12orai01 12orai02उरई। बसपा से दल बदल करने वाले नेताओ के खिलाफ पार्टी की ओर से तत्काल प्रतिक्रिया दी जाने की परंपरा रही है। जिसको देखते हुए अनुमान यह था कि बृजलाल खाबरी के बारे में भी कहा जायेगा कि वे बसपा के राष्ट्रीय महासचिव पद पर नही थे, यह झूठी जानकारी थी। साथ ही यह भी कहा जाता कि खाबरी को निष्कासित किया जा रहा था जिसकी जानकारी पहले से हो जाने के कारण उन्होंने कांग्रेस में अपना ठौर तलाश लिया। लेकिन अंदाजे के विपरीत बसपा उनके मामले में दो दिन बाद भी खामोश है। क्या उन्हें पार्टी में वापस लाने का प्लान बन रहा है या कोई बयान देने से बसपा नेतृत्व उनकी हैसियत बढ़ जाने की फिक्र कर रहा है।
खाबरी के पार्टी छोड़ने और कांग्रेस में शामिल हो जाने के घटनाक्रम पर बसपा नेतृत्व की उदासीनता हैरत में डालने वाली है। एक समय डाॅ. रामाधीन का वजूद पार्टी में मायावती से ऊपर था और तब मायावती शीर्ष पर आने के लिए उनके कांटे को निकालने की पेशबंदी कर रही थीं। इसमेें उन्होंने बृजलाल खाबरी का इस्तेमाल किया जो कि डाॅ. रामाधीन की ही यूथ बिग्रेड के मेम्बर थे। बृजलाल खाबरी से मायावती को रामाधीन के बारे में हर जानकारी मिल जाती थी। जिसे वे नमक मिर्च मिलाकर कांशीराम को बताती थीं तांकि उन्हें भड़काया जा सके। यहां तक कि एक बार रामाधीन के नाम से बैंक एकाउंट खोलकर उसमें लंबी रकम जमा करा दी गई। जिसके बाद मायावती ने कांशीराम से कहा कि ये शख्स मिशन के चंदे से अपनी पूंजी बना रहा है। कांशीराम इससे इतने नाराज हुए कि बाद में उन्होंने रामाधीन को पार्टी से निकाल दिया। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि शुरूआती दौर से ही बृजलाल खाबरी मायावती के कितने विश्वासपात्र कार्यकर्ता बन गये थे जिसके कारण उन्होंने ताकत मिलने के बाद बुंदेलखंड में जूनियर मोस्ट होते हुए भी बृजलाल को सबके ऊपर बिठा दिया। बृजलाल को उन्होंने 2007 के विधानसभा चुनाव के पहले राष्ट्रीय महासचिव का पद दिया था। लेकिन उन्होंने बृजलाल को कभी अदने कार्यकर्ता से ज्यादा नही माना। इसलिए मायावती जब नाराज हो गई तो उन्होंने 2007 में बृजलाल को जिला इकाई से निष्कासित करवाने की घोषणा करवाई। जबकि राष्ट्रीय स्तर के पदाधिकारी को जिला कमेटी पार्टी से निकाले इसे बसपा का अजीब दस्तूर ही माना जायेगा।
मायावती की निगाह में एक बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा का सदस्य रहने के बावजूद बृजलाल खाबरी का राजनीतिक अस्तित्व तुच्छ बना हुआ है इसलिए वे यह तक नही जताना चाहती कि बृजलाल नाम के उनकी पार्टी के किसी कार्यकर्ता ने कांग्रेस की सदस्यता ले ली है। इसकी उन्हें जानकारी तक है, दिलचस्पी तो दूर की बात है।
इस तरह बृजलाल के दलबदल को नजर अंदाज करने के पीछे एक तो गणित यह है। दूसरे उनके दलित और सजातीय होने की वजह से भी मायावती उनके मामले में तैश दिखाने की बजाय फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं। पूरे देश में धारणा यह है कि मायावती के किसी सजातीय में यह हिम्मत नही है कि वह अपनी तरफ से उनके खिलाफ बगावत कर जाये। इसकी एक भी नजीर लोगों की निगाह में आने पर सजातीयों पर उनकी पकड़ का तिलिस्म टूट सकता है। इस भय ने मायावती को संयमित कर रखा है।
लेकिन ऐसा भी नही है कि मायावती बृजलाल को सबक सिखाने की बजाय हाथ पर हाथ धरे बैठी हों। सूत्रों से खबर मिली है कि मायावती ने खुफिया तौर पर बृजलाल खाबरी के इस गृह जनपद मेेेें बसपा के उन पुराने मिशनरी नेताओं से संपर्क साधना शुरू कर दिया है जो बृजलाल का प्रभुत्व बढ़ने के बाद पार्टी से दूर चले गये थे। इनमें स्वयं रामाधीन तक का नाम शामिल है। साथ में पूर्व कैबिनेट मंत्री श्रीराम पाल और पूर्व विधायक शिवराम कुशवाहा को भी पार्टी में वापस बुलाने का प्लान बनाया गया है। ये प्रमुख नेता जिन पार्टियों में हैं उनमें वे उपेक्षा झेल रहे हैं। इसलिए उम्मीद है कि मायावती की ओर से कोशिश हो तो वे पसीज जायें।
इनके साथ-साथ विजय चैधरी, आत्माराम फौजी आदि को भी फिर से पार्टी से जोड़ने के लिए मायावती ने अपने दूत सक्रिय कर दिये हैं। मायावती की योजना खाबरी को अपने घर में ही इस तरह घेर देने की है जिससे उनका पुराने लोगों और सजातीयों से पूरी तरह अलगाव हो जाये। इस घटनाक्रम के चलते आने वाले कुछ ही दिनों में जिले की राजनीति में चैकाने वाले फेर बदल देखने को मिल सकते हैं।

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