सड़कों पर उतरते सामान्य वर्ग के युवाओं का आक्रोश केवल एक नीतिगत असंतोष नहीं, बल्कि चरमराती अर्थव्यवस्था और सिकुड़ते अवसरों के बीच खड़े एक पूरे समाज की संरचनात्मक बेचैनी का विस्फोट है। जब प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपनी जवानी खपाने वाला एक गरीब सवर्ण छात्र आरक्षण व्यवस्था को अपनी तबाही का कारण मानकर आंदोलित होता है, तो वह व्यवस्था के असली खलनायक को पहचानने से चूक जाता है। दूसरी ओर, समाजशास्त्रीय और राजनीतिक विमर्शों का एक वर्ग इस आंदोलन को केवल पारंपरिक जातीय प्रभुत्व की वापसी और सामाजिक बराबरी के प्रति असहजता के रूप में देखता है।

इस वैचारिक खींचतान के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सचमुच जाति बनाम जाति का संघर्ष है, या फिर पूंजी के आक्रामक संकेंद्रण से उपजी व्यापक दरिद्रता का वह आक्रोश है जिसे पहचान की राजनीति ने भटका दिया है?

दो ध्रुवों में बंटा विमर्श: जातीय विशेषाधिकार या अस्तित्व का संकट?

सामान्य वर्ग के आंदोलन की व्याख्या दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों से की जाती रही है:

सामाजिक वर्चस्व का दृष्टिकोण: विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि इस विरोध की जड़ें उस ऐतिहासिक मानसिकता में हैं जो वंचितों को समान धरातल पर स्वीकार नहीं कर पाती। उनका तर्क है कि जब पारंपरिक रूप से हाशिए पर रहे तबकों को संविधान के माध्यम से सत्ता और अवसरों में भागीदारी मिलती है, तो सदियों से चले आ रहे पदानुक्रम को झटका लगता है। इस नजरिए के अनुसार, जब राजनीति धार्मिक प्रतीकों और पुरातन व्यवस्था का महिमामंडन करती है, तब सवर्ण समाज का एक वर्ग स्वाभाविक रूप से यह अपेक्षा करने लगता है कि व्यवस्था उसके पारंपरिक विशेषाधिकारों की रक्षा करे।

बढ़ती गरीबी और कुंठा का दृष्टिकोण: इसके विपरीत, धरातल की वास्तविक सच्चाई यह है कि आर्थिक असुरक्षा अब किसी जाति विशेष तक सीमित नहीं रही। सामान्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा आज उस आर्थिक दलदल में फंसा है जहां शिक्षा और स्वास्थ्य की बुनियादी कीमतें उसकी पहुंच से बाहर हो चुकी हैं। यह आंदोलन किसी दूसरे के अधिकारों को छीनने की लालसा से अधिक अपने डूबते भविष्य को बचाने की घबराहट से पैदा हुआ है।

समस्या यह है कि सत्ता और राजनीतिक दल युवाओं के इस वास्तविक आर्थिक संकट को जातीय प्रतिद्वंद्विता के अखाड़े में तब्दील कर देते हैं, जिससे व्यवस्था की मूल कमियां विमर्श से बाहर हो जाती हैं।

गरीबी की बदलती परिभाषा और सम्मानजनक जीवन का ह्रास

गरीबी को केवल भुखमरी या ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ की न्यूनतम उपलब्धता तक सीमित रखना आधुनिक उपभोक्तावादी अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा धोखा है।

पारंपरिक गरीबी रेखा = केवल जैविक अस्तित्व (न्यूनतम कैलोरी, बुनियादी वस्त्र)

आधुनिक मानवीय दरिद्रता = सम्मानजनक आजीविका का अभाव + शिक्षा/स्वास्थ्य की असुरक्षा + अंतहीन कर्ज

आज देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जो आधिकारिक आंकड़ों में ‘रोजगारशुदा’ दर्ज हैं, लेकिन उनकी वास्तविक आय इतनी कम है कि वे एक महीने का अप्रत्याशित चिकित्सीय खर्च भी नहीं उठा सकते। एक निजी फर्म में 12 से 15 हजार रुपये पर 12 घंटे खटने वाला सवर्ण या गैर-सवर्ण युवा तकनीकी रूप से बेरोजगार नहीं है, लेकिन व्यावहारिक रूप से वह एक आधुनिक बंधुआ मजदूर है।

