किसी भी लोकतंत्र का चरित्र इस बात से तय नहीं होता कि उसकी सरकार के पास कितना प्रचंड बहुमत है; लोकतंत्र की आत्मा उसकी संवाद-शैली में बसती है। कानून संसद में बनते हैं, योजनाएँ फाइलों में चलती हैं और चुनाव रैलियों में जीते जाते हैं, लेकिन इतिहास किसी प्रधानमंत्री को उसकी रैलियों की भीड़ से नहीं, बल्कि उसकी भाषा की गरिमा से याद रखता है।
प्रधानमंत्री के शब्द केवल एक राजनेता की राय नहीं होते—वे पूरे राष्ट्र का नैतिक मानक बन जाते हैं। जब देश का सर्वोच्च नेता बोलता है, तो उसकी अनुगूँज भावी पीढ़ियों के आचरण को दिशा देती है।
इसीलिए आज यह सवाल किसी राजनीतिक विरोध का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक पीड़ा का विषय है: क्या 2014 में ‘व्यवस्था परिवर्तन’ की उम्मीद बनकर आए नरेंद्र मोदी और आज के नरेंद्र मोदी वास्तव में एक ही व्यक्ति हैं?
1. वह ‘नैतिक साहस’ जो इतिहास की उम्मीद बना था
याद कीजिए 2014 का वह दौर। नरेंद्र मोदी केवल एक जननेता के रूप में नहीं उभरे थे, बल्कि उन्हें भारतीय राजनीति में शिष्टाचार और कठोर निर्णय लेने वाले एक अनुशासित नायक के रूप में देखा गया था। विरोधी भी उनकी संवाद कला और स्पष्टता के कायल थे।
उस दौर में उनके दो बयानों ने देश के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताने-बाने को एक बड़ा ढांढस बंधाया था:
- साध्वी प्रज्ञा विवाद: जब अपनी ही पार्टी की नेता ने महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को “देशभक्त” कहा, तो प्रधानमंत्री ने बिना लाग-लपेट के कहा—“मैं उन्हें जीवन भर मन से माफ़ नहीं कर पाऊँगा।”
- गौ-रक्षा के नाम पर हिंसा: जब देश में भीड़ द्वारा हिंसा (मॉब लिंचिंग) की घटनाएँ बढ़ीं, तो उन्होंने कठोर लहजे में चेताया—“गौ-सेवा के नाम पर दुकान चलाने वाले ये लोग गो-सेवक नहीं, असामाजिक तत्त्व और गुंडे हैं।”
इन दोनों बयानों ने यह विश्वास जगाया था कि सत्ता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति अपनी ही विचारधारा के अतिवादियों को मर्यादा में रखने का नैतिक साहस रखता है।
2. संवाद का अवमूल्यन: व्यंग्य से व्यक्तिगत हमले तक
लेकिन समय के साथ यह ‘नैतिक अनुशासन’ सत्ता की राजनीतिक प्राथमिकताओं के नीचे दब गया। प्रधानमंत्री की भाषा का स्तर धीरे-धीरे राजनीतिक नीतियों के विरोध से हटकर व्यक्तिगत अवमानना की ओर मुड़ गया।
- व्यक्तिगत कटाक्षों की शुरुआत: गुजरात चुनाव के दौरान सोनिया गांधी के लिए “जर्सी गाय” और राहुल गांधी के लिए “हाइब्रिड बछड़ा” जैसे शब्दों का प्रयोग राजनीतिक व्यंग्य की सीमा लांघ गया।
- संसदीय गरिमा पर चोट: 2019 के चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत राजीव गांधी के लिए यह कहना कि “उनका जीवन भ्रष्टाचारी नंबर-1 के रूप में समाप्त हुआ”, एक ऐसे व्यक्ति पर आघात था जो अपना पक्ष रखने के लिए जीवित भी नहीं था। इसी तरह संसद में विपक्षी महिला सांसद के अट्टहास पर “रामायण सीरियल” का तंज कसना भले ही सीधा शब्द न हो, लेकिन उसका राजनीतिक संकेत बेहद शर्मनाक था।
- लाल किला बनाम चुनावी मंच: एक तरफ लाल किले की प्राचीर से ‘नारी सम्मान’ और ‘सबका साथ, सबका विकास’ का आह्वान होता है, तो दूसरी तरफ चुनावी रैलियों में “मंगलसूत्र”, “घुसपैठिए”, “जिनके ज्यादा बच्चे हैं”, “शहज़ादा” और “बाल बुद्धि” जैसी शब्दावली का बार-बार इस्तेमाल किया जाता है।
सवाल यह है: क्या चुनावी जीत इतनी अपरिहार्य हो गई है कि उसके लिए पद की मर्यादा को दांव पर लगाना पड़े?
