08orai01उरई। भाजपा और बसपा के गढ़ कहे जाने वाले जालौन जिले में समाजवादी पार्टी ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के बाद जनपद में अपना ऐसा परचम लहराया है कि दूसरी पार्टियों के होश उड़ गये हैं। इस कवायद में हमीरपुर जिले से आकर अपनी पैठ जमाने वाले पूर्व सांसद घनश्याम अनुरागी जिले के राजनैतिक पटल पर सबसे कददावर नेता बनकर स्थापित हो गये हैं। उन्होंने राजनैतिक समीकरणों को पूरी तरह पार्टी के पक्ष में मोड़ने में जो प्रभावी भूमिका निभाई उससे लोगों को भाजपा के दिवंगत नेता बाबूराम एमकाम के चाणक्य कौशल की याद आ गई है।
वैसे तो जालौन जिले में लोकदल के समय से ही सोशलिस्टों का जलवा रहा है। 1980 में जिले की चार विधानसभा सीटों में से दो पर लोकदल का परचम लहराया था और पार्टी के दोनो ही विधायक धुरंधर नेता थे। इनमें कालपी से चै. शंकर सिंह और माधौगढ़ से दलगंजन सिंह शामिल थे। इन दोनों नेताओं ने विधान सभा में तत्कालीन कांग्रेस सरकार की नाक में दम करके रख दिया था। इस कारण लोकदल में जालौन जिले का दबदबा इतना बढ़ गया था कि उत्तर प्रदेश युवा लोकदल की कमान प्रदेश के तमाम दिग्गज युवा नेताओं के बीच दलगंजन सिंह को सौंपी गई थी। दलगंजन सिंह का कार्यकाल के बीच में ही निधन हो गया जिसके बाद हुए उपचुनाव में कांगे्रस द्वारा सत्ता के भारी दुरुपयोग के बावजूद जिले में मजबूत जड़ों की वजह से फिर लोकदल के ही उम्मीदवार जितेंद्र शाह ने विजय पताका लहराई थी।
लेकिन बाद में जिले से लोकदल की राजनीति का सफाया हो गया। पड़ोस के जिले के नेता मुलायम सिंह प्रदेश से लेकर देश की राजनीति तक में शिखर तक पहुंचे लेकिन जालौन जिले का पुरसाहाल नही हो सका। यहां तक कि चैधरी शंकर सिंह को 1989 में मुलायम सिंह की सरकार में प्रदेश के आज तक के सर्वश्रेष्ठ कृषि मंत्री रहने के बावजूद बाद के चुनावों में लगातार पराजय का मुंह देखना पड़ा। इसी दौर में जिले में भाजपा और बसपा ने जोरदार रफ्तार पकड़ी। जबकि 1993 में गठित समाजवादी पार्टी मुलायम सिंह के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बावजूद जिले में अपना वजूद कायम करने के लिए तरसती रही।
बहरहाल यहां समाजवादी पार्टी के दबदबे की शुरुआत 2009 में घनश्याम अनुरागी द्वारा पहली बार जिले की किसी सीट को जीतने के साथ हुई। उन्होंने लोकसभा चुनाव की जंग फतह करके पार्टी की ऐसी बोहनी की कि इसके बाद जिले में उसके लिए गतिरोध की स्थिति टूट गई। 2010 में समाजवादी पार्टी ने जिले के प्रथम नागरिक का चुनाव जीता जब शिशुपाल सिंह यादव बसपा की सरकार होते हुए भी जिलापंचायत अध्यक्ष चुने गये। 2012 के विधान सभा चुनाव में उरई सदर की सीट से जिले में समाजवादी पार्टी ने प्रांतीय राजनीति में अपना खाता खोला। हालांकि 2014 में प्रदेश भर में मोदी सुनामी की वजह से यहां भी अनुरागी को अपनी सीट गंवानी पड़ी। लेकिन इससे जो लोग उनके कैरियर और समाजवादी पार्टी के जिले में जीत के सफरनामे को विराम लगना मान रहे थे उन्हें अब अपनी धारणा बदलने को मजबूर होना पड़ेगा।
पराजय की कसक से हताश होने की बजाय घनश्याम अनुरागी पार्टी के अंदर से लेकर बाहर तक के अपने विरोधियों से पूरी ताकत से जूझने में जुट गये। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के हाईकमान ने न केवल उन पर भरोसा कायम रखा बल्कि जिले में उन्हें पार्टी के सिरमौर का दर्जा दे दिया। इसके बाद अनुरागी ने पार्टी की उम्मीदों पर अपने को खरा साबित करते हुए पूरे समर्पण के साथ त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में ऐसे कमाल की व्यूह रचना की कि जिला पंचायत से लेकर क्षेत्र पंचायत प्रमुखों के चुनाव तक में पार्टी का ही नगाड़ा बजा। जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में उनके प्रयासों से पार्टी की उम्मीदवार फरहानाज के सामने दूसरे दल पर्चा तक भरने का साहस नही कर सके। कमोवेश यही हालत क्षेत्र पंचायत प्रमुखों के चुनाव में हुई। 9 ब्लाॅको में से 8 में तो पार्टी के घोषित उम्मीदवार जीते ही। नवें ब्लाॅक नदीगांव से विजयी सावित्री देवी के पति चंदन पाल ने भी चुनाव परिणाम की घोषणा के तत्काल बाद अपने आप को पहले से समाजवादी पार्टी का सदस्य बताने में गुरेज नही किया। पंचायत चुनावों में इकतरफा कामयाबी से समाजवादी पार्टी ने जिले में जड़ों तक अपनी स्थिति मजबूत करने का सुबूत दे दिया है। जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बुलंदी पर है।
इस पूरे राजनैतिक सफरनामे में बाबूराम दादा की तरह ही घनश्याम अनुरागी ने सामाजिक समीकरण के संयोजन मे भी विलक्षण कूटनीति का लोहा मनवाया है। विभिन्न कारणों से मुस्लिम मतदाता समाजवादी पार्टी से छिटक रहे थे लेकिन फरहानाज के जिला पंचायत अध्यक्ष के रूप में चुनाव से इस वर्ग के वोटर फिर पूरी तरह पार्टी के पाले में आते दिख रहे हैं। गैर जाटव दलितों की पार्टी के पक्ष में लामबंदी की रणनीति अनुरागी ने ब्लाॅक प्रमुख पद के प्रत्याशियों के चयन में दिखाई है। जिसका रंग विधान सभा चुनाव में सपा की संभावनाओं पर जरूर ही चढ़ेगा। बैकवर्ड की सभी जातियों के ध्रुवीकरण में समाजवादी पार्टी जिले में नंबर एक पर है। शीतल सिंह सेंगर जैसे नई ऊर्जा के नेताओं को आगे लाकर सवर्णों के बीच पार्टी के पासे मजबूत करने का भी प्रयास अनुरागी ने किया है।
दूसरी पार्टियों के बीच अनुरागी के प्रयासों से खलबली का माहौल है लेकिन विधानसभा चुनाव तक अपनी इस रफ्तार को बनाये रखना उनके लिए फिर भी एक बड़ी चुनौती की तरह है। जिस पर जिले की राजनीति का बारीकी से विश्लेषण करने वाले सयानों की निगाहें टिकी हुई हैं।

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