भारतीय राजनीति में जब भी राष्ट्रीय अखंडता और सैन्य अभियानों की गरिमा की बात आती है, तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) स्वयं को अंतिम और निर्विवाद न्यायाधीश के रूप में प्रस्तुत करती है। विपक्ष के किसी भी नेता द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा या सैन्य कार्रवाइयों पर उठाए गए तार्किक सवालों को भी भाजपा तुरंत ‘सेना का मनोबल गिराने वाला’ और ‘राष्ट्र-विरोधी’ घोषित कर देती है।
किंतु इतिहास के कुछ ऐसे पन्ने हैं, जो आज की भाजपा के इस ऊंचे नैतिक दावों की सरेआम भद पीटते हैं। इसका सबसे बड़ा ऐतिहासिक उदाहरण है—राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर ‘नकारात्मक राजनीति’ करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री चंद्र शेखर की जयंतियों पर भाजपा नेतृत्व द्वारा किया जाने वाला अति-उत्साही महिमा मंडन।
जो भाजपा राष्ट्रवाद का सर्टिफिकेट बांटती है, वह एक ऐसे नेता के सामने नतमस्तक है जिसने देश को बांटने वाली ताकतों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को ‘कत्लेआम’ कहा था और अयोध्या विवाद में हिंदू पक्ष के खिलाफ कट्टरपंथ की सबसे बड़ी दीवार (सैयद शहाबुद्दीन) खड़ी की थी। यह लेख इन दोनों विशिष्ट प्रसंगों के परिप्रेक्ष्य में भाजपा के इस घृणास्पद वैचारिक अंतर्विरोध को पूरी तरह बेनकाब करता है।
1. ऑपरेशन ब्लू स्टार: देश के अस्तित्व की लड़ाई को ‘कत्लेआम’ कहने वाले का महिमा मंडन क्यों?
1980 का दशक पंजाब और संपूर्ण भारत के लिए एक भीषण परीक्षा की घड़ी था। जरनैल सिंह भिंडरांवाले के नेतृत्व में चल रहा खालिस्तानी चरमपंथ कोई सामान्य कानून-व्यवस्था का संकट नहीं था। वह पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) और अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) द्वारा परदे के पीछे से नियंत्रित और पोषित एक अंतरराष्ट्रीय साजिश थी, जिसका एकमात्र उद्देश्य भारत का एक और हिंसक बंटवारा करना था।
स्वर्ण मंदिर (हरमंदिर साहिब) के भीतर भारी मात्रा में आधुनिक और घातक हथियारों का जखीरा जमा कर लिया गया था। तत्कालीन परिस्थितियों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (संघ) और भाजपा के शीर्ष नेताओं (अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी) ने भी स्पष्ट माना था कि यद्यपि यह कार्रवाई अत्यंत पीड़ादायक और दुखद है, लेकिन देश की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा के लिए यह एक ‘अनिवार्य कदम’ (Tragic Necessity) था। यदि सरकार और सेना उस समय चूक जाती, तो देश के नक्शे पर एक और विभाजन की लकीर खिंच जाती।
किंतु इस राष्ट्रीय संकट के समय चंद्र शेखर ने केवल अपनी ‘राजनैतिक अहमियत बढ़ाने’ के लिए एक खतरनाक और नकारात्मक राजनीति (Negative Politics) का रास्ता चुना:
- उन्होंने भारतीय सेना के इस अत्यंत कठिन और बलिदानों से भरे ऑपरेशन की निंदा करते हुए इसे “एक कत्लेआम” करार दिया।
- उन्होंने विदेशी ताकतों की साजिश और देश के विभाजन के वास्तविक खतरे को पूरी तरह दरकिनार करते हुए, सेना की भूमिका को ही कठघरे में खड़ा कर दिया।
- उनका यह स्टैंड पूरी तरह से एक संकीर्ण और अवसरवादी राजनीति से प्रेरित था, ताकि वे खुद को तत्कालीन सरकार के सबसे बड़े विरोधी के रूप में स्थापित कर सकें, भले ही इसके लिए देश की सुरक्षा दांव पर लग जाए।
भाजपा का पर्दाफाश: आज जो भाजपा विपक्ष से यह उम्मीद करती है कि वह सेना की हर कार्रवाई पर बिना सवाल किए पीछे खड़ी रहे, वही भाजपा सेना को ‘कत्लेआम का दोषी’ बताने वाले चंद्र शेखर के सामने किस राष्ट्रवाद के तहत नतमस्तक होती है? यदि सेना की अनिवार्य कार्रवाई को कत्लेआम कहना देशभक्ति है, तो भाजपा का आज का राष्ट्रवाद पूरी तरह ढोंग है। और यदि वह राष्ट्र-विरोधी कृत्य था, तो चंद्र शेखर का महिमा मंडन करके भाजपा आज खुद देशद्रोह की राजनीति को वैधता दे रही है।
2. अयोध्या विवाद: हिंदू आस्था के खिलाफ सैयद शहाबुद्दीन को खड़ा करने वाले का गुणगान क्यों?
