
गुजरात में विधानसभा के मौजूदा चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं की धड़कने बढ़ी हुई हैं। नरेंद्र मोदी भले ही आज प्रधानमंत्री हैं लेकिन आज भी उनकी लोकप्रियता का आइना गुजरात में ही देखा जाता है। इसलिए गुजरात के नतीजे अनुकूल न रहे तो राष्ट्रीय क्षितिज पर भी उनकी लोकप्रियता का सूर्य डूबने की तस्वीर उभरने लगेगी। नरेंद्र मोदी इस बात को समझते हैं इसलिए गुजरात विधानसभा के चुनाव में करो या मरो की मुद्र साधकर वे निजी तौर पर कंूद पड़े हैं। एक प्रधानमंत्री के लिए जितनी व्यस्तताएं होती हैं उनकी परवाह उन्होंने गुजरात में ताबड़तोड़ कई कार्यक्रम व सभाएं आयोजित करके छोड़ दी है।

गुजरात को लेकर भाजपा की घबराहट बार-बार छलक रही है। नरेंद्र मोदी को शिलान्यास, लोकार्पण और घोषणाओं की झड़ी गुजरात में लगानी थी इसके लिए उनकी प्रस्तावित सभा को देखते हुए हिमांचल प्रदेश के साथ गुजरात विधानसभा के चुनाव कार्यक्रम की घोषणा नही होने दी गई इसमें चुनाव आयोग की बहुत किरकिरी हुई।
पटेलों के आरक्षण के मुददे पर नाराजगी से भाजपा के गुजरात में किले की नीव धंसकना शुरू हुई थी लेकिन हार्दिक पटेल का जज्बाती आंदोलन समग्रता में समर्थन किये जाने योग्य नही है। पर अन्य ओबीसी जातियां और दलित भी भाजपा से नाराज हैं। केंद्र और प्रदेश में भाजपा के सत्ता में छा जाने के बाद से सामाजिक उपनिवेशवाद को पूरी ताकत मिलने का अनुमान पहले से ही था और यह हुआ भी क्योंकि भाजपा जिन कर्मकांडों को धर्म के नाम पर बढ़ाती है वे इसके लिए लक्षित हैं। इस कारण ओबीसी और दलित सारे देश की तरह गुजरात में भी राज सत्ता और समाज सत्ता के केंद्र से छिटक गये हैं। गौर करने वाली बात यह है कि भाजपा का विकास का जो माॅडल है उसकी वास्तविकता को भोगने के बाद इस बार राज्य में मोदी और भाजपा के खिलाफ जनाक्रोश का विस्फोट हो रहा है। शिक्षा, चिकित्सा जैसी जीवन के लिए बेहद जरूरी सेवाएं आम आदमी की पहुंच से इस माॅडल के चलते बहुत दूर चली गईं हैं। रोजगार के भी अवसर घटे हैं। इसके अलावा निजी क्षेत्र में जिनकों रोजगार मिला भी है वे अमानवीयता की हद तक शोषण को अनुभव कर रहे हैं।
यह अजीब विरोधाभास है एक ओर भाजपा भारतीय संस्कृति के गौरव और पहचान की बहाली पर बल देती हैं, दूसरी ओर व्यवहारिक तौर पर वह वैभव व एश्वर्य के प्रति दीवानगी की हद तक लालायित रहती है। साथ ही ऐसे तौर-तरीकों के प्रति आकर्षित है जिससे आत्म पहचान के सारे नामेनिशान मिट जायें। ऐसे ही कारणों से भारत का पतन प्राचीन काल में हुआ था जब देवी-देवताओं के ऐंद्रजालिक ग्लेमर को देखकर ऋषियों के भी मन डोले और वे भी त्याग, तपस्या भूल कर चकाचैंध की ओर चल पड़े। आज चकाचैंध की आंधी तथाकथित आधुनिक ऋषियों, मुनियों के सामने सत्ता के साष्टांग होने के बाद किस कदर प्रचंड हो गई है यह बताने की आवश्यकता नही है। संघ परिवार के दिग्गजों के लिए यह सोचनीय विषय है कि उन्होंने जिस मिशन के लिए अपना जीवन समर्पित किया क्या उनके अर्जुन उसे साकार करने की चिंता कर रहे हैं।
बहरहाल गुजरात में राहुल गांधी को जो रिस्पाॅस मिला है उससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक अंदर से हिल गये हैं। जो मुददे उठाये जा रहे हैं उनका जबाब देने की बजाय वे लड़ाई को गुजराती बनाम बाहरी के बीच केंद्रित करने की रणनीति को धार दे रहे हैं, हालांकि यह बेहद घटिया नीति है। शिखर पर बैठे नेता की विवशता होती है कि वह अपनी साख के नीचे नही जा सकता भले ही कितना भी कठिन संघर्ष का सामना उसे हो। प्रधानमंत्री ने अपनी सभाओं में कहा कि कांग्रेस ने मोरारजी देशाई का विरोध करके गुजरातियों का अपमान किया था। यह सड़क छाप भाषण का प्रमाण है। इसके जबाव में कोई यह कैसे कह सकता है कि मोदी और भाजपा पंडित जवाहर लाल नेहरू की आलोचना करके उत्तर प्रदेश का अपमान कर रहे हैं। फिर भी नरेंद्र मोदी की प्रपंच शक्ति से लोग भली भांति परिचित हो चुके हैं। इसलिए जो कटटरता की हद तक गुजरात में उनका विरोध कर रहे हैं उन्हें भी कांग्रेस का सफल होना इतना आसान नही लगा रहा। गुजरात का नतीजा जो भी हो लेकिन यहा एक सवाल यह भी उठता है कि संचार साधनों के इतने विकास से मानवीयता को कोई लाभ हुआ है या समाज इनके दुरुपयोग के चंगुल में फंस गया है। आज इसकी बाजीगरी के इस्तेमाल में माहिर लोग हर क्षेत्र में भगवान बनने की सीमा तक छाये जा रहे हैं। लोग संचार साधनों द्वारा सृजित वितंडा के प्रभाव में सम्मोहित सी स्थिति में खिचे चले जाते हैं। लेकिन जब उनकी तंद्रा टूटती है तो वे अपने को ठगा सा महसूस करते हैं। लेकिन फिर भी अपने आपको अगली बार भी ऐसी स्थितियों से बचा नही पाते। संचार क्रांति कहीं अच्छाई पर बुराई की जीत की कला तो नही बन गई है।







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