजवाद’ को ढूंढ पाना असंभव हो जाता है।
एक राजनेता के रूप में उनकी वैचारिक यात्रा अंतर्विरोधों का एक ऐसा संजाल है जिसका अंत अत्यंत दुखद हुआ:
[विपक्ष में प्रखर 'यंग तुर्क' और कॉरपोरेट विरोधी] │ ▼ (सत्ता की महत्वाकांक्षा)[अंबानी समूह की फंडिंग और परोक्ष सहायता की स्वीकृति] │ ▼ (नीतिगत समझौता)[मंडल आयोग (OBC आरक्षण) का संसद में तीखा विरोध और वी.पी. सरकार गिराना] │ ▼ (प्रतीकात्मक प्रतिशोध)[आंबेडकरवादी उभार के खिलाफ पटेल को प्रति-प्रतीक बनाकर भारत रत्न देना] │ ▼ (सांगठनिक तानाशाही)[स्वामी और जेठमालानी पर हिंसक हमले करवाकर आंतरिक लोकतंत्र का दमन]
चंद्रशेखर की राजनीति का यह निर्मम मूल्यांकन किसी व्यक्ति के प्रति द्वेष पर आधारित नहीं है, बल्कि यह उस वैचारिक अवसरवादिता का विश्लेषण है जिसने भारतीय समाजवाद के आंदोलन को अपूरणीय क्षति पहुंचाई। जो नेता संसद में खड़े होकर पूंजीपतियों के खिलाफ दहाड़ता था, उसने प्रधानमंत्री बनने के लिए कॉरपोरेट घरानों की कृपा स्वीकार की। जो नेता लोहिया का नाम लेकर पिछड़ों के हक की बात करता था, उसने पिछड़ों को उनका हक मिलने के ऐतिहासिक क्षण (मंडल कार्यान्वयन) पर सवर्ण आक्रोश की ढाल बनकर सरकार गिरा दी। जो नेता जेपी के संपूर्ण लोकतंत्र का सिपाही था, उसने अपनी ही पार्टी के सहयोगियों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित करवाया।
अतः, चंद्रशेखर की जन्मशताब्दी के इस प्रासंगिक परिप्रेक्ष्य में यह निष्कर्ष पूरी तरह साफ और अचूक है: चंद्रशेखर का समाजवाद केवल एक मुखौटा था—एक ऐसा मुखौटा जिसका इस्तेमाल उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि चमकाने के लिए किया, परंतु जब परीक्षा की घड़ी आई, तो उनका अंतर्निहित यथास्थितिवाद, उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और उनका पारंपरिक जातीय मानस उनकी घोषित वैचारिक प्रतिबद्धताओं पर पूरी तरह हावी हो गया। भारतीय राजनीति के इतिहास में उन्हें एक सिद्धांतों वाले समाजवादी के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे अवसरवादी राजनेता के रूप में याद रखा जाएगा जिसने सत्ता की ‘हविश’ में अपने ही वैचारिक पुरखों की विरासत का सौदा कर लिया।






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