29orai03उरई। सपा के भितरघात से जिला पंचायत अध्यक्ष की सीट तक पहुंची सुमन निरंजन पर अब बसपा और सपा दोनों अपना-अपना अधिकार जताने में जुटे हुए हैं। फिर भी कोई भी पार्टी अभी यह दावा नही कर पा रही है कि सदस्यों को मुंहमांगी कीमत अदा करने वाली सुमन निरंजन कब उनकी पार्टी की सदस्यता ग्रहण करेंगीं।
बसपा के छह और भाजपा के चार सदस्य चुनाव जीते थे। बसपा की ओर से प्रेस कांफ्रेस कर इस प्रकार की घोषणा नही की गई थी कि वह सुमन को अपना समर्थन दे रहे हैं। अंदरखाने से ही निर्दलीय प्रत्याशी के साथ उनकी सांठगांठ चल रही थी। बसपा की ओर से चुनाव में अपना कोई प्रत्याशी भी खड़ा नही किया गया। जबकि भाजपा अंत-अंत तक चुनाव मैदान में डटे रहने का संकेत देती रही। हालांकि जब हकीकत का अंदाजा हुआ तो चुनावी समीकरण गांठने की भी तैयारियां शुरू कर दी गईं। भाजपा ने अपना उम्मीदवार अर्चना गौतम को घोषित किया था। उधर सपा जिलाध्यक्ष इंद्रजीत सिंह यादव व पूर्व सांसद घनश्याम अनुरागी भाजपा पर इस बात को लेकर हमलावर बने रहे कि अर्चना गौतम तो क्या भाजपा के अन्य तीनो सदस्य पहले से ही सुमन निरंजन के हाथों अपनी कीमत तय करा चुके हैं। भाजपा का चुनाव लड़ने का महज नाटक कर रही है उसे खुद प्रत्याशी का भी वोट नही मिलने वाला। ऐसा होना निश्चित था इसलिए भाजपा नेता इन आरोपों का जवाब देने का साहस नही जुटा पा रहे थे। बताया जाता है कि चुनाव के दौरान विजयी पक्ष को करीब 7 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े हैं।
2005 का चुनाव भाजपा ने जिला पंचायत अध्यक्ष पद का आखिरी चुनाव लड़ा था तब जगजोत सिंह गुर्जर बाबूजी को आनंद यादव के विरुद्ध बाबूराम दादा ने चुनाव लड़वाया था। इसके बाद से भाजपा मुकाबले में सीधे तौर पर कभी नही उतरी।
शिशुपाल यादव से बसपा लड़ी तो फरहा नाज निर्विरोध चुनी गई थीं। इन दोनों चुनाव में भाजपा विपक्ष की किसी भी भूमिका मे नही रही। ताजा चुनाव में भाजपा ने अपने प्रत्याशी अर्चना गौतम को दो दिन पहले ही बैठाकर निर्दलीय प्रत्याशी सुमन निरंजन की गोद में जाकर बैठ गई। अब उनकी जीत के बाद भाजपा और बसपा के द्वारा अपने-अपने पक्ष में दावे किये जा रहे हैं। दोनों दल यह मानकर चल रहे है कि सुमन निरंजन का निकटवर्ती संबंध उनसे ज्यादा है। बसपा यह तर्क दे रही है कि उसके छह में से पांच वोट सुमन के पक्ष में गये हैं जबकि भाजपा की यह संख्या चार ही है। प्रेस कांफ्रेंस के द्वारा सुमन के पक्ष में खुला समर्थन करने की घोषणा करने वाले भाजपा के नेता दावे के साथ अभी यह नही कह सकते कि निर्दलीय प्रत्याशी की हैसियत से जीती सुमन को वह भाजपा का कार्यकर्ता कब तक बना लेंगें। वैसे सुमन निरंजन के ऊपर किसी दल विशेष का कोई जोर नही चल सकता क्योंकि सभी मतों की ऊंची कीमत आंकी गई है। इन परिस्थितियों में पार्टियां अपनी तरफदारी को लेकर कितना भी गाल बजायें उनका नव निर्वाचित अध्यक्ष के ऊपर नैतिकता के आधार पर कोई दवाब नही बन रहा है।

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