27c0e33e-70ae-40cd-b9cb-6e01381eb0ceउरई। वीर बुंदेलों की भूमि बुंदेलखंड में महिलाओं के जुझारूपन की चर्चाऐं भी रानी लक्ष्मीबाई से फूलन देवी तक के किस्सों में फैली हुई हैं। बुंदेलखंड के महानायक आल्हा की पत्नी सुनवा की महिला गुप्तचर सेना की गाथा बताती है कि इस अंचल में सदियों पहले से महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों के साथ-साथ युद्ध के मोर्चे पर भी भूमिका निभाती रही हैं। इसी कड़ी में होली के समय जालौन जनपद के लुधियात क्षेत्र में महिलाओं द्वारा खेली जाने वाली लटठमार होली का भी नाम आता है। हालांकि यह परंपरा संरक्षण और प्रोत्साहन के अभाव में अब विलुप्त होने की कगार पर है।
बुंदेलखंड में एक ओर टेसू-झिझियां के विवाह के खेल की परंपरा देखी जाती है। जिसमें किशोरियों की सुकुमार संवेदनाओं को सहेजने की भावना नजर आती है तो दूसरी ओर महोबा राज्य के अंतर्गत आने वाले जिले के लुधियात क्षेत्र में हाल के एक दशक पहले तक होली के समय जोरशोर से महिलाओं द्वारा लाठियां मारकर पुरुषों को खदेड़ने का खेल प्रचलित रहा है। लुधियात की महिलाओं का लटठ संचालन का कौशल होली के समय देखने वाला रहता था। हर साल होने वाली होली महिलाओं के लठैत पराक्रम को तराशने की भूमिका निभाती थी। जाहिर है कि इससे एक ओर महिलाएं अपनी अस्मिता का बचाव करने में सक्षम रहती थी दूसरी ओर बाहरी आक्रमण के समय वे घर गांव के मर्दों के साथ मुकाबला करने में भी पीछे नही रहती होंगी।
गुलाबी गिरोह की जिला कमाण्डर अंजू शर्मा का कहना है कि आज महिला हिंसा की बढ़ती घटनाओं की वजह से छात्राओं और युवतियों को जूडो-कराटे का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। लेकिन जालौन जिले मे लटठमार होली और शादियों के समय खेले जाने वाले जोगी-जिंदा के खेल की अनूठी परंपराऐं याद दिलाती है कि यहां महिलाओं को युद्ध कला के प्रशिक्षण की जरूरत को काफी पहले महसूस कर लिया गया था।
क्या है जोगी-जिंदा
बुंदेलखंड में जब गांव के किसी लड़के की बारात में सारे मर्द बाराती बनकर चले जाते थे। तब महिलाएं रात भर बेलन और मूसल लेकर जोगी-जिंदा का खेल करती थी। इस दौरान जो भी मर्द चाहे वह गांव का छिपा हुआ कोई शख्स हो या बाहरी। अगर उनके हत्थे चढ़ जाता तो अपने घरेलू सामान को ही हथियार बनाकर वे उसकी वो गत बना देती थीं कि उसे छुटकारा पाने के लिए सारी कलाबाजी भूलकर महिलाओं के सामने हा-हा करनी पड़ती थी।

Leave a Reply