जब निजीकरण के दौर में उच्च शिक्षा लाखों रुपये के पैकेज में बिकने लगे और निजी अस्पताल एक मध्यमवर्गीय परिवार की पूरी जीवनभर की कमाई कुछ दिनों में सोख लें, तो यह सिर्फ गरीबी नहीं बल्कि गरिमापूर्ण मानवीय जीवन का व्यवस्थित संहार है। सड़कों पर दिखने वाली हताशा इसी संहार का परिणाम है।

क्रोनी कैपिटलिज्म: जनसाधारण की लूट और कॉरपोरेट समाजवाद

आम जनता जब आरक्षण की दशमलव-प्रतिशत वाली सीटों के लिए आपस में लड़ रही होती है, उसी समय देश के संसाधनों की सबसे बड़ी लूट शांतिपूर्वक फाइलों में दर्ज हो रही होती है।

आर्थिक आयाम आम नागरिक की स्थिति कॉरपोरेट दिग्गजों की स्थिति

ऋण एवं देनदारी मामूली किस्त न चुकाने पर संपत्ति कुर्क, सामाजिक अपमान हजारों करोड़ की देनदारी पर 80-90% की ‘हेयरकट’ छूट

संसाधनों की पहुंच छोटे उद्यम के लिए जमीन और कर्ज मिलना असंभव ₹1 की लीज पर हजारों हेक्टेयर जमीन और त्वरित बुनियादी ढांचा

जोखिम और सुरक्षा बाजार के हर झटके (महंगाई, छंटनी) का सीधा शिकार घाटे का समाजीकरण (सरकारी बेलआउट), मुनाफे का निजीकरण

कर प्रणाली अप्रत्यक्ष करों (GST) का सबसे भारी बोझ कॉरपोरेट टैक्स में भारी कटौतियां और सब्सिडी

जी समूह और सुभाष चंद्रा का मामला इस व्यवस्थागत पक्षपात का क्लासिक उदाहरण है, जहां 22,000 करोड़ रुपये से अधिक की देनदारियों को महज कुछ सौ करोड़ में निपटाने की खबरें सुर्खियां बनती हैं। राष्ट्रीय बैंकों द्वारा बड़े औद्योगिक घरानों के लाखों करोड़ रुपये के फंसे कर्ज (NPA) को बट्टे खाते में डाल दिया जाता है।

जब सत्ता ‘एक रुपये से एक करोड़’ बनाने के सपने दिखाकर गिने-चुने कॉरपोरेट ड्रैगन्स को बैंकों के दरवाजे खोल देती है, तो इसका सीधा गणित यह होता है कि एक बड़े उद्योगपति के 1 करोड़ रुपये के कृत्रिम मुनाफे के पीछे औसतन 1 हजार आम मेहनतकशों को गरीबी और निम्न वेतन के दलदल में धकेला जाता है।

सरकारी नौकरियों की मृगतृष्णा: आंकड़ों का सच

सामान्य वर्ग के युवाओं का यह सोचना कि आरक्षण हटने या कम होने से उनकी बेरोजगारी और गरीबी का संकट हल हो जाएगा, एक सांख्यिकीय भ्रम के अलावा कुछ नहीं है।

कुल भारतीय कार्यबल: ~55 से 60 करोड़

संगठित सरकारी नौकरियां: ~2 से 3 करोड़ (कुल कार्यबल का मात्र 4-5%)

रिक्तियां प्रति वर्ष: कुछ लाख (प्रतिस्पर्धा करने वाले युवा: करोड़ों)

यदि गणितीय रूप से मान भी लिया जाए कि देश की 100% सरकारी नौकरियां केवल सामान्य वर्ग को दे दी जाएं, तब भी 90% से अधिक सवर्ण युवा बेरोजगार और दरिद्र ही रहेंगे। इसका कारण स्पष्ट है:

पदों का संकुचन: सरकारें लगातार पदों को ‘सरेंडर’ कर रही हैं या उन्हें ठेके (कॉन्ट्रैक्ट) और आउटसोर्सिंग में बदल रही हैं।

स्थायी रोजगार का अंत: रक्षा सेवाओं में ‘अग्निवीर’ जैसी योजनाएं और विश्वविद्यालयों व सार्वजनिक उपक्रमों में तदर्थवाद इस बात का प्रमाण हैं कि राज्य अब स्थायी रोजगार देने की अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह पीछे हट रहा है।

