बिहार में सामाजिक न्याय की राजनैतिक धारा अभी भी प्रभावशाली है। नीतिश राजद द्वारा हाल में किये गये घोटालों के भंडाफोड़ से असहज हैं। अगर नितिश राजद के साथ सुगमता से काम नही कर पा रहे थे तो भाजपा के साथ भी उनकी स्थिति कुछ विशेष नही सुधरी है। सामाजिक न्याय की धारा में लालू उनके मुकाबले में पहले से ही आगे हैं। इसलिए नीतिश अपनी साख बचाने के लिए इससे जुड़े मुददों को उठाने में लग गये हैं। उन्होंने निजी क्षेत्र में भी दलितो, पिछड़ो व आदिवासियों के लिए आरक्षण की मांग कर डाली है। उनका यह शिगूफा बसपा सुप्रीमों मायावती को रास नही आया। उन्होंने कहा है कि नीतिश इसकी मांग करने की बजाय इसे लागू करके दिखायें हालांकि मायावती खुद उत्तर प्रदेश में पूरे पांच साल के कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री रहने के दौरान इस पर ईमानदारी से अमल नही कर पाईं थीं। उन्होंने सरकारी ठेकों व आपूर्ति में भी दलितों के आरक्षण की व्यवस्था कर दी थी लेकिन यह कार्रवाई प्रतीकात्मकता तक सिमटी रही। उनकी पार्टी सीलिंग को सही तरीके से लागू कर भूमिहीन दलितों में अतिरिक्त जमीन बांटने की बात करती रही थी लेकिन यह कदम उठाने का साहस भी मायावती नही दिखा सकीं।
यह विपर्यास है कि सामाजिक न्याय के मामले में ज्यादा ठोस कार्रवाइयां सवर्ण नेताओं के माध्यम से हुईं। राजीव गांधी ने पंचायती राज और स्थानीय निकाय संस्थाओं में आरक्षण के लिए संसोधन कराया। सामाजिक परिवर्तन में उनके इस प्रयास का बड़ा योगदान है। जमीनी स्तर पर वंचित जातियों का नेतृत्व तैयार और विकसित करने में इससे ऐतिहासिक कामयाबी मिली। नतीजतन सामाजिक जड़ता को काफी हद तक तोड़ा जा सका। मंडल आयोग की रिपोर्ट वीपी सिंह ने लागू की भले ही इसकी वजह से उन्हें खलनायक का दर्जा दे दिया गया लेकिन उनके इसे लागू करने के तरीके से ऐसा बबंडर उठा कि देश का राजनैतिक चरित्र ही बदल गया। बहुजन को सत्ता के केंद्र में लाने में इस बबंडर ने बड़ी भूमिका अदा की। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए दिग्विजय सिंह ने दलितों के आरक्षण के मामले में डायवर्सिफिकेशन के लिए कारगर तरीके से शुरूआत की। अर्जुन सिंह ने मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू कराने की बहस को तेज किया। साथ ही तकनीकी और प्रबंधन संस्थानों के प्रवेश में तमाम विरोध के बावजूद आरक्षण को लागू कराया।
समावेशी व्यवस्था के लिए अमेरिका और कनाडा जैसे विकसित देशों में आरक्षण को लागू करके तार्किक परिणति तक पहुंचाया गया। जिससे इन देशों को और ज्यादा ताकत मिली। हालांकि इस देश में परंपरागत रूप से सत्ता पर काबिज रहा एक बड़ा वर्ग ऐसा जाहिर करता है कि जैसे आरक्षण का अपराध केवल इस देश के लोगों के साथ किया गया है। साथ ही वे इसे देश को कमजोर करने वाला उपक्रम साबित करने में पूरी ऊर्जा झोंकते रहते हैं।
भाजपा के सत्तारूढ़ होने के बाद आरक्षण को खत्म करने की मांग करने वालों के हौसले बुलंद हैं। साथ ही योजनाबद्ध तरीके से इसके लिए प्रयास भी शुरू कर दिये गये हैं। सुधबुध खो चुके बहुजन में इसका प्रतिकार भी नही देखा जा रहा। लेकिन अंततोगत्वा आरक्षण का अधूरा समापन सामाजिक स्थायित्व के लिए खतरा साबित होगा जिससे राष्ट्रीय अखंडता भी प्रभावित हो सकती है। हालांकि नीतिश की निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग पहली नजर में गंभीर प्रतीत नही होती। लेकिन इससे यह साबित हो जाता है कि चतुर और दूरदर्शी नेता अभी भी इसमें दूरगामी राजनैतिक लाभ की आशा देखते हैं।

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