
भ्रष्टाचार के मोर्चे पर निष्क्रियता के आरोप का सामना कर रही योगी सरकार ने दो सीनियर पीसीएस अधिकारियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई के जरिये अपनी छवि को उजला करने की कोशिश की है। इनमें मेरठ के अपर आयुक्त रणधीर सिंह दुहण को सीधे बर्खास्त कर दिया गया है जबकि दूसरे पीसीएस अधिकारी घनश्याम सिंह जो कि गौतम बुद्ध नगर में एडीएम राजस्व थे निलंबित कर दिये गये हैं। दुहण के खिलाफ पिछली सरकार में ही जांच रिपोर्ट दाखिल हो गई थी जो शासन स्तर पर लंबित थी। किसी सीनियर पीसीएस अधिकारी के खिलाफ सीधे बर्खास्तगी की कार्रवाई को असाधारण बताया जा रहा है तांकि इसके महत्व को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा सके और भ्रष्टाचार के विरोध में सरकार की कठोर प्रतिबद्धता को साबित किया जा सके। यह दूसरी बात है कि सरकार ने अपनी समझ में भले ही यह कदम उठाकर भ्रष्ट नौकरशाही पर कहर बरपा दिया हो पर अधिकारियों में इसे लेकर चौकन्नें होने जैसी कोई स्थिति नही देखी जा रही बल्कि नौकरशाही में इस पर बहुत ठंडी प्रतिक्रिया रही है। निश्चित रूप से यह एक सवाल होना चाहिए कि ऐसा क्यो है।
सरकार के दीपावली के तत्काल बाद इस आतिशबाजी जैसे धूमधड़ाके को लेकर लोगों में उत्साह की कमी के अपने कारण हैं। पूर्वांचल के एक एआरटीओ का भ्रष्टाचार का एक बड़ा मामला पकड़ा गया था जिसमें उसकी करोड़ों की सम्पत्ति जब्त की गई थी और उसे जेल भेज दिया गया था। यह कार्रवाई लोगों को पहले तो बहुत रास आई लेकिन बाद में इसमें पोल नजर आने लगी जब उक्त अधिकारी के पक्ष में अदालत के राहत देने वाले आदेश आने शुरू हो गये और जिसके पीछे सरकार की कमजोर पैरवी मानी गई। यादव सिंह के मामले में भी दाल में काला होने की स्थिति बनी। यादव सिंह के भ्रष्टाचार के तार महत्वपूर्ण राजनैतिज्ञों और उनके परिवार से जोड़े जा रहे थे जिससे लोगों को सनसनीखेज नतीजे सामने आने की उम्मीद बंध गई थी लेकिन यह जांच तार्किक परिणति पर पहुंचती इसके पहले ही जांच में ढील नजर आने लगी। इन घटनाओं ने ऐसी धारणाओं को बढ़ावा दिया है कि सरकार के ही कुछ विभीषणों का संरक्षण भ्रष्ट तत्वों को प्राप्त हो रहा है। सपा सरकार में जिन लोगों के खिलाफ लोकायुक्त की संस्तुतियों को अनदेखा कर दिया गया था वे अभी भी बचे हुए हैं। बल्कि यह लग रहा है कि लोकायुक्त की भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ पिछली रिपोर्टें स्थाई तौर पर दाखिल दफ़्तर की जा चुकी हैं। कथनी और करनी के अंतर के इस आभास से जनमानस में निराशा पैदा हुई है जो तब तक दूर नही हो सकती जब तक कि भ्रष्टाचार के मामले में दागियों के खिलाफ ताबड़तोड़ कार्रवाइयां हमलावर अंदाज में लोगों को नजर आनी शुरू नही होती। इसीलिए पीसीएस अधिकारियों के खिलाफ इतनी बड़ी ताजा कार्रवाई के बावजूद लोग संशय मुक्त नही हो पा रहे हैं।