भाजपा की राजनीति की दूसरी सबसे बड़ी आधारशिला ‘राम मंदिर आंदोलन’ और ‘सांस्कृतिक पुनरुत्थान’ रहा है। भाजपा हर चुनाव में हिंदुओं की आस्था और उनके ऐतिहासिक संघर्षों की दुहाई देकर वोट बटोरती है। किंतु अयोध्या विवाद को दशकों तक उलझाए रखने और हिंदू पक्ष के खिलाफ एक अभेद्य सांप्रदायिक दीवार खड़ी करने वाले असली सूत्रधार कोई और नहीं, स्वयं चंद्र शेखर थे।
- शहाबुद्दीन को राजनीतिक जीवनदान: भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी सैयद शहाबुद्दीन को राजनीति की मुख्यधारा में लाकर स्थापित करने और उन्हें ‘बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी’ (BMAC) के रूप में एक राष्ट्रीय मंच प्रदान करने का श्रेय चंद्र शेखर को ही जाता है।
- सांप्रदायिक वीटो का निर्माण: शहाबुद्दीन ने शाहबानो केस से लेकर अयोध्या विवाद तक, भारतीय राज्यव्यवस्था को ब्लैकमेल करने के लिए जिस ‘मुस्लिम सांप्रदायिक वीटो’ का निर्माण किया, उसे चंद्र शेखर का पूर्ण वैचारिक और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था।
- समझौते की मेज को तोड़ना: जब भी अयोध्या विवाद को साक्ष्यों के आधार पर सुलझाने का प्रयास किया गया, शहाबुद्दीन ने कट्टरपंथ और वामपंथी इतिहासकारों की आड़ लेकर बैठकों का बहिष्कार किया। चंद्र शेखर ने अपने इस ‘प्रॉडक्ट’ पर कभी कोई नियंत्रण नहीं रखा, क्योंकि शहाबुद्दीन की यह नकारात्मक और अड़ियल राजनीति केंद्र में चंद्र शेखर की अपनी कमजोर बैसाखियों वाली सत्ता को टिकाए रखने के लिए जरूरी थी।
भाजपा का पर्दाफाश: संघ और विहिप के लाखों कार्यकर्ताओं ने जिस शहाबुद्दीन के सांप्रदायिक वीटो के खिलाफ 500 वर्षों की लड़ाई को अंजाम दिया, उस शहाबुद्दीन के निर्माता और राजनीतिक आका चंद्र शेखर की जयंतियों पर भाजपा नेताओं का यह अति-उत्साह शहीदों की आत्माओं के साथ एक क्रूर मखौल है। यह प्रमाणित करता है कि भाजपा के लिए राम मंदिर आंदोलन के घाव और हिंदुओं की भावनाएं केवल और केवल सत्ता की सीढ़ी थीं।
3. निष्कर्ष: वोट बैंक की मंडी में वैचारिक भद पीटती भाजपा
इस पूरे विश्लेषण से यह अकाट्य सत्य सामने आता है कि चंद्र शेखर का संपूर्ण राजनीतिक चरित्र राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव के मुद्दों पर केवल ‘नेगेटिव पॉलिटिक्स’ के जरिए अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक प्रासंगिकता को बनाए रखने का था। वे देश के विभाजन की साजिश रचने वाली ताकतों के खिलाफ खड़ी सेना का विरोध कर सकते थे और बहुसंख्यक समाज की आस्था को दबाने के लिए शहाबुद्दीन जैसे चेहरों को शह दे सकते थे।
भाजपा द्वारा ऐसे नकारात्मक राजनीति के पुरोधा का किया जाने वाला महिमा मंडन यह साबित करता है कि सत्ता के बाजार में जब सौदा तय होता है, तो विचारधाराएं मलबे की तरह फेंक दी जाती हैं।
- विशिष्ट जातियों (जैसे राजपूत/ठाकुर मतदाताओं) के तुष्टीकरण और चुनावी गोटियां सेट करने के लिए भाजपा ने अपने ही राष्ट्रवाद की भद पिटवा ली।
- जो व्यक्ति सेना के शौर्य को कत्लेआम कहे, वह भाजपा के लिए ‘महान दूरदर्शी’ बन जाता है।
- जो व्यक्ति हिंदू आस्था के खिलाफ शहाबुद्दीन को खड़ा करे, वह भाजपा के लिए ‘श्रद्धेय’ बन जाता है।
यह विरोधाभास आज की भाजपा के उस मलिन और दोहरे चरित्र का पूर्ण पर्दाफाश है जो दिखाता है कि इनके लिए राष्ट्रवाद, सेना का सम्मान और राम का नाम केवल चुनावी बिसात के मोहरे हैं, जिन्हें सत्ता की मलाई चाटने के लिए किसी भी समय बदला जा सकता है। आज इतिहास भाजपा को उसके इसी वैचारिक खोखलेपन और अवसरवाद के लिए कटघरे में खड़ा करता है।







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