सार्वजनिक उपक्रमों की बिक्री: रेलवे, हवाई अड्डे, बंदरगाह और ऊर्जा क्षेत्र जैसे विशाल रोजगारदाता संस्थानों को चुनिंदा पूंजीपतियों को सौंपा जा रहा है, जहां न आरक्षण का नियम लागू होता है और न ही पेंशन व सेवा सुरक्षा की गारंटी।

एकाधिकारवादी अर्थव्यवस्था और पूंजी का संकेंद्रण

वर्तमान आर्थिक मॉडल प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने का दावा करता है, लेकिन व्यवहार में यह खुले तौर पर ‘मोनोपॉली’ (एकाधिकार) और ‘ओलिगोपॉली’ (कुछ लोगों का नियंत्रण) को स्थापित करता है।

पारंपरिक आजीविका का विनाश: जब ई-कॉमर्स और रिटेल के बड़े जायंट्स को सरकारी नीतियों से असीमित बढ़ावा मिलता है, तो मोहल्ले के लाखों छोटे दुकानदार, सप्लायर और कामगार तबाह हो जाते हैं।

कृत्रिम शेयर मूल्यांकन: वित्तीय हथकंडों, शेल कंपनियों और कर्ज के बल पर कंपनियों के शेयर मूल्य हजारों गुना चढ़ाए जाते हैं। इस सट्टेबाजी से उपजी संपदा का जमीनी उत्पादकता से कोई संबंध नहीं होता।

वेतन दमन (Wage Suppression): बाजार में जब कुछ ही खरीदार और रोजगारदाता बचते हैं, तो वे श्रम की कीमतें मनमाने ढंग से तय करते हैं। कामगारों की सौदेबाजी की ताकत (Bargaining Power) शून्य हो जाती है, जिससे समाज में काम करने वालों और मुनाफा कमाने वालों के बीच की खाई विकराल होती चली जाती है।

विकल्प की रूपरेखा: एक नए आर्थिक मॉडल की अनिवार्यता

इस चौतरफा संकट से बाहर निकलने का रास्ता जातियों के आपसी गृहयुद्ध से नहीं, बल्कि नीतिगत ढांचे को बदलने के लिए एक संयुक्त नागरिक संघर्ष से निकलेगा। इस नए मॉडल के प्रमुख स्तंभ निम्नलिखित होने चाहिए:

एंटी-ट्रस्ट और एकाधिकार-विरोधी नीतियां: किसी भी एक कॉरपोरेट घराने को रणनीतिक क्षेत्रों (दूरसंचार, बंदरगाह, ऊर्जा, खुदरा व्यापार) में एकाधिकार स्थापित करने से रोकने के लिए कड़े कानून।

श्रम की गरिमा और न्यूनतम वेतन की गारंटी: असंगठित और गिग इकॉनमी के हर कामगार के लिए अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा और महंगाई के अनुपात में न्यूनतम सम्मानजनक वेतन।

पूंजी का विकेंद्रीकरण: बैंकों का फोकस चुनिंदा घरानों को भारी कर्ज देने के बजाय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) और वास्तविक उत्पादन करने वाले जमीनी उद्यमियों को आसान पूंजी उपलब्ध कराने पर हो।

मुनाफे और करों का तार्किक पुनर्वितरण: अत्यधिक संपत्ति और अनियंत्रित कॉरपोरेट मुनाफे पर प्रगतिशील कर (Progressive Taxation) लगाकर उस राजस्व को विश्वस्तरीय सार्वजनिक शिक्षा, सार्वभौमिक स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर खर्च करना।

जब तक सवर्ण और आरक्षित वर्ग का युवा एक-दूसरे को अपनी बदहाली का कारण समझता रहेगा, तब तक नीतियों की लूट का यह तंत्र सुरक्षित रहेगा। आरक्षण सामाजिक प्रतिनिधित्व का एक संवैधानिक माध्यम है, लेकिन वह व्यापक आर्थिक गरीबी का संपूर्ण समाधान कभी नहीं था। आज की ऐतिहासिक आवश्यकता यह है कि देश का नौजवान जातीय सीमाओं को तोड़कर एक ‘नागरिक’ के रूप में संगठित हो और सवाल पूछे कि देश की दौलत मुट्ठी भर तिजोरियों में कैसे कैद हो रही है। असली लड़ाई आरक्षण के पक्ष या विपक्ष की नहीं, बल्कि संसाधनों पर जनता के अधिकार और एक जनपक्षधर आर्थिक व्यवस्था के निर्माण की है।

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