3. ‘मौन स्वीकृति’ का दुष्परिणाम: जब निचले स्तर पर मर्यादा ध्वस्त हुई
जब नेता मर्यादा की रेखा को धुंधला करता है, तो उसके अनुयायी उस रेखा को पूरी तरह मिटा देते हैं। आज भाजपा के भीतर जो अनुशासनहीनता और जहरीली भाषा का बोलबाला दिखता है, वह शीर्ष नेतृत्व के ढीले पड़ते नैतिक नियंत्रण का ही परिणाम है।
- संसद के भीतर अमर्यादित आचरण: लोकसभा में भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी द्वारा विपक्षी सांसद दानिश अली के खिलाफ जिस तरह के असंसदीय और सांप्रदायिक शब्दों का प्रयोग किया गया, उसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का सिर झुका दिया। बदले में क्या हुआ? केवल एक कागजी नोटिस।
- सेना और संवैधानिक संस्थाओं पर प्रहार: मध्य प्रदेश के मंत्री कुंवर विजय शाह द्वारा सेना की महिला अधिकारी पर आपत्तिजनक टिप्पणी हो, या सांसद निशिकांत दुबे द्वारा सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं पर अनियंत्रित बयानबाज़ी—इन्हें “व्यक्तिगत बयान” कहकर पल्ला झाड़ लेना शीर्ष नेतृत्व की नैतिक लाचारी को दर्शाता है।
- सार्वजनिक विमर्श का पतन: दिल्ली से लेकर राज्यों के चुनावी समर तक, नेताओं द्वारा प्रतिद्वंद्वियों के माता-पिता और व्यक्तिगत जीवन पर किए जाने वाले निचले स्तर के हमले अब अपवाद नहीं, नियम बन चुके हैं।
4. अटल की विरासत और आज का विरोधाभास
यहाँ पंडित नेहरू या अटल बिहारी वाजपेयी को याद करना केवल पुरानी यादों में खोना नहीं है, बल्कि उस मानक को याद करना है जो हमने खो दिया है।
अटल जी भी प्रखर वक्ता थे। वे नेहरू और कांग्रेस की नीतियों की धज्जियाँ उड़ा देते थे, लेकिन उनके शब्दों में एक अभिजात लालित्य और विरोधी के प्रति सम्मान होता था। उन्होंने कहा था:
“सरकारें आएँगी-जाएँगी, पार्टियाँ बनेंगी-बिगड़ेंगी, लेकिन यह देश रहना चाहिए, इस लोकतंत्र का अमर रहना चाहिए। मतभेद हो सकते हैं, मनभेद नहीं होने चाहिए।”
अटल जी जानते थे कि राजनीति में प्रतिद्वंद्वी ‘शत्रु’ नहीं होता। लेकिन आज की भाषा अपने राजनीतिक विरोधी को “देशद्रोही” और “परजीवी” सिद्ध करने पर तुली है।
5. निष्कर्ष: बहुमत का अहंकार बनाम नैतिक आभामंडल
यह तर्क दिया जा सकता है कि आज विपक्ष की भाषा भी कौन-सी दूध की धुली है? विपक्ष के नेता भी मर्यादा लांघते हैं। लेकिन तुलना समान स्तर पर नहीं हो सकती।
विपक्ष का नेता एक दल का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि भारत का प्रधानमंत्री 140 करोड़ भारतीयों के लोकतांत्रिक चरित्र का चेहरा होता है। दुनिया भारत को केवल उसकी जीडीपी (GDP) या सैन्य ताकत से नहीं नापती; वह यह भी देखती है कि भारत का नेतृत्व अपने विरोधियों से किस भाषा में बात करता है।
आज नरेंद्र मोदी के पास प्रचंड बहुमत है, वैश्विक मंचों पर प्रभाव है और अभेद्य चुनावी मशीनरी है। लेकिन किसी भी जननेता की सबसे बड़ी पूँजी उसकी चुनावी सफलता नहीं, उसका नैतिक आभामंडल होता है।
जब भाषा की मर्यादा टूटती है, तो वह नैतिक आभामंडल भी धूमिल होने लगता है। भारत आज भी उसी 2014 वाले मोदी की प्रतीक्षा कर रहा है जो ‘परिवर्तन’ का वादा लेकर आया था—एक ऐसा नेता जिसकी सबसे बड़ी ताकत केवल उसका भाषण नहीं, बल्कि उसकी भाषा की मर्यादा थी।






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