जालौन-उरई । प्रख्यात कवि व रंगकर्मी पूरन चंद्र मिश्र पूरन की कुटिया के पास स्थित बिरिया वाले महावीर मंदिर परिसर में वरिष्ठ साहित्यकार यज्ञदत्त त्रिपाठी की अध्यक्षता में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें रचनाकारों की रचनाओं ने श्रोताओं पर गहरा असर छोड़ा। जीवन के परिप्रेक्ष्य में रचनाओं ने सोचने को मजबूर किया।

प्रख्या कवि यज्ञदत्त त्रिपाठी ने यह रचना जो आज के स्वार्थ के समय हित साधने के लिए व्यवहार बढ़ाने वालों पर गहरा कटाक्ष करती है-उनसे लोग लिपटते लगते, जिनकी शक्ति पावर है। जिनसे किसी लाभ की आशा या अनिष्ट का डर है।

प्रख्यात बुजुर्ग व शरीर से अशक्त होने के बावजूद लगातार रचनाकर्म में लगे हुए पंडित पूरनचंद्र मिश्र ने मां सरस्वती की वंदना करते हुए यूं पढ़ी-मइया कस दो वीणा मेरी जैसी बज रही तोरी, को सुनाकर सभी सुधीजनों को ज्ञान की देवी मां सरस्वती के सामने श्रद्धावनत कर दिया।

क्रांतिकारी विचारों वाले डा. राधेश्याम योगी ने-चलने का धर्म यही रुको नहीं, लक्ष्य अगर पाना है तो रुको नहीं, सुनाई तो देर तक तालियां बजती रही। बुंदेलखंड के रसखान के नाम से मशहूर गजलकार नासिर अली नदीम ने प्रबल पीर सहते रहे कब तक रे मनमीत, विरह अग्नि दहते रहे कब तक रे मनमीत। को भी सराहा गया।

वरिष्ठ कवियत्री व गजलकार डा. रेनू चंद्रा ने-पृथक तुमसे स्वत्व अपना व्यर्थ ही कैसे जताऊ। रेनू हूं मैं तुम्हारी क्या विनय के गीत गाऊ। तथा यंू सताइए मुझको भूल जाइए मुझको भी खूब सराही गई। डा. अनुज भदौरिया ने अगर रिक्त हो जगह ह्दय में थोड़ा सा तुम हिस्सा दे दो पर जमकर तालियां बटोरीं।

इस दौरान सुभाष चंद्र शास्त्री, मानिक चंद्र मिश्रा, सुशील कुमार कुशवाहा ने भी अपनी रचनाएं सुनाई। डीवी कालेज के पूर्व प्राचार्य व कवियत्री स्वर्गीय डा. वीणा श्रीवास्तव के पति डा. अरुण श्रीवास्तव ने उद्देश्य परक कवि गोष्ठियों की सराहना करते हुए कहा कि इनसे समाज में जहां एक ओर साहित्यिक माहौल बनता है। वहीं नवोदित पीढ़ी में साहित्य के संस्कार पड़ते है। ऐसी कवि गोष्ठियों में पहुंचकर उन्हें लगता है कि कैसे कहीं वीणा भी आकर बैठी है। उन्हें यह एहसास सुखद लगता है।

 

 

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