रणधीर सिंह दुहण 2012-13 में शामली में एडीएम तैनात थे। उस समय उन्होंने 27 हैक्टेयर शत्रु सम्पत्ति को अनधिकार नीलाम कर दिया था। जिसमें करोड़ों रुपये का अवैध लाभ अर्जित किया गया था। मामला जानकारी में आने पर अखिलेश सरकार ने तत्काली मंडलायुक्त तनवीर जफर अली को इसकी जांच सौपी। मंडलायुक्त ने उनके खिलाफ आरोप सही पाये और कार्रवाई के लिए रिपोर्ट शासन को भेज दी जहां वह फाइलों में कैद हो गई। इतना ही नही हाल में ग्राम समाज के अनियमित स्थानांतरण के मामले में भी उनकी दुस्साहसिक हेराफेरी का भंडाफोड़ हुआ जिससे उन्हें सजा के तौर पर डिप्टी कलेक्टर के प्रारंभिक वेतनमान पर रिवर्ट कर दिया गया था। दुहण 1991 बैच के पीसीएस अधिकारी हैं और फरवरी 2018 में इनको रिटायर होना था। इस तरह अपनी पूरी नौकरी विवादित कारगुजारियों के जरिये उन्होंने जमकर मलाई काटते हुए गुजारी। अब वे आखिरी में जाकर फंसे हैं जिससे इनके सेवा निवृत्ति संबंधी तमाम लाभ और पेंशन खटाई में पड़ जाने की आशंका हो गई है। पर इन पर जेल भेजने जैसी कड़ी कार्रवाई न हुई तो बताते हैं कि ये इतना कमा चुके हैं कि सिर्फ आर्थिक-भौतिक नुकसान से इनकी सेहत पर कोई बड़ा फर्क नही पड़ेगा।
दूसरी ओर घनश्याम सिंह की दिलेरी को भी जान लेते हैं। 2012 में अपने बेटे के नाम से इन्होंने प्राइवेट लोगों से जमीन खरीदी और मेरठ गाजियाबाद एक्सप्रेस-वे के लिए उस जमीन को अधिग्रहीत कराकर उसका मुआवजा ले लिया। न केवल इतना बल्कि आर्विटेशन कोर्ट के माध्यम् से उन्होंने यह मुआवजा 10 गुना ज्यादा हासिल किया। रेट 617 रुपये वर्ग मीटर का था जबकि इनको 6500 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से मुआवजा दिया गया। इसमें घनश्याम सिंह के बेटे को 7 करोड़ 58 लाख रुपये की गैरकानूनी आमदनी हुई। घनश्याम की जांच मेरठ के आयुक्त प्रभात कुमार ने की। उन्होंने लिखा कि घनश्याम सिंह की बदनियती शुरू से ही स्पष्ट होती है। अपने बेटे के नाम जमीन खरीदने से पहले उन्होंने शासन की अनुमति नही ली जबकि यह अनिवार्य था। घनश्याम 1997 बैच के पीसीएस अधिकारी हैं और उनका रिटायरमेंट 2026 में है। लेकिन उनका निलंबन आगे चलकर बर्खास्तगी में बदलेगा या कुछ समय बाद वे सवेतन बहाली का इनाम पाकर संकट मुक्त हो जायेगे यह देखना होगा।क्योकि ज्यादातर निलंबित अधिकारियों के साथ इसी तरह अंत भला सो सब भला होता है।
केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनों ही जगह भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकारें बन जाने के कारण लोगों को इनसे भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था बनाने के संबंध में बहुत ज्यादा उम्मीदे हैं जो दुर्भाग्य से पूरी नही हो रही। मोदी और योगी दोनों ही मंच से भ्रष्टाचार का पूरी तरह सफाया कर देने का दम जरूर भरते हैं लेकिन व्यवहारिक तौर पर यह चरितार्थ न होने से लोगों को इससे सुकून मिलने की बजाय वितृष्णा हो रही है। कांग्रेस के जमाने में कई बड़े घोटाले सुर्खियों में रहे अब ऐसा कोई मामला सुर्खियों में नही आ पा रहा। लेकिन यह ट्रिक की कामयाबी हो सकती है, भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का प्रमाण नही। सही बात यह है कि नोटबंदी के समय गुजरात में महेश शाह जैसे मामूली आदमी के यहां मिली अरबों की नगदी का मामला रहस्यमय ढंग से दफन हो गया। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह की कंपनी को एक ही वर्ष में इतना भारी मुनाफा हो गया कि जैसे कुबेर वरदान में उन्हें पूरा खजाना दे गया हो। मोदी की मंहगी निजी विमान यात्राओं का औद्योगिक घरानों द्वारा बंदोबस्त किया जाना, उनकी एश्वर्य और भव्यता से परिपूर्ण शौकीन जीवन शैली और एक उद्योगपति के व्यवसायिक हित साधन के लिए उनका अनायास पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मियां नवाज शरीफ के यहां पहुंच जाना यह सब बातें ऐसी हैं जिनसे कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है के कयास जुड़ते हैं। शिव सेना भाजपा का सहयोगी दल है। इसके मुख पत्र सामना में कहा गया है कि भाजपा सबसे बड़ी दौलतमंद पार्टी है जो पैसे के दम पर उसके समेत सहयोगी दलों तक का भक्षण कर लेना चाहती है। अगर भाजपा का सहयोगी संगठन उस पर अंधाधुंध धन बटोर लेने जैसा आरोप लगा रहा है तो कहीं न कहीं उसमें सच्चाई जरूर होनी चाहिए।
वीपी सिंह जब प्रधानमंत्री थे तब उनकी निजी सफेदी पर कभी कोई दाग नही ढूढ़ा जा सका था। लेकिन तो भी लोग उनसे खुश नही थे। लोग कहते थे कि उन्होंने बोफोर्स का मुददा उठाया था जिससे यह आस पैदा हुई थी कि प्रधानमंत्री बनकर वे प्रशासन में रोजमर्रा के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा देगें जो जन सामान्य के उत्पीड़न और उनके अधिकारों के दमन का सबसे बड़ा कारण है। पर वे यह नही कर पाये तो एक तरीके से यह उनकी वायदा फरामोशी है। आज भी लोग सबसे ज्यादा तलबगार इसी पहल के हैं। उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार पर कंट्रोल के लिए पुलिस की तीन इकाईयां काम करती हैं सतर्कता, भ्रष्टाचार निरोधक और आर्थिक अपराध अनुसंधान। लेकिन यह तीनों संस्थायें सफेद हाथी बनी हुई हैं। लोकायुक्त को भी बेजान बना दिया गया है। भ्रष्टाचार विरोधी संस्थाओं के अधिकारी मुफ्त की रोटियां तोड़ रहे हैं। उनसे काम लेने की एक बार मायावती ने अपनी सरकार के समय सोची थी तब पीएल पुनिया उनके प्रमुख सचिव थे। उन्होंने जो भी पटटी पढ़ाई हो सभी इकाइयों को समन्वित करके कारगर ढंग से जुटाने का प्लान उस समय दफन कर दिया गया था। पर योगी सरकार अभी तक तो इस तरह की चर्चा भी नही कर सकी है। यह सरकार इन संस्थाओं को क्यों नही टारगेट दे रही है कि हर महीने इतने अधिकारी कर्मचारी ट्रेप करो। अगर इन संस्थाओं से काम लिया जा सके तो जनता पर टैक्स बढ़ाने की जरूरत ही नही पड़ेगी क्योंकि भ्रष्टाचार से अर्जित परिसम्पत्तियों की जब्ती से ही सरकारी खजाना लबालब हो जायेगा। लेकिन सरकार है कि नौकरशाही का इतना अदब कर रही है कि उसे छूना भी नही चाहती। उसकी मेहरबानी को भांपकर ही अधिकारियों और कर्मचारियों ने अपना रेट पहले से कई गुना ज्यादा बढ़ा लिया है। वे लोग इस बात से बहुत खुश हैं कि अब रेट भी ज्यादा मिल रहा है और मुख्यमंत्री का हिस्सा भी नही देना पड़ रहा। प्रदेश में नौकरशाही भ्रष्टाचार का जिस कदर नंगा नाच कर रही है उस पर प्रभावी रोक जरूरी है। शुरूआत में कम से कम 400-500 अधिकारी और कर्मचारियों को जेल भेजकर उनकी सम्पत्ति कुर्क करने की कार्रवाई होनी चाहिए तभी कुछ असर होगा। दो वरिष्ठ पीसीएस अधिकारियों पर कार्रवाई को व्यापक रूप से प्रसारित करने की जरूरत महसूस करके सरकार ने जताया है कि वह भ्रष्टाचार पर सख्ती को प्राथमिकता में रखने की जनभावना से अवगत हो चुकी है। तो क्या अब सरकार अभियान के स्तर पर इन कार्रवाइयों को बढ़ाते दिखेगी।







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